Tuesday, July 21, 2015

ग्लास में फिट कैमरे से सेल्फी

मेस से निकलते ही पानी की बूंदे चेहरे पर गिरने लगीं। दो दिन बाद मिले थे इसका गुस्सा सा था बूंदों में। मुझे एक्यूप्रेशर सरीखा एहसास हुआ । चेहरे पर लैंड करते ही गुस्सा ठंडा हो जाता बूंदों का और वो चेहरे के मैदान पर टहलते हुए इधर-उधर घूमने लगीं। कुछ तो गले से गुजरते हुए अंदर तक पहुंच गयीं और गुदगुदी जैसी करने लगी। हम भी कुछ बोले नहीं। मजे लेते हुए नटखट बूंदों का खेल देखते हुए वो कविता याद करते रहे जिसमें बादलों की गोद से निकलकर जमीन की तरफ बढ़ती बूंद की भावनाओं का चित्रण किया गया है।

स्कूल का समय हो गया था। बच्चे अकेले,साइकिल,अपने घरवालों के साथ स्कूल की तरफ बढ़ रहे थे। एक ट्रक, जो चारो तरफ तिरपाल से ढंका था, में खूब सारे बच्चे खड़े थे। ट्रक रुकते ही बच्चे कूदकर नीचे उतरकर भागते, तेज और धीरे-धीरे चलते हुए स्कूल की तरफ चलते गए। धीरे चलने वाले बच्चे पता नहीं धीर-गम्भीर स्वभाव के थे या फिर स्कूल आना उनको मजेदार नहीं लग रहा होगा।

दूर ट्रेन दिखी। दांयी तरफ नीले सफेद डब्बे। हम ट्रेन को देख रहे थे और सोच रहे थे कि आगे जबलपुर उतरने वाले यात्री डब्बे के दरवाजे के पास इकट्ठा होने लगे होंगें। हम यह भी सोच रहे थे कि क्या ट्रेन से कोई हमें देख रहा होगा। फिर तय भी कर लिया कि नहीं देख रहा होगा। बड़ी चीज द्वारा छोटी चींजों को देखने का रिवाज नहीं। इसको ऐसे समझिये कि एक आदमी को सरकार के क्रिया कलाप दीखते हैं लेकिन सरकार आम आदमी को नहीं देख पाती। सरकार की नजर में आने के लिए आदमी को भीड़ बनना पड़ता है। वोट बैंक बनना होता है।

सूरज भाई पूरे जलवे के साथ आसमान में चमक रहे थे। हमको देखकर और भी चमकने लगे। कुछ किरणों को हमारे पास भेज दिया। वे किरणें हमारी बायीं तरफ आकर हमसे बतियाने लगीं। इसके चलते हमारी और साइकिल की एक कमजोर सी परछाई सड़क पर बन गयी। इतनी कमजोर कि उसको देखने का मन नहीं हुआ।
पंकज टी स्टाल पर पहुंचते ही माहौल गर्मजोशी भरा दिखा दिया। एक आदमी ने चाय वाले की माँ को सम्बोधित करतेहुए गाली दी। चाय वाले ने 'भो' से शुरू होने वाली गाली से जबाब दिया। 'भो' से शुरू होने वाली गाली सुनते हुए एक बारगी एहसास हुआ कि शायद इस गाली का जन्म संस्कृत से हुआ हो । संस्कृत में 'भो' सम्बोधन के लिए प्रयोग होता है शायद।

गालीबाजी आगे बढ़ती शायद लेकिन तिपहिया हाथ रिक्शे पर बैठे एक व्यक्ति की किसी बात पर चाय वाला ऐसी तेजी से उसकी तरफ बढ़ा जैसे संसद में सांसद लोग सदन कूप की तरफ बढ़ते हैं। लेकिन हाथ रिक्शे के पास पहुंचकर गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की बात करने वाली सरकार के कदमों की तरह गड़बड़ आदमी को देखते ऐन वक्त पर ठिठक गया। अनमने मन से उसने हाथ रिक्शे के अगले पहिये को जमीन से उठाया। रिक्शे वाला उसकी मेहनत से बेपरवाह मुस्कराते हुए रिक्शे की सीट पर बैठा चाय पीता रहा। चाय वाला पहिये को जमीन पर आहिस्ते से रखकर हल्की-फ़ुल्की गलियां बकता हुआ अपनी दूकान के काउंटर के पीछे आकर खड़ा हो गया। रिक्शे पर बैठा पैर से लाचार आदमी चाय पीते हुए मुस्कराता रहा।

चाय की दूकान पर एक बुजुर्ग हाथ में एक बैग लटकाये चाय पी रहे थे। उम्र 70 साल। 506 आर्मी बेस वर्कशाप से रिटायर। दफ्तरी का काम करते थे। 1963 में नवी पास की थी। रीवाँ में रहते हैं। महीने दो महीने में आते हैं तो सीजीएचएस अस्पताल से दवा ले आते हैं। यहां रांझी में बेटा रहता है। सुनार है। उसी के पास रहते हैं। दूसरा रीवां में खेती करता है।

अस्पताल में नम्बर लगता है। 33 वां नम्बर लगा है। सुबह 7 बजे 33 वां नम्बर। पहला वाला और जल्दी आया होगा। 8 बजे अस्पताल वाले आएंगे। नम्बर को कम्प्यूटर पर चढ़ाएंगे। फिर डाक्टर 9 बजे आकर देखना शुरू करेंगे। 12 बजे तक नम्बर आएगा।

कार्ड देखते हैं। नाम जगन्नाथ प्रसाद। माँ के नाम के आगे चिड्ढी बाई लिखा है। दूसरी स्त्री के नाम के आगे सम्बन्ध में औरत लिखा है (पत्नी नहीँ)।लिखने वाले के लिए औरत का मतलब पत्नी ही होता होगा।
चाय की दुकान से चलते हुए देखा कि एक आदमी ग्लास में चाय पीते हुए ग्लास को दूर ले जाकर ऐसे देख रहा था जैसे ग्लास में फिट कैमरे से सेल्फी ले रहा हो।

लौटते हुए शाखा वाली जगह पर केवल दो लोग दिखे। बारिश में अनुशासन ढीला हो जाता है। दोनों एक दुसरे के सामने झुके हुए दायें-बायें पंजे छूने वाली कसरत कर रहे थे।

साईकिल की दूकान पर सोचा हवा भरवा ले। उतरते ही अगले पहिये की हवा शेयर बाजार की तरह धड़ाम से कम हो गयी। पहिये की मसल्स पिचक गयीं। पहिया खुलवाया तो पंचर मिला। एक भूरा कांच का टुकड़ा अगले पहिये में घुसपैठ करने में कामयाब हो गया था। पंचर बनाने वाले ने दारू पीने वालों पर गुस्सा उतारा जो पीकर बोतल सड़क पर फेंक देते हैं। उसी के टुकड़े पंचर का कारण बनते हैं।

पंचर की दूकान पर हमारी साईकिल के बारे में इतनी बातें हुईं जिससे लगा कि हम साईकिल के बारे में कुच्छ नहीं जानते। कटोरी, हब और दीगर चीजों का जिक्र हुआ। अपनी साइकिल मुझे अपने देश में विदेशों से मंगाई तकनीक की तरह लगी जिसको हम आधुनिक होने के लिए खरीद तो लेते हैं लेकिन उसके बारे में जानते कुछ नहीं। कोई विदेशी मशीन बिगड़ जाती है तो उसको सुधारने के लिए इंजीनियर विदेश से ही आता है। हम भुक्क बने खाली बटन दबाकर मशीन चलाना जानते हैं।

पंचर बना तो साइकिल चलाते हुए वापस आये। पहला पंचर है तीन महीने करीब में। अब देखते हैं अगला कब होगा।
चलिए अब चला जाये दफ्तर। समय हो गया। आप भी चकाचक रहिये। जो होगा देखा जाएगा।

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