Saturday, July 25, 2015

हम चेन ढीली रखते हैं

अनूप शुक्ल की फ़ोटो.चाय की दुकान पर तीन लोग सीमेंट की बेंच पर बैठे थे। एक लड़का सामने मोटरसाइकिल की सीट पर बैठा भाषण टाइप कुछ दे रहा था। हर वाक्य के शुरू और अंत में गालियों की गिरह लगाता जा रहा है। तीनों लोग मग लगाकर भाषण सुन रहे थे।

हम चाय लेकर तीन लोगों के बीच की खाली जगह में धँस गए। बैठने के दौरान हुए व्यवधान के चलते लड़के का भाषण कुछ रुका। लेकिन कुछ देर में ही फिर शुरू हो गया। चाय खत्म करके वह निकल अपने एक साथी के साथ लिया। अब बेंच पर हमारे अलावा दो लोग और बचे।

साथ बैठे बुजुर्ग बड़ी तन्मयता से बीड़ी फूंक रहे थे।आँख मूंदकर बीड़ी पीता हुआ आदमी दुनिया का सबसे सन्तुष्ट इंसान लगता है। रेडियो पर गाना बज रहा था- 'ऐसी शक्ति हमें देना दाता।' बुजुर्ग गाने को रेडियो के साथ दोहराने लगे।तन्मयता से गाते हुए देखकर लगा यह गाना उनका फेवरिट गाना है।

गाना पूरा होने के बाद उन्होंने बीड़ी पीने का अधूरा काम फिर पूरा करना शुरू किया। कई दांत गायब होने के चलते मुंह पोपला ही कहा जायेगा। बीड़ी का धुंआ टूटे दांतों के बीच से फरार होकर हवा में विलीन हो जा रहा था। ठीक वैसे ही जैसे किसी सीमा पार करके घुसपैठिये देश की जनता में दूध में पानी की तरह घुलमिल जाएँ या फिर किसी व्यवस्था में कहिलों, कामचोरों और भृष्ट लोगों की तरह एकमेक हो जाएँ।

बुजुर्गवार हाथ में घड़ी पहने थे।ढीली पीली चेन देश की क़ानून व्यवस्था की तरह लग रही थी। इधर-उधर घूमती। हमने ध्यान दिलाया तो बोले-हम चेन ढीली रखते हैं। आराम रहता था। कानून व्यवस्था भी शायद आराम के ही लिए ढीली रखी जाती हो।

क्रासिंग बन्द थी। हमने शरीफ आदमी की तरह क्रासिंग के खुलने का इन्तजार किया। बगल में एक साइकिल वाला खड़ा था। उसका अगला पहिया पंचर था। बताया-पंचर हो गया। पंचर साइकिल चलाते हुए ही ड्यूटी की जगह से यहां तक आ गए। एक जगह रात की चौकीदारी का काम करता है।

हमने कहा-ऐसे तो ट्यूब पूरा खराब हो जायेगा। रिम भी टेढ़ा हो जायेगा। पंचर बनवा लो। आगे दुकान है।

वो बोला-पैसे नहीं हैं पंचर बनवाने के।

हमने कहा-बनवा लो। बाद में दे देना।

वह बोला-अच्छा देखते हैं।शायद मान जाए।

आगे निकलकर साइकिल की दूकान पर उसका इंतजार करते हुए साइकिल वाले से बतियाते रहे कि वह आये तो साइकिल वाले से कहकर उसका पंचर बनवा दें। साइकिल वाले के पास हमारे 8 रूपये बकाया भी हैं। हिसाब बराबर हो जाएगा।

लेकिन काफी इन्तजार के बाद भी वह आया नहीं। शायद किसी गली से निकलकर चला गया।पैदल गया होगा या चलाते हुए कह नहीं सकते।

बस स्टैंड पर एक लड़का पैर स्टैंड की ग्रिल में फंसाये अपने पूरे शरीर को सी सा की तरह घुमाते हुए कसरत कर रहा था।

पुलिया पर एक बच्चा बैठ योग कर रहा था। बगल की पुलिया पर फैक्ट्री में काम करने वाली महिला हूटर बजने का इन्तजार कर रही थी। पति की जगह नौकरी पायी महिलायें रोज समय से पहले आकर पुलिया पर बैठ जाती हैं। समय होने पर अंदर चली जाती हैं। फैक्ट्री में डाक बांटने और दफ्तरों में चाय-पानी पिलाने का काम करते हुए शाम को बाहर हो जाती हैं। इनके लिए जिंदगी का मतलब शायद यही होता हो:
सुबह होती है, शाम होती है
उम्र यूं ही तमाम होती है।
टीवी पर राजस्थान के बच्चों के प्रदर्शन की खबर आ रही है। उनके स्कूल में पढ़ाई के लिए मास्टर नहीं हैं। कोई बयान दे रहा है-हमको ध्वस्त व्यवस्था मिली है।हम इसे ठीक कर रहे हैं। आधी ठीक कर ली है। बाकी जल्दी ही कर लेंगे।

खबर को विज्ञापन ने धकिया कर बाहर कर दिया। इसके बाद 'फिट रहे इण्डिया' शुरू हो गया।

आप फिट रहिये। हम फूटते हैं दफ्तर को। आपका दिन शुभ हो।

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