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Friday, November 29, 2024
नीचे बहती गंगा मैया , ऊपर चले रेल का पहिया
Monday, November 25, 2024
यहाँ सुकून से हैं
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Wednesday, November 20, 2024
फेसबुक के पाठक
फ़ेसबुक पर कुल क़रीब 3 अरब मतलब 300 करोड़ लोगों के खाते हैं। इनमें क़रीब 38 करोड़ भारत के लोग हैं।
Tuesday, November 19, 2024
देख लेते हैं तेरा क्या लेते हैं?
देख लेते हैं तेरा क्या लेते हैं?
Saturday, November 16, 2024
भारत में बदलाव के क्रांति से ही हो सक़ता है-जस्टिस मार्कण्डेय काटजू
-भारत में 10000 साल से लोग बाहर से आ रहे हैं।
जीवन बदल देने वाली घटनायें
'जीवन बदल देने वाली घटनायें' कानपुर के यायावर गोपाल खन्ना के जीवन के कुछ संस्मरणों का संकलन है। गोपाल खन्ना जी मूर्तिकला, चित्रकला, फ़ोटोग्राफ़ी ,काष्ठकला , रोमांचक भ्रमण एवं रोमांचक खेलों से जुड़े रहे हैं। काव्य एवं कथा लेखन से भी संबद्ध रहे है। घुमक्कड़ी से लम्बे समय तक जुड़ाव और विभिन्न अभियानों के चलते नाम के पहले यायावर स्थाई रूप से जुड़ गया। यायावरी से संबंधित लेख और संस्मरण भी लिखते रहे हैं। एकल एवं सामूहिक कला प्रदर्शनियों में प्रतिभाग करते रहे हैं। उनके 100 से अधिक मूर्तिशिल्प अमेरिका, कनाडा , इंग्लैंड , स्विट्ज़रलैंड ,दुबई ,पाकिस्तान व जापान आदि देशों के व्यक्तिगत संग्रहालयों में संग्रहीत हैं।
2008 में बैंक आफ बड़ौदा से सेवानिवृत्त 76 वर्षीय गोपाल खन्ना जी के संग्रह ख़ज़ाने ने 2000 से अधिक प्राचीन एवं समकालीन खिलौने , सिक्के , शंख , सीप ,पत्थर ,मेडल्स , पिक्चर पोस्टकार्ड और अनेक प्राचीन वस्तुएँ शामिल हैं। निरंतर सृजन शील यायावर गोपाल शहर के लगभग हर सांस्कृतिक ,सामाजिक आयोजन में शामिल होते रहते हैं। उनकी सक्रियता अनुकरणीय है।
खन्ना जी ने दो दिन पहले फ़ोन पर सूचित किया कि उनकी संस्मरण पुस्तक 'जीवन बदल देने वाली घटनायें' का विमोचन 15.11.2024 को यूनाइटेड पब्लिक स्कूल में होना हैं। आने का अनुरोध किया। हमने हामी भारी और जाने का तय किया।
यूनाइटेड पब्लिक स्कूल में दो साल पहले मृदुल कपिल की किताबों 'मोहब्बत 24 कैरेट' का भी विमोचन हुआ था। वह किताब अपने में अनूठी है।
कल समय पर पहुँचे। कुछ ही लोग आए थे उस समय तक। धीरे-धीरे सभागार भर गया। कानपुर के माननीय सांसद रमेश अवस्थी जी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। व्यस्तता के कारण वे थोड़ा विलम्ब से आए और कुछ देर सुनकर अपनी बात कहकर चले गए।
कार्यक्रम में विभिन्न वक्ताओं ने किताब में सम्मिलित संस्मरणों के बारे में अपनी राय व्यक्त की। कुल जमा 110 पेज की किताब में कुल 57 संस्मरण हैं। अधिकतर संस्मरण गोपाल खन्ना जी के बचपन और नौकरी के समय के हैं। रोज़मर्रा के जीवन के ये संस्मरण एक संवेदनशील मन के संस्मरण हैं। इनमें घर परिवार से जुड़े लोग हैं, दोस्त हैं, अध्यापक हैं, पड़ोसी हैं, बच्चे हैं , बुजुर्ग हैं। एक तरह के 'सामाजिक संदेश' हैं ये संस्मरण।
वक्ताओं के विचार के बीच में माननीय सांसद जी का वक्तव्य हुआ। लगभग हार बात में माननीय प्रधानमंत्री जी और माननीय मुख्यमंत्री जी का ज़िक्र। राजनीति से जुड़े लोगों की यह मजबूरी सी होती है कि वे हर मंच को अपनी पार्टी के प्रचार के लिए उपयोग करें। सांसद जी ने शहर में नए पुस्तकालय खुलवाने की योजना बनाकर देने की बात कही। इस पर वहाँ मौजूद वक्ताओं में से एक सुरेश अवस्थी जी ने शहर के मौजूदा पुस्तकालयों जैसे मारवाड़ी पुस्तकालय, फूलबाग पुस्तकालय आदि के सुचारु संचालन की व्यवस्था करने का आग्रह किया। सांसद महोदय जी ने आश्वासन दिया। विदा हुए।
गोपाल खन्ना जी ने भी अपने किताब में सम्मिलित संस्मरण में से कुछ सुनाए। एक रोचक संस्मरण में उन्होंने बताया कि पहाड़ की एक यात्रा के दौरान उन्होंने एक युवा महिला का फ़ोटो खींचा था। उसको फ़ोटो भेजने की बात भी कही थी। किसी कारणवश फ़ोटो भेज नहीं पाए। भूल गए। फिर जाना नहीं हुआ। संयोगवश क़रीब बीस-बाइस साल बाद वहीं गए तो फ़ोटो साथ लेते गए। उस महिला की खोज की जिसकी फ़ोटो खींची थी उन्होंने। पता चला उसकी शादी हो गयी और वह कहीं दूर रहती है। लेकिन उसकी बेटी पास ही रहती है। बेटी से मुलाक़ात हुई। बेटी एकदम उसी तरह लग रही थी जैसी बीस बाइस साल पहले उसकी माँ दिखती थी। गोपाल खन्ना जी ने फ़ोटो बेटी को दे दिए कि वो अपनी माँ को देगी। विदा होने के पहले लड़की ने पूछा -'माँ से कुछ कहना तो नहीं है?' इसका कोई जबाब यायावर जी के पास नहीं था।
और भी किस्से सुनाए गोपाल खन्ना जी ने। अच्छा लगा उनको सुनना। उनके संस्मरण एक उदात्त मन के सहज व्यक्तित्व के संस्मरण हैं। सभी में यह ध्वनित होता है कि दुनिया भले ही कितनी ही बदल रही हो , कितनी ही व्यावसायिक मतलबी हो रही हो लेकिन आज भी संवेदनशील भावों का महत्व है। अच्छाई , उदारता और अच्छा समझा जाने वाला काम तुरंत करने के लिए प्रेरित करने वाले संस्मरण हैं 'जीवन बदल देने वाली घटनायें' में।
हमने सोचा था कि समारोह के बाद किताब ख़रीदेंगे। लेकिन समारोह ख़त्म होने के पहले ही सभी को एक-एक किताब भेंट की गई। साथ में नाश्ता भी।
घर लौटकर किताब पढ़नी शुरू की। कल रात से लेकर आज सुबह तक सभी 57 संस्मरण पढ़ लिए। 110 पेज की किताब 24 घंटे से कम के समय में पढ़ ली जाए यह अपने आप में उसकी पठनीयता और रोचकता का परिचायक है। सभी संस्मरण पाठक के जीवन से जुड़े संस्मरण लगते हैं। यह यायावर गोपाल खन्ना जी के लेखन की सफलता है। मैं इसके लिए उनको बधाई देता हूँ।
Friday, November 15, 2024
शरद जोशी के पंच -22
1. कुछ धक्के पाप की श्रेणी में नहीं आते। वे पुण्य की श्रेणी में आते हैं। उसे कहते हैं धरम-धक्का। मतलब, जब आप दर्शन के लिए ,प्रसाद लेने के लिए या नदी में स्नान करने के लिए दूसरों को धक्का देते हैं, तो वह धरम-धक्का कहलाता है।
2. अमेरिका के क्या कहने ! वह बड़ा पाक-साफ़ दूध का धुला है। वह छोटे-बड़े सभी शास्त्रों का प्रसारक है। हर जगह आग उसके ही भड़काए भड़कती है। उसकी एजेंसियाँ सर्वत्र मौत की सौदेबाज़ी और सुविधाएँ उत्पन्न करने में प्रवीण हैं। वह हत्यारा बनने की आकांक्षा पाले है। मौक़ा मिलते ही वार करता है। फिर भी वह न्यायाधीश की ऊँचाई पर बैठ अंतिम निर्णय देता है।
3. छोटा आतंक ज़मीन पर खड़ा हथगोला फेंकता है, बड़ा आतंक समुद्र और आकाश से शहरों पर बमबारी करता है।
4. जो कारण-अकारण, काम की बेकाम की , फिर चाहे समझदारी या मूर्खता की बात करता रहता है, उसकी नेतागीरी मज़बूत रहती है।
5. इस देश की जनता से जुड़े रहने के लिए एक नेता को कितने अख़बारों में क्या-क्या नहीं कहना पड़ता है। पत्रकार को आते देख मुस्कराना पड़ता है, फ़ोटोग्राफ़र को आते देख गम्भीर होना पड़ता है। दूसरे दिन उस अख़बार में अपनी बात तलाशनी पड़ती है क़ि जो उसने कहा वह छपा या नहीं और जो छपा वह चमका या नहीं।
6. नेता शब्दों के भूसे का उत्पादन करते रहते हैं और देश की जनता उनमें से एक समझदारी का, तथ्य का ,विचार का दाना तलाशती रहती है।
7. भारतीय पत्रकार की यह दैनिक ट्रेजिडी है कि वह एक दाने की तलाश में नेता के पास जाता और शब्दों का भूसा लेकर कार्यालय लौटता है।
8. यह अजीब ट्रेजिडी है कि इस देश में अपनी बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए आदमी का लखपति होना ज़रूरी हो गया है।
9. जब स्टेशन की साफ़-सफ़ाई होने लगे तो समझिए ,रेलवे का कोई बड़ा अफ़सर मुआयने के लिए आ रहा है।
10. अफ़सरों पर दोहरा भार है। जनता के साथ धोखेबाज़ी करो, उसे मूर्ख बनाओ , साथ में प्रधानमंत्री को भी धोखे में रखो ताकि उन्हें सचाई पता न लग सके।
Thursday, November 14, 2024
शरद जोशी के पंच-21
1. हमारा राष्ट्रीय स्वभाव है कि जब हम एक बार किसी को अपना शत्रु मान लेते हैं , तो फिर उससे लड़ते नहीं। समझौते का प्रयास करते हैं।
2. यदि सरकार अपनी बुराई स्वयं न करे, तो लोग उसकी बुराई करने लगते हैं।
3. अख़बार की खबरें पढ़ना बावन पत्तों को बार-बार फेंटकर देखने की तरह है। हर पत्ता एक खबर है। उनमें से ही जैसे पत्ते निकल आएँ, वह आपका आज का समाचार से भरा अख़बार है। उन्हीं पत्तों की नई सजावट। चूड़ी के टुकड़ों से सजा एक नया फूल। आपके देश की ताज़ा तस्वीर , जो पुरानी तस्वीर से रंग चुराकर बनाई गई है।
4. जब भी साजिश होती है, भांडे फूटते हैं, पत्रकार का मुँह बंद करने की उचित व्यवस्था की जाती है। यों मान जाए तो ठीक है, नहीं तो हाथ-पैर तोड़ देने से लाश ठिकाने लगा देने तक का सारा इंतज़ाम करना वे जानते हैं।
5. सरकारें जो भी हों, मैं वित्तमंत्रियों से सदा प्रभावित रहा हूँ। उसे मैंने सत्ता के रहस्य-पुरुष की तरह महसूस किया है। वह कुछ करेगा। क्या करेगा , कह नहीं सकते मगर कुछ करेगा। हो सकता है, ग़लत ही करे, मगर किए बिना नहीं रहेगा।
6. मुझे लगता है, कई बार ऐसे क्षण आए होंगे , जब क्रांति हो सकती थी, पर इसलिए नहीं हुई कि तभी वित्तमंत्री ने आलू-प्याज़ के भाव बढ़ा दिए और लोग बजाए क्रांति के आलू-प्याज़ पर सोचने लगे। इस तरह देखा जाए तो इतिहास-पुरुष होते हैं वित्त-मंत्री।
7. आर्थिक क्षेत्र की सारी सारी गुत्थी इस दर्शन से सुलझ सकती है कि जो सफ़ेद कमाई करते हैं, वे टैक्स भरेंगे और जो काली कमाई करते हैं , सरकार उन्हें छूट देगी, क्योंकि सरकार काली कमाई से अपना कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती। काली कमाई की सहायता से राजनीतिक पार्टी चल सकती है, मगर सरकार नहीं।
8. पूरे देश में जो कुकरमुत्तों की तरह तथाकथित लघु उद्योग बने हैं , उनमें अधिकांश को न माल बनाना आता है और न बेचना आता है। उन्हें एक्साइज बचाना आता है। टैक्स न चुकाना आता है। इस क्षेत्र में कूद पड़ने की उनकी प्रेरणा भी यही रही है। यदि उत्पाद शुक्ल देना पड़े तो उन्हें स्वयं को बीमार उद्योग घोषित करते देर नहीं लगती।
9. आदिवासी की ओर देखो तो संस्कृति कम और ग़रीबी अधिक नज़र आती है। वे ज्ञानी-ध्यानी सचमुच बड़े बेरहम हैं, जो आदिवासियों में संस्कृति के दर्शन किया करते हैं। उनकी हालत देख , उनके साथ बजाय नाचने के, जेब का पैसा बाँटने की इच्छा होती है।
10. आम भारतीय नागरिक की ज़िंदगी ही धक्के खाने की है। अधिकांश का पूरा जीवन धक्के खाते बीत जाता है। स्कूल में एडमिशन के लिए धक्के खा रहे हैं, जवानी में नौकरी के लिए और बुढ़ापे में पेंशन के लिए। बम्बई का आदमी रोज लोकल ट्रेन में दोहरा धक्का सहन करता है। सामने से उतरने वाले धक्का दे रहे हैं, पीछे से चढ़ने वाले। पर लाइन लगवाने वाली सभ्यता ,पता नहीं , रेल के डिब्बों के दरवाज़े पर कहाँ ग़ायब हो जाती है।
Tuesday, November 12, 2024
मोबाइल है या हथगोला
Monday, November 11, 2024
शरद जोशी के पंच-20
1. एक जमाने में राजसूय यज्ञ करने वाले राजपाट छोड़ देते थे, और आज अनिश्चित कुर्सियों के इस देश में एक मुख्यमंत्री, जिसे सौ तिकड़म और उठा-पटक करने के बाद बतौर भीख और इनाम के मुख्यमंत्री पद मिलता है ,उसे त्यागते या निकाले जाते समय किटाने क्रियाकलाप करता है। अंतिम क्षण तक चिपके रहने की सम्भावना खोजी जाती है।
2. राजनीतिज्ञों की एक अदा है ,मौक़े पर चुप्पी मारना। कुछ लोग सिर्फ़ यह कहने के लिए पत्रकारों को बुलाते हैं कि मुझे कुछ नहीं कहना।
3. राज्यों में भ्रष्टाचार बढ़ता रहता है और वहाँ का समझदार वर्ग मन ही मन सोचता रहता है कि कब मंत्रिमंडल बदले। वह एक बयान नहीं देगा, कोई पहल नहीं करेगा। लोग सच भी स्वार्थवश बोलते हैं। अपना कोई लाभ नहीं तो सच बोलकर क्या करना ?
4. हमारा राष्ट्रीय चरित्र खिलाड़ियों का नहीं, दर्शकों का रहा है। जो जीता उसे कंधे पर उठाया , जो हारा उसे हूट करने लगे। साफ़ नहीं चिल्लाकर कहते कि हम किसके साथ हैं। छत पर चढ़कर आवाज़ लगाने का साहस अपने घर पर पत्थर पड़ने के डर से समाप्त हो जाता है।
5. लोग जब अति चतुराई बरतने लगते हैं ,तब न बड़ी क्रांति होती है और न छोटी। छोटे परिवर्तन होते भी हैं तो विकल्प उतना ही व्यर्थ होता है।
6. नए नेता को कुर्सी मिलने वाली है। कचरा- पेटी में से जिसे उठाकर इस कुर्सी पर बिठा दिया जाएगा , लोग हार-फूल लेकर उसकी तरफ़ दौड़ेंगे। राज्य के विधायक इतना तो कह सकते हैं कि हमें एक अच्छा मुख्यमंत्री दो। हम मूर्ख और भ्रष्ट को सहन नहीं करेंगे। पर इतना कहने से ही विद्रोही मुद्रा बनती है। भविष्य ख़तरे में नज़र आता है। जो भी मिल जाए ,स्वीकार है।
7. किसी भी प्रदेश में मुख्यमंत्रियों के कमी नहीं है। ग़ालिब एक ढूँढो हज़ार मिलते हैं। पर सारे मुरीद तो एक अदद कुर्सी पर लड़ नहीं सकते। मुख्यमंत्री का पद एक टूटी पुरानी कुर्सी है। लम्बा आरामदेह सोफ़ा नहीं। यदि संविधान में इस पद को सोफ़ा-कम-बेड बनाने की गुंजाइश होती तो आज उस पर कितने पसरे मिलते।
8. मुख्यमंत्री चुनना सुंदरियों की भीड़ में एक अदद परसिस खंबाटा चुनने की तरह कठिन है। केंद्र से निर्णय फ़ीता लेकर आते हैं। सबकी राजनीतिक कमर नापते हैं। क़द, कोमलता ,मुस्कान और अन्य टिकाऊ गुण जाँचते हैं और घोषित करते हैं , यह रहा तुम्हारा भावी मुख्यमंत्री।
9. मुहावरों के उपयोग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि लोग कथ्य से अधिक भाषा के चमत्कार में रुचि लेने लगते हैं। हम लेखक प्रायः यह ट्रिक अपनाते हैं। जब कहने की बात नहीं रहती तब हम शब्दों को अधिक रंगीन और ज़ोरदार बनाने की कोशिश करते हैं।
10. अब काला धन सात तालों में है ही नहीं। अधिकांश काल धन खुले में घूमता , घुमाया जाता है, उपयोग होता नज़र आता है। खुली आँखों नज़र आता है। मसाले के पान , फ़ाइवस्टार के पैकेट, व्हिस्की की बोतल, शानदार पार्टी, पाँचतारा संस्कृति ,विदेशी माल, बेहतरीन कार और आलीशान इमारतों तक काला धन तालों में छुपकर बैठा नहीं, बल्कि लगभग नग्न अवस्था में दिखाई पड़ता है।
Saturday, November 09, 2024
नवीन मार्केट की सड़क पर
नवीन मार्केट की सड़क पर
Friday, November 08, 2024
स्टेशन निकल आया
शहर में बहुत भीड़ है। सड़कें गाड़ियों के नीचे दबी हैं। फुटपाथ पर या तो दुकानदारों का क़ब्ज़ा है या बेघरबार लोग अपना अस्थाई ठिकाना बनाए हुए हैं।
जहां-जहां मेट्रो बन रही है वहाँ सड़क तीन भागों में बंट गयी है। बीच का भाग मेट्रो बनाने के लिए घेरा गया है। बाक़ी सड़क आने-जाने के लिए छोड़ दी गयी है। चलो रेंगते हुए, बचते-बचाते।
कल सीटीआई चौराहे से विजय नगर की तरफ़ आते हुए देखा बड़ा गड्ढा ख़ुदा हुआ है। विजय नगर के नाले (गंदा नाला) समानांतर दस मीटर लम्बा गड्ढा। एक बच्ची वहाँ कुर्सी पर बैठी उबासी लेती सड़क से लोगों, वाहनों को गुजरते देख रही थी। बग़ल में कई झोपड़ियाँ बनी हैं। एकदम नाले के ऊपर। वर्षों से ये झोपड़ियाँ ऐसे ही ही बनी हुई हैं। किसी भी तरह के परिवर्तन, विकास-विकास की औक़ात नहीं क़ि इनका बाल-बाँका कर सके।
बच्ची से झोपड़ी के बग़ल में खुदे गड्डे के बारे में पूछा तो उसने बताया -'यहाँ स्टेशन निकल आया है। वही बनेगा।'
स्टेशन निकल आया मतलब मेट्रो स्टेशन। शायद विजय नगर मेट्रो स्टेशन। स्टेशन बनेगा तो झोपड़ियाँ हटेंगी। कुछ नया बनने के लिए पुराना हटेगा ही। हटाने से याद आया कि इस बीच विजय नगर चौराहे पर लगी महाकवि भूषण की मूर्ति भी हट चुकी है।
बच्ची से पूछा कि फिर तुम कहाँ जाओगी? उसने कुछ जवाब नहीं दिया। सोच रही होगी शायद -'इस बेवक़ूफ़ी भरी बात का क्या जवाब दिया जाए?'
वहीं पास खटिया पर लेते एक आदमी से बात की। पता चला पास बैठी बच्ची और बग़ल में खेलते बच्चे का पिता है वह। खटिया और उसपर के बिस्तर वर्षों से ऐसे ही पड़े लग रहे थे।
पता चला वो 42 साल से यहीं रह रहा है । बस्ती घर है लेकिन रहता यहीं है। पत्नी बस्ती में है। बच्चे इसके साथ। होटल में खाना बनाने का काम करता है। बच्चों के लिए भी वही बनाता है। बच्चे पढ़े नहीं। स्कूल गए होंगे लेकिन स्कूल और बच्चे एक-दूसरे को रास नहीं आए होंगे।
स्टेशन बनाने के लिए झोपड़ी हटेगी तो कहाँ जाओगे पूछने पर बताया -'देखेंगे कहीं जुगाड़। अभी तो हफ़्ते भर की मोहलत मिली है।
हफ़्ते भर बाद जिसका ठीहा उजड़ने वाला है वो आराम से खटिया पर लेता हुआ है। पता चला -' कंधे पर चोट लग गयी । इसलिए काम पर भी नहीं जा पाया।'
आदमी से पूछने पर पता चल कि उसका न आधार कार्ड है , न राशन कार्ड , न वोटर कार्ड। अलबत्ता मोबाइल है पास में। बिना किसी पहचान के ज़िंदगी जी रहा है बंदा।
आधार कार्ड न बनवाने के पीछे कारण बताया -'काम में लगे रहे। बनवा ही नहीं पाए।अब बताते हैं लोग कि दो हज़ार रुपए लगेंगे बनवाने के।'
आगे एक झोपड़ी के बाहर तीन महिलाएँ-बच्चियाँ एक के पीछे एक बैठी-खड़ी बाल काढ़ रहीं थीं, जुएँ बिन रहीं थीं। सबसे आगे वाली महिला ज़मीन पर बैठी थी, उसके पीछे बच्ची खटिया पर बैठी उसके बाल संवार रही थी, उसके पीछे खड़ी बालिका उसके जुएँ बिन रही थी। सब मिलकर अपने समय का दिन दहाड़े क़त्ल कर रहीं थीं।
समय काटने के समाज के हर वर्ग के अपने-अपने उपाय होते हैं। कोई जुएँ बीनते हुए बाल बनाते हुए , कोई लड़ते-झगड़ते, कोई बुराई-भलाई करते, कोई हऊजी-पपलू खेलते पार्टी करते , कोई रोते-झींकते, कोई दुनिया को बरबाद करते और कोई दुनिया की चिंता करते हुए समय बिताता है। हरेक के अपने जायज़ बहाने होते हैं समय बिताने के।
आगे सिग्नल लाल था। एक बच्ची लपक-लपक कर गाड़ियों की खिड़कियाँ खटखटा कर माँग रही थी। हमारी दायीं तरफ़ की खिड़की खुली थी वह उससे सटकर कुछ माँगने लगी।
बच्ची ने बताया-' सुबह से कुछ खाया नहीं। भूख लगी तो माँगने आ गए।'
'सुबह की बजाय दोपहर में क्यों आई माँगने?' -हमने ऐसे पूछा गोया हम उसकी अटेंडेंस लगा रहा हों।
'हमने सोचा घर में होगा कुछ खाने को। इसलिए सुबह नहीं आए। अभी मम्मी से से पूछा तो उसने बताया कुछ है नहीं तो आ गए माँगने।'- बच्ची ने बताया।
मम्मी किधर हैं? मेरे पूछने पर बच्ची बच्ची ने बताया -' बहन को नहला रही हैं हैण्डपम्प पर।'
पास में हैण्डपम्प पर एक महिला बच्ची के सर पर पानी डालकर नहलाती दिखी।
बच्ची मेरी खिड़की से सटी खड़ी थी। उसके माँगने की बात मेरे ज़ेहन में थी लेकिन देने की इच्छा कमजोर सी क्योंकि पर्स पीछे था। बग़ल में रखे होते पैसे तो शायद फ़ौरन दे भी देते। दिमाग़ ने हाथ को आदेश दिया पर्स निकालने के लिए लेकिन हाथ ने आदेश के पालन में लालफ़ीताशाही का मुजाहरा किया। टाल गया दिमाग़ का आदेश। दिमाग़ को लगा उसने आदेश कर दिया अब उसकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हुई। दुनिया में परोपकार के तमाम काम इसी तरह टलते रहते हैं।
इस बीच दिमाग़ में फिर कुलबुलाहट हुई और बच्ची से पूछा -' स्टेशन बनने पर झोपड़ी हटेंगी तो कहाँ जाओगी तुम लोग?'
उसने कहा -' कहीं डाल लेंगे पन्नी।'
इस बीच सिग्नल हरा हो गया। हम गाड़ी हांक कर आगे बढ़ गए। बच्ची दूसरे लोगों के आगे-पीछे घूमते हुए माँगने लगी।
Thursday, November 07, 2024
ट्रम्प की जीत के मायने
कल अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आए। डोनाल्ड ट्रम्प को अमेरिकी लोगों में दुबारा अपना मुखिया चुना। कमला हैरिश हार गयीं। शायद अमेरिका अभी महिला राष्ट्रपति चुनने के लिए तैयार नहीं है। महिलाओं वोटिंग का अधिकार भी देर से मिला था अमेरिका में। मुखिया भी चुनी जाएँगी कभी भविष्य में।

