Friday, March 18, 2016

आयुध निर्माणी दिवस

आज आयुध निर्माणी दिवस है। आज के ही दिन सन 1802 में पहली आयुध निर्माणी , गन एन्ड शेल फैक्ट्री काशीपुर की स्थापना हुई थी। मतलब 214 वां जन्मदिन है आज हमारी निर्माणियों का।

आज सुबह की शुरुआत प्रभात फेरी से हुई। फैक्ट्री के गेट नंबर 1 से शुरू करके पूरी फैक्ट्री इस्टेट घूमते हुए गेट नंबर 6 तक पहुँचे। आप भी देखिये कुछ झलकियाँ।

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Thursday, March 17, 2016

मच्चर बहुत हैं जबलपुर में

साथ चाय पीते हुए पोज देते बच्चे
आज सुबह मौसम बहुत खुशनुमा सा था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी। मन किया कि बहुत देर तक साइकिल पर टहलते रहें। हवा का मजा लेते रहे हैं।

निकले तो सोचा व्हीकल मोड़ तक जायेंगे। पर फिर 'जोंगा तिराहे' से गाड़ी घुमा ली। फ़ैक्ट्री के गेट नंबर 6 के सामने एक जोंगा जीप का माडल रखा है। पहले बनती थी फ़ैक्ट्री में यह जीप।

पांच-सात बच्चे सड़क पर फ़ूलों की कैचम-कैच कर रहे थे। एक दूसरे की तरफ़ फ़ेंकते, कैच करते, फ़िर फ़ेंकते। कभी-कभी फ़ूल जमीन पर गिर जाता था। कमल का फ़ूल जमीन पर गिरता होगा तो चोट तो लगती होगी न उसको। फ़ूल को चोट की बात से विनोद श्रीवास्तव जी की पंक्तियां याद आ गयीं:
धर्म छोटे-बड़े नहीं होते,
जानते तो लड़े नहीं होते,
चोट तो फ़ूल से भी लगती है
सिर्फ़ पत्थर कड़े नहीं होते।
यह कविता तो अभी याद आई। उस समय बच्चे जब एक-दूसरे की तरफ़ फ़ूल फ़ेंक रहे थे तब यह कविता याद रही थी:
’मुझे फूल मत मारो
मैं अबला बाला वियोगिनी कुछ तो दया विचारो।’

ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे
मैथिलीशरण गुप्त जी की यह रचना याद करते हुये परसाई जी का एक लेख याद आया जिसमें वे मैथिलीशरण गुप्त से मजे लेते हुये कुछ इस तरह लिखते हैं-’ चिरगांव में कोई मैथिलीशरण गुप्त जी से मिलने जाता था तो पहले उससे पूछा जाता- ’हिन्दी का सबसे अच्छा कवि कौन है?' मिलने के लिये उसी को अन्दर बुलाया जाता जो जबाब में मैथिली शरण गुप्त का नाम लेता।’

राष्ट्रकवि की परंपरा अब राष्ट्रसेवकों में पसर रही है। लोगों को लगता हैं कि देश में राष्ट्रसेवा का ठेका उनके ही नाम एलाट हुआ है। उनके अलावा कोई और देश सेवा का काम करते दिखता है तो लोग मार-पीट-गाली-गलौज पर उतर आते हैं। गाली-गलौज भी तभी करते हैं जब दूरी के कारण मारपीट संभव नहीं होती ।


तमिलनाडू के ड्राइवर जबलपुर में चाय पीते हुए
मिसिर जी और बिन्देश्वरी प्रसाद टहलते हुये मिल गये। हाल-चाल लिये-दिये गये। आगे बढे।
 
चाय की दुकान पर पांच बच्चे सुबह की सैर करते हुये मिले। दो बड़े, तीन छोटे। उन लोगों ने चाय का आर्डर दिया। बड़े बच्चों के लिये दो फ़ुल और छोटे बच्चों के लिये दो में तीन।

बच्चों से बतियाये। पूछा पहाड़ा आता है? वो भी मजे लेते हुये बोला-’हां आता है। 11 से 2 तक।’ हमने कहा -'अच्छा एक का सुनाओ।'

वह बोला - ’एक का नहीं आता।’



हमने कहा -’ क्या यार तुम सात में पढते हो और 19 का पहाड़ा नहीं आता। एक बच्चे ने सुनाना शुरु किया पानी पर चढकर। उन्नीस एकम उन्नीस, उन्नीस दूना अठारह।


मच्छर के कारण सो नहीँ पाये आँख लाल
दूसरे बच्चे ने हंसते हुये खुद सुनाना शुरु किया। उन्नीस पंचे तक ठीक सुनाया। इसके बाद गड़बड़ा गया। हमने सोचा शिक्षा व्यवस्था पर कुछ डायलाग मार दें पर मटिया दें। शिक्षा मतलब पहाड़े रटना ही नहीं होता।
बच्चों को जितने बार फोटो दिखाई उनमें से एक ने लपककर पैर छुए। शायद आदत है उसकी यह। लपककर पैर छूना।

दो ड्राइवर मिले वहीं। बंगलौर के पास होसुर से सामान लेकर आये हैं। पांच दिन लगे आने में। कन्नड, तमिल और काम भर की हिन्दी जानते हैं। रात को ढाई बजे पहुंचे। बोले-’ मच्चर बहुत हैं जबलपुर में। सो नहीं पाये।’ आंखे लाल दिख रहीं थी।

हमने पूछा-'कभी जबलपुर घूमे भी हो?'

बोला-'घूमे नहीँ। पचासों बार आये जबलपुर। लेकिन कभी शहर नहीं घूमे। आये, सामान उतारा चले गये।'
लौटते में देखा सूरज भाई आसमान पर छाये हुये थे। हमने कहा- जलवा है गुरु तुम्हारा ही दुनिया में। वे मुस्कराये। मुस्कराये तो और हसीन लगने लगे। सुबह हो गयी अब काम से लगा जाये।

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Wednesday, March 16, 2016

मैडम फ़टाफ़ट पढ़ाती हैं

पहाड़ पर टेसू के पेड़
आज निकलने में कुछ देर हो गयी। जब साइकिल स्टार्ट की तब सड़क चलने लगी थी। लोग तेजी से लौट रहे थे। हमारे आगे कुछ बुजुर्ग खरामा-खरामा टहलते हुये जा रहे थे। सब फ़ुल पैंट पहने हुये थे। कल से पता नहीं जिस किसी को देखते हैं तो पहली निगाह पैंट पर जाती है।

सड़क पर मेरी परछाई मुझसे बड़ी होकर दिख रही थी। साइकिल इतनी बड़ी कि उसके पहिये पूरी सड़क की चौड़ाई को पार करके पेड़ तक पहुंच गयी थी। सूरज जब उगता है या अस्त होता है तो लोगों को परछाई को इसी तरह बढ़ा चढ़ाकर दिखाता है। कोई जब आपकी ज्यादा तारीफ़ करे तो समझ लेना चाहिये अगला या तो नौसिखिया है या खत्तम हो गया है।

शोभापुर रेलवे क्रासिंग के पार पहाड़ पर टेसू के पेड़ दूसरे पेड़ों के साथ मजे से झूम रहे थे। सुबह की हवा और सुगन्ध का नाश्ता करने के बाद सूरज की किरणों की मिठाई खाकर उनके चेहरे पर तृप्ति का भाव पसरा हुआ था। पत्तियां तक चिकनाई हुई थीं।


दीपा किताब पढ़ रही है
दीपा से मिलने गये आज। उसके लिये नेशनल बुक ट्र्स्ट की दो किताबें लाये थे। छोटी-छोटी कविताओं और कहानी की चित्रकथायें। किताबें दीं तो खड़े-खड़े पढ़ती रही। हमने पढ़ने को कहा तो ठीक से पढ़ नहीं पाई। अच्छर चीन्हती नहीं। हमने कहा - ’मिलाकर पढ़ा करो। धीरे-धीरे।’ बोली-’ मैडम फ़टाफ़ट पढ़ाती हैं। समझ में नहीं आता।’

पास के मजदूर सुबह का खाना बना रहे थे। उनके दो साथी वापस चले गये हैं। चार हफ़्ते रहने के बाद। ये लोग होली के बाद जायेंगे। सुबह का खाना बना रहे थे ये लोग। अरहर की दाल बना रहे थे। भात इसके बाद पकायेंगे।
अरहर की दाल गांव से लाये हैं अपने साथ। वहां 300 रुपये पसेरी मिलती है खड़ी अरहर। मतलब 60 रुपये किलो। खुद उगाते हैं लोग इसलिये इस भाव मिल जाती है।

पिछले दिनों अरहर की मंहगाई पर अनेकों व्यंग्य लेख लिख मारे लोगों ने। लेकिन कैसे पैदा होती है, क्यों मंहगी होती है यह शायद पता नहीं होगा लोगों को। यह भी सही है जिन्होंने अरहर की मंहगाई पर लेख लिखे होंगे उनमें से शायद किसी के यहां अरहर बनना , कम से कम मंहगाई के कारण, बंद नहीं हुआ होगा।


सुबह का खाना बनाते कामगार
महेश नाम बताया कामगार ने। 25 साल उमर है। आठवीं पास है। आठ साल पहले शादी हुई। दो बच्चे हैं। छह साल और चार साल के। पत्नी गांव में रहती हैं। बच्चों और पापा, मम्मी आदि के साथ। कोई नशा नहीं करते। दांत सूरज की रोशनी में चमक रहे थे। साथ के लोग भी महेश की तरह ही दो-दो बच्चे वाले हैं। उनके ही हम उम्र।
हम महेश से कहते हैं कि दीपा को पढ़ा दिया करो। वे बोले- ’यह एक कान से सुनती है, दूसरे से निकाल देती है।’ दीपा कहती है-’ ये लोग काम पर जाते हैं। पढ़ायेंगे कब?’ वे कहते हैं-’ शाम को तो लौट आते हैं।’ तय हुआ कि शाम को पढाई होगी।

हम महेश से पूछना चाहते हैं कि उसकी हाबी क्या है? पूछते हैं कि खाली समय में क्या करते हो? वह कहता है-’ खाली समय रहता कहां है? सुबह खाना बनाते हैं। दिन में काम करते हैं। लौटकर फ़िर खाना। रात हो जाती है सो जाते हैं। फ़िर वही दिनचर्या।’

बहुत अलग नहीं है यह जिन्दगी भी अकबर इलाहाबादी के इस शेर से:
बीए किया ,नौकर हुये
पेंशन मिली और मर गये।

स्कूल जाते बच्चे
लौटते में क्रासिंग बन्द मिली। मेरे पीछे एक आटो में केन्द्रीय विद्यालय के बच्चे स्कूल जाने के लिये बैठे थे। आठ बच्चे एक आटो में। सबसे आगे वाले बच्चे से पूछा तो बोला- ’सिक्थ बी में पढ़ते हैं।’ हमने पूछा-’ सब लोग ६ में पढ़ते हो? ’नहीं मैं फ़ोर्थ में पढ़ती हूं’- पीछे से बच्ची ने जल्दी से कहा। उसको शायद डर लगा कि कहीं हड़बड़ी में उसकी क्लास न बदल जाये।

बच्चों के इम्तहान हैं। नौ बजे से। हमने कहा-’ अभी तो साढे सात ही बजे हैं। क्या करोगे इतनी जल्दी जाकर? वो बोले-खेलेंगे। प्रेयर होगी।

हमने पूछा - कौन सी प्रेयर होती है?

वो बोले-’इतनी शक्ति हमें देना दाता।’

पीछे एक बड़ा बच्चा ऊंघता हुसा था बैठा था। अनमना सा। हमने पूछा- ’क्या नींद आ रही है? बहुत पढे क्या?’
वह कुछ बोला नहीं। बस हल्के से मुस्करा दिया।

सिक्स्थ बी वाले बच्चे ने बताया - ’भैया ऐसे ही रहते हैं। चुप। बहुत कम बोलते हैं।’

हमने कहा-’ तो तुम लोग बोला करो! ’

वो बोला-’ बोलते हैं। लेकिन भैया बोलते ही नहीं।’

द्सवीं में पढ़ता है बच्चा। चुप रहता है। क्या कारण है यह उसके साथ के ही लोग समझ सकते हैं। लेकिन अभी भी उसका चेहरा मेरी आंखों के सामने आ रहा है। चुप। थोड़ा उदास। बहुत उदासीन।

सड़क पर एक आदमी अपने छोटे बच्चे को साइकिल के कैरियर पर बैठाये स्कूल भेजने जा रहा था। बच्चा दोनों तरफ़ पैर किये बैठा था।

एक बच्चा हरक्युलिस साइकिल पर पैडल मारता चला रहा था। कक्षा 6 में पढ़ता है। एक साल से आ रहा है साइकिल पर। आगे डोलची और डंडा रहित साइकिल मतलब बच्ची साइकिल मानी जाती है। हमने पूछा- ’दीदी की है साइकिल?’

’नहीं मेरी मम्मी की है।’ बच्चे ने बताया। यह भी कि वे हाउस वाइफ़ हैं। कहीं काम नहीं करतीं।

सूरज भाई के साथ चाय पीते हुये पोस्ट पूरी कर रहे हैं। सुबह हो गयी।

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Tuesday, March 15, 2016

भई आते जाते रहा करो

चक्कू गरदन पर लगाने पर भी भारतमाता की जय न बोलने वाली बात सेे ’फ़िराक गोरखपुरी’ के बारे में यह संस्मरण याद आ गया। पढिये! मजा आयेगा।  

"एक बार फिराक साहब के घर में चोर घुस आया. फिराक साब बैंक रोड पर विश्वविद्यालय के मकान में रहते थे. ऐसा लगता था उन मकानों की बनावट चोरों की सहूलियत के लिए ही हुयी थी, वहां आएदिन चोरियाँ होतीं. फिराक साब को रात में ठीक से नींद नहीं आती थी. आहट से वे जाग गये. चोर इस जगार के लिए तैयार नहीं था.
उसने अपने साफे में से चाकू निकाल कर फिराक के आगे घुमाया. फिराक बोले, “तुम चोरी करने आये हो या कत्ल करने. पहले मेरी बात सुन लो.”

चोर ने कहा, “फालतू बात नहीं, माल कहाँ रखा है?”

फिराक बोले, “पहले चक्कू तो हटाओ, तभी तो बताऊंगा.”

फ़िर उन्होंने अपने नौकर पन्ना को आवाज़ दी, “अरे भई पन्ना उठो, देखो मेहमान आये हैं, चाय वाय बनाओ.”
पन्ना नींद में बड़बडाता हुआ उठा, “ये न सोते हैं न सोने देते हैं.”

चोर अब तक काफी शर्मिंदा हो चुका था. घर में एक की जगह दो आदमियों को देखकर उसका हौसला भी पस्त हो गया. वह जाने को हुआ तो फिराक ने कहा, ” दिन निकाल जाए तब जाना, आधी रात में कहाँ हलकान होगे.” चोर को चाय पिलाई गई. फिराक जायज़ा लेने लगे कि इस काम में कितनी कमाई हो जाती है, बाल बच्चों का गुज़ारा होता है कि नहीं. पुलिस कितना हिस्सा लेती है और अब तक कै बार पकड़े गये.

चोर आया था पिछवाड़े से लेकिन फिराक साहब ने उसे सामने के दरवाजे से रवाना किया यह कहते हुए, “अब जान पहचान हो गई है भई आते जाते रहा करो.”

रहोगे पाजामा ही

सुबह की सड़क
सबेरे कमरे से बाहर निकले तो लगा बारिश हो रही थी। लेकिन ध्यान से देखा तो कोहरा गिर रहा था। मतलब कुदरत भी अब ’डाक्टर्ड’ नजारे पेश करने लगी है। ध्यान से न देखो तो धोखा हो सकता है।

हमको बाहर निकला देख पक्षी अलग-अलग अंदाज में चहचहाने लगे। ऐसे लगा जैसे कोई ताजा व्यंग्य रचना फ़ेसबुक पर पोस्ट करो तो साथी लोग अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रहे हों। बढिया, भौत बढिया, कलम तोड़ से लेकर इसमें व्यंग्य कहां है, सरोकार नदारद, ये तो सपाटबयानी है तक की प्रतिक्रियायें मानो पक्षी दे रहे हों -हमको ताजा व्यंग्य रचना मानकर।

एक चिडिया तो हमको देखकर बहुत जोर से चिंचियाती हुई हंस सी रही थी। लगता है वो हमको आज ’घुट्टन्ना’ की जगह पूरे पायजामा में देखकर मजे ले रही हो और कह रही हो- नकलची कहीं के। कुछ भी पहनो- रहोगे पाजामा ही।

एक आदमी पुलिया के पास सर झुकाये हाथ में ’टहलुआ डंडा’ लिये चला जा रहा था। लगता है देहरादून में घोड़े की पिटाई के लिये जबलपुर में शर्मिन्दगी व्यक्त कर रहा हो।


सूरज भाई अपने डुप्लीकेट के साथ
सड़क पर पहुंचकर देखा कि एक आदमी सूरज की तरफ़ मुंह किये हाथ जोड़े खड़ा था। जैसे मंत्री लोग बाबा लोगों के सामने जाकर नमस्कार मुद्रा खड़े हो जाते हैं उसी तरह चुपचाप खड़ा था। सूरज भाई प्रसाद रूप में उसको गर्मी प्रदान कर दे रहे थे।

सूरज और उस आदमी के बीच ऊर्जा का आदान प्रदान होते देख मुझे बड़ी बात नहीं कल को सूरज से गर्मी लेने पर कोई सरकार ’से्स’ लागू कर दे। जलकर, मलकर की तरह कोई ’धूपकर’ लागू हो जाये। हर आदमी सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में रहेगा और महीने के अंत में उसका ’धूपकर’ का बिल उसके पास पहुंच जायेगा। पहली बार लागू होने पर वापस ले लिया जायेगा लेकिन फ़िर बाद में फ़िर क्या पता लागू होकर ही रहे। फ़िर अगली पीढी को बताते हुये लोग कहेंगे - ’जब हम बच्चे थे तब धूप मुफ़्त में मिलती थी। जितनी मन आये उतनी सेंक लो। कोई टोंकता नहीं था।’

तालाब पर सूरज भाई एकदम जमकर गदर किये हुये थे। खिलकर चमक रहे थे। पानी भी उनकी संगत में ऐसे चमक रहा था जैसे किसी नेता के बगल में सटकर सेल्फ़ी लेते उसके चेले-चपाटे चहकते हैं। पेड़ चुपचाप जनता की तरह सर झुकाये सारा गदर होते देख रहे थे।


खटखट होटल पर जलेबी बनने लगी
पंकज टी स्टाल पर सुशीला मिली। आज परदेशी नहीं दिखे। सुशीला ने बताया कि कल किसी मोटरसाइकिल वाले ने उसे टक्कर मार दी। जमीन पर गिर गईं वो। वो भाग गया। आसपास के दुकान वालों ने उठाया। उसको गरियाया। दर्द है। रेंगते हुये आई हैं घर से। साथ के परदेशी चले गये हैं कहीं। बोली- ’दस-बीस रुपया मिल जईहैं तो कौनौ गोली लै ल्याब।’ हमने सोचा चाय पीकर जाते समय कुछ पैसे देते हुये जायेंगे। लेकिन वह पहले उठकर धीरे-धीरे चली गयी। उसको शायद लगा होगा -’इसके पास बतियाकर समय नष्ट करने से अच्छा जीसीएफ़ चला जाये मांगने। फ़ैक्ट्री शुरु होने वाली है।’

सामने भट्टी पर जलेबी छान रहा था दुकान वाला। बने हुये पोहे से भाप उड़ रही थी। होटल का नाम देखा - ’खट-खट होटल।’ दुकान वाले ने कहा - ’अच्छा आया है।’ हमने कहा-’ आओ तुम्हारे साथ लेते हैं।’ वह कपड़े के छन्ने में मैदा भरकर जलेबी बनाने लगा और हमने उसका फ़ोटो लिया। फ़ोटो लेते समय उधर से सूरज भाई भी कढाई में घुस के बैठ गये। हमने कहा- ’क्या करते हो भाई, जल जाओेगे।’ वे बड़ी तेज हंसने लगे। बोले- ’पता है न हमारी सतह का तापमान 6000 डिग्री होता है। ये तेल तो सौ डिग्री के अल्ले-पल्ले होगा।

दुकान वाले ने बताया कि उसकी दुकान सन 1980 से चल रही है। 2200 रुपया किराया है। जलेबी आजकल 100 रुपया किलो है। बच्चों ने नाम रख लिया खट-खट होटल क्योंकि खटर-पटर होती रहती थी यहां। हमको लगा कि अच्छा हुआ कि हमारे पूर्वज अपने देश का नाम पहले ही हिन्दुस्तान या फ़िर भारत रख गये। आज रखा जाता तो न जाने किस नाम पर सहमति हो पाती।


टेसू के फूल
रास्ते के एक जगह शाखा लगी हुई थी। दो लोग हाफ खाकी पेंट में और एक बालक भूरी फुल पैन्ट में था। चौथा आदमी एकदम अलग ड्रेस में था। आपस में चुहल करते हुए वे बतिया रहे थे।

लौटते में देखा टेसू के फ़ूल खिले हुये थे पेड़ पर। बगल में बेशरम के बैगनी फ़ूल भी खिले हुये थे शान से। दोनों बिना एक-दूसरे को गरियाये मजे से झूम रहे थे।

कुछ दूर रेल की पटरी पर रेलगाड़ी भन्नाती हुई चली जा रही थी। ऐसा लग रहा था कि उसको किसी ने बेमन से पटरी पर दौड़ा दिया हो और वह यात्रियों को लादकर चल दी हो। आलोक धन्वा की कविता याद करते हुये हम वापस लौट आये:
हर भले आदमी की एक रेल होती है
जो माँ के घर की ओर जाती है.
सीटी बजाती हुई.
धुआँ उड़ाती हुई
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दैनिक हिन्दुस्तान में 19.03.2016

Monday, March 14, 2016

कौन है जो सपनों में आया

सूरज भाई पूरी झील पर खिले हुए हैं
सुबह सडक पर जब निकले तो एक साइकिल सवार मोबाइल पर गाना सुनते जा रहा था। गीत के बोल नहीं सुनाई देर रहे थे मुझे लेकिन सड़क लगता है गाना सुनते हुये इठला रही थी। पेड़, पौधे, पत्ते गीत के साथ डांस कर रहे थे।

सड़क पर बिन्देश्वरी प्रसाद मिल गये। पुलिया की तरफ़ चले जा रहे थे। हमसे पूछे मिश्र जी मिले क्या उधर? हम बोले -नहीं। शायद आकर चले गये हों। हमने पूछा- आइये चाय पिलायें। वे बोले-’हम चाय नहीं पीते जबसे डायबिटीज हुई है। पीते भी हैं तो घर में पीते हैं, बिना शक्कर की।’

चाय की दुकान पर गाना बज रहा है-
’रामपुर का वासी हूं मैं लक्ष्मण मेरा नाम
सीधी-साधी, बोली मेरी सीधा-साधा काम’


सड़क पर एक मोटर साइकिल वाला हाथ छोड़कर मफ़लर बांध रहा था। हैंडल सीधा बना रहा। आटो पायलट मुद्रा में चलती रही फटफटिया। बीच में कहीं गढ्ढा पड़ जाता तो प्लास्टर आफ़ पेरिस की खपत का इंतजाम हो जाता।

गाना बजने लगा:
’कौन है जो सपनों में आया
कौन है जो दिल में समाया
लो झुक गया आसमां भी
इश्क मेरा रंग लाया।’


 
अख़बार बांचता हुआ आम आदमी
अब बताइये सपना आप देख रहे हैं, दिल में कोई आपके समाया है, इश्क आपका रंग लाया और आप पूछ रहे हैं। हद्द है यार ! सुबह-सुबह क्या हसीन मजाक कर रहे हैं। जरा सा चूक जाए कोई तो दिल में कुछ कुछ होने लगे।
चाय की दुकान पर खड़े-खड़े देखा एक मोपेड पर कई बड़े थैलों में एक सवार पान मसाला लादे चला जा रहा था। दुकानों पर सप्लाई करेगा। लोग पुडिया फाड़कर मुंह ऊपर करके डाल लेंगे और चल देंगे। उनमें से न जाने कितनों को कैंसर होगा। पान मसाले वाले अमीर होते जायेंगे। खाने वाले लुटते, मरते रहेंगे। अभी कानपुर में पता चला एक पान मसाले वाले के यहां इनकम टैक्स का छापा पड़ा। पचास करोड़ पेनाल्टी देने को राजी हुये। इनकम टैक्स वाले और मांग निकाल रहे हैं। हो जायेगा समझौता।

इस बीच दोनों में परिचय निकल रहे होंगे:
’तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई
यूं हीं नहीं दिल लुभाता कोई’


एक बच्ची मोपेड पर एक छोटे बच्चे और एक बुजुर्ग को बैठाये चली जा रही थी। आगे एक बड़ा थैला भी रखे थी। जिम्मेदार है बच्ची। कल ’दैनिक भाष्कर’ में पढी एक खबर याद आ गयी। एक बच्ची ने नौ साल की उमर से अखबार बांटने का काम किया। पढाई साथ-साथ। तीन स्कूलों ने देरी से आने के कारण उसको स्कूल से निकाल दिया। चौथे ने उसको देरी से आने की अनुमति दी। अब वह 23 की हो गयी है। पढाई पूरी करके काम कर रही है और अपने जैसी स्थिति वाले लोगों को सहायता और सहयोग करती है।

झील की तरफ़ जाते हुये देखा सूरज भाई आसमान में छाये हुये थे। झील के पानी में सूरज भाई पूरे कबीले के साथ नहा रहे थे। पूरा तालाब उजला-उजला, खिला-खिला सा दिख रहा था। एक बच्चा किनारे उकडू बैठे मोबाइल पर कुछ खुट-खुट कर रहा था।

लौटते में देखा कि एक आदमी गुमटी के पास बैठा अखबार पढ रहा था। अखबार में विजय माल्या बयान पढ़कर सोच रहा होगा कि ये है दबंग आदमी। डंके की चोट पर कह रहा है-'अभी भारत वापस नहीँ आऊंगा, अभी माहौल मेरे खिलाफ है।'

जैसे भी हैं, हम सुंदर हैं
सामने सामुदायिक भवन के बोर्ड से ’भ’ गायब हो गया है। लिखा है- ’सामुदायिक वन’। इस स्थिति को हम पिछले तीन साल से देख रहे हैं। और लोग भी देख रहे होंगे। लेकिन वन को भवन बनाने की इंतजाम नहीं हुआ।
लौटकर अखबार में सांवली महिलाओं द्वारा शुरु किया गये ’अनफ़ेयर लवली अभियान’ के बारे में खबर पहले पेज पर देखी। खूबसूरती पर गोरे लोगों के एकछत्र कब्जे के खिलाफ़ अभियान है यह अभियान। वीरेन्द्र आस्तिक की कविता याद आ गयी:

हम न हिमालय की ऊंचाई,
नहीं मील के हम पत्थर हैं
अपनी छाया के बाढे. हम,
जैसे भी हैं हम सुंदर हैं
हम तो एक किनारे भर हैं
सागर पास चला आता है.
हम जमीन पर ही रहते हैं
अंबर पास चला आता है.

अम्बर और सागर तो नहीं आये अभी तक लेकिन शायद कविता पढकर सूरज भाई धड़धडाते हुये कमरे में धंस आये। साथ बैठकर चाय पी रहे हैं हमारे साथ। आप भी आइये पीना हो तो।
 
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Sunday, March 13, 2016

मठाधीश और सम्पन्न साधु तो भोगी होते हैं

प्रश्न: संन्यास लेकर जो मठाधीश , महंत, या धर्म के उपदेशक हो जाते हैं क्या उनकी इच्छायें वास्तव में मर जाती हैं?
-नरसिंहपुर से विजय बहादुर

उत्तर: मेरा ख्याल है, जब तक कोई ऐसा कार्य या ऐसा चिन्तन या ऐसा कर्म न हो जो आदमी की चेतना को पूरी तरह डुबा ले और उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को उठने न दे तब तक संन्यास लेने या मठाधीश हो जाने से आदमी की तृष्णा नहीं जाती। सेक्स और भूख पर विजय पाना सबसे कठिन है। आमतौर पर साधारण संन्यासी भोजन-लोलुप और स्त्री-लोलुप होते हैं। ये बड़े दयनीय भी कभी-कभी लगते हैं। दमन से आदमी दुखी होता है। मठाधीश और सम्पन्न साधु तो भोगी होते हैं। मैंने भी कई स्वामियों को रबड़ी पीते देखा
है।


रायपुर से प्रकाशित होने वाले अखबार देशबन्धु में ’पूछो परसाई से’ श्रंखला के अंतर्गत 12 अक्टूबर, 1986 को प्रकाशित।

Saturday, March 12, 2016

अपना काम करने का सपना


मोहम्मद कलीम पुलिया पर
’ये है हमारा मशीन का स्केच ! ये मोटर है! ये जाली ! यहां से दाना फ़ाइनली निकलेगे।’ - कलीम एक कागज में स्केच बनाकर हमको समझा रहे थे।

हुआ यह कि दो दिन पहले पुलिया पर सोते हुये कलीम मिले। साइकिल पर बक्सा, पेटी के कुंडी वगैरह रिपेयर करने का सामान लदा था। कुछ साइकिल के हैंडल पर, बाकी कैरियर की पेटी पर। कब्जा, पेटी रिपेयर का ही काम करते हैं कलीम। कभी काम मिलता है, कभी नहीं मिलता। परसों की ही कुल कमाई 100 रुपये हुई थी।
हमने ऐसे ही रायबहादुर की तरह कहा- ’ इस धन्धे में काम रोज नहीं मिलता तो कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेते।’

कलीम बोले-’ काम तो करना चाहता हूं। अपना काम। लेकिन पूंजी का जुगाड़ ही नहीं हो पा रहा।’

हमने कहा -’ क्या काम करने की सोच रहे हो? कितना पैसा चाहिये उस काम में?’

उन्होंने बताया-’ हम पोल्ट्री फ़ार्म, सुअर पालने वालों के लिये दाना बनाना का काम करना चाहते हैं। 50-60 हजार लगेंगे इस काम में। काम से और लोगों को भी रोजगार मिलेगा।’

विस्तार से अपनी योजना के बारे में बताते हुये बोले कलीम-’ परियट नदी के पास सैंकडों डेयरी हैं। हजारों जानवर हैं वहां। रोज कोई न कोई मरता है। उसका गोश्त बेकार जाता है। हम उस मरे हुये जानवर के गोश्त से मुर्गियों और सुअरों के लिये दाना (चारा ) बनाने वाली मशीन बनायेंगे। इससे हम चार लोगों को रोजगार भी देंगे। हमारा बहुत दिन से सपना है यह काम करने का लेकिन पैसे के कारण पूरा नहीं हो पा रहा है।’

हमने कहा- ’ तो बैंक से पैसा लोन लेकर सपना पूरा करो न्! शुरु करो काम।’


अपना काम करने का सपना है कलीम का
बैंक में लोन कैसे मिलेगा? कौन देगा ? यह बात कह ही रहे थे कलीम तब तक हमारे एक परिचित हमको खोजते हुये आये। एक किताब कूरियर से आयी थी। किताब आर्डर करते समय मैं अपना मोबाइल नंबर लिखना भूल गया था सो कूरियर वाला मुझे खोज रहा था। उनसे पूछा उसने मेरे बारे में तो मुझे पुलिया पर खड़े देखकर वे कूरियर वाले को मेरे पास ले आये।

मैंने उनसे कहा -’ये जरा इनकी कुछ सहायाता कर सकते हो बैंक से लोन दिलाने में तो करो।’

उन्होंने कहा - ’हां हम पूरी कोशिश करेंगे। इसके बाद साढे तीन बजे अपने सब कागज लेकर बैंक आने की बात तय हुई कलीम और मेरे परिचित की।’

मैं फ़ैक्ट्री पहुंचा तो कुछ देर में फ़ोन आया कलीम का कि वे बैंक में इंतजार कर रहे हैं। हमने अपने परिचित को फ़ोन किया तो वे पहुंचे बैंक। इस बीच मैंने बैंक मैनेजर से लोन के बारे में जानकारी ली तो पता चला कि ’मुद्रा लोन’ मिलता है 50 हजार से 10 लाख तक। लेकिन इस साल का लक्ष्य पूरा हो गया है। अप्रैल मई में मिल सकता है अगर उनका खाता बैंक में हो।

शाम को पता चला कि लोन मिल जायेगा लेकिन उसके लिये पैन कार्ड होना जरूरी है। आधार कार्ड, वोटर आई डी है कलीम के पास। पैन कार्ड जैसे ही मिलेगा लोन मिल जायेगा। अब मैंने पैन कार्ड की जानकारी नेट से ली। अब कलीम के लिये पैन कार्ड का इंतजाम करना है।

इस बीच मैंने कलीम से पूछा कि तुम्हारा बैंक में खाता है ? बोले - है! जीरो बैलेंस वाला खाता है। हमने पूछा - किस बैंक में है? बोले - ’बैंक का नाम याद नहीं पर किताब घर में धरी है।’ हमने कहा - ’नाम देखकर बताओ।’
कुछ देर में कलीम का फ़ोन आया। बोले- ’ सटक बैंक में खाता है।’ हमने कहा - ’ये सटक बैंक कौन सी नयी खुल गयी। स्पेलिंग पढकर बताओ।’


ये है कलीम की मशीन का स्केच
पता चला कि उनका खाता स्टेट बैंक में है। जिसे वो सटक बैंक कह रहे थे।

इस बीच हमने कहा -’ तुम गोश्त से दाना बनाने की मशीन कैसे बनाओगे?’

कलीम बोले-’ हम खुद बनायेंगे। हम मिस्त्री हैं। पुरानी मोटर उठा लेंगे। सब कर लेंगे। बस पैसे का जुगाड़ हो जाये।’

हमने कहा-’ अच्छा स्केच बनाकर बताना कैसे बनाओगे मशीन।’ कलीम बोले- ’दिखायेगे।’

हमने सोचा स्केच की बात कही है। एकाध दिन बाद कभी आयेंगे। लेकिन कल दोपहर लंच के बाद फ़ैक्ट्री जाते समय देखा कि कलीम भाई स्केच लिये हाजिर थे। हमको एक-एक चीज विस्तार से समझाने लगे।

हमने कहा - ’ स्केच तो मुझे नहीं पता वैसा ही है जैसा तुम मशीन बनाने की सोच रहे हो। लेकिन जितनी शिद्धत से तुम इस काम के बारे में सोच रहे तो इसको पूरा होने से कोई रोक नहीं सकता।’

कलीम बोेले-’ यह मेरा बहुत दिनों का सपना था। आपका सहयोग मिलेगा तो अब लगता है यह पूरा भी हो जायेगा। इससे लोगों को रोजगार भी मिलेगा। लोन भी मैं साल भर में चुका दूंगा।’

हमने कहा - ’तुम्हारा सपना पूरा होगा तो मुझे बहुत खुशी होेगी।’

और विस्तार से बात करने पर बताया कलीम ने कि मशीन तो 20 हजार में बन जायेगी लेकिन बाकी का हिसाब-किताब करने में, दुकान बनाने के लिये 30-40 हजार और चाहिए। दुकान नहीं होगी तो कौन आयेगा मेरे यहां से दाना खरीदने।

कल मेरी एक पोस्ट पर टिप्पणी करते हुये सलिल जी ने 'मुद्रा लोन' का जिक्र किया। उनसे और जानकारी लेकर ये लोन कलीम भाई को दिलवाने की कोशिश करेंगे। देखते हैं कितना सफ़ल होते हैं उनका सपना पूरा करने में।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207515572180901

Friday, March 11, 2016

बुजुर्ग आदमी अकेलेपन का शिकार होता है

सुबह आज थोड़ा देर से उठे। सोचा आज मटिया दें साइकिलिंग। लेकिन फ़िर निकल ही गये। सोचा चाहे दो पैडल मारें, लेकिन मारना चाहिये।

पुलिया के पास बिन्देश्वरी प्रसाद टहलते हुये वापस जा रहे थे। हमने पूछा - अकेले?

वो बोले - ’हां, मिश्रा जी आ नहीं रहे तीन दिन से। शायद घर चले गये।’

हम बोले- ’परसों तो आप लोग साथ दिखे थे।’

वो बोले- ’परसों नहीं उसके पहले मिले थे।’

बुजुर्ग आदमी अकेलेपन का शिकार होता है। एक दिन साथी नहीं मिलता तो हुड़कने लगता है।

चाय की दुकान पर बहस प्राइवेट स्कूलों की लूट पर हो रही थी। बहस क्या एकतरफ़ा रोना रोया जा रहा था।
यह रोना शाश्वत होता जा रहा है। सरकारी स्कूल बन्द हो रहे हैं। जबकि देश को शिक्षित और साक्षर बनाने के लिये ऐसे स्कूल खूब सारे होने चाहिये। बच्चे प्राइवेट स्कूलों में फ़ीस न भर पाने के कारण जा ही नहीं पाते।
हमको आर्ट आफ़ लिविंग वाले गुरु जी का चार साल पुराना बयान याद आया। उन्होने बयान जारी किया था- "सरकारी स्कूलों में पढ़ाई से नक्सलवाद को बढ़ावा मिलता है। सरकारी स्कूल बन्द करके उनकी जगह निजी स्कूल खोलने चाहिये।"

( पोस्ट का लिंक - http://fursatiya.blogspot.in/2012/03/blog-post_21.html )
ऐसी उत्तम सोच वाले गुरुजी 35 लाख लोगों को आर्ट आफ़ लिविंग सिखायेंगे। पर्यावरण का चूना लगाते हुये।

फ़ैक्ट्री गेट के पास एक आदमी बीडी का धुंआ फ़ूंकते हुये मिला। धुंआ ऐसे निकलकर भाग रहा था जैसे माल्या जी भारतीय बैंकों का पैसा हिल्ले लगाकर फ़ूट रहे हों।

लौटते में मिश्रा जी मिले। वे बोले- ’बिन्देश्वरी प्रसाद नहीं मिले आज। लगता है देर हो गयी। हम उनको बताये कि वे तो आपको खोज रहे थे।’

पुराने जमाने के लोग हैं ये बुजुर्गवार। आजकल के लोग अगर टहलने निकलें तो पुलिया पर पहुंचने पर न मिलें तो फ़ोनिया लें।

फ़िर मिश्रा जी ने बताया कि दो दिन उनकी तबियत गड़बड़ हो गयी तो निकले नहीं टहलने। कमर दर्द था।
सूरज भाई एकदम छाये हुये थे आसमान पर। बहुमत वाली सरकार के प्रधानमंत्री की तरह पूरे आसमान पर उनका नियंत्रण दिख रहा था। हर तरफ़ उजाले के स्वयंसेवक पसरे हुये थे उनके। फ़ूल, पत्ती, कली, फ़ुनगी, कोने, अतरे, कंगूरे, अटारी, गली, मोहल्ले, जल-थल-नभ जिधर देखो उधर सूरज भाई के स्वयंसेवक तैनात थे। जैसे कोई सरकार हर महत्वपूर्ण पद पर अपने जाति, विचारधारा के लोगों को बैठाना ही सरकार की सफ़लता की गारन्टी मानती है वैसे ही सूरज भाई ने भी आते ही हर जगह अपने उजाले के कमांडो बैठा दिये।

हद तो तब हो गयी जब सूरज भाई ने हमारे चाय के थरमस के ऊपर भी उजाले का एक छुटभैया बैठा दिया। हमने उनकी बाल सुलभ शासन वृत्ति पर हंसते हुये थरमस का ढक्कन खोला। चाय कप में डालते हुये देखा कि उजाला चाय में भी घुस गया। लगता है पेट में भी जाकर वहां भी कुर्सी डालकर बैठेगा।

चाय पीते हुये जब मैंने सूरज भाई से यह बात कही तो वो हंसते हुये बोले- ’अरे नहीं, जिसकी फ़ितरत उछलने-कूदने की होती है वो एक जगह बैठता नहीं। पेट में उछलता-कूदता रहेगा। जहां कोई रास्ता दिखेगा वो बाहर भी जायेगा।’

मन किया कि कहें कि निकलते ही कहीं आर्ट आफ गुरु वाले एंजाइम के चपेटे में आ गए तो खाद बनकर रह जायेंगे आपके उजाला भाई। लेकिन कहे नहीं। कोई हमारा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी तो है नहीँ जो उसका चरित्र हनन करें, उसकी खिल्ली उड़ायें। यह सब तो राजनीति में होता है। बल्कि सच कहें तो अब बस यही सब तो होता है। राजनितिक सवालों के जबाब देते हुए व्यक्तिगत हमले किये जाते हैं। बड़े सवालों के जबाब में चिरकुट तर्क दिए जाते हैं। ताली पीटने के लिए बाल गोपाल/स्वयं सेवक/ कामरेड लोग होते ही हैं जो कहते भी हैं-'क्या करारा जबाब दिया है।'

चाय पीते हुये बतियाते हुये सूरज भाई कब आसमान पर चले गये पता ही नहीं चला।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207508601926649

Thursday, March 10, 2016

टेसू के फ़ूल जमीन का श्रंगार कर रहे हैं

झील के पानी में छप्प-छैयां करते सूरज भाई
मेस से बाहर निकलते ही पक्षी बड़ी जोर से चिंचियाते दिखे। ऐसे जैसे ’विजय माल्या’ जी के विदेश निकल लेने पर बैंक हल्ला मचा रहे हों। आसमान में भी धुयें की एक लकीर दिखी। बड़ी तेजी से दूर से भागती हुई। हमको फ़िर माल्या जी याद आये। मतलब हाल यह समझिये कि जिसमें देखो उसमें ’माल्या-मूरत’ ही दिख रही थी- ’देश का पैसा लेकर भागता अमीर।’

सड़क पर एक परिवार टहल रहा था। देखते-देखते बच्चा आगे दौड़ने लगा। जमीन पर धप्प-धप्प करते जूते रखता। पीछे उसका पिता भागने लगा। कुछ दूर आगे जाकर पिता ने बच्चे को पिछाड़ दिया। बच्चा पलटकर भागने लगा। पिता फ़िर पलटकर बच्चे को पकड़ने की मुद्रा में उसके पीछे भागने लगा। बच्चे की मां पिता-पुत्र के ’मार्निंग-कौतुक’ को देखते एक समचाल से टहलती रही। गरदन थोड़ा बायीं तरफ़ किये हुये।

दिहाड़ी कमाने निकला कुम्हार
एक सरदार जी आंखों में धूप वाला चश्मा लगाये कोई भजन गाते हुये टहलते जा रहे थे। एक महिला और टहल रही थी। बहुत धीरे-धीरे। लग रहा था उसको गरदन में कोई तकलीफ़ है। पैर में भी। शायद मन में भी।
एक आदमी ठेले पर कुछ घड़े रखे बेंचने के लिये ले जा रहा था। लालमाटी जायेगा। एक घड़ा 70 रुपये का। बताया कि सब बिक जाते हैं घड़े। पहले महिलायें भी घड़े बेचने जाते दिखीं थीं। पर वे घड़े अपने सर पर ढोकर ले जातीं थीं। लेकिन आदमी लोग सर पर ढोकर बेंचने जाते नहीं दिखें। दोनों के काम करने की सुविधाओं में अंतर है। लैंगिग भेदभाव। एक ही काम के लिये महिला को सर पर ज्यादा बोझ ढोना होता है।


परदेशी और सुशीला चाय की दुकान पर
सूरज भाई तालाब में उतरकर नहा रहे थे। किरणों के साथ मिलकर पानी में ’छप्प-छैंया’ करते हुये सूरज भाई प्रमुदित और किलकित से दिख रहे थे। हमने कहा -’तालाब का पानी गन्दा करने के जुर्म में तुम पर भी जुर्माना ठुक जायेगा समझ लो सूरज भाई।’

इस पर सूरज भाई बड़ी तेज खिलखिलाकर हंसे। सब दिशायें भी उनके साथ हंस पड़ीं। इसके बाद उन्होंने मुस्कराते हुये अपनी शाश्वत धमकी दी-’ हम भी फ़िर अपनी ऊष्मा का शुरुआत से लेकर आजतक का बिल भेज देंगे। सदियों तक चुकाते नहीं बनेंगे।’ हम उनको मुस्कराते हुये पानी में नहाता छोड़कर चले आये।


दीपा पानी भर लाई
पंकज टी स्टाल पर काफ़ी दिन बाद जाना हुआ। एक बुजुर्ग आदमी और बुजुर्ग महिला साथ बैठे चाय पी रहे थे। जमीन पर। आदमी ने बताया कि साथ की महिला उसकी बहन हैं। बाद में पता चला सगी बहन नहीं- बहन सरीखी हैं। अपनी तरफ़ से बताया ताकि हम उनको पति-पत्नी न समझ लें।

पति-पत्नी समझा जाना समझ लो कितना खराब समझा जाता है। :)

दोनों रीवां के रहने वाले हैं। दोनों के जीवन साथी खत्म हो गये। बच्चे नहीं हैं। मांगते-खाते हैं। जीसीएफ़ के सामने बैठते हैं। दस-बीस-तीस रुपये मिल जाते हैं। उसी से गुजर बसर खाना-पीना हो जाता है।


सुबह की रसोई बनाते कामगार
परदेशी नाम है आदमी का। उमर साठ के ऊपर होगी। औरत के पेट में ट्यूमर था। दस साल पहले गुजर गयी। महिला का नाम सुशीला है। उनका पति सालों पहले गुजर गया। खून छरछराता था। एक ही जगह रहते हैं दोनों। खाना अलग-अलग बनाते हैं। पंकज ने बताया कभी -कभी चाय पिला देते हैं दोनों को। हमने भी चाय भर के पैसे दिये दोनों को और अपना काम खत्म समझा।

वहीं तीन लड़के चाय पीते हुये एक ही सिगरेट से बारी-बारी से सुट्टा लगा रहे थे। सरकार ने सिगरेट मंहगी करके युवा शक्ति को एक जुट होने का मौका दिया है।

दीपा से मिलने गये। उसके पापा ने कुंडम से आये कुछ लोगों को अपने ठीहे के पास बनाने-खाने की जगह दे दी। मतलब बुला लिया कि आओ बनाओ-खाओ। सबका अकेलापन दूर होगा।

कुंडम से आये लोग सुबह का खाना बना रहे थे। लकड़ी साथ लाये हैं। होली तक रुकेंगे। घर में सब लोग हैं। मां-पिता-बच्चे-पत्नी और परिवार। अभी वहां कोई काम नहीं तो यहां चले आये। 250 रुपये रोज के मिलते हैं।


बटलोई में आटा मांढ़ा जा रहा है
एक आदमी बटलोई में आटा मांड़ रहा था। दूसरा शीशे में खुद को निहार रहा था। हमने पूछा -’घर में भी खाना बनाते हो ऐसे कभी? ’ वो बोले- ’घर में बाई है न! बोई बनाती है। पर जब जरूरत पड़ती है तो बनाते भी हैं।’

दीपा पानी भरकर आ गयी। सर पर अल्युमिनियम की पतीली में पानी भरे। आज उसकी छुट्टी है। उसके पापा ने उसको नहाने के लिये चिल्लते हुये कहा। वह चुपचाप अंदर चली गयी। हमने उसके पापा से कहा-’ ऐसे चिल्लाया मत करो भाई। प्रेम से बोला करो।’ वह बोला- ’ प्रेम से बोलते हैं तो यह हमको बेवकूफ़ समझती है। बात नहीं मानती।’ कहने का मन हुआा (लेकिन कहा नहीं)-’ बेवकूफ़ तो हो ही तुम जो ऐसा समझते हो। प्रेम से बोलो तो बच्ची ज्यादा अच्छे से काम करेगी।’


टेसू के फूल जमीन का श्रंगार करते हुए
लौटते हुये क्रासिंग बन्द मिली। ट्रेन धड़धड़ाते हुये निकली। ओवरब्रिज के पास टेसू के पेड़ से फ़ूल नीचे झरे हुये पड़े थे। बहुत खूबसूरत लग रहे थे। अनायास पुष्प की अभिलाषा कविता याद आ गयी:

’मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फ़ेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ पर जायें वीर अनेक”
चलिये। चला जाये। कर्तव्य पथ डट जाया जाये। कविता याद करते हुये:
’वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डट जावें’
मल्लब अगर कोई कर्तव्य मार्ग पर नहीं डटा है और कोई उसको टोंकता है तो अगला तसल्ली से कह सकता है -"क्या करें भाई! दयानिधे से शक्ति की ग्रांट आई ही नहीं! कैसे डट जायें कर्तव्य मार्ग पर? शक्ति की ग्रांट आये तभी तो डटें।" ये दयानिधे हमारे खिलाफ़ षडयन्त्र कर रहे हैं  :)


सूरज भाई सुबह से कर्तव्यमार्ग पर डटे हुये हैं और हमको बहानेबाजी करता देखकर मुस्करा रहे हैं। सुबह हो ही गयी।
 https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207499661063133

Wednesday, March 09, 2016

वन्दना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो

सूरज की अगवानी को तैयार तालाब
आज सुबह जब साईकल स्टार्ट किये तो सुबह अभी हुई नहीं थी। अँधेरा पूरी तरह छंटा नहीं था। पेड़ चुपचाप खड़े थे। गोया वे अँधेरे और उजाले की जंग निर्लिप्त भाव से देख रहे थे। जो जीतेगा उसके पक्ष में हिलते-डुलते, पत्तों के चंवर डुलाते वंदना शुरू कर देंगे।

फैक्ट्री के सामने की चाय की दुकान खुल गयी थी। ऍफ़ एम रेडियो पर गाना बज रहा था:
'इस जग में मेरा कोई नहीं
जाऊं तो बोलो जाऊं किधर'
पर हमारी ऐसी कोई समस्या नहीं थी। हम आगे निकल लिए।

एक आदमी ने साईकल सड़क पर खड़ी की और सड़क किनारे पड़ी बेंच पर पीठ के बल लेट गया। शवासन मुद्रा में। हाथ ऊपर कर लिए।मानों ऊपर से कुछ गिरेगा तो कैच कर लेगा।

सरदार जी जेब में मोबाईल धरे तेज चाल से चले जा रहे थे। उनके पीछे तीन लड़कियां टहलती हुई चली जा रहीं थी। मन किया उनसे पूछेँ कि कल महिला दिवस कैसे मनाया? लेकिन फिर नहीँ पूछा। क्या पता वे कह दें -' हम महिला नहीं हैं। हम लड़की हैं।' या फिर यह ही कह दें- ' आपसे क्या मतलब? माइंड योर बिजनेस! '  :)

सूरज उगता लाल है लेकिन फोटो में पीला हो गया
तालाब की तरफ गए। सूरज भाई अभी निकले नहीँ थे लेकिन चिड़ियाँ चहचहाते हुए उनकी वंदना का अभ्यास करने लगीं थीं। हरेक अलग-अलग तरह से हल्ला मचाते हुए सूरज भाई की वन्दना का रियाज कर रहा था। तालाब पर एक अपने पंख फड़फड़ाते हुये मानों कह रही हो:
'वन्दना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो।'
आगे एक लड़की आदमी के साथ-साथ टहलती दिखी। लड़की अपने हाथ तेजी से दायें-बाएं कर रही थी। आदमी के हाथ आगे-पीछे ही हो रहे थे।लग रहा था कि पीटी कर रहा हो।

एक युवा तेजी से भागता आ रहा था। सड़क पर इतनी जोर से पैर पटकते हुए दौड़ रहा था कि अगर कोई नाजुक मिजाज सड़क होती तो मारे संकोच के धसक जाती।

रांझी मोड़ से तालाब की तरफ गए। एक लड़की अपने कुत्ते को टहला रही थी। दूर से कुत्ते की जंजीर दिखाई नहीं दे रही थी। जैसे कई धाकड़ भाषण देने वालों के प्रांप्टर जनता को दिखाई नहीँ देते और जनता समझती है कि बिना पढ़े धाँसू भाषण दे रहा है, धुंआधार। पास से दिखी जंजीर। पतली जैसे ट्रेन में सूटकेस बाँधने वाली होती है।



तालाब किनारे सूरज भाई दिखे। एकदम लाल। मानों सुबह-सुबह लाल सलाम कर रहे हों। लेकिन जब फोटो खींचा तो उनका रंग पीला पड़ गया था। लगता है उनको भी डर हो कि अगर फेसबुक पर अपने असली रंग में पोस्ट किये गए तो लोग गरियायेंगे कि ये सूरज भाई भी जे एन यू वालों के साथ लग लिए।

चिड़ियों के झुण्ड के झुण्ड सूरज के आसपास चककर काटते हुए चहचहा रहे थे। सब यही सोच रहे थे कि सूरज के साथ सेल्फी हो जाए फिर दिन भर लोगों को दिखाते हुए हवा पानी मारेंगे।

'तालाब खेलने' वाले अभी आये नहीं थे।सिर्फ एक आदमी अपनी मोपेड पर आया था। उसने कमीज उतारकर झोले में डाली और कन्धे पर 'ट्यूब डोंगी' लादकर तालाब किनारे 'रेडी टु मूव' पोजीशन में धर ली।

सड़क पर पांच-छह भैंसे अधमुंदी आँखे लिए बीच सड़क से कुछ किनारे बायीं तरफ पगुराती हुई जा रहीं थीं। उनके पीछे एक आदमी एक पुड़िया से तम्बाकू निकाल कर हथेली में धरकर रगड़ता हुआ चला जा रहा था।

एक आदमी सड़क पर आँख मलता खड़ा हुआ था। आँख इतनी तेजी से मल रहा था वह गोया पलकों पर गुस्सा उतार रहा हो कि इतनी जल्दी क्यों खुल गयीं।या शायद देरी से खुलने पर गुस्सा उतार रहा हो।


सब उगते सूरज को सलाम करने लगे
रांझी थाने के बगल की चाय की दुकान पर पहुंचे तो एक बुजुर्ग ने अपना चाय का ग्लास हमको जबरदस्ती थमा दिया। चेहरा जाना पहचाना लगा। लेकिन नाम याद नहीं आया। लेकिन जैसे ही बतियाना शुरू किये तो याद आया -'ये तो छट्ठू सिंह हैं।'

कोई बात चली तो छट्ठू सिंह ने अपना एक किस्सा सुनाया -"कलकत्ते में एक बार घर का बल्ब फ्यूज हो गया तो हम बगल के कारखाने में घुसकर निकाल लाये। तीन महीने बाद फिर फ्यूज हो गया तो एक बिजली के खम्भे पर चढ़ गए। मारा झटका तो गिरे आकर नीचे लोहे पर। जांघ में घुस गया लोहा। दरबान आया और पूछा -'क्या कर रहे थे यहां?' हम उसको बोले-'देख रहे थे कि दरबान ड्यूटी पर तैनात है कि नहीं।' " बताते हुए हंसने लगे छट्ठू सिंह।

'कितने दिन में ठीक हुई चोट?' हमारे पूछने पर बोले-'दस दिन लग गए घाव भरने में।'


छट्ठू सिंह चाय की दुकान पर। पीछे मिश्रा जी
छट्ठू सिंह के सारे दांत गायब हैं इसलिए उनकी आधी आवाज से ज्यादा आवाज हमारे कान तक पहुंचने के पहले ही हवा में गोल हो जा रही थी जैसे जन कल्याण योजनाओं का बड़ा हिस्सा जनता के पास पहुँचने के पहले ही गायब हो जाता है।

हमने छट्ठू सिंह से कहा-'दांत लगवा लो। अच्छा रहेगा। स्मार्ट लगोगे। चकाचक।'



छट्ठू सिंह ने बताया कि बताया कि डॉक्टर को दिखाया था। बोला -'मसूढ़े काटने पड़ेंगे।हम नहीं लगवाये।'

हमने कहा लगवा लो। पैसा हम दे देंगे।

इस पर छट्ठू सिंह बोले-'आप कह दिए हम समझ लिए लग गए दांत। अब बुढ़ापे में क्या करेंगे। सन् 1935 की पैदाइश है। हमारे साथ के खेले, खाये 300-400 लोग हमारे देखते-देखते चले गए। अब तो:
सदा भवानी दाहिनी सन्मुख रहें गणेश
पांच देव रक्षा करें, ब्रह्मा, विष्णु, महेश।
इसके बाद वहीँ चाय की दुकान पर देवी भजन सुनाने लगे:
'अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।'
हमने उनका भजन गाते हुए वीडियो बनाया। चलते समय हमने कहा -'आओ चलो बैठो पीछे चलते हैं।' छट्ठू सिंह बैठ गए पीछे कैरियर पर। हम 100 मीटर करीब चले। देखा हवा बहुत कम थी दो लोगों के लिए। सुबह कोई था नहीं हवा वाला। रिम हिलने लगा तो छट्ठू सिंह उतर गए। फिर हम चले आये।

रास्ते में टेसू के फूल मिले, सूरज भाई खिले हुए मिले। पुलिया बैठे दो बुजुर्ग मिले। हम साईकल मोड़कर उनसे बतियाये और कहा-'आइये आपको चाय पिलाते हैं मेस में।'

वो बोले-' आपसे बातचीत हो गयी बस यही बहुत है। हम आपका इंतजार कर रहे थे।'

कमरे पर आकर सोचा कि एक दिन उन सब लोगों को इकट्ठा किया जाए जिनसे अलग-अलग मोड़ पर बात होती है और सबके अनुभव एक साथ सुने जाएँ।

यह सोचने के साथ ही बाहर देखा। सूरज भाई मुस्करा रहे थे। मानों कह रहे हों-'यू आर क्रेजी।'

सूरज भाई की मुस्कान देखकर लगा -'सुबह हो गयी।'

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207487372315922

Saturday, March 05, 2016

भारत में पहले पानी की नदियां बहतीं थीं


सूरज भाई का जलवा झील पर पसरा है
आज सुबह निकले तो सड़क धुली-धुली लग रही थी। बादलों के पास जो पानी बचा रहा होगा वह फ़ेंककर चलते बने होंगे। मौसम सुहाना और आशिकाना सा !

चाय की दुकान पर दो लोग फ़र्श पर उकड़ू बैठे बीड़ी पी रहे थे। चाय का ग्लास बगल में धरा था। खाने के बाद जैसे लोग कोई ’स्वीट डिश’ खाते हैं वैसे ही चाय के बाद अब ’कुछ बीड़ी हो जाये’ के वाले अंदाज में सुट्टा मार रहे थे।

बात करते हुये पता चला कि देहरादून से आये हैं सामान लेकर। बुधवार को चले थे। शनिवार को आ गये 1400 किमी करीब दूरी तय करके। हम जानते हैं देहरादून से स्प्रिंग आती है। पूछा - ’ (लीफ़) स्प्रिंग लाये हो?’ वो बोले-’ स्प्रिग नहीं, कमानी लाये हैं।’ स्प्रिंग को बोलचाल की भाषा में कमानी कहते हैं।

जनता से जनता की भाषा में ही बतियाया जाना चाहिये। नहीं बतियायेंगे तो एक-दूसरे की बात समझ नहीं पायेंगे।
लौटते हुये बोले-’ बुरहानपुर होकर जायेंगे। केला मिल जायेगा ले जाने के लिये।’

देहरादून के पास ही एक गांव के रहने वाले हैं सब ड्राइवर। एक ट्र्क में दो ड्राइवर हैं ताकि जब एक आराम करे तो दूसरा चलाता रहे। तीन ट्र्क एक साथ आये हैं।


दीपा होमवर्क करती हुई
चाय की दुकान से चलकर झील की तरफ़ गये। रास्ते में बस स्टैंड पर एक आदमी सड़क की तरफ़ पीठ किये पैर ऊपर नीचे झटकते हुये कसरत कर रहा था। तेज कसरत करते हुये लगा कि फ़टाफ़ट दुलत्ती चला रहा है।
झील पर सूरज भाई का पायलट आ गया था। पूरा तालाब लाल सा कर दिया था उसने। मानो सूरज की रैली होने वाली हो झील के मैदान पर। सूरज भाई के आने के पहले रोशनी की झालर, झंडे लहरा रहे थे। तारों पर बैठे पक्षी चिंचियाते हुये लगता है सूरज भाई जिन्दाबाद, जिन्दाबाद, जिन्दाबाद का नारा लगा रहे थे। क्या पता कुछ लोग हमारा नेता कैसा हो, सूरज भाई जैसा हो भी का नारा भी लगा रहे थे।

मैदान के पास हैंडपंप पर ठेकेदारी पर काम करने वाले मजदूर नहा रहे थे। महिलायें कपड़े बदल रहीं थीं।
पास के ही मकान के बाहर एक लड़का स्कूल जाने के लिये बस्ता पीठ पर लादे तैयार खड़ा था। पानी की बड़ी बोतल बस्ते के बाहर झांक रही थी।

पानी की बात से याद आया कि कल शाम एक लड़की अपने भाई के साथ मोटरसाइकिल पर मेस के बाहर मिली। हम चूंकि बाहर ही मिल गये तो उसने पूछ लिया -’अंकल पानी भर लें?’ हमने कहा-’ भर लो।’ इसके बाद अंदर आकर वे मोटरसाइकिल एकदम नल के पास खड़ी करके अपने झोले में से कई बोतल निकालकर भरने के बाद झोले में रखने लगे।

पता चला कि उनके यहां पानी के लिये जो हैंडपम्प लगा है उसमें पानी खारा आता है। पीने लायक नहीं होता। आमतौर पर पापा आते हैं भरने पानी लेकिन अभी एक्सीडेंट हुआ है तो आ नहीं पाते। लड़की ट्यूशन पढकर आयी है तो अपने भाई के साथ पानी भरने आ गयी।

किस विषय का ट्यूशन पढती हो पूछने पर बताया उसने अंग्रेजी का। इंजीनियरिंग की पढाई करती है श्रीराम इंजीनियरिंग कालेज से। फ़र्स्ट ईयर में। कम्प्यूटर साईंस।

हमने कहा - ’तुम अंग्रेजी का ट्यूशन पढ़ती हो लेकिन बात तो हिन्दी में कर रही हो। सब पैसा बरबाद कर दिया। बोल पाती तो अंग्रेजी?’

इस पर उत्साहित होकर उसने कहा-’ यस वी कैन स्पीक इंगलिश।’

हमने मजे लिये- ’बोल अकेले रही हो। कह ’वी’ रही हो?’ वह हंसने लगी।

लेकिन बात पानी की हो रही थी। बच्चे लोग न्यू कंचनपुर से पानी भरने के यहां आये थे। दिन पर दिन पानी की सम्स्या विकराल होती जा रही है। अभी खबर सुन रहे हैं-’ बुंदेलखंड में पानी के तालाबों पर पहरे के लिये बंदूकधारी लोग तैनात किये गये हैं।’

कल के सीन क्या पता ऐसे हों- ’ लोग सुबह उठते ही पानी भरने के लिये निकल पड़ें। पेट्रोल पम्पों के बगल में ही पानी के पम्प खुल जायें। पानी की सप्लाई विदेशों से होने लगे। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पानी के दाम उछलने से देश में मंहगाई बढ़ने लगे। सरकारें पानी के सब्सिडी देने लगे। कोई पानी पंप वाला इसलिये जेल चला जाये कि वह पानी में पेट्रोल मिलाकर बेंच रहा था। जैसे आज पेट्रोल के विकल्प खोजे जाते हैं वैसे ही कल पानी के विकल्प खोजे जायें। एक-एक बोतल पानी के मार-काट होने लगे। लोग दहेज में पानी के भरे टैंकर देने लगें। और लोग बीते हुये जमाने को याद करते हुये कहें- ’ भारत में पहले पानी की नदियां बहतीं थीं।

रेलवे क्रासिंग पर पीला सिग्नल जल रहा था। क्रासिंग के पास एक लड़की स्कूल ड्रेस में मोबाइल पर बतिया रही थी। पावरपैक से चार्जिंग भी चल रही थी। मोबाइल की बैटरी आजकल लोगों के धैर्य की तरह देखते-देखते खल्लास हो जाती है। कल को क्या पता वाई-फ़ाई चार्जर आने लगें।

दीपा से मिलने गये। वह बैठे हुये होमवर्क कर रही थी। अंग्रेजी की किताब से फ़ूलों के नाम याद कर रही थी। कुर्ता उलटा पहने थी। हमने याद दिलाया तो हंसने लगी। पापा उसके हमेशा की तरह शिकायत करते मिले। पढ़ती नहीं। हमने पूछा तो बोली- ’ खेलने चली जाती हूं। सहेली के साथ। पकड़म-पकड़ाई, चीटी धप और इसी तरह के खेल।’

पापा उसके कहने लगे- ’ हम इससे कहते हैं कि पढोगे नहीं तो बंगले में काम करोगी। मैडम नहीं बन पाओेगी। लेकिन ये पढती ही नहीं। हम दिन भर रिक्शा चलाते हैं। शाम को आते हैं बरतन मांजते हैं। खाना बनाते हैं। ये दिन भर घूमती, खेलती रहती है। पढती ही नहीं।’

हम कहते हैं कि पढ़ा करो तो चुप रहती है। फ़िर बताती है आज साढे नौ बजे जाना है स्कूल। पापा को बुलाया है। दस्तखत करने के लिये। शायद पैरेन्टस टीचर मीटिंग है।

लौटते हुये दो लड़कियां साइकिल पर जाती हुई दिखीं। एक लड़की बार-बार अपनी स्कर्ट नीचे करते हुये ठीक सा कर रही थी। शायद कुछ छोटी हो। बगल से गुजरते हुये उनसे बात करते हुये चलने लगे। पता चला कि इंतहान देने जा रही हैं। आज अंग्रेजी का पर्चा है। इसके पहले हिंदी का हुआ। अच्छा हुआ। हमने ’आल द बेस्ट’ कहा इम्तहान के लिये तो दोनों बोलीं- ’थैंक्यू अंकल।’ अब इस समय उनको कापी मिल गयी होगी। वे उस पर अपना रोल नंबर लिख चुकी होंगी।

सूरज भाई पूरे बगीचे में अपना जलवा बिखेरे हुये हैं। किरणें पूरे बगीचे में पसरी हुई धमाचौकड़ी कर रही हैं।
सुबह हो गयी है। आपको दिन मुबारक हो।

Thursday, March 03, 2016

बच्चे मन के अच्छे

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Wednesday, March 02, 2016

बस चले तो साईकल को कम्पलसरी सवारी कर दें

सूरज भाई पेड़ों के पीछे से उजाले की सप्लाई कर रहे हैं
सुबह आलस हमेशा लफ़ड़ा करता है। पचास बहाने बताता है न निकलने के लिए। अक्सर झांसे में आ भी जाते हैं। लेकिन फिर मन उचकता है तो बहाने की बाड़ फांदकर लपक कर चल ही देते हैं। एक बार साइकिल स्टार्ट कर देते हैं तो लगता है अच्छा ही किया निकल लिए।

आज भी ऐसा ही हुआ। लेकिन निकल ही लिए। जब निकले तो सोचा किधर जाएँ। चूंकि देर हो गयी थी इसलिए पहला पड़ाव फैक्ट्री के सामने की चाय की दुकान रही।

चाय की दुकान पर दो नौजवान मिले। सामने वीएफजे स्टेडियम से टहलकर आया था एक। दूसरा शायद सीधा घर से चला आ रहा था। दूसरे ने चाय के लिये आर्डर दिया और सिगरेट लेने के लिए बगल की दुकान की तरफ़ लपका। पहले ने टोंका, सुबह-सुबह सिगरेट? उसके एतराज करने तक वह सुलगा चुका था। पहले ने चाय के लिये मना कर दिया कहते हुए-'अब्बी पीकर आये हैं घर से।'

पता चला कि दूसरा जवान ठेकेदारी का काम करता है। पहले दिन में कई पैकेट पी जाता था सिगरेट। अब दिन में 3-4 सिगरेट सुलगती हैं। उम्र के साथ कम होती जा रही है। पता यह भी चला कि नींद न आने की समस्या है उसको। देर तक नहीं आता, फिर देर तक सोता है।

पहला युवक कम्प्यूटर का काम करता है। लेनोवो कंप्यूटर आजकल बताया 22 हजार तक में आ रहा है। हमने बताया कि हमने 2004 में कॉम्पैक का लैपटाप 84 हजार में लिया था। अभी भी टनाटन चल रहा है। वो बोला-' उस समय आप यंग रहे होंगे। नई चीज खरीदने का उत्साह रहा होगा।'

मतलब उस युवा की नजर में अब हम युवा न रहे। 'मार्गदर्शक मंडल' के आइटम हो गए। मन किया कि उसको परसाई घराने की यौवन की परिभाषा सुना दें:

"यौवन सिर्फ काले बालों का नाम नहीं है।यौवन नविन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तत्परता का नाम है; यौवन लीक से बच निकलने की इच्छा का नाम है। और सबसे ऊपर बेहिचक बेबकूफी करने का नाम यौवन है।"

प्रतापगढ़ निवासी हैं दोनों उम्र 80 के करीब
और कुछ हो न हो लेकिन 'बेहिचक बेवकूफी' करने की सहज इच्छा के चलते लगता है कि अपन चिर युवा रहेंगे।
चाय पीकर देखा सूरज भाई पेड़ों की आड़ से रोशनी की सर्च लाइट मार रहे थे। सड़क की दांयी और दिखे सूरज। भाई। मन किया उनको दक्षिणपंथी कह दें। लेकिन फिर नहीं कहा। कोई राजनीति का आरोप लगा देगा लफड़ा होगा।

बायां और दायां अब इतना राजनैतिक हो गया है कि बोलते हुए लगता है राजनीति की गली में घुस रहे हैं। क्या पता कल को कोई बाएं और दायें को भी राजनीतिक विचार धारा से जोड़ते हुए बताये--चौराहे से 'कम्युनिष्ट गली' में मुड़ जाइयेगा वहीं 'बुर्जुआ कोने' पर पहला ही मकान है अपना।

पुलिया पर एक बुजुर्ग मिले। बताये पुलिस विभाग से रिटायर हुये थे 94 में। प्रतापगढ़ के रहने वाले। वायरलेस विभाग में काम करते थे। कंचनपुर में उस समय घर ले लिये थे। फिर यहीं बस गए।

कई जगह सर्विस किये हैं मिश्रा जी। इंदौर, जगदलपुर, भोपाल, जबलपुर। बस्तर के बारे में बताया -'कुछ नहीं बदला वहां। औरतें अभी भी खड़े-खड़े पेशाब करती हैं। आदिवासी लोगों का ईसाईकरण हो रहा है।'

उम्र के अस्सीवें साल में पहुंचे मिश्र जी का स्वास्थ्य अभी भी टनाटन लग रहा था। कहा तो बोले- 'अब कमजोरी लगती है। डायबिटीज़ है 20 साल से। परहेज करते हैं पर उठने-बैठने में तकलीफ होने लगी है। पर जब रिटायर हुए थे तब एक भी बाल सफेद नहीँ हुआ था। बल्कि हमारे अधिकारी बोले, मिश्रा जी हमारे हाथ में होता तो हम आपको दुबारा नौकरी पर रख लेते।'

उसी समय जीसीएफ से रिटायर एक और साथी आ गए वहां। पता चला कि वो भी प्रतापगढ़ के रहने वाले हैं।प्रतापगढ़ से रामफल की बात चली। वह भी प्रतापगढ़ के रहने वाले थे। मिश्रा जी ने बताया-'उस दिन जब हम वोट डाल कर आये तो घर के बाहर ही बैठा था। पसीना-पसीना हो रहा था। और खत्म हो गया। जब भी बात होती थी कहता था, बाबूजी बाजार बहुत टाइट चल रहा है।'


छिउलिया (टेसू) होली के लिए तैयार
उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से लोग रहते हैं कंचनपुर में। पहले लोग यहां जमीन/मकान खरीदते थे। रहते थे। नौकरी खत्म होने के बाद जाते समय बेच देते थे। अब लोग बेचते नहीं यहीं बस जाते हैं।

साइकिल से हमको चलते देखकर बहुत ख़ुशी जाहिर की मिश्र जी ने। बोले-'अब लोग चलते नहीं साइकिल से। हमारा बस चले तो साईकल को कम्पलसरी सवारी कर दें।'

मेस की तरफ लौटते हुए देखा कि सामने पेड़ में लाल रंग के फूल खिले हुए थे। कायनात अपने को होली के लिए तैयार कर रही है। यहां लोग इसको छिउलिया कहते हैं।

अभी जब हम यह लिख रहे थे तो सूरज भाई बाहर से हमको लिखते और चाय पीते देख रहे थे। हमको अकेले चाय पीते देखकर अंदर घुस आये और भन्नाते हुए बोले-' अकेले-अकेले चाय पी रहे हो।' हम कुछ जबाब दें तब तक वो थर्मस की चाय कप में उड़ेलकर साथ में पीने लगे। चाय पीते ही उनकी भन्नाहट गायब हो गयी और मुस्कान उनके चेहरे पर फ़ैल गयी।
लगा अब सही में सुबह हो गयी।


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Tuesday, March 01, 2016

आगे बढ़ते जाना ही जिन्दगी है


सूरज भाई  झील के पानी पर  अपना अंगौछा धर दिए
आज सुबह मेस से निकलते ही बाहर दो महिलायें तेज चाल से जाती हुई दिखीं। शायद टहलकर वापस लौट रही हों। अंधेरा और उजाला बराबर सा था। एक महिला सडक से नीचे उतरकर ’गठरी’ से नीचे बैठी हुई थी। आगे बढने से पहले हमें याद आया कि मोबाइल तो कमरे में ही छूट गया। हम वापस लौटे। मोबाइल धरा जेब में और प्रात:कालीन सैर के लिये गम्यमान हुये।

एक लड़का सड़क पर टहलता हुआ आता दिखा। उसके हाथ जेब में थे। शायद सर्दी के कारण। लेकिन हमको लगा कि उसके हाथ सरकार के हाथ हैं जो उसकी जेब में जो भी होगा, निकाल लेंगे। हमें यह सोचने का कारण भी समझ में आ गया। सरकार ने प्राविडेंट फ़न्ड के पैसे पर भी टैक्स लगा दिया है। इसको सही ठहराते हुये कल किसी ने बताया कि लोग अपने प्रावीडेंट फ़ंड का उपयोग इन्वेस्टमेंट में करते हैं इसलिये यह टैक्स लगाया गया।
हमने उसी समय याद किया था कब-कब हमने पैसे निकाले। हमने आज तक पैसे बहन/भतीजी की शादी के लिये, कार लिये, बच्चे की फ़ीस भरने के लिये या फ़िर कोई उधार चुकाने के लिये निकाले। अब फ़िर बच्चे की फ़ीस भरनी है दो महीने बाद। क्या इस बार टैक्स लगेगा? वैसे देखा जाये तो यह भी तो इन्वेस्टमेंट ही है !

एक लड़की टहलती हुई जोर-जोर से अपनी साथ की महिला को बता रही थी- ’आंटी हम उठ तो बहुत जल्दी ही गये थे लेकिन निकलने में देर हो गयी।’ एक लड़की गले में टुपट्टा डाले शाल ओढे महिला के साथ तेज-तेज टहलती हुई जा रही थी।


आम आदमी की बतकही -जनता तो फुटबाल है
हम राबर्टसन लेक देखते हुये गये। सूरज भाई भी निकले नहीं थे अभी। लेकिन उसके आगमन की सूचना देते हुये बादल ललछौंहा सा दिख रहा था। उसकी छाया झील के पानी में पड़ रही थी। ऐसा लग रहा था मानो सूरज ने अपना अंगौछा और मफ़लर दोनों एक साथ झील के पानी में धरकर अपना कब्जा जमा लिया हो पहले से ही कि जब भी वो आयेगा तब यहां बैठेगा। पक्षी भी अभी तक आये नहीं थे।

रास्ते में दो सुअर एक-दूसरे को पिछियाते हुये दिखे। क्या पता अपने समाज में वे एक-दूसरे की विरोधी पार्टी में हों और उनके यहां भी कोई बजट-शजट पेश हुआ हो कोई और उनके प्रवक्ता आपस में बहस करते हुये एक दूसरे का तगड़ा विरोध कर रहे हों। इसी प्रक्रिया में एक-दूसरे को थूथनियाते हुये, धौल-धप्पा करते हुये दौड़ा रहे हों।

रांझी मोड़ पर एक पुलिस वाले भाई जी टाइगर वाहन के बाहर अकेला खड़ा अपने सर पर हाथ फ़ेर रहे थे। लग रहा था खुद ही खुद को दुआयें दे रहे हों-’ सलामत रहो, आबाद रहो।’

चाय की दुकान पर अखबार पढ़ते हुये चाय पीने लगे। बजट के समर्थन और विरोध में बयान थे। चाय की दुकान से थोड़ी ही दूर पर कुछ लोग एक तसले में लकड़ी सुलगाये आग तापते हुये बतिया रहे थे। एक ने कहा -’लगता है सर्दी अब होली के साथ ही जायेगी। होली तक ऐसे ही आती-जाती रहेगी।’

दूसरे ने घर-घर मदिरालय बन जाने की बात कहते हुये सूचित किया कि अब सरकार ने सुविधा दे दी है कि मुंह खोलते ही पीने लगो। हमने कहा - ऐसा क्या? वह बोला- ’हौ, तब क्या? सुबह से ही लोग खटखटाने लगते हैं और चढ़ाने लगते हैं। ’ एक घर की तरफ़ इशारा करते हुये बताया -’ वहां सुबह-शाम बैठकी चलती है। जुआ भी चलता है। पत्ते खेलते देखते हैं तो अपन भी खड़े हो जाते हैं जाकर।’


सूरज भाई अपने डुप्लीकेट के साथ
इसके बाद बात फ़्रीडम मोबाइल की होने लगी। एक ने बताया - ’अरे वो वाला मोबाइल जिसमें बात करते हुये फ़ोटू भी दिखती है। 5000 का आता है आजकल। 5 लाख लोगों ने बुक किये हैं। अपने ने भी बुक किया है। गौरमेंट पीछे पड़ गयी है कम्पनी के। दिला के मानेगी मोबाइल। नहीं देंगे तो बंद कर देगी तबेले में। गौरमेंट को चूतिया नहीं बना सकते।’

फ़िर पता नहीं कहां से जनता की बात भी होने लगी। एक ने कहा- ’जनता तो फ़ुटबाल की तरह है। गौरमेंन्ट एक किक मारती है जनता उधर गिरती है। उधर से भी एक किक पड़ती है जनता बेचारी और कहीं गिरती है। लेकिन गौरमेंट भी का करे? उसको भी तो चलाना है न । यह सब करना पड़ता है। पर गरीब आदमी की मरन है।’
एक बोला- ’गरीब आजकल वही है जो काम नहीं करना चाहता है। काम करने वाले के लिये पचास काम हैं।’
दूसरे ने डपट दिया उसे और कहा-’ लौंडे काम पर लग गये इसई लाने ऐसी छांट रहे बातें। बताओ उसका दद्दा कौन काम करेगा अब? घर भर का कमाई का सहारा था वो!’

पता चला कि ड्राइवर की बात हो रही थी जो अपने परिवार में एक मात्र कमाने वाला था। उसको लकवा मार गया। इससे उसके परिवार में भुखमरी का संकट हो गया है।

उसके बारे में और बाते हुईं फ़िर-’ भला आदमी है। नेक इंसान। कभी-कभी मदद करके मुफ़्त भी सामान ढो देता था। लेकिन बीपी के चलते लकवा मार गया। आधा शरीर झूल गया। बीपी बड़ी खतरनाक बीमारी है।’


रास्ता ही मंजिल है का सन्देश देती जोंक
लौटते हुये देखा कि रांझी मोड़ पर पुलिस वाले भाई उसी तरह खड़े अपने सर पर फ़ेर रहे थे। अभी तक अकेले थे। हम उसके पास गये। बातचीत की कुछ देर। पता लगा ’प्रभात गस्त’ पर निकले हैं। साथ के लोग आने वाले हैं। गाड़ियां नई खरीदी गयीं हैं गस्त के लिये।

हमने उसने पूछा कि जब मैं इधर से गया था भी आप सर पर हाथ फ़ेरते दिखाई दिये। अभी भी लगातार सर पर हाथ फ़ेर रहे हैं। कोई तकलीफ़ है सर में या बाल छोटे ज्यादा हो गये उसका अफ़सोस मना रहे हैं।

भाई जी मुस्कराये पर कुछ बोले नहीं। लेकिन उनके सर पर बीच के बाल काफ़ी कम से थे। सफ़ेद हो गये बाल बीच में कम थे तो सहलाते हुये उनको शायद सांत्वना सी दे रहे हों या फ़िर किनारे के बालों को फ़ुसलाकर बीच में लाने के लिये पटा रहे हों यह सोचते हुये कि ये बीच में आ जायें तो ’सबका साथ , सबका विकास’ टाइप हो जाये सर के बालों में।


मोड़ पर ही एक कूड़े का वाहन पंक्चर खड़ा था। चार लोग मिलकर पहिया बदल रहे थे। इसके बाद कूड़ा भरने निकलें शायद।

लौटते में फ़िर झील के पानी पर सूरज भाई को देखते हुये आये। सूरज भाई पूरी तरह से चमक रहे थे। उनकी पूरी जवान परछाई झील के पानी में पड़ रही थी। ऐसा लग रहा था मानो उनकी ’अटेस्टेट फ़ोटोकाफ़ी’ झील के पास धरी हो। हो तो यह भी सकता है कि सूरज भाई वीआईपी हैं तो उनके कई डुप्लीेकेट साथ चलते हों। झील के पानी वाला सूरज उनका कोई डुप्लीकेट हो।

झील के किनारे ही एक जोंक मिट्टी में सरकती जा रही थी। बहुत-बहुत धीमी गति से। लेकिन जहां जा रही थी रास्ते में अपने निशान छोड़ती जा रही थी। यह भी सोचने की बात है कि वह जोंक अकेली थी। मंजिल कहां है कुछ पता नहीं उसको लेकिन वह आगे जा रही है। शायद वह भी मानती हो कि - ’रास्ता ही मंजिल है। आगे बढ़ते जाना ही जिन्दगी है।’

नहीं क्या ?

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याददाश्त बढ़ाने का तरीका



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