Friday, July 24, 2015

फ़ड़फ़ड़ा के सूरज फ़िर से निकल पड़ा,
दिन शुरु हुआ पकड़े हुये एक खड़खड़ा।
किरणें निकल पड़ी हैं खिलखिलाते हुये,
अंधेरा हुआ गोल, रात का तंबू उखड़ा।
भौंरे ने कली को आहिस्ते से चूम सा लिया,
फ़ूल इंतजार कर रहा उसका खिला-खड़ा।

-कट्टा कानपुरी

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