Wednesday, July 01, 2015

स्मार्ट सिटी में रिक्शेवाले

कल अपने बच्चे का मोबाईल फोन फिर से बनवाने गए। स्मार्ट वाला।हुआ यह फोन गिर जाने से उसकी स्क्रीन टूट गयी। टच खराब। सर्विस सेंटर ने नई स्क्रीन लगा दी। 2200/- में। फोन चलने लगा। हम खुश।

लेकिन ख़ुशी एक दिन बाद खल्लास हो गयी। फोन का टच खराब। स्थिर हो गया फोन। मौन। सर्विस सेंटर फोन किया तो बताया कि फोन वारण्टी के बाहर है। पार्ट्स की कोई गारन्टी नहीं। फिर भी ले आइये देख लेंगे।

'फिर भी' ले गए। कुछ इधर-उधर किया गया। फोन फिर चलने लगा। हमने पूछा- ये फिर कब खराब होगा? कुछ बता सकते हैं क्या? ये स्क्रीन बार-बार अनशन पर क्यों बैठ जाती है?

बताया गया- फोन का मदरबोर्ड गड़बड़ाया है। कुछ खराबी है। वारण्टी के बाहर है। बदलवाने पर बड़ा खर्च आएगा। बड़ा खर्च मतलब 8/10 हजार। 

मतलब स्मार्टफोन की स्मार्टनेस तभी तक है जब तक वह वारण्टी के भीतर है। वारण्टी के बाहर कदम रखते ही स्मार्टफोन जाहिलफोन में बदल जाता है और 'फैशन के दौर में गारन्टी की अपेक्षा करके बेवकूफी का मुजाहिरा न करें' का बैनर लटका लेता है। इस साल भर पुराने स्मार्टफोन से बढ़िया तो अपन की 15 साल पुरानी कार है जो अभी भी जरा सा धक्का देते ही स्टार्ट हो जाती है।

लौटते हुए बारिश का आनंद लेते हुए भी मन धुकपुक कर रहा था कि कहीं गाड़ी रुक न जाये। भीगते पानी में बच्चा धक्का लगाएगा तो कई दिन तक भुननायेगा। इसी पानी में गोविन्द नगर से  गन्दनाला चौराहे की तरफ आते बाईं तरफ कई झुग्गियों में रहते परिवार दिखे।शायद  ये  'गाड़िया लोहार' परिवार हैं। जिन्होंने महाराणा प्रताप का साथ दिया था लड़ाई में। 

भीगते पानी में झुग्गियों के अंदर बैठे लोग झुग्गियों से टपकते पानी को देख रहे थे। कुछ लोग झग्गियों के ऊपर चढ़े मोमियां इधर-उधर करते हुए पानी के अंदर जाने के रस्ते को बन्द करने की कोशिश कर रहे थे। सड़क से नीचे नाले तक झोपडी का विस्तार था। पता नहीं जब कानपुर स्मार्ट सिटी बनेगा तब ये झोपड़ियां रहेंगी या इनके साथ ही स्मार्ट बनेगा कानपुर।

रिमझिम बारिश में अपने घर के टपकने की चिंता से बेखबर दो बच्चे अपनी प्लास्टिक की गाड़ियां फुटपाथ पर चला रहे थे। जहां फुटपाथ के ऊबड़-खाबड़ पन से उनकी गाडी रूकती वे गाड़ी उठाकर थोड़ा आगे रख लेते और फिर चलाने लगते।

जिन लोगों को शहरों में सड़को पर गड्ढे होने पर एतराज है उनके लिए यह माडल अच्छा उपाय हो सकता है अपनी गाड़ियों को गड्ढों से बचाने का। अपने साथ क्रेन लेकर चलें। जहां सड़क पर गड्ढा मिले, गाड़ी क्रेन से उठाकर गड्ढे के आगे रख लें और फिर चलाने लगे। गाड़ियों को गढ्ढे से बचाने का यह अच्छा उपाय हो सकता है। जब शहर स्मार्ट बन जाएगा तब शायद क्रेनों की व्यवस्था सरकार की तरफ से हो।

अपनी गाड़ी मरम्मत के लिए देने के बाद पैदल हो गए हम। कोई ऑटो मिला नहीं तो गन्दा नाला तक रिक्शा खोजा। रिक्शा वाला उस सवारी पर भुनभुना रहा था जो अस्पताल तक आई और फिर अपने साथ के मरीज को लेकर 'अभी आते हैं पैसा देने ' को कहकर अंदर चली गयी। रिक्शा वाला बाहर इन्तजार करता रहा वह सवारी नहीं आई। हो सकता है मरीज की तीमारदारी में व्यस्त हो गयी हो और उसे याद न रहा हो कि बाहर रिक्शावाला अपनी मजूरी के लिए इन्तजार कर रहा हो।

हम बैठ गए रिक्शे पर तब याद आया कि हमारे पास फुटकर पैसे नहीं हैं। 500 रूपये का नोट है। एक एटीएम के पास रुककर बेटे को 100 रूपये निकलवाने भेजा।तब तक बतियाते रहे रिक्शेवाले से।

हरदोई (हरद्रोही मतलब भगवान विरोधी मूल नाम मानने वाले 'हरदोई' को 'हद्दओई' कहते हैं ताकि 'हर' न निकले मुंह से) का रहने वाला रिक्शावाला पहले लखनऊ में रिक्शा चलाता था। उसके पहले मजूरी करता था। खेती है नहीं। कानपुर में गोपाला टावर के पास 10-12 लोगों के साथ रहता है। रिक्शा किराए का है। 50 रूपये रोज पर। 200 करीब रूपये रोज कमा लेते हैं। कल सुबह सुबह 20/- मतलब दिहाड़ी के 10% की चपत एक सवारी से लग गयी।

बातचीत करते हुए रिक्शेवाले के हथेली  में पड़े ढट्ठे देखे। हथेली के जिस हिस्से पर हैंडल का जोर पड़ता है उस हिस्से की खाल कड़ी हो गयी थी। बताया कभी-कभी दवाई लगाते हैं तो आराम मिलता है। यह भी कि कम हो या ज्यादा यह निशान तो हर रिक्शे वाले के हाथ में होते हैं।

रिक्शे से उतरकर बेटे ने अपना और उस सवारी का किराया भी दिया जो सुबह अस्पताल में मरीज के चक्कर में भूल गयी होगी किराया देना रिक्शे वाले को। हमने फ़ोटो लेते हुए मुस्कराने को कहा तो वह कहने पर जबरियन मुस्करा तो दिया लेकिन उसको भूख लगी थी इसलिए पास की चाय दूकान पर चला गया। सम्भावित जाम के कारण पीछे से सब हल्ला भी मचा रहे थे। 

जब रिक्शे वाला चला गया तब याद आया कि उससे पूछना चाहिए था कि उसने अपनी बेटी के साथ सेल्फ़ी लेकर फेसबुक पर अपलोड की कि नहीं। लेकिन फिर लगा अच्छा ही किया उसके सामने याद नहीं आया। जो अपना परिवार पालने के लिए घर से दूर रिक्शा चलाने आया हो, जिसकी सुबह की शुरुआत जाने-अनजाने सवारी द्वारा  किराया न दिए जाने से हुई हो और जो सुबह से भूखा हो उससे इस तरह का सवाल पूछना बेहूदगी ही होती।
पानी कल से बरस रहा है। तमाम लोग ' बरखा रानी जरा जम के बरसो' का आह्वान करते हुए बारिश के मजे ले रहे हैं। मजे हम भी ले रहे हैं लेकिन बीच-बीच में रिक्शेवाले की हथेलियाँ दिख जाती हैं और मजे में खलल पड़ जाता है। यह भी सोचते हैं कि जब कभी कानपुर स्मार्ट सिटी बनेगा तब रिक्शे वाले यहां रहेंगे या फिर बाहर कर दिए जायेंगे। 

आपको कुछ पता हो तो बताइयेगा। चैनलों से तो कुछ पता नहीं चल पा रहा। अभी तो चैनल किसी घपले पर बहस करने में जुटे हैं।

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2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मुसकुराते रहिए और स्वस्थ रहिए - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. स्मार्ट सिटी में रिक्शे भी स्मार्ट होंगे शायद ।

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