Sunday, November 24, 2013

समझनें में चूक और ययाति के वंशज

http://web.archive.org/web/20140420081826/http://hindini.com/fursatiya/archives/5173

समझनें में चूक और ययाति के वंशज

बच्चीआजकल एक पत्रकार का नाम चर्चा में है। बुढौती में जवानी के तेज ने ऐसा जकड़ा कि साथ की तरुणी को दबोच लिया अगले ने । अकेले में। बच्ची की उमर की साथी से यौन दुर्व्यवहार किया। पत्रकार की चौतरफ़ा थुड़ी-थुड़ी हो रही है। फ़ुटबाल की तरफ़ उछलते उनके नये-पुराने कारनामों पर दनादन ‘निंदा-किक’ लग रहे हैं।
खुलासे के बाद अगले ने कहा- “समझने में भयंकर चूक हुयी। अनजाने में (दो दो बार) पाप हो गया। कोई नहीं! हो गया सो हो गया। अब प्रायश्चित कर लेंगे- प्रायश्चित के साबुन में बड़ी जान है।”
अपने पाप को, प्रायश्चित के डिटरजेंट में डालकर, ‘पाप वॉशिंग मशीन’ चलाकर वरिष्ठ पत्रकार छह माह के ‘पश्चाताप अवकाश’ पर चले गये। अपने साबुन और वॉशिंग मशीन पर उनको पक्का भरोसा था। यकीन था कि छह महीने में न पाप रहेगा न पाप का नामोंनिशान।
लेकिन प्रायश्चित का साबुन गांधी जी के जमाने का था। एक्पायरी डेट का साबुन। एक्सपायर्ड दवाओं के रिएक्शन की तरह साबुन भी रिएक्ट कर गया। पाप दुनिया भर में झाग की तरह फ़ैल गया। पत्रकार को एहसास नहीं था कि उनका अकेले में किया पाप दुनिया भर को दिख जायेगा। ‘म्यूट’ किये हुये पाप चीख-चीखकर बोलने लगे। बहरों को भी सुनाई देने लगा कि पाप हुआ है। एक बार उनसे समझने में फ़िर चूक हुई।
खुलासे की पत्रकारिता करने वाले पत्रकार से यह समझने में भी चूक हुई कि दो लोगों के बीच हुआ व्यवहार जितना व्यक्तिगत होता है उससे कहीं ज्यादा उसके सार्वजनिक होने की संभावना होती है।
अब हाल यह है कि एक व्यक्ति की समझने में हुई चूक का सिलसिला जो शुरु हुआ तो तमाम लोगों से धड़ल्ले से समझ में चूक होती जा रही है। हाल यह है कि
‘समझ की चूक अकेले ही चली थी जानिबे मंजिल मगर
चूक मिलती गयी औ (चूक का) कारवां बनता गया।’
जिसे देखो वही इस ‘समझ-चूक-यज्ञ’ में अपनी आहुति डालता जा रहा है। स्वाहा बोलता जा रहा है। पत्रकार से समझने में हुई चूक का सिलसिला एक बार जो शुरु हुआ तो फ़िर तो मत पूछो भैया। एकदम्मै तहलका मच गया। जिसे देखो वही ‘समझने की चूक’ की गंगा में डुबकी लगाने लगा।हर एक की ‘समझ की चूक’ दूसरे की ‘समझ की चूक’ से कह रही है – मुझे भी तू लिफ़्ट करा दे।
ऐसे ही ‘समझने में हुई चूकों’ के कुछ नमूने यहां पेश किये जा रहे हैं:
1. पत्रकार से शुरु हुई समझ के चूक ने सबसे पहले पत्रकार की बॉस को अपनी गिरफ़्त में जकड़ा। समझ में चूक के चलते वे यह समझ बैठीं कि उनके संस्थान में हुआ एक महिला के साथ हुआ यौन अपराध संस्थान का आंतरिक मामला है। बाहर के लोगों को इसमें दखल देने की जरूरत नहीं।
2. ‘समझ चूक वायरल’ ने इसके बाद कुछ समझदार टाइप लोगों को जकड़ा। वे कहते पाये गये कि पत्रकार जरा अलग टाइप का है। बुद्धिजीवी बिरादरी का । सो उसकी हरकत को जरा अलग टाइप से देखा जाये। अपराध के नजरिये से देखने की बजाय मनोविज्ञान के चश्में से देखा जाये इसे। बहुत भलाई के काम किये हैं अगले ने समाज के लिये। लिहाजा उसकी ‘समझने में हुई चूक’ को जरा भली निगाहों से देखा जाये।
3. समझने में चूक समाज के लोगों से भी हुई। पत्रकार खोजी पत्रकारिता के धंधे में लगा था तो लोगों ने यह समझ लिया कि ये जो भी कुछ करेगा सबके भले के लिये ही करेगा। लोगों ने एक पत्रकार की आम इंसान की तरह हरकतें करने की आजादी पर भांजी मारने की कोशिश की। पत्रकार ने अपने साथ हुई नाइंसाफ़ी का बदला ले लिया और दिखा दिया कि उसे मात्र सामाजिक सरोकारी पत्रकार समझकर उसके साथ अन्याय किया गया। लंपट भी अगला किसी से कम नहीं है।
4. कुछ लोगों ने समझा कि पत्रकार ने यौन दुर्व्यवहार किया तो इसका मतलब उसकी पत्रिका के जुड़े सब लोग लंपट है। पत्रकार जिस पत्रिका में है उसे बंद कर दिया जाये। यह कुछ ऐसा ही है जैसे शोले में जय-वीरू को सजा देने के लिये गब्बर सिंह ने पूरे रामगढ़ को सबक सिखाने का प्लान बना डाला था।
5. पत्रकार ने माफ़ी बिना शर्त माफ़ी मांगी तो लोगों से यह समझने में चूक हुई कि वह वाकई अपनी करनी पर शर्मिन्दा है। लेकिन जब पत्रकार ने बाद में बयान जारी किया कि लफ़ड़े में महिला की ‘असहमति नहीं’ थी। तो लोगों को लगा कि पत्रकार की धूर्तता को उसका ‘अपराध बोध’ समझने की चूक हुई।
6. पिछले उदाहरण में पत्रकार ने महिला साथी की ‘असहमति’ में ‘अ’ को शायद उसकी ‘टाइपो’ समझा हो। उसकी अपने बचाने की कोशिशों, पत्रकार को बरजने, मुक्त होने के प्रयासों को पत्रकार सहमति के इशारों के रूप में ले रहा हो। अपने साथ की गयी लंपटता से बचने की कोशिशों को पत्रकार उसकी ‘असहमति नहीं’ ही समझता रहा। समझने में हुई इस चूक के चलते सब लफ़ड़ा हो गया। इसमें वरिष्ठ पत्रकार का क्या दोष?
7. अब पत्रकार कह रहा है कि उसके खिलाफ़ राजनैतिक साजिश हो रही है। उससे यह समझने में चूक हो रही है कि लोग उसके इस झांसे में आ जायेंगे।
8. अब महिला की मां से पूछा जा रहा है पत्रकार को बचाने के लिये क्या (कीमत) चाहिये? यह भी समझने की चूक ही है शायद कि इससे महिला चुप हो जायेगी।
9. कुछ संस्कारवान भले मानुष सोच रहे हैं अगर अंग्रेजी पत्रकार की जरा भी रुचि शायरी में होती तो उसने नबाज देवबंदी का यह शेर जरूर पढ़ा होता :
बदनजर उठने ही वाली थी किसी की जानिब लेकिन,
अपनी बेटी का ख्याल आया तो दिल कांप गया।
तो वह अपनी बेटी की उमर की साथिन से जबर्दस्ती ऐसी हरकत न करता। लेकिन यह भी लोगों की समझने की चूक ही है। अगर सूक्ति वाक्यों से लोगों के मन बदलते तो मठ और धर्मस्थल अपराधों के अड्डे न होते।
समझने की चूक के सिलसिले को और आगे बढ़ाने की जगह आइये आपको अपने पूर्वज ययाति की कहानी सुनाते हैं। श्रम को भुलाने के लिये सुनते चलें:
राजा नहुष बहुत वीर टाइप राजा थे। उन्होंने युद्ध में इंद्र को हरा दिया। इंद्र को हराने के बाद इंद्र की पत्नी से संसर्ग करना चाहा। इंद्राणी ने भी शर्त रखी- अगर नहुष सप्तर्षियों की पालकी में बैठकर आयेंगे तो वे नहुष की इच्छा पूर्ति करेंगी। नहुष उतावले। वे बैठकर चल दिये। सप्तर्षि उनकी पालकी ठो रहे थे। कुछ-कुछ ऐसे जैसे आजकल जाने-माने बुद्धिजीवी राजनीतिज्ञों की पालकी ढोते हैं। ॠषि थोड़ा बुजुर्ग थे। मंथर गति से चल रहे थे। उधर राजा नहुष का जिया बेकरार। इंद्राणी तक शीघ्र पहुंचने उनकी इच्छा ने उफ़ान मारा तो उन्होंने ऋषि अगस्त्य के माथे पर ‘सर्प!’ कहकर जोर से लात मारी । लात लगते ही ऋषि का ऋषित्व जाग उठा और उन्होंने वहीं खड़े-खड़े राजा नहुष को शाप जारी कर दिया- ‘यह नहुष और इसके पुत्र कभी सुखी नहीं होंगे’।
ऋषि अगस्त्य के दिये शाप का ही प्रभाव था कि राजा नहुष के पुत्र राजा ययाति बुढ़ा गये लेकिन उसकी यौन इच्छायें तरुण ही बनीं रहीं। बाद में उसने अपनी यौनेच्छायें पूरी करने के लिये अपने पुत्र से जवानी उधार मांगी।”
अपने समाज से समझने में यह भी भूल हुई कि वह अगस्त्य ऋषि के शाप का प्रभाव राजा ययाति के साथ ही खतम हुआ। सच तो यह है कि ययाति के वंशज होने के चलते वह शाप हम पर आज भी लागू है। पत्रकार ने जो किया वह शाप के प्रभाव के चलते किया। पूर्वजों को दिये शाप के प्रभाव के चलते उसके वंशज पत्रकार द्वारा की गयी गड़बड़ी लिये पत्रकार को दोषी ठहराना भी क्या समझनें में हुई चूक नहीं होगा ?
लेकिन पत्रकार से यह भी समझने में भूल हुई शाप ययाति के वंशजों पर लागू होता है। पीड़ित महिलाओं पर नहीं। उसके पुत्र भले उसको सहयोग करने के लिये अभिशप्त हों। लेकिन पीडित महिलाओं पर शाप लागू नहीं होता। अब राजा-महाराजाओं के जमाने गये जब पीडित महिलायें अपने खिलाफ़ हुई लंपटताओं को राजाओं की कृपा समझकर चुप रह जातीं होंगी। अब महिलायें अपने खिलाफ़ हुये अत्याचार को अपने पूर्वजन्मों के कर्मों का फ़ल समझकर चुप रह जाने वाली नहीं रहीं। वे जमाने विदा हुये जब अपने खिलाफ़ हुये यौन दुर्व्यवहार के लिये खुद को दोषी मानकर खुद को दुनिया में मुंह दिखाने लायक नहीं समझती थीं। कुओं, तालाबों कूदकर जान दे देतीं थीं। अब उनमें यह ताकत आ गयी है कि वे ययाति के वंशजों के मुखौटे नोचकर उनका असली चेहरा सबको दिखा सकें।
इतना सब हल्ला-गुल्ला होने के बाद भी लग रहा है कि यह सारा मामला भी ऐसे ही रफ़ा दफ़ा हो जायेगा। अब यह पता नहीं जो मुझे लग रहा है वह सच साबित होगा कि समझ की एक और चूक।

8 responses to “समझनें में चूक और ययाति के वंशज”

  1. Swapna Manjusha
    समझ समझ के समझ को समझो,
    समझ समझना भी एक समझ है।
    समझ समझ के जो न समझे,
    मेरे समझ में वो नासमझ (घाघ) है।
    ऐसे घटिया लोगों के पास अगर आप, समझ की पहुँची पहुँचायेंगे, तो वो पहुँची भी कहाँ पहुँचेगी !
    गर भूले से वो पहुँच भी गयी तो, पहुँची तक भी न पहुँचेगी :)
    Swapna Manjusha की हालिया प्रविष्टी..कुछ विशुद्ध देसी जुगाड़ :)
  2. sanjay jha
    ऐसे किन्ही परिस्थिति को लोग ‘प्यार से स्वीकार’ कर लेते हैं या ‘क्रोध में प्रतिरोध’ कर बैठते हैं……..लेकिन आप का ई बिना ‘खून बहाये ……. कतल कर’ देने का तरीका है बोले तो गज्जब है ………. ‘उपमा और बिम्ब’ का क्या कहिये………..बाकि सारी पोस्ट अगर पावती तक न भी पहुंचे तो कोई बात नै …… ‘नवाव देवबंदी’ के ‘शेर’ ही पहुँच जाये तो ‘बात बन जाये’ ………….
    प्रणाम.
  3. रचना त्रिपाठी
    पत्रकार साहब ने तो एक सहकर्मी के साथ मांफी मांगकर कर प्रायश्चित करने की औपचारिकता में सफल होने से चूक गये.. लेकिन कौन जाने अभी उनके नीचे कितनी महिला सहकर्मीं काम करी होंगी, उनका हिसाब कौन लेगा..? हो सकता है वह महिलाएं अपने पिछले जन्मों के बुरे कर्मों का फल समझकर ही चुप रह गयीं हों.. :(
    रचना त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..गिफ्ट कहो या तिहवारी बात बराबर है…
  4. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    जो चूके सो, लेकिन देश में की गयी किसी भी चूक पर तंज कसने से आप कतई नहीं चूकते; और आपको प्रशंसा भाव से पढ़ने से हम।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..ध्यानचंद को भारतरत्न क्यो?
  5. arvind mishra
    अब फुरसतिया पर बासी सामग्री मिलेगी? :-(
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..मोक्ष का मार्ग मछलियां (सेवाकाल संस्मरण- 12 )
  6. सतीश सक्सेना
    मत चूके चौहान !!
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..कैसे जाओगे यहाँ से, लेके प्यार, सजना – सतीश सक्सेना
  7. shefali
    बढ़िया कटाक्ष किया है …
    shefali की हालिया प्रविष्टी..आओ गुडलक निकालें …….
  8. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    […] समझनें में चूक और ययाति के वंशज […]

Tuesday, November 19, 2013

अखबारों का चुगलखोर रवैया

19 नवंबर 2013 पर 12:29 अपराह्न
भारत रत्न के लिये नामांकित राव साहब ने वैज्ञानिक शोध के लिये पर्याप्त धन मुहैया न कराये जाने की प्रवृत्ति की आलोचना की। इसे बेवकूफ़ी बताया। उन्होंने और भी बातें कहीं। जैसे कि हमारे यहां के लोग मेहनती नहीं हैं। जहां ज्यादा पैसा मिलता है वहां चले जाते हैं। देश भक्ति के भाव के मामले में चीनियों से कमतर हैं।

अखबारों ने ने राव जी की बातचीत को छापते हुये शीर्षक लगाया- देश के नेता मूर्ख हैं।

शीर्षक ही ऐसा था कि प्रतिक्रियायें आनी थीं। वो तो कहिये राव साहब राजनीति में नहीं हैं वर्ना टीवी इसको प्राइम टाइम बहस का विषय बनाता।

आज राव साहब की प्रतिक्रिया आयी है कि उन्होंने नेताओं को नहीं स्थितियों को मूर्खतापूर्ण, दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।

राव साहब ने कई काम की बातें भी कहीं। जो हमारे समाज की प्रवृत्ति के बारे में बताती हैं। लेकिन अखबारों ने काम की बातें छोड़कर उनकी बातचीत की सबसे वाहियात लगती बात को प्रमुखता दी। अखबार की बलिहारी है।

कबीरदास का दोहा है:
 साधु ऐसा चाहिये, जैसा सूप सुभाय,
 सार-सार को गहि रहै, थोथा देय उड़ाय।

लेकिन आज अखबार थोथा ही पकड़ रहे हैं। सार को उड़ा दिया। अब सवाल-जबाब और सफ़ाई की प्रक्रिया में और काम की बातें हवा हो गयीं।

अखबारों का यह रवैया चुगलखोर रवैया है। वैज्ञानिक ने शोध के लिये पैसा न मिलने की प्रवृत्ति को मूर्खतापूर्ण कहा। झट से बता दिया नेता जी को –साहब आपको मूर्ख कह रहे हैं वैज्ञानिक साहब। वो तो कहो किसी नेताओं को विज्ञान से मतलब नहीं वर्ना क्या पता कोई नेता बयान ठोक देता – वो वैज्ञानिक मूर्ख है। और क्या पता उसके बयान को लपककर कोई अखबार छापता – मूर्ख वैज्ञानिक को भारतरत्न।

अखबारों का यह रवैया अलाली का रवैया है। किसी ने कुछ कहा तो या तो उसकी बात पूरी की पूरी छाप दीजिये भाई अखबार में। पढने वाले अपना मतलब निकाल लेंगे या फ़िर सार संक्षेप पेश करते हुये शीर्षक ऐसा लगाइये जो उसकी सारी बातों का प्रतिनिधित्व करता हो। लेकिन अखबार अपने शीर्षक आइटम सांग की तरह लगाते हैं।

अखबार और मीडिया अपनी खबरें जमाने को तो ऐसे जमाते हैं जैसे कोई महल बना रहे हैं। लेकिन खबरों के कबाड़ को समेटने में उसकी कोई रुचि नहीं होती। अभी कुछ दिन पहले एक बाबा जी के कहने के पर उन्नाव के पास खजाने की खोज में खुदाई के किस्से मीडिया ने लगातार कई दिन दिखाये। एक इतिहासकार की वहां खजाना न होने की तर्कपूर्ण और तथ्यपूर्ण दलील को किनारे करके जमूरों की तरह बयान देते अंधभक्तों पर कैमरे चमकाये। और अब जब वहां कुछ न मिलने पर खुदाई का काम बन्द कर दिया गया है तो मीडिया इस बारे में चुप है। अखबारों ने तो कम से कम खबर तो दी कि खुदाई बन्द हो गयी है लेकिन टेलिविजन पर इस बारे में कोई खबर नहीं। उसकी हरकत इमारत बनाकर पैसा पीटने वाले ठेकेदार सरीखी है जो अपना मलवा घटनास्थल पर ही छोड़कर फ़ूट लेता है।

बाकी बातें एक तरफ़ लेकिन हमें अखबार की इस खबरों के पेश करने रवैये पर एतराज है। खबर से लगता है जैसे कि मूर्खता कोई बहुत खराब गुण है। सच तो यह है कि मूर्खता सबसे पवित्र गुण है। मूर्खता सहज मानवीय गुण है। निर्दोष प्रवृत्ति है। देश दुनिया के तमाम कारोबार इसके सहारे ही चल रहे हैं। लोग मूर्खता न करें तो राजनीति मुश्किल हो जाये।

अखबारों को मूर्खता का अपमान नहीं करना चाहिये। यह प्रवृत्ति मूर्खतापूर्ण है।    

Saturday, November 16, 2013

सचिन तुमने क्रिकेट छोड़ी, हम तुमको भारत रत्न देंगे

आज सचिन ने अपना आखिरी मैच खेला। मैच खतम होते ही सचिन को भारत रत्न देने की घोषणा हो गयी। सचिन के सैकड़ा होते ही जैसे उनके प्रशंसक खुशी से उछल पड़ते थे । उसी तरह सचिन के रिटायर होते ही लगता है सरकार खुशी से उछल पड़ी और उनको भारत रत्न थमा दिया। ऐसा लग रहा है देश के इस महान खिलाड़ी से करार हुआ होगा- सचिन तुम क्रिकेट छोड़ दो,हम तुम्हें भारत रत्न देंगे।

सचिन के पहले स्व. ध्यानचंद को भारतरत्न देने की बात सुनी जा रही थी। सचिन ने आज संन्यास लेकर दद्दा को भारतरत्न की दौड़ में पीछे छोड़ दिया और एक और रिकार्ड बनाया – किसी खिलाड़ी को मिलने वाले पहले भारत रत्न का। अच्छा ही हुआ उनको भारत रत्न देने की घोषणा आज ही हो गयी। अगर आज सचिन को भारत रत्न मिलने की घोषणा नहीं होती तो शायद इस दौड़ में उनका नाम भी स्व. ध्यानचंद जी की तरह पीछे हो जाता। सरकार ने सोचा- तुरत दान महाकल्याण। आज न अपन ने न दिया तो कल को पता नहीं और कोई दे जाये। इनाम का श्रेय किसी और को क्यों दिया जाये।

लोगों का कहना है कि मेजर ध्यानचन्द ने उस गुलामी मे बिना कोई संसाधन ,चमके और इस देश को,हाकी को वड़ी ऊंचाई दी,वह अभी तक अभूतपूर्व है। लेकिन सरकार की भावुकता का लोगों की भावुकता से क्या मुकाबला? सरकार सचिन के रिटायरमेंट की घोषणा से भावुक हो गयी और उनको भारत रत्न दे डाला। नियमों में बदलाव करते हुये यह किया गया। पता नहीं क्या इस बारे में भी सोचा गया होगा कि मेजर ध्यानचंद को भी सचिन के साथ ही भारत रत्न की घोषणा कर दी जाती। लेकिन आजादी के पहले का महानायक बुजुर्गों की तरह किनारे हो गया शायद।

हड़बड़ी में इस इनाम की घोषणा शायद इसलिये हुयी हो कि सरकार को लग रहा हो कि देश सचिन के रिटायरमेंट की घोषणा शायद सहन  न  कर पाये। भारत रत्न की घोषणा से उनका दर्द कुछ कम हो जाये शायद।

इस भारत् रत्न के पीछे मीडिया का भी बहुत बड़ा योगदान है। उसको भी कुछ हिस्सा अपने आप मिल जाना चाहिये भारत रत्न का। लोग कह रहे हैं - सचिन को भारतरत्न मे मीडिया का आधा (हिस्सा) है।

सचिन के रिकार्ड के बारे में तो बच्चा-बच्चा जानता है। लेकिन जिन वैज्ञानिक महोदय को इनाम मिला है उनके बारे में मीडिया तक को कुछ हवा नहीं है। उल्टे उनके बारे में नकात्मक खबरे तैरने लगी हैं सोशल मीडिया में। सरकार द्वारा आज के भारत रत्न की घोषणा एक उलार बैलगाड़ी की तरह है। जिसमें एक नाम ऊपर उठा हुआ सबको दिख रहा है, जबकि दूसरा हिस्सा जमीन में धंसा जा रहा है।

हम शरमाये जा रहे हैं कि भारत रत्न से सम्मानित दो लोगों में एक के बारे में कुछ नहीं जानते। यह बात हमारी और हमारे देश के मीडिया की वैज्ञानिक मामलों में रुचि की परिचायक है। यह भी लग रहा है कि क्या स्व. ध्यानचंद का नाम अब भारत रत्न की दौड़ से हमेशा के लिये बाहर हो गया।

एक सर्वकालीन बेहतरीन खिलाड़ी और एक नामचीन वैज्ञानिक को भारत रत्न मिलने की बधाई।

Thursday, November 14, 2013

सट्टे का रिकार्ड भी सचिन के नाम

http://web.archive.org/web/20140420084223/http://hindini.com/fursatiya/archives/5167

सट्टे का रिकार्ड भी सचिन के नाम

सचिनआज सचिन अपना आखिरी मैच खेल रहे हैं। मुंबई में 200 वां टेस्ट खेलने के बाद ‘क्रिकेट भगवान’ रिटायर हो जायेंगे।
पूरा मीडिया सचिन मय है। मीडिया की सड़क पर बैरीकेटिंग लगा दी है। सचिन की खबर के अलावा और कोई खबर अन्दर नहीं घुसेगी। चिल्लर खबरों की तो खुदै हिम्मत नहीं आज ’मीडिया दरबार’ में घुसने की। बाकी जो एकाध आयेंगी वो बहुत तगड़े सोर्स से घुस पायेंगी।
सिद्धू जी कह रहे हैं सचिन 500 सौ साल बाद भी भगवान माने जायेंगे। सचिन के प्रशंसक के बारे में बताया जा रहा है कि उसने सचिन के चलते नौकरी छोड़ दी। शादी नहीं की। विकट जलवे हैं भगवान के।
कौन जाने कल को 14 नवंबर ’बालदिवस’ की जगह ’सचिन रिटायरमेंट दिवस’ के रूप में जाना जाने लगे।
मीडिया तो एकदम्मै बौराया हुआ है। सचिन के बुखार में आंय-बांय़-सांय हरकत कर रहा है। कल एक टीवी चैनल पर खबर चल रही थी। एंकर कह रहा था—
“सचिन महान हैं क्योंकि —— ? “
इसका सबसे बढिया जबाब दीजिये और मुंबई मैच के दो टिकट पाइये।
हद्द है। भगवान के महान होने के कारण पूछ रहा है मीडिया। सचिन तो शरीफ़ हैं। यथा भगवान तथा भक्त। और किसी कलयुगी महान के बारे में कोई पूछ के देखे कि वो क्यों महान हैं ? उनके भक्त कच्चा चबा जायेंगे उसे।
मैंने सोचा लिखें – सचिन महान हैं क्योंकि वे सच में रिटायर हो रहे हैं।
लेकिन फ़िर यह सोचा कि ऐसा लिखना अच्छी बात नहीं हैं। मीडिया की बालसुलभ कमाई की कोशिशों को क्या ठेस पहुंचाना? है न?
खेल तो जो है सो हैइऐ है। सचिन कमाऊ खिलाडी हैं। खुद तो उन्होंने कमाया ही दूसरों को भी कमाई के मौके उपलब्ध कराये। 3000 करोड़ का सट्टा लगा है सचिन पर। शतक पर सट्टा, डबल शतक पर सट्टा, शून्य पर आउट होने पर सट्टा, पचास बनाने पर सट्टा, कैच होने पर सट्टा, विकेट लेने पर सट्टा। मतलब उनकी हर अदा पर सट्टा है। सट्टा ही सट्टा। सट्टे पर सट्टा।
सचिन के तमाम रिकार्ड में ये भी एक रिकार्ड हो शायद कि वे क्रिकेट के ऐसे खिलाड़ी हैं जिनके नाम पर सबसे ज्यादा सट्टा लगा। किसी एक खिलाड़ी के नाम पर इत्ते सट्टे नहीं लगे।
इससे ज्यादा विडम्बना क्या होगी कि जो खिलाड़ी कभी सट्टेबाजी में शामिल नही रहा उसके नाम पर सबसे बड़े सट्टे लगें। जिस इंसान ने कभी कोई गड़बड़-सड़बड़ नहीं की उसके नाम पर सबसे बड़े धतकरम हों। मुक्तिबोध के शब्दों में- “किसी व्यभिचार के बन गये बिस्तर।”
लेकिन सचिन के भगवान होने के नाते यह तो होना ही था। भगवान सार्वजनिक सम्पत्ति की तरह होता है। उसके चाहने वाले उसका मनमाफ़िक उपयोग करते हैं। भक्त पूजा के लिये, पुजारी पेट के लिये, बाजार कमाई के लिये, दंगाई दंगे के लिये, सट्टाई सट्टे के लिये तो राजनीतिक पार्टियां सत्ता के लिये। भगवान के बस में दुनिया की भले ही तमाम ताकतें हो लेकिन अपना मनमाना उपयोग रोकने की ताकत नहीं है उनके पास। बहुत निरीह होते हैं इस मामले में भगवान।
एक निठल्ले खेल के महानायक की महाविदाई देने में जुटे हुये मीडिया की कवरेज देखते हुये एहसास हो रहा है मानो अपने यहां क्रिकेट के अलावा और कुछ होना ही नहीं है।
क्या पता अपने देश के मीडिया से कोई पूछे – हमारे यहां वैज्ञानिक हैं, समाज सेवक हैं, कवि हैं, लेखक हैं, गायक है, नेता हैं, विकास है, खुशहाली है, बराबरी है। तुम्हारे यहां क्या है?
इस पर हमारा मीडिया ऐठते हुये कहेगा- हमारे पास सचिन है।
बहरहाल अब जब सचिन रिटायर हो रहे हैं तो उनको शुभकामनायें देते हुये सोच रहा हूं कि बाजार, मीडिया और सटोरिये मिलकर अगला भगवान किसको बनाते हैं। भगवान के बिना बाजार, मीडिया और सटोरियों का गुजारा मुश्किल है।

4 responses to “सट्टे का रिकार्ड भी सचिन के नाम”

  1. Abhishek Chaturvedi
    सचिनमय हो गया भारत सारा. सचिन किसी के हों न हों , सटोरियों के भगवान जरूर हैं.
  2. सट्टे का रिकार्ड भी सचिन के नाम | SportSquare
    [...] सट्टे का रिकार्ड भी सचिन के नाम [...]
  3. रचना त्रिपाठी
    मेरा तो दिमागे काम नही किया, नही तो एक-आद हम भी लगा लिए होते घरहि में, एक से बढ़कर एक भक्त पडे हैं। आपका लेख पढ़कर दिमाग की बत्ती जली.. थोड़ा और जोर दिए होते तो बच्चों के पास मिंटोफ्रेश पड़ा था खा लिए होते.. लेकिन अफसोस! :)
  4. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    […] सट्टे का रिकार्ड भी सचिन के नाम […]

Wednesday, November 13, 2013

रट्टामार अंग्रेजी के साइड इफ़ेक्ट

http://web.archive.org/web/20140420082740/http://hindini.com/fursatiya/archives/5156

रट्टामार अंग्रेजी के साइड इफ़ेक्ट

रट्टाआज सबेरे टीवी खोला तो पता चला कि सीबीआई के डायरेक्टर साहब ने कुछ बयान टाइप दिया है। वह कुछ गलत टाइप का है। उससे हल्ला टाइप मचा है। मीडिया में निंदा टाइप होने लगी। सोशल मीडिया में थुड़ी-थुड़ी टाइप।
मुहावरे की भाषा में कहा जाये तो सीबीआई डायरेक्टर ने ’मीडिया मुशायरा’ लूट लिया।
सीबीआई आजकल फ़ुल फ़ार्म में है। परसों प्रधानमंत्री ने कुछ कहा। कल वित्तमंत्री ने कुछ सुनाया। आज मीडिया का हल्ला। मतलब सीबीआई ने हैट्रिक मार दी।
लोग कह रहे हैं कि सीबीआई डायरेक्टर को ऐसा कहना नहीं चाहिये था। महिला संगठन माफ़ी मांगने की मांग कह रहे हैं। माफ़ी मांगें बात खतम हो। मीडिया भी झल्ला रहा है। कहां सचिन के संन्यास और प्रधानमंत्री के चुनाव के लजीज पकवान के बीच यह बलात्कार बयान का कंकड़ आ गया। लेकिन सीबीआई डायरेक्टर माफ़ी के मसले को सीबीआई जांच की तरह लटका रहे हैं। शायद वे भी जनप्रतिनिधियों की तरह “मेरे बयान का गलत अर्थ लगाया गया” वाली फ़ार्मूला नौका से बयान नदी पार करना चाहते हैं।
सीबीआई डायरेक्टर का बयान यह दर्शाता है कि संगत का क्या असर होता है। नेताओं की संगत में रहते हुये उनका भी मन बयानबाजी के लिये हुड़कता है। जैसे नेता ऊल-जलूल बोलते हैं वैसे ही उनका बोलने का मन करने लगता है। कभी बोल भी देते हैं। बोल ही दिये। फ़िजूल में बवाल हो गया।
घपलों-घोटालों, नेताओं की सोहबत में रहते-रहते अक्सर अधिकारियों की समझ-बत्ती गुल हो जाती है। जिसको आज क्लीन चिट दी कल उसी के खिलाफ़ रपट लिखनी पड़ती है। जिसके नाम वारंट होता है उसको क्लीनचिट देनी पड़ती है। तमाम न्याय, अन्याय जोन से गुजरते हुये काम करना पड़ता है सीबीआई को। उनके बयान बिजली की झालर की तरह जलते-बुझते हैं। कभी जगमग कभी अंधकार। “जेट लैग” की तरह “बयान लैग” हो जाता है उनको। कहना कुछ चाहते हैं निकल कुछ जाता है।
अब बताइये बात हो रही है सट्टे की और उसमें बयान बलात्कार का दे रहे हैं। ये तो सीबीआई की तरह काम करना हुआ न। दफ़ा 420 के अभियुक्त को 302 की माला पहना दी और 302 के आरोपी को धारा 144 में टहला दिया। सट्टे पर कानून की बात चल रही थी तो कह देते कि भाई कानून बनाने का काम हम करते नहीं। बनेगा तो पालन हो जायेगा। जैसे और कानून का पालन होता है वैसे इसका भी होगा। कानून होते ही पालन करने के लिये हैं। हो ही रहा है पालन। आजतक किसी कानून ने लिखाई शिकायत की उसका पालन नहीं हो रहा है? लोग कहते हैं तो लोगों का तो छोड़िये। लोग तो ये भी कहते हैं कि देश रसातल में जा रहा है। लेकिन सच तो यह है न कि देश निरन्तर प्रगतिशील है। मंगल पर जा रहा है।
लोगों को यह लग रहा है कि एक जिम्मेदार अधिकारी ने ऐसा बयान कैसे दे दिया। उसकी सोच ऐसे कैसे हो गयी। महिलाओं के प्रति असम्मान की बात उनके मुंह से निकली कैसे?
अब कारण क्या है ये तो सीबीआई के डायरेक्टर साहब ही बता सकते हैं। लेकिन होता है कि लोग तमाम काम अनजाने में करते हैं यह सोचते हुये कि जो वे कर रहे हैं उसमें गलत क्या है? यह तो दस्तूर है। जब रेलवे के मेम्बर साहब अपनी पोस्टिंग के बारे में रेल मंत्री के भांजे से लेन-देन कर रहे थे तो दस्तूर समझकर ही तो किया उन्होंने। लेकिन सीबीआई के डायरेक्टर साहब ने अपने कर्तव्य का दस्तूर निभाया और उनको अन्दर करा दिया और मंत्री जी को बाहर।
अब डायरेक्टर साहब ने जो कहा वह बात वे आमतौर पर सहज मन से कहते रहते होंगे। लेकिन माइक और मीडिया के गठबंधन से यह साबित हो गया कि उन्होंने जो कहा वह ठीक तो नहिऐ है। देखिये मामला माफ़ी से निपटता है या कुछ और होगा। रेलमंत्री का इस्तीफ़ा उधार है उनके कर्तव्य के दस्तूर के चलते।
लेकिन अगर कोई मुझसे पूछे तो मैं तो कहूंगा कि सारा कुछ किया धरा अंग्रेजी का है। बचपन में हम लोग ढेर अंग्रेजी बिना मतलब समझे रटते हैं और बुढ़ापे तक इम्प्रेशन मारने के लिये दोहराते रहते हैं। डायरेक्टर साहब के इस बयान के पीछे अंग्रेजी के मुहावरे का हाथ है। मुहावरे का मतलब है “अगर रेप को रोका नहीं जा सकता है तो उसका आनंद लेना चाहिए”। मतलब अगर कोई काम आपकी मर्जी के खिलाफ़ आपके साथ हो रहा है और वो होना ही है तो उसका मजा लो। सीबीआई इसी सिद्धान्त के हिसाब से तो चलती है। कोई जांच मजबूरी में करनी पड़ती है तो उसे पूरा मत करो। लटकाये रखो। मजे लो जांच के।
अंग्रेजी में कही बात में असल कुछ गलत लगती ही नहीं है। उसी के चलते उन्होंने यह कह दिया। उनको अन्दाजा ही नहीं होगा कि लोग अब अंग्रेजी से प्रभावित नहीं होते। मतलब समझकर हल्ला मचाने लगे हैं।
सीबीआई डायरेक्टर की बयानबाजी बचपन की रट्टामार अंग्रेजी के साइड इफ़ेक्ट हैं।

3 responses to “रट्टामार अंग्रेजी के साइड इफ़ेक्ट”

  1. HindiThoughts.Com
    अंग्रेजी के साइड इफ़ेक्ट :डी nice one
    HindiThoughts.Com की हालिया प्रविष्टी..Prerak Prasang of Mahatma Gandhi in Hindi
  2. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    इस आप्तवचन को मैंने भी इंटर स्तर तक जाते-जाते सुन समझ लिया था, लेकिन इसकी स्वीकार्यता पर हमेशा डाउट रहा मन में। कहीं सुनाने की हिम्मत नहीं पड़ी। लेकिन सीबीआई को तो ‘तोता’ उपाधि सर्वोच्च न्यायालय से मिली हुई है। अब डाइरेक्टर को तो रट्टू होना ही पड़ेगा। ताज्जुब तब होता जब वो अपना विवेक लगाकर कोई भाषण दे दिये होते।
    आपका आलेख वास्तव में कालजयी टाइप हो गया है। राप्चिक।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..अपनी औरतों के प्रति अपराधी हमारा समाज
  3. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    […] रट्टामार अंग्रेजी के साइड इफ़ेक्ट […]

Tuesday, November 12, 2013

चिल्लर भूकंप और खबरों के कोलाज

http://web.archive.org/web/20140420082513/http://hindini.com/fursatiya/archives/5144

चिल्लर भूकंप और खबरों के कोलाज

भूकंप कल रात दिल्ली में हल्का भूकंप आया। वैज्ञानिक बता रहे थे -छोटा वाला था। चिल्लर भूकंप। आ गया तो अच्छा हुआ। धरती की ऊर्जा मुक्त हो गयी। बड़े भूकम्प का खतरा कम हो गया।
पता नहीं क्या सही है लेकिन सुनते ही हमें लगा कि शायद अपनी धुरी पर घूमती धरती को जब सचिन के संन्यास की खबर पता लगी होगी तो वह हिल गयी होगी। उसी झटके से भूकम्प आ गया होगा।
यह भी हो सकता है कि शायद उसको कल की मंगलयान की हरकत पर गुस्सा आया हो। मंगलयान ने कल अगली कक्षा में जाने में थोड़ा नखरे दिखाये। धरती को लगा होगा कि स्वदेशी तकनीक पर आधारित यान स्वदेशी बीमारियां भी ले गया है क्या? क्या वह इस बात की धमकी दे रहा है कि जबतक छठा वेतन आयोग नहीं लागू होगा तब तक अगली कक्षा में न जायेगा। यह सोचते ही धरती का माथा भन्ना गया होगा कि और वह नीचे से चिल्लाई होगी- अरे बेवकूफ़ किंडरगार्डन अकल वाले, तू यंत्र है यंत्र। कोई सरकारी कर्मचारी थोड़ी जो वेतनमान, डी.ए. के लिये काम रोके। जाता है आगे कि बताऊं तुझे वहीं पर आकर?
इस तरह हड़काने पर धरती थोड़ा हिल गयी होगी। गुस्से में लोग कांपने लगते हैं न। इसीलिये यहां भूकंप आ गया होगा।
शायद इस पर मंगलयान ने लड़ियाते हुये कहा हो- अरे न मम्मा! मैं कोई इंसान थोड़ी हूं जो ऐसी हरकतें करूं। मैंने तो तुमसे दूर आकर तुम्हारी खूबसूरती देखी तो ठिठक गया। तुम तो बहुत खूबसूरत हो। सूरज की रोशनी में तो किसी भी हीरोइन से कई गुना चमक रही हो। पास में रहते हुये साथ वाले की खूबसूरती का अन्दाजा नहीं होता। यू आर क्यूट यार। लव यू मम्मा।
मंगलइस पर धरती ने पक्का मंगलयान को झिड़का हो- अरे चल जा भाग बतबने कहीं के! अपना काम कर मंगल पर जाकर। मुझे भी परिक्रमा करनी है सूरज की।
इसके बाद धरती ने खुद को शीशे में निहारा होगा। मुस्कराते हुये अंगड़ाई ली होगी। उसी अंगड़ाई के चलते दिल्ली में हल्का भूकम्प आ गया होगा।
कहने को तो लोग यह भी कह रहे हैं कि यह बापू निराशाराम के श्राप का परिणाम है। उनके जेल में बन्द होने के चलते उनकी लीलाओं में व्यवधान हुआ है। इससे उन्होंने भारत की पापात्माओं के लिये श्राप इशू कर दिया होगा। श्राप की डिलीवरी करने वाला कोरियर दिल्ली में पापात्माओं के पते पूछ रहा होगा। यह बात पता चलते ही दिल्ली हल्का सा हिल गयी होगी। उसी को लोगों ने भूकंप का नाम दे दिया।
एक खबर यह भी है कि ऊपर स्वर्ग/नरक में भारत के प्रधानमंत्री के चुनाव की खबर पहुंची होगी तो वहां भारत के जित्ते भी लोग रहते हैं वे अपने-अपने साइड का आसमान फ़ाड़कर भारत का चुनाव देखने के लिये लग गये होंगे। किसी ने वहां के महापुरुषों को उनके बारे में यहां चल रही चर्चाओं के बारे में बताया होगा। हो सकता है किसी ने महापुरुषों से मौज भी ली हो कि -भाईसाहब, रहे होगे आप अपने समय के खलीफ़ा। लेकिन अब तो आपके हाल पुराने अखबार में छपी खबरों सरीखे हो गये हैं। जैसे अखबारों को मनचाहे आकार में काटपीटकर, अपने मनमाफ़िक चिपकाकर लोग खूबसूरत कोलाज बनाते हैं वैसे ही आपके जीवन से जुड़ी घटनाओं को लोग मनचाहे तरीके से काट-छांटकर अपनी तर्क-कुतर्क की लेई-गोंद से जोड़ कर इधर-उधर चिपका रहे हैं।
इस बात से महापुरुषों के चेहरे पर उदासी छा गयी हो शायद। अपने से दूर चले गये बच्चों के चेहरे की उदासी देखकर हिल गयी हो शायद धरती। इसई से दिल्ली में भूकंप आ गया होगा।
सही कारण पता नहीं क्या है लेकिन अपन को चिल्लर भूकंप वाली बात जमती है। अपने यहां तमाम असमानता है, गैरबराबरी है, बरबादी है। उससे सब हलकान हैं। लेकिन सब मिलकर उससे निजात पाने के लिये कुछ करते नहीं। इधर-उधर हल्ला-गुल्ला मचाकर, जिन्दाबाद-मुर्दाबाद करके मस्त हो जाते हैं। जिनको बहस करनी है, व्यवस्था चलानी है, कानून बनाने हैं वे हड़ताल, धरना, प्रदर्शन कर रहे हैं। काम ठप्प कर रहे हैं। नतीजतन निठल्ले लोग व्यवस्था पर कब्जा किये हैं। कानून को टहला रहे हैं।
प्रभावित लोग भी मीडिया, अखबार, सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा चिल्लर की तरह खर्च कर डालते हैं। चिल्लर तरीके से गुस्सा निकालकर लोग चुप हो जा रहे हैं। इसी के चलते बदलाव के बड़े भूकम्प नहीं आते। स्थगित हो जाते हैं।
चिल्लर गुस्से की तरह चिल्लर भूकम्प भी आकर चला गया। अब अगले प्रधानमंत्री की खबर के बारे में कोई चिरकुट हलचल पेश करेगा मीडिया- एक कामर्शियल ब्रेक के बाद। आप यहीं रहियेगा। कहीं जाइयेगा नहीं बुद्धु बक्से को छोड़कर।

2 responses to “चिल्लर भूकंप और खबरों के कोलाज”

  1. sanjay jha
    सुन्दर ………. मजा आया पढ़कर…………
    प्रणाम.
  2. अजय कुमार झा
    हा हा हा हा हा चिल्लर था भूकंप जी …इत्ते कमाल के रीज़न के लिए ही भूकंप को ..समझिए कि ..हल्लन आफ़ द ईयर का पुरस्कार दिया गया है । बहुत झटका दे दिए हैं भूकंप को आप अपना कट्टा कनपुरिया से …थरथराहट बना हुआ है एकदम्म :) :)
    अजय कुमार झा की हालिया प्रविष्टी..जागृति– तुम्हारा सरनेम क्या था ..(इश्कनामा-1)

Sunday, November 10, 2013

लोहिया नेहरू के पास छोटे भाई की तरह आये थे

http://web.archive.org/web/20140420081342/http://hindini.com/fursatiya/archives/5130

लोहिया नेहरू के पास छोटे भाई की तरह आये थे

मधु लिमयेआज चंचल जी की वाल पर एक चर्चा देखी। उसमें शेष नाराय़ण सिंह जी के एक लेख का लिंक था – जवाहर लाल नेहरू के शिष्य थे डॉ राम मनोहर लोहिया । लेख मधु लिमये जी के लेखन के हवाले से लिखा गया था। फ़ेसबुक पर हुई बातचीत में यह बात भी आयी कि डॉ. लोहिया सरीखा व्यक्ति नेहरू जी का शिष्य नहीं हो सकता।
मुझे इस सिलसिले में समाजवादी पार्टी की पत्रिका में मधु लिमये जी द्वारा लोहिया जी पर लिखा लेख याद आया। इस लेख में लोहिया जी की खूबियों- खामियों का विस्तार से जिक्र किया था। लोहिया जी की एक बात जो मुझे याद आ रही है उसका लब्बो-लुआब यह था कि :
हम भारतीय सदियों से दबे -पराजित रहे हैं। जरा सी बात से खुश हो जाते हैं। जरा से पराक्रम पर वीर पूजा करने लगते हैं। हमारा देश हजार सालों के खंड-खंड जीवन के बाद एक राष्ट्र के रूप में हमें मिला है। हमें इसका महत्व समझना चाहिये।
नेहरू के साथ अपना राजनैतिक जीवन शुरु करने वाले लोहिया जी बाद में नेहरू जी के कट्टर विरोधी बने। इस बारे में परसाई जी की राय थी:

डॉक्टर लोहिया का कुल मिलाकर एक ही वाद रह गया- नेहरू तथा उनकी पुत्री का हर मामले में विरोध। यह विरोध कार्यक्रमों को लेकर होता तो एक बात थी। इस विरोध का मूल वाक्य था -नेहरू ने देश का नाश कर दिया। नेहरू की खानदानी सल्तनत को मिटाओ।
इस विरोध के क्या कारण थे इस बारे में लोगों की अलग-अलग धारणायें हैं। लेकिन मधु लिमये जी ने अपने लेख में लोहिया जी की नेहरू ग्रंथि की तरफ़ इशारा भी किया है। लोहिया जी प्रखर विद्वान थे। बु्द्दिमान थे। पढे-लिखे थे। देश की बारे में नीतियों में उनका नेहरू जी से मतभेद रहा होगा। लेकिन यह वह समय था जब नेहरू की लोकप्रियता चरम पर थी। उनके प्रखर व्यक्तिगत विरोध के बावजूद नेहरू जी की लोकप्रियता में कोई फ़र्क नहीं पड़ा। नेहरू का कद बहुत ऊंचा था उस समय। लोहिया जी नेहरू जी के प्रति इसीलिये और आक्रामक होते गये। उनके विरोध में नेहरू ग्रंथि की खीझ भी थी।
बकौल परसाईजी :

पहले ही आम चुनाव में समाजवादियों की बुरी तरह हार हुई। तब नेहरू ने उनसे कहा कि तुम लोग कांग्रेस में आ जाओ तो मुझे ताकत मिलेगी। हम मिलकर दक्षिणपन्थियों से लड़ लेंगे। तब जयप्रकाश नारायण ने कार्यक्रमों की लिस्ट दी जिसे नेहरू ने मान लिया। तब जयप्रकाश नारायण अपने चार साथियों के साथ नेहरू मंत्रिमंडल में जाने को राजी हो गये थे। इसमें लोहिया भी थे। पर डॉ. लोहिया के हठ के कारण यह समझौता टूट गया।
ऐसे होता तो क्या होता के तमाम कयास लगाये जाते हैं। एक कयास यह भी लगाया जाना चाहिये कि अगर जयप्रकाश नारायण, लोहिया आदि प्रखर राजनीतिज्ञ नेहरू जी के साथ रहते और देश के निर्माण में सहयोग देते तो देश की दिशा क्या होती? तब शायद हालत अलग होते। शायद वंशवाद भी इतने विकट रूप में न होता। शायद आपातकाल भी न होता। शायद……..।
बहरहाल आप पढिये परसाई जी से पूछे एक सवाल का जबाब जिसमें उन्होंने नेहरू-लोहिया सबंधों पर अपी राय दी है।
प्रश्न: कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन के बाद डॉ. राममनोहर लोहिया को नेहरू क्यों अपने घर इलाहाबाद ले गये, उन्हें अपने घर कई दिनों तक क्यों रखा? वे दोनों एक-दूसरे को किन-किन बातों में चाहते थे, किन-किन बातों में मतभेद था? दोनों के समाजवाद में क्या अन्तर था?
क्या कारण थे कि पं. नेहरू के शासनकाल में डॉ. राममनोहर लोहिया को अनेक बार जेल जाना पड़ा। क्या मणिपुर जेल में डॉ. लोहिया को कई दिनों तक यातना सहनी पड़ी, क्या पं. नेहरू ने यातना की खबर लगने पर हस्तक्षेप किया था?—कटोरातालाब रायपुर से ’कविराज’
उत्तर- मुझे पता नही, आप किस कलकत्ता अधिवेशन की बात कर रहे हैं। अगर पंडित नेहरू डॉ. लोहिया को घर ले गये, तो यह कुछ विचित्र नहीं था। जर्मनी से जब डॉ. लोहिया डाक्टरेट लेकर लौटे थे, तब उनकी उम्र 27-28 साल की थी। वे बहुत प्रतिभावान थे। वे नेहरू के पास छोटे भाई की तरह आये थे। वे आनन्द भवन लोहियामें नेहरू परिवार में काफ़ी रहे भी थे। उन्हें कांग्रेस के विदेश विभाग का सचिव बनाया गया था। वे लगातार नेहरू के निर्देश पर उनके साथ काम करते रहे थे। वे लोकतांत्रिक समाजवाद जर्मनी से ही सीखकर आये थे। जर्मनी में ही ’ सोशलिस्ट इंटरनेशनल ’ का प्रधान ऑफ़िस रहा है। अभी भी है। यह याद रखना चाहिये कि ये लोकतांत्रिक समाजवादी साम्यवाद विरोधी होते हैं। इन्हीं की मदद से हिटलर जीता था और भयंकर तानाशाह बना था। उसने कम्युनिस्टों का कत्लेआम कराया था । समाजवादी समझते थे कि हिटलर उन्हें बक्स देगा। यह उनका भ्रम था, हिटलर ने समाजवादियों को भी पीटा।
यह मैंने डॉ. लोहिया के समाजवाद की पृष्ठभूमि बताने के लिये लिखा।
कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण वामपन्थ के नेता थे। इनके साथ लोहिया, अशोक मेहता भी थे। नेहरू खुद समाजवादी थे। पर नेहरू का समाजवाद यह जर्मनी वाला समाजवाद नहीं था। नेहरू का विश्वास कार्ल मार्क्स में भी था। वे ’वैज्ञानिक समाजवाद’ मानते थे, यह उन्होंने खुद कई जगह लिखा है। कांग्रेस में दक्षिणपन्थ के नेता सरदार पटेल और राजेन्द्र प्रसाद थे। पंडित नेहरू की स्थिति इन सबसे ऊपर थी। पर वे समर्थन समाजवादियों का करते थे। 1947 में जयप्रकाश और लोहिया के नेतृत्व में समाजवादी कांग्रेस से बाहर आ गये। इन्होंने समाजवादी दल बनाया। दक्षिणपन्थियों में आचार्य कृपलानी भी अपने साथियों को लेकर बाहर आ गये। उन्होंने ’कृषक मजदूर प्रजा पार्टी’ बनाई। बाद में दोनों मिलीं और ’प्रजा समाजवादी पार्टी’ बनाई। इन्हें पंडित नेहरू की विदेश नीति पसंद नहीं थी। ये सोवियत रूस से इतने घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं चाहते थे। ये साम्यवाद विरोधी थे। पर देश में ये तुरन्त आर्थिक क्रांति चाहते थे, जो अव्यवहारिक थी। पहले ही आम चुनाव में समाजवादियों की बुरी तरह हार हुई। तब नेहरू ने उनसे कहा कि तुम लोग कांग्रेस में आ जाओ तो मुझे ताकत मिलेगी। हम मिलकर दक्षिणपन्थियों से लड़ लेंगे। तब जयप्रकाश नारायण ने कार्यक्रमों की लिस्ट दी जिसे नेहरू ने मान लिया। तब जयप्रकाश नारायण अपने चार साथियों के साथ नेहरू मंत्रिमंडल में जाने को राजी हो गये थे। इसमें लोहिया भी थे। पर डॉ. लोहिया के हठ के कारण यह समझौता टूट गया।
JLNehruतब से लोहिया नेहरू के कट्टर विरोधी हो गये। वे तुरन्त क्रांतिकारी कार्य करवाना चाहते थे, पर कम्युनिस्ट पार्टियों को साथ न लेकर जनसंघ जैसी प्रतिक्रियावादी पार्टी को साथ लेते थे। वे सिलसिलेवार आन्दोलन नहीं करते थे, उपद्रव और अक्सर स्टंट करते थे। नेहरू पर अशिष्ट भाषा में हमले करते थे। वर्ग- संघर्ष को तैयार नहीं थे और संसदीय लोकतंत्र में भी निष्ठा नहीं थी। वे पता नहीं क्या चाहते थे? बुद्धिमान थे, विचारक थे, अच्छा लिखते-बोलते थे। उन्होंने इतिहास पर भाषण दिये थे, जो ’इतिहास चक्र’ नाम की पुस्तक में सगृहीत हैं। उनके विचार काफ़ी पुस्तिकाओं में हैं। पर डॉक्टर लोहिया का कुल मिलाकर एक ही वाद रह गया- नेहरू तथा उनकी पुत्री का हर मामले में विरोध। यह विरोध कार्यक्रमों को लेकर होता तो एक बात थी। इस विरोध का मूल वाक्य था -नेहरू ने देश का नाश कर दिया। नेहरू की खानदानी सल्तनत को मिटाओ। वे एक बार लोकसभा के सदस्य हुये। वहां भी उन्होंने अशिष्ट भाषण दिया। नेहरू ने टिप्पणी की- मैने डॉ. लोहिया को काफ़ी साल बाद देखा। मैं उनसे बेहतर बातों की अपेक्षा कर रहा था। पर मैं निराश हुआ।
लोहिया नेहरू और इन्दिरा गांधी की रोज आलोचना करते थे, पर नेहरू और इन्दिरा ने कभी कोई शब्द लोहिया के खिलाफ़ नहीं कहा -यानी उनकी अवहेलना की। लोहिया पंडित नेहरू के खिलाफ़ चुनाव लड़ते थे। पंडित नेहरू एक शब्द भी लोहिया के खिलाफ़ नहीं बोलते थे।
लोहिया के सम्बन्ध अमेरिका से अच्छे थे। एक अमेरिकी महिला की पुस्तक है- ’लोहिया एंड अमेरिका मीट’। इसमें लोहिया की अमेरिका यात्रा का विवरण था। अमेरिकी शासक नेहरू की गुटनिरपेक्षता तथा समाजवादी देशों से मित्रता और स्वतंत्र विदेश नीति पसन्द नहीं करते थे। डॉ.लोहिया नेहरू का कड़ा विरोध करते थे। इसलिये वे प्रिय थे।
परसाई-जीडॉ. लोहिया वर्ण-संघर्ष की भी बात करते थे। वे जनेऊ तुड़वाते थे। पर जनेऊ तोड़ने से कहीं वर्ण मिटते हैं? ईसाइयों में भी ब्राह्मण ईसाई और गौड़ ईसाई – यह वर्ण भेद है।
लोहिया का नारा था गैरकांग्रेसवाद ! कांग्रेस को सत्ता से हटाओ। पर वे सामाजिक-आर्थिक क्रांति का कोई वैकल्पिक कार्यक्रम नहीं देते थे। शायद वे क्रांति भी नहीं चाहते थे- हालांकि उन्होंने लिखा है सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण कार्ल मार्क्स का ही सही और वैज्ञानिक है, महात्मा गांधी का नहीं। पर वे वर्ग संघर्ष की तैयारी भी नहीं करते थे। वे वास्तव में पूंजीवाद का सफ़ाया भी नहीं चाहते थे।
वे आंदोलन करते थे, कानून तोड़ते थे तो जेल जाते थे। मणिपुर की घटना के बारे में मैं नहीं जानता।
(देशबन्धु, रायपुर में 11 मार्च, 1984 को प्रकाशित)

2 responses to “लोहिया नेहरू के पास छोटे भाई की तरह आये थे”

  1. neeraj
    blog subscribe nahi ho raha, check kriye
  2. arvind mishra
    यह श्रृंखला बहुत अच्छी चल रही है -देश के राजनैतिक अतीत और महापुरुषों पर परसाई जी को पढ़ना ज्ञान के नए पहलुओं से मुखातिब होना है।
    लोहिया के बारे में मुझे सदैव कुछ अधिक जानने की उत्कंठा बनी रहती है। उनकी विद्वता का लोहा मानता आया है देश -मगर आज की बिना मूल्य की राजनीति में वे बस एक मोहरा बने हुए हैं !
    मैं इस लेख को लिखता तो एक फोटू और चेपता -अनूप शुक्ल की। या फिर अपनी – दोनों शख्सियतों में कुछ न कुछ नेहरु -लोहिया का अंतर्द्वन्द तो है :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..झांसी गले की फांसी दतिया गले का हार…….(सेवा -संस्मरण जारी)

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Thursday, November 07, 2013

मंगल अभियान कृष-3 और क्रिकेट मैच

http://web.archive.org/web/20140209191351/http://hindini.com/fursatiya/archives/5113
दो दिन पहले भारत का अंतरिक्ष यान मंगलग्रह के लिये रवाना हुआ। नारियल फोड़कर भेजे गये अंतरिक्ष यान का दिन भर हल्ला मचा रहा। शाम को मीडिया की प्राइमटाइम बहस का हिस्सा बना मंगल अभियान। हम सुकून से सोये कि चलो कम से कम एक दिन तो उपलब्धियों की बात हुई।
सुबह अखबार आया तो सोचा कि देखा जाये और क्या विवरण आया है अखबार में। अखबार के पहले पेज में देखा तो पूरे पेज पर स्टार स्पोर्ट्स का विज्ञापन था जिसमें लिखा था -आज से बदलेगी खेल की परिभाषा।
हमें लगा शायद स्टार स्पोर्ट्स वाले कोई घोषणा करने वाले हों कि वे मंगलग्रह पर खेल के लिये टीम भेजेंगे। पन्ना पलटा तो देखा कि एक बैट्समैन एक बल्ला और एक पांव आधा उठाये भरतनाट्यम मुद्रा में खड़ा था। ये तो क्रिकेट का विज्ञापन निकला भाई। हमे लगा चलो कोई नहीं। अखबार बेचारे गरीब लोग हैं। विज्ञापन से ही पेट का खाना मिलता है उनको। खबर अगले पेज पर देख लेते हैं।
ताज्जुब हुआ अगले पेज पर भी मंगल अभियान की खबर नहीं थी। मोटी हेडिग थी- 199 वें टेस्ट के लिये तेन्दुलकर तैयार। इसके खबर के दांये-बायें सचिन से जुड़ी खेल की खबरें और घटनायें थीं। सचिन के मैच खेलने की तैयारी की खबर ने मंगल अभियान की खबर को धकिया के पीछे कर दिया। एक निठल्ले खेल के नायक के एक मैच में खेलने की खबर ने देश के वैज्ञानिकों की कर्मठता की कहानी को पीछे कर दिया। अपने वैज्ञानिकों की उपलब्धि पर गर्व का खुमार एक्कै दिन में उतर गया।
चैनलों में देखा तो मंगल अभियान या उपग्रह की कोई खबर नहीं आ रही थी। चैनल सचिन के द्वारा लिये गये एक विकेट का गाना गा रहे थे। मंगल अभियान की खबर नेपथ्य में चली गयी थी। सचिन के द्वारा लिया गया एक विकेट मंगलग्रह पर भेजे गये उपग्रह से ज्यादा चर्चा लायक दिखा मीडिया को।
मंगल अभियान पर खर्चे के बारे में भी कुछ लोग रोना रोते दिखे। कोई बोला इत्ते में ये हो जाता वो हो जाता। जिन बुद्धिजीवियों को मंगल अभियान में चार सौ करोड़ रुपये के खर्चे से दुख हो रहा है उनको जानकारी के लिये बता दें कि इसी गरीब समाज ने कृष-3 पिक्चर देखने के लिये तीन दिन में 75 करोड़ फ़ूंक दिये। तीन हफ़्ते में मंगल अभियान के बराबर पैसा फ़ूंक चुका होगा समाज इस फ़िल्म को देखने के लिये!
वो तो कहो किसी ने ये नहीं कहा कि क्या जरूरत थी चार सौ करोड़ फ़ूंकने की। कृष से कहते तो 68 किलो के यान को मंगल ग्रह की कक्षा में धर के आ जाता। कृष-3 के मानवर को लगा देते तो अपनी जीभ से मंगल की मिट्टी के नमूने जीभ में लपेट के आ जाता जैसे पिक्चर में आइसक्रीम चाट लेता है। मिट्टी टेस्ट करके पता कर लेते कि मंगल पर पानी या मीथेन है कि नहीं।
छोडिये पिक्चर की कमाई को। मान लीजिये कि सौ करोड़ की आबादी में दस करोड़ कामगार हैं और सबको औसतन न्यूनतम वेतन (लगभग 300 रुपये रोज) मिलता है। बकौल परसाई जी पूरा देश खाने के बाद कम से कम दो घंटे ऊंघता है। घंटे भर की मजूरी अगर चालीस रुपये मान लें तो चार सौ करोड़ तो देश ऊंघने में बरबाद कर देता है। जिसको मन आये अपने हिस्से की बरबादी कम करके देश के खाते में जमा कर दे।
ताज्जुब हुआ यह देखकर कि एक बाबा के सपने के आधार गड़े खजाने की खोज में दिन-रात रिपोर्टिंग करता मीडिया मंगल अभियान की खबर पर एकदम उदासीन सा दिखा। खजाने के बारे में बाबा के चेले के नौटंकी भरे बयान बार-बार दिखाने वाले मीडिया को यह सुधि नहीं आयी कि उस वैज्ञानिक से विस्तार से बातचीत करते इस बारे में जिसने इस अभियान के लिये पिछले अठारह माह कोई छुट्टी नहीं ली और काम में लगा रहा। अच्छा होता कि इस मौके पर मीडिया वाले सरल भाषा में बात करने वाले वैज्ञानिकों को बुलाकर बात करते कि कैसे अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष में जाते हैं। क्या गति होती है जब जाता है यान। कैसे परिक्रमा करते हैं। कैसे उतरते हैं यान। क्या फ़ायदे हैं इन उपग्रहों के? कैसे कचरा फ़ैल रहा है अंतरिक्ष में।
लेकिन मीडिया की प्राथमिकतायें अलग हैं। उसको क्रिकेट के भगवान के 199 वें टेस्ट में खेलने की खबर ज्यादा दिलचस्पी है बनिस्पत अपने देश के पहले मंगल अभियान के। देश में वैज्ञानिक अभिरुचि कहां से आयेगी?


Sunday, November 03, 2013

परकम्मावासी



दीपावली पर खरीददारी

http://web.archive.org/web/20140420082729/http://hindini.com/fursatiya/archives/5099

दीपावली पर खरीददारी

खरीददरीपिछली दीवाली के पूरे साल भर बाद दीवाली आयी है।
जिधर देखो उधर पूरी चहल-पहल है। तमाम काम पड़ा है। सब निपटाना है।
त्यौहार मनाने के पहले लोग सब काम निपटाने में जुटे हैं। जिसे देखो वो कुछ न कुछ निपटा रहा है। जो निपटा नहीं रहा है वो फ़ैला रहा है।
हमें तो लगता है लोग झुट्ठै कहते हैं कि दीवाली खुशियों का त्यौहार है। हमें तो लगता है कि दीवाली काम में व्यस्त रहने का त्यौहार है। बिना काम के व्यस्त रहने का त्यौहार है।
हाल यह है कि घर के न जाने किन किन कोने-अतरे से कोई काम निकल आता है। सामने खड़ा हो जाता है बेशर्मों की तरह- हमको निपटाओ।
एक को निपटाया नहीं कि अगला सर उठाकर हाजिर- उसको निपटाया तो क्या निपटाया, हमको निपटाओ तो जाने।
गर्ज यह कि त्यौहार के मौके पर काम देश में ठांव-कुठांव होने वाले बम धमाकों की तरह हो जाते हैं। जैसे देश का कुछ पता नहीं कब, किधर से, कित्ते बम फ़ट पड़ें। वैसे ही त्यौहार के मौके पर घर में कोई गारण्टी नहीं कौन सा काम सर पर आ पड़े। आप घर के किसी सुरक्षित कोने में दुबके पड़े हो यह सोचते हुये कि त्यौहार तसल्ली से दुबक के मनायेंगे। लेकिन वहां भी -’सुनते हो…..’ के साथ कोई काम गोद में डाल दिया जाता है। – लो कुछ नहीं कर रहे तो इसे ही संभालो, निपटाओ।
इधर त्यौहारों में शुभकामनाओं के जबाब देना भी एक काम हो गया है। जिसकी शुभकामनायें आयें उनको धन्यवाद देते हुये डबल शुभकामनायें देना है। हमने इस काम पर ध्यान दिलाते हुये इसमें लगने की अनुमति मांगी तो मना कर दी गयी। बताया कि हमारा पुराना रिकार्ड ठीक नहीं इस मामले में। शुभकामनायें देते हुये बतियाने लगते हैं। तीस पैसे के काम में तीन रुपये फ़ूंक देते हैं। इस मनचाहे काम से वंचित करके हमको बाजार दौड़ा दिया गया। जाओ भाग के सब्जी ले आओ।
मन तो किया कि एक ठो एंग्री एंग मैन टाइप कोई डायलॉग मार के इस पर विरोध प्रकट कर दें कि मनपसंद काम से भगाकर हमें ऐसा काम क्यों सौंपा जा रहा है जो हमको रत्ती भर नहीं सुहाता। जरको नहीं जमता।
आपको बतायें कि हमको दो काम सख्त नापसंद हैं- एक खरीददारी करना और दूसरा प्रधानमंत्री बनना।
दूसरे काम के लिये तो हमने सब मीडिया वालों को साफ़ कह दिया है -खबरदार जो कहीं हमारे नाम की चर्चा चलाई प्रधानमंत्री पद के लिये किसी प्राइम टाइम में।
अब मीडिया वालों को हड़का दिये तो वे तो बेचारे मान गये लेकिन घर में तो जोर नहीं चलता न! घर वालों को हड़काने के बारे में सपना भी नहीं देखते। ये सपना तो खैर शोभन सरकार भी नहीं देख सकते। देखने की हिम्मत होती तो वैरागी काहे होते?
इसलिये जब कहा जाता है खरीदारी के लिये तो निकल पड़ते हैं झोला लेकर, झोले जैसा मुंह लटकाये।
तो भैया जब हमको अपने मनपसंद काम से वंचित करके बेमन वाला काम हम पर लाद दिया गया तो हम भी तमतमाते हुये चल दिये घर से (तमतमाने का काम घर बाहर निकलकर किये भाई) बाजार खरीददारी करने के लिये। ठान लिया मन में कि गांठ में जित्ते पैसे हैं सबको ठिकाने लगा देना है। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
सबसे पहले प्याज की दुकान पर पहुंचे। भाव पूछे तो बताया 40 रुपये किलो। हमें लगा दुकानदार मौज ले रहा। दो दिन पहले टीवी पर दिल्ली में प्याज के बढ़े दाम पर हुई बहस देखी थी हमने। हमने दोबारा पूछा तब भी दाम नहीं बढ़ाये अगले ने। मन किया कि एक ठो स्टेटस मारें फ़ेंकबुक पर कि देखो दिल्ली वाले कित्ता झूठ बोलते हैं। मन तो ये भी किया वहीं प्याज की ठेलिया के पास एक ठो संवाददाता सम्मेलन करके मीडिया वालों खबर ले लें कि खाली दिल्ली के बाजार के दाम पर प्याज का प्राइम टाइम करते रहते हैं। ये नहीं कि कभी शताब्दी पकड़कर कानपुर आयें और यहां के प्याज के दाम की खबर दुनिया को सुनायें- विजय नगर , गन्दे नाले की सब्जी मण्डी की प्याज की ठेलिया के दायें कोने से कैमरा मैन अलाने के मैं फ़लाने।
खैर प्याज की दुकान से फ़ुरसत पाकर हम आलू खरीदे। अट्ठाइस रुपया किलो। बाद में पता चला कि उसके भी मंहगे होने की अफ़वाह फ़ैलाने की साजिश चल रही है। बगल में भिंडी भी बड़े शरीफ़ दाम पर सलीके से मिल रही थी। बहरहाल, हमने अब बता दिया सो अब किसी सब्जी के मंहगे होने की खबर उड़ाये कोई तो परेशान होने के पहले हमसे पूछ जरूर लेना। काहे के लिये सब्जी के नाम पर जी धक्क से करना। और भी तमाम सामान हैं मंहगाई का रोना रोने के लिये।
सब्जियों से निपट के गणेश-लक्ष्मी खरीदने के लिये मुड़े। मूर्तियां दो तरह की मिल रहीं थीं। प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की सस्ती और देशी मिट्टी की मंहगी। हमने कहा खरीदेंगे तो देशी मिट्ठी की। चाहे मंहगी ही हों। वो थोड़ा अनगढ़ और मेहनत से बनाई मूर्ति भी लग रही थी। बहुत मेहनत से मूर्तियां छांटी। हमने किसी से सुना था कि लक्ष्मी की मूर्ति की नाक सुडौल होनी चाहिये। लेकिन जिस मूर्ति को देखा सबमें लक्ष्मी जी नाक ऐं-वैं टाइप दिखी। किसी में बेडौल, किसी में कटी सी। किसी में बिल्कुल्लै गायब। मन किया कि कहें लक्ष्मी जी से – ये सब गड़बड़ लोगों की संगत का नतीजा है। गलत लोगों के यहां रहोगी तो नाक कैसे साबुत बचेगी? लेकिन फ़िर कुछ कहे नहीं। सोचा त्यौहार के दिन क्या ताना मारना। लक्ष्मीजी मूर्ति के बाद गणेश जी फ़ाइनल किये। उसमें ज्यादा नहीं देखना पड़ा। एक में देखा कि गणेश जी का सर फ़टा हुआ था जैसे किसी ने भीड़ में लाठी चला दी हो। दुकान वाले ने बताया कि पकने में चिटक गये होंगे गणेश जी। पैसे लेने के बाद दुकानदार ने तमाम जगह पैसे छुआते हुये मत्थे से सटाये। हमारे से उसने बोहनी की थी।
दुकान से चलते-चलते देखा कि दुकान वाले ने अपने लड़के को एक कन्टाप मारा। बच्चे से एक मूर्ति गिर गयी थी। धोखे से। सजाते समय। मन तो किया कि मूर्ति वापस कर दें इस हिंसा के विरोध में। लेकिन फ़िर ‘दुकानदारी हिंसा हिंसा न भवति’ सोचते हुये दीगर सामान खरीदने लगे।
बाजार भर में छोटे-छोटे बच्चे दुकानदार बने सामान बेंचने में लगे थे। छोटे-छोटे बच्चे। गिनती और हिसाब में मुस्तैद। इनकी दीवाली इसी तरह मन रही थी। शाम तक कुछ कमा लेंगे तो शायद मजे करें।
पास के सब फ़ूंककर और तमाम सामान लादकर घर पहुंचे तो फ़िर सोचा कि तारीफ़ सुनने को मिलेगी। इत्ती खरीदारी करके आये थे। लेकिन ऐसा कुच्छ न हुआ। उल्टे उलाहना मिला कि ये सब सामान लाने के लिये किसने कहा था?
तो भैया ये रहे दीवाली पर खरीददारी के हाल। न करो तो आफ़त, करो तो डबल आफ़त।
नोट: ऊपर पटाखे वाली दुकान की फोटो ललित शर्मा जी की। पटाखे नहीं खरीदे तो उनकी फोटू ही सही। दीवाली पर ललित शर्मा जी ने बहुत काम निपटाये।

7 responses to “दीपावली पर खरीददारी”

  1. संतोष त्रिवेदी
    आप तिहवार को भी चुप नहीं बैठ सकते :-)
    आपको सपरिवार दीपावली मंगलमय हो :-)
  2. ashok kumar awasthi
    दीवाली पर आप कि तरह सभी का यही हाल है .सबसे ज्यादा सेलफोन पर शुभकामना संदेशों के आदानप्रदान में समय लगता है .अगर साइलेंट पर करो तो बाद में आपको फॉर्मेलिटी निभानी पड़ेगी. एक बात समझ में नहीं आयी. गतवर्ष इतने सन्देश आये लकिन साल वैसे ही गुज़रा जैसे पिछला वाला बिता था.तो क्या यह केवल शब्द थे उन्के पीछे भाव नहीं थे , इतने लोगों में किसीकी जुबान पर सरस्वती नहीं बैठी थी कि उसी ले कारन साल वाकई मंगलमय हो जाता ? यही सोंच कर संतोष कर रहा हूँ कि शायद इन्ही शुभकामना ओं के कारन कुछ अनिष्ट नहीं हुआ . हाँ एक फ़र्क़ हुआ है , अब अखबारों में दीवाली में दीवाला जैसे शीर्षक नहीं पढ़नेको मिलते. शायद बाज़ारी संस्कृति एसा नहीं लिखने देती.या विज्ञापनओं की भरमार इतनी है कि जगह नहीं बचती. अंत में आपको तथा आपके प्रभामंडल के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनायें.
  3. arvind mishra
    दिवाला तो सही सलामत है ? :-)
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..देहाती औरत!
  4. काजल कुमार
    सही है. हल्‍ला तो होना ही चाहि‍ए.
    काजल कुमार की हालिया प्रविष्टी..कार्टून :- दि‍वाली का अगला दि‍न
  5. कट्टा कानपुरी असली वाले
    बिना लक्ष्मी अकेले शापिंग ?
    हुकुम बजा लाये हो !
    कट्टा कानपुरी असली वाले की हालिया प्रविष्टी..अपने अपने उल्लू ले , महिलायें बाहर निकलीं हैं -सतीश सक्सेना
  6. SALIL VARMA
    Man khush ho gaya. Laga jaise ham aapke sath jhoja pakde bazar mein ghoom rahe hain. Mast!
  7. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    […] दीपावली पर खरीददारी […]