Thursday, July 16, 2015

बस्ते और उम्मीद का बोझ

सबेरे सड़क धुली धुली लग रही थी। लग रहा था कि प्रकृति ने सड़क पर पानी छिड़ककर अभी-अभी पोछा लगाया है।

सड़क के दोनों तरफ हरियाली दिख रही है। पेड़, पौधे, घास,पत्ती हरे-हरे। कुछ फूल अलग दिखने की जिद में दिख रहे थे। हरा-पीला रंगबिरंगा रंग धारण करके बहुमत से अलग दिखने की कोशिश। उनको इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा था। जहां दिख रहे थे फूल सब नोचे जा रहे थे। बचे सिर्फ वही फूल थे जो या तो नोचे जाने वालों की पहुंच से दूर थे या फिर वे जो ऐसे थे जिनके मुकाबले घास फूस और कांटे खूबसूरत लग रहे थे। बहाना पूजा का था लेकिन सजा अलग दिखने की जुर्रत की थी। जो बहुमत के खिलाफ होगा, नोचा जाएगा।
आज चूंकि हरियाली की सरकार है इसलिए सब पेड़ पौधे हरा भरा दिखने की कोशिश में हैं। कुछ दिन पहले पतझर की सरकार थी तो यही सब पेड़ पौधे नंगे होने की दौड़ में शामिल थे। इससे साफ़ होता है पेड़-पौधे भी लोकतन्त्र के छुटभैये गुंडों सरीखे होते हैं जो कि जिस पार्टी की सरकार होती है उसी का झंडा अपनी जीप में फहराते हुए गुंडई करते हैं।

जगह-जगह सड़क के गड्ढों में पानी जमा हुआ था। यह पानी सड़क किनारे के पेड़ों के लिए आईने का काम कर रहे थे। पेड़ उचक-उचक कर सड़क के पानी में अपनी शक्ल देखते हुए खुश हो रहे थे। हिलती हवा के साथ पोज बदल-बदलकर मगन हो रहे थे और उस ठेकेदार को दुआएं दे रहे थे जिसने सड़क असमतल बनाई। वहीं बगल के पेड़, जिसके पास की सड़क समतल होने के चलते आइना विहीन थी , ठेकेदार को कोस रहीं थीं कि उसने उनके पास सड़क असमतल क्यों नहीं की। कुल मिलाकर दुआएं बहुमत में थीं इसलिए उनकी सरकार बची हुई थी और ठेकेदार फल फूल रहे थे।

चाय की दुकान पर मिसिर जी मिले। एक बच्चा चाय पीने आया। उसके पास फुटकर पैसे नहीं थे। दस के नोट के बदले उसको एक विजिटिंग कार्ड टाइप कागज दिया। उससे वह अगली बार जब आएगा तो यह कागज जमा कर देगा और चाय पिएगा। बच्चा एक कन्स्ट्रक्शन कम्पनी में काम करता है। कमरे पर सिर्फ सोने का इंतजाम है।बाकी के लिए बाहर पर निर्भर। पन्नी में चाय लेकर जाते हुए बच्चे को हम तब तक देखते रहे जब तक वह दीखता रहा। इसके बाद साइकिल स्टार्ट करके चल दिए।

व्हीकल मोड़ के पास गन्दगी पसरी हुई थी। चारो तरफ प्लास्टिक की पन्नियाँ, पालीथीन किसी सत्ताधारी पार्टी के स्वयंसेवकों सरीखी फ़ड़फ़ड़ा रही थी। जो गन्दगी चिपटी थी वह आसपास फैला रही थी। एक सूअर समतल फैली गन्दगी पर गर्व से टहलते हुए अपने बढ़ते साम्राज्य को देखकर गर्व सा कर रहा था। एक जगह उसको गन्दगी ढेर सा दिखा तो अपनी थूथन से उसने गन्दगी को हिलाकर आसपास फैला दिया। शायद उसको यह आशंका होगी कि गदंगी एक जगह इकट्ठा होकर कहीं उसके खिलाफ न हो जाए।

रास्ते में गिरी जी मिले। जबरियन घर ले जाकर चाय पिलाई। बोले -बच्चे की नौकरी के लिए रुके हैं जबलपुर में। नौकरी लगते ही बलिया चले जाएंगे। फ़ौज की फिजिकल के हिसाब से बच्चा तैयार है। बस लिखित और इंटरव्यू में निकल जाए तो हो जाएगा।

आगे माता-पिता बच्चों को स्कूल भेजने के लिये सवारियों का इंतजार करते दिखे। एक माँ ने अपनी बच्ची का भारी बस्ता अपनी पीठ पर लाद रखा था। बच्ची अपनी सहेली के साथ खेल रही थी। सवारी आते ही बस्ता और अपनी उम्मीदें बच्ची की पीठ पर लाद दी। बच्ची बस्ते और उम्मीद का बोझ लादे हुए स्कूल चली गयी।
बच्ची तो स्कूल चली गयी। अब हमको भी दफ्तर जाना है।

चलते हैं तैयार होने। आप भी मजे कीजिये।

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1 comment:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन निर्मलजीत सिंह सेखों और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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