Monday, July 27, 2015

मल्टीफ्लेक्स में पिच्चर


कल सुबह मन किया पिच्चर देखने चला जाए। हाल में रिलीज हुई 'मसान' देखने का मन था। पता किया तो लगी ही नहीं है यहां। कुल जमा दो मल्टीफ्लेक्स हैं। दोनों में बड़ी बजट वाली पिक्चरों का कब्जा है।'बाहुबली' और 'बजरंगी भाई जान' और एक और कोई अंग्रेजी फ़िल्म।

आये दिन पिक्चरों के रिकॉर्डतोड़ कमाई के आंकड़े आते हैं। 'बाहुबली' के बनाने में 250 करोड़ खर्च हुए उसने 400 करोड़ की कमाई कर ली। यही कहानी 'बजरंगी भाई जान' की है। लेकिन अगर 'मसान' और 'मिस टनकपुर हाजिर हो' लगी होती यहां तो हम उनको देखने जाते-इन बाहुबली पिक्चरों के बजाय।

तकनीक की उबलब्धता ने सस्ते सिनेमा बनाना भी सम्भव किया है लेकिन बाजार के तिकड़म के चलते थियेटर तक पहुंचने की राह कठिन ही है। पहले शहर में पचासों सिनेमा हाल होते थे। हर तरह की पिक्चर को आशियाना मिल जाता था। अब मल्टीप्लेक्स के बोलबाले के चलते वो सिनेमा हाल बन्द हो गए या फिर और जरूरत के हिसाब से बदल गए हैं। पिक्चरों के लिए बस मल्टीप्लेक्स के सिनेमा हाल ही ठिकाने रह गए। जब हर थियेटर में एक ही पिक्चर चलेगी तो कमाई तो होगी ही। लेकिन क्या रिकार्ड कमाई वाली इन पिक्चरों को कोई दुबारा भी देखना चाहेगा।


भारत में शॉपिंग माल्स (वाल मार्ट आदि) आने का हल्ला चलता रहता है। बुलौआ दिया जाता है। तर्क यह दिया जाता है कि शॉपिंग माल्स आ जाने पर चीजों की बर्बादी कम होगी और सेवायें बेहतर होंगी। सस्ती भी। लेकिन जिस तरह मल्टीप्लेक्स सिनेमा हाल में छोटे बजट वाली फिल्मों को घुसने की अनुमति नहीं मिलती उसे देखकर यही लगता है कि वाल मार्ट आ जाने पर जब छुटपुट दुकाने बन्द हो जाएंगी (जिस तरह मल्टीप्लेक्स थियेटर आने पर छोटे सिनेमा घर बन्द हुए) तो तमाम चुटुर-पुटुर चीजें जो छोटी दुकानों पर मिल जाती हैं, मिलना बन्द हो जाएंगी।

खैर, गए तो सुबह समदड़िया सिनेमा हाल में सुबह के सवा नौ के शो के सब टिकट बिक गए थे। हमारी तो खैर अलग बात अकेले रहते हैं। लेकिन ये फेमिली वाले लोग सुबह-सुबह सनीमा के लिए लाइन लगाये खड़े हैं यह अचरज की बात लगी।


जो भाई लोग कहेंगे कि आन लाइन बुक करके जाना चाहिए हम ऐसे जाते हैं उनकी जानकारी के लिए बता दें की भाई ऑनलाइन बुकिंग में फिर टिकट मिलने न मिलने की अनिश्चितता ख़त्म हो जाती है। आजकल सहज मायूसी भी दुर्लभ हो गयी है। पिक्चर का टिकट मिलने पर ख़ुशी होती। न मिलने पर उदासी। सो मायूसी मिली लेकिन ज्यादा नहीं क्योंकि दूसरे मल्टीप्लेक्स में साढ़े दस बजे का शो था।

दूसरे जगह गए तो वहां भी भीड़ थी लेकिन इतनी नहीं कि कन्धे छिलें। सुकून की बात यह भी कि जिससे पूछो वही बजरंगी भाई जान देखने आया था।बताते चले कि हम 'बजरंगी भाईजान' क्यों नहीं देखने गए इसके लिए न सलमान खान का ट्वीट था न उसको मिली सजा लेकिन बस ऐसे ही नहीं गए।


देखा कि स्कूली ड्रेस में तमाम बच्चे लाइन से सिनेमा देखने के लिए अंदर जा रहे हैं -'बजरंगी भाई जान'। पिक्चर देखना तो ठीक लेकिन ड्रेस में देखकर लगा कि ये बेचारे स्कूल ही आये हैं क्या।

यहां भी टिकट की मारामारी थी। पौन घण्टा पहले लगने के बावजूद टिकट सबसे आगे का मिला। गर्दन गर्व से तानकर पिक्चर देखने का मौका। सनीमा शुरू होने में देर थी तो बाहर जाकर चाय पी। बढ़िया चाय 10 रूपये में ,जो हाल में 40 की मिलती, पीते हुए एक भाई जी से फोटो फ्री में खिंचाये।

पिक्चर देखी। बढ़िया फोटो-शोटो,साऊंड-फाउंड, इफेक्ट-सिफेक्ट सब 250 करोड़ के माफिक। लेकिन पूरी पिक्चर में थोक के भाव जो लड़ाई दिखाई गई है उससे लगा कि कहानी कुछ है नहीं इसलिए फू-फां ठूंसा गया। लड़ाई के इत्ते सीन देखकर हमको तो ऐसा लगा जैसे जनता की भलाई का बढ़ाने की बजाय हल्ला-गुल्ला करके संसद ठप्प करने का सीन चल रहा हो।

झटके से फ़िल्म खत्म हुई। उसके बाद कड़प्पा पर चुटकुले चल रहे हैं। क्या पता पिक्चर वालों ने लड़ाई-झगड़ा फिल्माने में इतना समय बर्बाद कर दिया फिर देखा कि समय कम बचा तो झटके से निपटा दी पिक्चर। आगे का ठेका सोशल मीडिया को दे दिया कि अब तुम बताओ पिक्चर के बारे में।

सिनेमा हाल से निकलकर ग्वारी घाट गए।बरसात के पानी के चलते नर्मदा का पानी मटमैला हो गया था। मन्दिर आधा डूब गया था।

ग्वारी घाट से आगे जमतरा घाट भी गए। वहां भी पानी मटमैला था। घाट के पास ही झोपड़िया में एक बाबाजी सो रहे थे। एक महिला एक मूर्ती सजाये बैठी थी। उसने बताया कि उसके बच्चे नहीं थे। आदमी खत्म होने के बाद 6 साल पहले उसने सन्यास ले लिया।

'नर्मदे हर' का जबाब 'नर्मदे हर' देते हुए ही हम लौट आये।

आज नए हफ्ते की शुरुआत है। आपके लिए हफ्ता शुभ हो। मंगलमय हो। जय हो।

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