Friday, July 03, 2015

सुशील सिद्धार्थ जी का श्रीलाल शुक्ल जी के बारे में संस्मरण

मौसम 'भारत-भारती' पुरस्कार का था। परमानन्द श्रीवास्तव और मैं श्रीलाल शुक्ल की बैठक में उपस्थित थे। परमानन्द जी ने एक पत्रक श्रीलाल जी की ओर बढ़ाते हुए सूत्र जोड़ा कि जैसी आपसे बातचीत हुई थी, भारत-भारती के लिए आप मेरी संस्तुति कर दें। श्रीलाल जी आनंद से भर गए और बोले कि यह भी खूब रही। भाई परमानंद, अभी तो मैं खुद इस पुरस्कार पर नजरें गड़ाए हूँ। .. और ठहाका लगाया। परमानन्द जी ठहाके में शामिल होते हुए बताने लगे कि पत्रक में कहाँ क्या लिखना है। श्रीलाल जी ने संस्तुति लिखी, हस्ताक्षर किया और पूछने लगे कि इधर के रचनाकारों में आपको कौन-कौन पसंद है।

किसी भी प्रसंग, मनोदशा, स्थिति या संवाद से अचानक असम्पृक्त हो जाना श्रीलाल शुक्ल का स्थायी भाव है। यह बात मैं लगभग पचीस वर्षीय अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। उन्नीस सौ बयासी-तिरासी में अमृतलाल नागर के कहने पर मैं पहली बार उनसे मिलने गया। 'राग दरबारी' पढ़ चुका था। संक्षिप्त मुलाकात में ही मैं व्यग्र था कि श्रीलाल शुक्ल को इस उपन्यास पर अपनी राय दे दूँ। मैं राय दे ही रहा था कि श्रीलाल जी का सीधा वाक्य आया, 'लेकिन ये सब आप मुझसे क्यों कह रहे है।' और उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग पर बातचीत शुरू कर दी। यह बात उनके संपर्क में आया कोई भी व्यक्ति बता सकता है कि वे 'निज कबित्त केहि लाग न नीका' की सर्वस्वीकृति के अपवाद है। प्रहार और प्रशंसा दोनों को शालीनता से स्वीकार करने का गुण उनमें है। 'बिस्रामपुर का संत' उपन्यास प्रकाशित होने से पहले उन्होंने प्रकाशक से आग्रह किया था कि इसकी पांडुलिपि उदय प्रकाश को दिखा ली जाय। दूसरों से राय लेने की उदारता और उन पर अमल करने का विवेक श्रीलाल जी के पास रहा है।

आज आर्ट आफ लिविंग की बड़ी चर्चा है। श्रीलाल जी इसके आचार्य है। बहुत गहरे से वे जीवन को लीलाभाव से देखते है। एक बार उनसे पूछा था कि व्यतीत जीवन को किस तरह देखते है तो उनका उत्तर था, 'जाने कितना जीवन नष्ट हुआ। जितना नष्ट हुआ उसका सदुपयोग करते तो गुणवत्ता में वृद्धि होती। .. फिर भी इन स्थितियों को मैं अफसोस के भाव से नहीं लेता। जी हुई जिंदगी को लेकर आत्मभ‌र्त्सना का इरादा नहीं है। .. अतीत पर निगाह डालने से कभी-कभी ऐसा होता कि अनुभूति के बावजूद मेरे मन में न तो आक्रोश है न किसी क्षति की भावना।' यही जीने की कला है।

श्रीलाल शुक्ल से मेरा रिश्ता गुरु और शिष्य जैसा है। 'जैसा' इसलिए कि श्रीलाल जी गंडा बाँधने में भरोसा नहीं करते और अंधश्रद्धा की गंडक में बहना मुझे अच्छा नहीं लगता। उनका तेजस्वी बौद्धिक रूप मुझे मुग्ध कर देता है। जीवन-जगत में कितने ही प्रसंगों/प्रश्नों पर बात करते हुए मैंने पाया कि एक विलक्षण गद्यकार सामान्य बातचीत को भी व्यंजक बना देता है। अपने लेखन पर वे चर्चा नहीं करते, मगर औरों के लेखन पर उनकी पूरी निगाह रहती है। कुछ वर्ष पूर्व तक श्रीलाल जी सबसे ज्यादा पढ़ने वाले लेखकों में एक थे। अब अस्वस्थता के कारण वे ज्यादातर विश्राम ही करते है। इधर उन्हें जब-जब देखने गया तो निराला की यह पंक्ति घुमड़ती रही- 'झूल चुकी है खाल ढाल की तरह तनी थी।' कोई बात नहीं, हर ढाल एक दिन निढाल होती है। श्रीलाल जी ने इतना यशस्वी, सक्रिय, समर्थ और लम्बा रचनात्मक जीवन जिया है कि जाने कितनों को उनसे ईर्ष्या होती रही है। जब श्रीलाल जी का भरोसा मुझ पर कायम हुआ तो उन्होंने बहुत सारी ऐसी बातें भी बताई। मैं महसूस करता रहा कि वे अपनी उदार मनोवृत्ति के सहारे कैसे ऐसे व्यक्तियों को क्षमा करते जा रहे है। हाँ, यदि उनके किसी प्रिय व्यक्ति पर छींटाकशी हो रही हो तो वे चूकते नहीं। एक बार श्रीलाल जी के निवास पर बैठक हो रही थी और श्रीलाल जी किसी आगामी फंक्शन में आमंत्रित लोगों के नाम पढ़ रहे थे। पढ़ने के बाद पूछा कि कोई छूट तो नहीं गया। लखनऊ में षड्यंत्रों के लिए सुपरिचित एक सज्जन ने कहा एक युवा नवोदित का नाम लेकर कहा जब उन तक को बुला लिया तो बचा कौन। श्रीलाल जी गंभीर हो गए, 'तक को से आपका क्या मतलब?' जाहिर है सज्जन की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

श्रीलाल जी शब्दों का अचूक इस्तेमाल करते है और विलक्षण प्रत्युत्पन्नमति उसमें चमक पैदा करती है। किसी भी गोष्ठी या सभा में उनका होना आकर्षण का कारण रहा है। यह विचित्र है कि श्रीलाल जी, 'काँटों से भी निबाह किये जा रहा हूँ मैं' में भी निपुण है। मगर जब वे खीझ जाते है तो एक न एक मौलिक समाधान भी निकालते है। एक मतिमंद-स्वच्छंद लेखिका कई सप्ताह से श्रीलाल जी को घेर रही थीं कि मेरे कहानी संग्रह की भूमिका लिख दीजिए। श्रीलाल जी हार गए तो शर्त सामने रखी, 'भूमिका मैं लिख दूँगा, मगर जीवन भर आप मेरे घर का रुख नहीं करेंगी।' स्तरीय बातें करना उन्हें अच्छा लगता है। एक बार उन्हे भरोसा हो जाय कि आप ईमानदारी से काम करते है तो फिर उनकी आत्मीयता का आँगन आपके लिए खुल जाता है। जब मैं 'श्रीलाल शुक्ल संचयिता' के लिए सामग्री चुन रहा था तब श्रीलाल जी ने बस इतना कहा कि 'पढ़कर ही चुनना'। इस वाक्य का अर्थ मैं समझता था। जब सामग्री ले गया तो एक सरसरी निगाह डाल कर ही वे संतुष्ट हो गए। एक साक्षी भाव श्रीलाल जी में हमेशा रहा है।
श्रीलाल शुक्ल की जीवन चर्या और पद्धति को लेकर पक्ष व विपक्ष में काफी कुछ कहा जाता रहा है। 'तद्भव' का प्रवेशांक इसका प्रमाण है। जब हिन्दी में संस्मरणों और आत्मकथाओं का फैशन शुरू हुआ तो मैंने श्रीलाल जी से कहा कि आप ऐसा कुछ क्यों नहीं लिखते। श्रीलाल जी ने मुझे घूरकर देखा, 'यानी मैं कमलेश्वर की तरह जलती हुई नदी लिखूँ। राजेन्द्र यादव की तरह मुड़-मुड़ कर देखूँ। देखिए, आपने जिस किसी के साथ भी जीवन का कोई हिस्सा जिया है, उसके व्यक्तिगत प्रसंगों को चौराहे पर खोल देना नितान्त अनुचित है। यह रिश्तों का अपमान है।' श्रीलाल शुक्ल के जीवन में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष है, लेकिन दोनों का सौंदर्य उन्होंने बनाए रखा है। 'इस उम्र में' कहानी में उन्होंने जो तीखा आत्मसाक्षात्कार किया है, वह उनका विशिष्ट गुण है। मध्यवर्गीय भारतीय लेखकों की तरह उन्होंने भी संघर्ष किया, दुख के दिन बिताए.. लेकिन इसका स्यापा कभी नहीं किया। 'ट्रैजिडी' शब्द पर 'बिस्रामपुर का संत' में उन्होंने जो टिप्पणी की है वह शहीदों की सूची में नाम लिखवाने वालों को पढ़नी चाहिए।
'राग दरबारी' 'पहला पड़ाव' 'बिस्रामपुर का संत' आदि अनेक श्रेष्ठ उपन्यासों, श्रेष्ठ कहानियों और व्यंग्य आलेखों के लेखक श्रीलाल शुक्ल का नाम दिग्गज हिंदी लेखकों में शुमार हो चुका है। 'राग विराग' फिलहाल उनका आखिरी उपन्यास है। अब शायद वे लिखने के लिए स्वयं को सहेज न सकें। एक उपन्यास उनके मन में आकार ले चुका था कि वे प्राय: साहित्य और समाज के वृहत्तर हितों की चर्चा ही करते है। बात करते-करते मुस्कुराहट कौंध जाती है और उदासी की धूल कम हो जाती है।
अनेक भाषाओं के जानकार, साहित्य और संगीत के मर्मज्ञ श्रीलाल जी का मौन भी बहुत कुछ बोलता है। उन्हे अनेकानेक सम्मान, पुरस्कार और अलंकरण प्राप्त हुए है। सबसे बढ़कर पाठकों का अपार आदर मिला है।
श्रीलाल शुक्ल 'गद्य की शक्ति' का नया भाष्य रचने वाले यशस्वी लेखक है। वे स्वयं में लेखन का एक 'स्कूल' है। कई पीढि़याँ उनसे सीख चुकी हैं।
Sushil Siddharth http://www.abhivyakti-hindi.org/sansma…/2011/raag_viraag.htm

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