Thursday, August 13, 2015

मुंह सूख जाता है आवाज लगाते–लगाते

सुबह दफ्तर जाते हुए पुलिया के पास ही साइकिल पर रंगबिरंगी झाड़ू लादे भाईजी से मुलाकात हुई। आधारताल में रहते हैं। सुबह–सुबह झाड़ू बेचने के लिए व्हीकल की तरफ आते हैं।दिन भर में हजार/बारह सौ की बिक्री हो जाती है। दस पर्सेंट करीब की कमाई हो जाती है।

भारत नाम है इनका।।झाड़ू खुद बनाते हैं। सामन बाहर से मंगाते हैं।

23 साल के भारत फैजाबाद के रहने वाले हैं। यहां अपने रिश्तेदार के यहां रहते हैं। शादी हो गयी है एक साल पहले। पत्नी फैजाबाद में ही रहती हैं। यहां कमरा बहुत मंहगा है इसलिए पत्नी को साथ नहीं रखते। बीच–बीच में महीने–दो महीने के लिए घर हो आते हैं। बात रोज होती है पत्नी से। 

हमने पूछा क़ि घर से इतनी दूर क्यों आये फिर। झाड़ू का काम तो लखनऊ में भी कर सकते हो। इत्ती दूर काहे आये फिर। इस पर भारत ने कहा–वहां लखनऊ में आवाज लगाकर सामान बेचने की मनाही है। पुलिस वाले पकड़ लेते हैं। यहां इस तरह की कोई रोक नहीं।इसलिए यहां आ गए।

मुंह में मसाला देखकर हमने पूछा–मसाला क्यों खाते हो?

मुंह सूख जाता है आवाज लगाते–लगाते। इसलिए मसाला खाना पड़ता है। अब आदत पड़ गयी है। इसलिए खाते हैं।

हमने कहा–अरे भले आदमी मुंह सूखता है तो पानी की बोतल साथ लेकर चलो। जब मुंह सूखे पानी पी लो।
इस सलाह के खिलाफ भी मासूम बहाना उसके पास मौजूद था। बोला–सामान लादने के बाद जगह नहीं बचती साईकिल में ।कहां रखे पानी की बोतल।

हमने कहा–भले मानस, कैरियर में पीछे टांग लिया करो।

काफी बातचीत हो गयी। दोनों को काम पर निकलना था। निकल लिए। देखते ही शाम हो गयी। और अब रात भी। सोचा कि सुबह की कहानी बता दें।

तोरा मन दर्पण कहलाये

तोरा मन दर्पण कहलाये
भले बुरे सारे कर्मों को
देखे और दिखाए।

'पंकज टी स्टाल' पर गाना बज रहा है। आज सुबह पुलिया पर दो रिटायर्ड लोग मिले। हम पास गए तो उतर कर अटेंशन टाइप हो गए। हम हाल–चाल का आदान–प्रदान करके आगे बढ़ गए।

एक दम्पति आपस में बात करते हुये टहल रहे थे। महिला धीरे–धीरे चल रही थी। पैर में कोई तकलीफ सी थी। चलते हुए कुछ कह रही थी अपने उनसे। वो सामने गर्दन किये उसकी बात सुन रहे थे। सामने इतनी जिम्मेदारी से किये थे मानो उनको डर था कि पत्नी की तरफ मुंह करके सुन लेंगे तो सुनाई देना बन्द हो जायेगा।

एक महिला अकेली टहल रही थी। बाएं हाथ से साड़ी का पल्लू थामें दायें हाथ को चप्पू की तरह चलाती हुई टहल रही थी। पल्लू पकड़ने के चलते उसकी टहलने की गति आधी हो गयी थी। हमको परसाई जी का यह सूक्ति वाक्य –''इस देश की आधी ताकत लड़कियों शादी करने में बर्बाद हो जाती है' की तर्ज पर लगा–'देश की महिलाओं की आधी ताकत साड़ी का पल्लू सँभालने में खर्च हो जाती है।'

एक आदमी सड़क के किनारे खड़ा होकर पीटी कर रहा था। ऊपर हाथ करके जब वो दोनों हथेलियों को मिलाता होगा तो उनके बीच की हवा का तो दम घुट जाता होगा। हवा फड़फड़ाती हुई हथेलियों को दूर धकेलती  होगी। मुक्त होते ही आसपास की हवा के गले लगकर लंबी–लंबी साँस लेकर हाल ठीक करती होगी।

गाना बजने लगा:

'तू प्यार का सागर है
तेरी एक बूँद के प्यासे हम।'

बोलो सागर की बूँद भी भला कोई पीता है। लेकिन शायद वह 'थ्रो प्रापर चैनल' की बात हो। मतलब सागर अपना पानी बादल को देगा। बादल फिर हमको देगा पानी। प्यार होने के लिए भी कुछ न कुछ माध्यम चाहिए होता है। पहले भाई/बहन के दोस्त/ सहेलियिन या फिर पड़ोस से प्रेम का चलन था। समय के साथ क्रांतिकारी बदलाव आया है इस चलन में।

अगला गाना बजा:
'जोत से जोत जलाते चले चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो।'

गाने में साफ़ नहीं किया गया है कि प्रेम की गंगा प्रदूषण मुक्त होगी या फिर कानपूर/ बनारस वाली नाले,कचरे की संगति वाली गंगा।

सड़क पर एक आदमी बहुत तेजी से हाथ चलाता हुआ चला आ रहा है। हाथ तेजी से चलाते हुए उसको देखकर लग रहा है वह हवा को पहले दायें तरफ भेजता है। जैसे ही हवा दायें तरफ पहुँच जाती है वैसे ही वह उसको धकेल कर बायीं तरफ कर देता है।

दोनों हाथों के बीच की हवा झल्लाते हुए कोसती होगी। शायद मन में कह रही हो –ये मुआ हमको दफ्तर की फ़ाइल की दायें–बाएं इधर–उधर कर रहा है। ये नहीं कि हमको फेफड़े में भेजे हमरा काम पूरा हो। हवा को क्या पता कि फेफड़े तक पहुंच कर अपनी कार्बन डाई आक्साइड बनना सबके भाग्य में नहीँ होता। उसके लिए भी ऊपर पहुंच जरुरी होती है।

एक महिला सड़क पर सलीके से सड़क पर टहल रही है। 'मृदु मंद मंद मंथर मंथर/लघु तरणि हंसनी सी सुन्दर ।' महिला के दोनों  हाथ चप्पू की तरह इधर उधर हो रहे थे। मुझे लगा कि सड़क पर चलता इंसान आसमान में उड़ते पक्षी सरीखा ही होता है। आसमान में पंख जो काम करते हैं, सड़क पर वही काम हाथ करते हैं। सड़क मानो नदी हो और इस पर चलता इंसान नदी में तैरती नाव हो और इधर–उधर चलते हाथ इस 'मनुज नाव' की पतवार हैं जो चलने में सहायक होते हैं।हाथ न हों तो पैर को आगे चलने में बहुत मेहनत करनी पड़े।

नदी,नाव, पंख और आसमान के जिक्र से रमानाथ जी की कविता याद आ गयी:

'मेरे पंख कट गए हैं
वरना मैं गगन को गाता।'

पंख हम सबको मिलते हैं।अब यह हम पर है कि हम उससे कितना ऊपर उड़ते हैं। कितना आसमान छूते हैं। कुछ लोग अपने पंख रहते अपने क्षितिज छू लेते हैं। कई लोग समय बीत जाने पर पंख कट जाने का अफसोस करते हैं। इसलिए गुरु जब तक पंख हैं तब तक उड़ लो। जो हुनर है पास में उसे खूब निखार लो।

इसी कविता की आखिरी पंक्तियाँ हैं:

वो जो नाव डूबनी है
मैं उसी को खे रहा हूँ
पर डूबने से पहले
एक भेद दे रहा हूँ।

मेरे पास कुछ नहीं था
जो तुमसे मैं छिपाता।

मेरे पंख कट गए हैं
वरना मैं गगन को गाता।

तो मित्रों आज सुबह मेरे पास यही कुछ था लिखने के लिए । सब बता दिया बिना कुछ छिपाये। चलते समय गाना बज रहा है:

'प्यार के इस खेल में
दो दिलों के मेल में
तेरा पीछा न मैं छोड़ूंगा सोनिये
चाहे भेज दे तू जेल में।'

गाना सुनते हुए सोच रहा हूँ कि कितने बहादुर होते हैं प्रेम करने वाले जिनको जेल जाने की भी डर नहीं है।सोच तो यह भी रहा हूँ कि कैसा है वह समाज जहां प्रेम ,जो मानव जीवन का उत्कृष्टम भाव है, करने पर जेल जाना पड़े ।

नीचे फोटो में रांझी रोड पर बैठा कुत्ता शायद सूरज भाई को सलामी देने के इंतजार में है।

Wednesday, August 12, 2015

’सूजन’ में दर्द का होना जरूरी है

हम जब बीएचयू में उच्च शिक्षा रत थे तो साथी थे बलिया जिले के यादव जी। कविताओं से सहज लगाव होने के चलते हम अक्सर कविता गाते/ गुनगुनाते रहते थे। एक दिन यादव जी ने हमसे कहा -तुम मुझे कुछ अपनी पसंदीदा कवितायें सुनाओ। लिखाओ। हम भी याद करेंगे।

हमने उनको नन्दन जी की यह कविता उनको सुनाई:
अजब सी छटपटाहट
घुटन, कसकन
है असह पीड़ा।
समझ लो साधना की अवधि पूरी है।

अरे ,
घबरा न मन
चुपचाप सहता जा
सृजन में दर्द का होना जरूरी है।
यादव जी ने याद करके कविता कुछ दिन बाद हमको इस तरह सुनाई:

अजब सी छटपटाहट
घुटन, कसकन
है असह पीड़ा।
समझ लो साधना की अवधि पूरी है।
अरे ,
घबरा न मन
चुपचाप सहता जा
’सूजन’ में दर्द का होना जरूरी है।
मुझे लगा कि आम आदमी के पास पहुंचकर कविता कितनी सहजऔर सटीक हो गयी। ’सृजन’ में दर्द हो या न हो कहा नहीं सकता लेकिन’ ’सूजन’ में दर्द से कोई माई का लाल इंकार नहीं कर सकता।

Tuesday, August 11, 2015

तुम्हारी याद आई औ मन गुदगुदा गया

तुम्हारी याद आई औ मन गुदगुदा गया
एक मिनट , जरा कोई फोन आ गया।

धनिया की जगह फिर से टमाटर ले आये
दुकान पर तेरा चेहरा फिर याद आ गया।

पूरा दिन बीता पर तुम्हें याद नहीं किया,
मना है याद करने को, ये याद आ गया।

प्रेम गली खुदी है,सीवर के पाइप पड़ रहे
इसीलिये उचक के मैं फेसबुक पे आ गया।

तेरी तस्वीर पे इत्ती जोर से लाइक लिया
अंगूठा मेरा स्क्रीन के पार* आ गया ।

पढ़ के मेरा मेसेज लगता है मुस्कराई हो,
यहां लॉन पूरा रौशन, गुलजार हो गया।

-कट्टा कानपुरी
*शेर संसोधन हरमेश सिंह की सलाह पर।

धर्म कोई हो मूल स्वभाव बना रहता है

रायमन कुजूर और मारिया एक्का
आज सुबह देर से जगे। मन नहीं था निकलने का लेकिन कुछ देर अलसाये लेटे रहने के बाद झटके से उठ गए। पुलिया पर फैक्ट्री की दोनों महिलाएं साढ़े सात बजने का इन्तजार कर रही थीं। मुंह ने तम्बाकू नहीं देखकर ठीक लगा।

हम केशरी पटेल की दूकान तक गए थे। दो दिन पहले उनके इंजिनियरिंग पास बच्चे के बारे में लिखा था तो एक मित्र ने गुड़गांव का नम्बर दिया था कि उनके पास कुछ काम मिल सकता है। दो दिन केशरी परिवार से सम्पर्क नहीं हुआ तो हम बता नहीं पाये। आज उनको बताने गए तो खोजने पर मिला नहीं। पता नहीं किधर बिला गया। अगर व्यवस्था बनती हो भाई जी नम्बर फिर से दे दें। इनबॉक्स में या कमेंट में।

लौटे तो पुलिया पर हथेली पर तंबाकू रगड़ते हुए रायमन कुजूर मिले। 506 बेस वर्कशाप से 2012 में सुपरवाइजर पद से रिटायर।

बातचीत करते हुए पता चला कि रायमन पहले ओरांव थे जो कि गोंड आदिवासी होते हैं। एक पीढ़ी पहले क्रिश्चियन हुए। हमने पूछा कि किश्चियन होने के बाद आपकी स्थिति में कितना बदलाव आया है? इस पर रायमन बोले-हम तो पैदाइशी ईसाई हैं। धर्म तो पिता ने बदला इसलिए कैसे कुछ कह सकते हैं।

हमने पूछा-लेकिन अब भी कई ओरांव लोग मिलते होंगे आपको। उनकी तुलना में आपको अपनी स्थिति कैसी लगती है?

हमें लगता है कि ईसाई बनने के बाद हम अधिक सभ्य हुए हैं-रायमन ने बताया।

बातचीत करते हुए एक महिला हाथ में लकड़ी लिए टहलते हुई आ गईं। कन्धे पर भूदानी झोला। हमें लगा कि हनुमान मन्दिर में बैठकर आ रही हैं। लेकिन फिर याद आया कि आज तो सोमवार है। आज हनुमान जी के यहां तो मामला ठनठन गोपाल रहता है।

पूछा तो पता लगा कि वो रायमन की पत्नी हैं। नाम मारिया। शादी के पहले मरिया ईक्का थीं। शादी के बाद मारिया कुजूर। झोले में सुबह की सैर के समय बीने हुए करीब किलो भर मशरूम थे। प्रकृति से फल और अन्य प्राकृतिक सामान इकट्ठा करना सहज स्वभाव है आदिवासी समाज का। धर्म कोई हो मूल स्वभाव बना रहता है।
मूलत: आदिवासी होने के कारण एस टी समुदाय को मिलने वाली सुविधाएँ ईसाई बनने के बाद भी मिलती हैं।
बहुत मंहगे बिकते हैं। 50 रूपये पाव। फ्रिज में भी खराब हो जाते हैं। इसलिए जो बचते हैं उनको बेच देते हैं।
एक बेटी है दोनों की। 30 साल की। अभी तक शादी नहीं हुई। ईसाई धर्म में लड़के वाले लड़की वालों के पास आते हैं प्रस्ताव लेकर। अभी तक कोई मामला जमा नहीं। गोंड समाज ने होते तो शायद बच्ची के बच्चे भी हो गए होते।

यह अकेली बेटी है? पूछने पर मारिया ने बताया कि एक बच्चा भी था। 1998 में 12 साल का होने के बाद नहीं रहा।भगवान ने दिया था। वापस बुला लिया।

तम्बाकू खाने को मना नहीं करती रायमन को? पूछने पर मारिया बोली-अब तो आदत हो गयी है। कभी-कभी दारु भी पी लेते हैं रायमन। लेकिन मारिया न तम्बाकू खाती हैं न और कोई नशा।

फोटो खींचकर दिखाया तो मरिया बोली-सब बाल सफेद। हमने कहा-अच्छी तो लग रही। इस पर दोनों मुस्कराने लगे।

लड़ाई होती है आप लोगों की आपस में? इस सवाल के जबाब में रायमन बोले-होती है। कभी-कभी। लेकिन बहुत कम।

जिंदगी कैसी कटी? इस सवाल के जबाब में बोले-हम खुशहाल हैं। पेंशन मिलती है 18 हजार। कोई तकलीफ नहीं। बेटी की शादी हो जाये बस। और कुछ नहीं चाहिए हमको।

उनको घर जाना था। हमको दफ्तर। दोनों लोग अपने-अपने रस्ते चल दिए।

Sunday, August 09, 2015

सब अपनी मर्जी की करत हैं

गुड्डू पुत्र रामफल यादव
आज दिन भर आराम करते ही बीती। बीच में कुछ पोस्ट फेसबुक से उठाकर ब्लाग पर डाली।घर में और कुछ मित्रों से बतियाये भी। कुछ ने हड़काया भी कि ख्याल क्यों नहीं रखते अपना।

लेटे-लेटे पढ़ते या बतियाते हुए कई बार अपनी पसंदीदा मुद्रा पेट के बल लेटने को हुए। लेकिन ऐन टाइम पर दो दिन पहले का बवाल याद आ गया। फिर सीधे हो गए।

शाम को साइकिल स्टार्ट करके टहलने निकले।कई दिनों से रामफल के यहां जाने की सोच रहे थे। लेकिन जा नहीं पा रहे थे। आज गए तो रामफल का बड़ा बेटा गुड्डू मिला। घर में पत्नी पूजा बिटिया प्रिया थे। बिटिया तखत पर आराम से लेटी थी। हमारे पहुंचने पर उठकर अंदर चली गई।

रामफल के न रहने के बाद पहली बार आये थे उनके घर। पता चला रामफल के ऊपर आठ दस हजार का कर्ज था। चूँकि फल खुद लाते नहीं थे। कोई दूसरा देता था उसके फल बेचते थे। कभी नुकसान हो जाता था। लब्बोलुआब यह कि कर्ज छोड़ गए रामफल।

रामफल की ठेलिया उनकी पत्नी ने कर्ज चुकाने के लिए फल के ठेकेदार को बेच दी। बकौल गुड्डू-'माताराम ने कर्ज पटाने के लिए ठेलिया बेच दी। वो छोटे भाई के साथ रहती हैं। फिर पिताजी की निशानी के रूप में उसे हमने (गुड्डू) पैसे देकर वापस खरीद लिया।'

ठेलिया तो ले ली पिताजी की लेकिन उसको लगाने के लिए पैसे नहीं गुड्डू के पास। ठेकेदार उधार माल नहीं देता। घर का खर्च चलाने के लिए गुड्डू लेबर का काम करने लगे। बड़ा बेटा (जो इंटर पास है) एक जगह चौकीदारी करता है। छोटा बेटा हाईस्कूल में पढ़ता है। बिटिया इंटर पास करके एक जगह 'टैली' सीखने जाती है। 500 रूपये महीने फ़ीस है।


कंचनपुर के सूरज विदा होते हुए
हमने गुड्डू से पूछा कि तुम फल का काम क्यों नहीं करते। तो बताया कि फल लाने के लिए पैसे नहीं। हमने पूछा कितने पैसे? तो बताया- 5000/- रुपये से काम हो जायेगा। हमने कहा-अच्छा 5000 रूपये हम तुमको आज दे दें या दिला दें तो कब से फल का काम शुरू कर दोगे? बोले-कल से।

हमने गुड्डू से फिर पूछा कि सही में फल का काम करना चाहते हो या हमारे कहने पर कर रहे। बोले-सही में करना चाहते हैं। हमने कहा-अच्छा हम कमरे पर पहुंचकर फोन करेंगे तब आना और ले जाना पैसे।

उस समय हमारे पर कुछ जमा 55 रूपये थे। जो की कमरे पर लौटते समय तक 10 रूपये हो गए। बाकी का साबुन सर्फ ले लिया। बाकिया सब पैसे बैंक में हैं। एटीएम खराब था। नया मिल गया है लेकिन उसका पिन आलस्य के चलते अभी तक लाये नहीं। मेस में आये तो जिसके पास पता किया उसके पैसे बैंक में ही हैं। अभी एक मित्र को बोला है। वो निकाल के लाएगा फिर उससे उधार लेकर गुड्डू को उधारी देंगे।

गुड्डू की बिटिया प्रिया से हमने पूछा कि क्या शौक है। खाली समय में क्या करती हो। तो उसने बताया-सोते हैं। हमने पूछा-पढ़ने का शौक है। तो बोली -हाँ भैया की अप्रेंटिस की किताबें पढ़ते रहते हैं। अप्रेंटिस की किताबें मतलब साधारण गणित और सामान्य ज्ञान जैसी किताबें। हमने कहा हम तुमको कहानी की किताबें देंगे वो भी पढ़ना।

रामफल के यहां से निकलकर आधारताल की तरफ गए। सूरज भाई टाटा करते हुए विदा हो रहे थे। सड़क पर लोग आ-जा रहे थे। सड़क किनारे के ही कुछ खेतों में लोग धान की रोपाई कर रहे थे।

आधारताल के पास बहुत भीड़ थी सो लौट आये।

ओवरब्रिज के पास दीपा का ठिकाना है। वहां गए तो पता चला कि वह बगल के अहाते में खेलने गयी है।रास्ते से उसके लिए बिस्कुट का पैकेट लिया था। सो बगल के अहाते गए। वहीं खेलती हुई दीपा दिखी। बिस्कुट लेकर थैंक्यू अंकल बोलकर टाटा करके अंदर चली गयी।

शोभापुर रेलवे क्रासिंग के पास बैरियर बन्द होने जा रहा था। लपकते हुए बैरियर पार किया।रास्ते में साईकिल की चेन उतरी। पहली बार। चेन चढ़ाते हुए हाथ में लगी ग्रीस को सड़क किनारे की घास से पोछ लिया।

मेस के पास दो ऑटो में कुछ महिलाएं बैठी दिखीं। ऑटो में बिजली के हंडे और जनरेटर लदे थे। बारात के बैंड के साथ चलने वाली लाइट थी। महिलाएं उनको सर पर लादने के लिए थीं। रांझी में रहती हैं। 10 महिलाएं थीं। बारात के साथ बिजली का हंडा लादकर चलने के 100 रूपये मिलते हैं। काम तो एक से दो घण्टे का। लेकिन कुल मिलाकर 4 से 5 घण्टे लग जाते हैं। कुछ टूट-फुट जाए तो उसके पैसे कटते हैं।

बात करते हुए एक महिला बोली-आदमी चाहे जित्ता कमाता होय लेकिन जबलपुर है यह। यहां औरत को काम करना ही पड़ता है। आदमी जो कमाता है वो दारु में उड़ा देता है। बच्चों को पालने के लिए औरत को खटना पड़ता है। अब बच्चों को तो पलना पड़ता है न। उनको आराम जिनके बच्चे नई हैं।

हमने पूछा-आदमी को टोकती नहीं हो दारु पीने से।इस पर सब हंसने लगीं।एक बोली-टोंक के किसको कुटाई करवानी है? सब अपनी मर्जी की करत हैं। इससे अच्छा चुपे रहो।

जिस गाड़ी से बरात आ रही थी वह पंचर हो गयी थी। इसलिए उसके आने में देर हुई। उनको बरात के इन्तजार के लिए छोड़कर हम कमरे पर चले आए।

Saturday, August 08, 2015

हफ्ते में एकाध मंगलवार/शनिवार और होते


पुलिया के पास ये दो महिलाएं मिलीं।तेजी से घर की तरफ जाती हुई। लाल माटी में रहती है।शनिवार को हनुमान मन्दिर से शनिचर की मंगनई करके लौट रही हैं। 15 से 20 लोग मांगने वाले आते हैं।मंगलवार और शनिवार दो ही दिन भीख अच्छी मिलती है।बाकी दिन सन्नाटा रहता है।

जैसे दफ्तरों में काम करने वाले कहते हैं कि काश हफ्ते में इतवार और होते वैसे ही शायद हनुमान मन्दिर में मांगने वाले कहते होंगे -काश हफ्ते में एकाध मंगलवार/शनिवार और होते।

भीख में जो पैसा मिलता है वह सब में बंटता है। 40-50 रूपये हरेक के हिस्से में आता है।

मांगने वाले आम तौर पर सुबह 5 से 6 बजे से लेकर शाम के 4 से पांच बजे तक बैठते हैं। कुछ लोग और देर तक भी बैठते हैं।

बातचीत में पीछे बिना चश्मे वाली माताजी ने बताया कि उनका डुकरा (आदमी) 4 साल पहले नहीं रहा।यादव हैं जाति से। पहले ठेकेदार के यहां दिहाड़ी मजदूरी करती थी।खेत में भी काम किया।लेकिन अब बुजुर्ग हो गयी तो ठेकेदार कहते हैं- अम्मा अब तुमसे काम नई हो सकता। सो का करें। मजदूरी में पेट पालने के लाने माँगन लगे।
बाल बच्चे के बारे में पूछने पर बताया-आठ बच्चे हुए। लेकिन सब एक-एक करके ऊपर चले गए।कोई न बचा।
दूसरी वाली माताजी के बेटे बहुरिया हैं। लेकिन वो अलग रहते हैं। ये भी पहले मजूरी करती थीं।लेकिन बुजुर्ग होने के बाद काम मिलना बन्द हो गया। इसलिए हनुमान जी की शरण में आ गईं। बजरंगबली तमाम के सहारे का काम करते हैं। इसीलिये तो भजन है न:

बजरंगबली मेरी नाव चली
जरा बल्ली दया की लगा देना।

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