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| सूरज की अगवानी को तैयार तालाब |
आज सुबह जब साईकल स्टार्ट किये तो सुबह अभी हुई नहीं थी। अँधेरा पूरी
तरह छंटा नहीं था। पेड़ चुपचाप खड़े थे। गोया वे अँधेरे और उजाले की जंग
निर्लिप्त भाव से देख रहे थे। जो जीतेगा उसके पक्ष में हिलते-डुलते, पत्तों
के चंवर डुलाते वंदना शुरू कर देंगे।
फैक्ट्री के सामने की चाय की दुकान खुल गयी थी। ऍफ़ एम रेडियो पर गाना बज रहा था:
'इस जग में मेरा कोई नहीं
जाऊं तो बोलो जाऊं किधर'
पर हमारी ऐसी कोई समस्या नहीं थी। हम आगे निकल लिए।
एक आदमी ने साईकल सड़क पर खड़ी की और सड़क किनारे पड़ी बेंच पर पीठ के बल लेट
गया। शवासन मुद्रा में। हाथ ऊपर कर लिए।मानों ऊपर से कुछ गिरेगा तो कैच कर
लेगा।
सरदार जी जेब में मोबाईल धरे तेज चाल से चले जा रहे थे। उनके
पीछे तीन लड़कियां टहलती हुई चली जा रहीं थी। मन किया उनसे पूछेँ कि कल
महिला दिवस कैसे मनाया? लेकिन फिर नहीँ पूछा। क्या पता वे कह दें -' हम
महिला नहीं हैं। हम लड़की हैं।' या फिर यह ही कह दें- ' आपसे क्या मतलब?
माइंड योर बिजनेस! ' :)
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| सूरज उगता लाल है लेकिन फोटो में पीला हो गया |
तालाब की तरफ गए। सूरज भाई अभी निकले नहीँ थे लेकिन चिड़ियाँ चहचहाते हुए
उनकी वंदना का अभ्यास करने लगीं थीं। हरेक अलग-अलग तरह से हल्ला मचाते हुए
सूरज भाई की वन्दना का रियाज कर रहा था। तालाब पर एक अपने पंख फड़फड़ाते हुये
मानों कह रही हो:
'वन्दना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो।'
आगे एक लड़की आदमी के साथ-साथ टहलती दिखी। लड़की अपने हाथ तेजी से
दायें-बाएं कर रही थी। आदमी के हाथ आगे-पीछे ही हो रहे थे।लग रहा था कि
पीटी कर रहा हो।
एक युवा तेजी से भागता आ रहा था। सड़क पर इतनी जोर
से पैर पटकते हुए दौड़ रहा था कि अगर कोई नाजुक मिजाज सड़क होती तो मारे
संकोच के धसक जाती।
रांझी मोड़ से तालाब की तरफ गए। एक लड़की अपने
कुत्ते को टहला रही थी। दूर से कुत्ते की जंजीर दिखाई नहीं दे रही थी। जैसे
कई धाकड़ भाषण देने वालों के प्रांप्टर जनता को दिखाई नहीँ देते और जनता
समझती है कि बिना पढ़े धाँसू भाषण दे रहा है, धुंआधार। पास से दिखी जंजीर।
पतली जैसे ट्रेन में सूटकेस बाँधने वाली होती है।
तालाब किनारे सूरज
भाई दिखे। एकदम लाल। मानों सुबह-सुबह लाल सलाम कर रहे हों। लेकिन जब फोटो
खींचा तो उनका रंग पीला पड़ गया था। लगता है उनको भी डर हो कि अगर फेसबुक पर
अपने असली रंग में पोस्ट किये गए तो लोग गरियायेंगे कि ये सूरज भाई भी जे
एन यू वालों के साथ लग लिए।
चिड़ियों के झुण्ड के झुण्ड सूरज के
आसपास चककर काटते हुए चहचहा रहे थे। सब यही सोच रहे थे कि सूरज के साथ
सेल्फी हो जाए फिर दिन भर लोगों को दिखाते हुए हवा पानी मारेंगे।
'तालाब खेलने' वाले अभी आये नहीं थे।सिर्फ एक आदमी अपनी मोपेड पर आया था।
उसने कमीज उतारकर झोले में डाली और कन्धे पर 'ट्यूब डोंगी' लादकर तालाब
किनारे 'रेडी टु मूव' पोजीशन में धर ली।
सड़क पर पांच-छह भैंसे
अधमुंदी आँखे लिए बीच सड़क से कुछ किनारे बायीं तरफ पगुराती हुई जा रहीं
थीं। उनके पीछे एक आदमी एक पुड़िया से तम्बाकू निकाल कर हथेली में धरकर
रगड़ता हुआ चला जा रहा था।
एक आदमी सड़क पर आँख मलता खड़ा हुआ था। आँख
इतनी तेजी से मल रहा था वह गोया पलकों पर गुस्सा उतार रहा हो कि इतनी जल्दी
क्यों खुल गयीं।या शायद देरी से खुलने पर गुस्सा उतार रहा हो।
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| सब उगते सूरज को सलाम करने लगे |
रांझी थाने के बगल की चाय की दुकान पर पहुंचे तो एक बुजुर्ग ने अपना चाय का
ग्लास हमको जबरदस्ती थमा दिया। चेहरा जाना पहचाना लगा। लेकिन नाम याद नहीं
आया। लेकिन जैसे ही बतियाना शुरू किये तो याद आया -'ये तो छट्ठू सिंह
हैं।'
कोई बात चली तो छट्ठू सिंह ने अपना एक किस्सा सुनाया
-"कलकत्ते में एक बार घर का बल्ब फ्यूज हो गया तो हम बगल के कारखाने में
घुसकर निकाल लाये। तीन महीने बाद फिर फ्यूज हो गया तो एक बिजली के खम्भे पर
चढ़ गए। मारा झटका तो गिरे आकर नीचे लोहे पर। जांघ में घुस गया लोहा। दरबान
आया और पूछा -'क्या कर रहे थे यहां?' हम उसको बोले-'देख रहे थे कि दरबान
ड्यूटी पर तैनात है कि नहीं।' " बताते हुए हंसने लगे छट्ठू सिंह।
'कितने दिन में ठीक हुई चोट?' हमारे पूछने पर बोले-'दस दिन लग गए घाव भरने में।'
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| छट्ठू सिंह चाय की दुकान पर। पीछे मिश्रा जी |
छट्ठू सिंह के सारे दांत गायब हैं इसलिए उनकी आधी आवाज से ज्यादा आवाज
हमारे कान तक पहुंचने के पहले ही हवा में गोल हो जा रही थी जैसे जन कल्याण
योजनाओं का बड़ा हिस्सा जनता के पास पहुँचने के पहले ही गायब हो जाता है।
हमने छट्ठू सिंह से कहा-'दांत लगवा लो। अच्छा रहेगा। स्मार्ट लगोगे। चकाचक।'
छट्ठू सिंह ने बताया कि बताया कि डॉक्टर को दिखाया था। बोला -'मसूढ़े काटने पड़ेंगे।हम नहीं लगवाये।'
हमने कहा लगवा लो। पैसा हम दे देंगे।
इस पर छट्ठू सिंह बोले-'आप कह दिए हम समझ लिए लग गए दांत। अब बुढ़ापे में
क्या करेंगे। सन् 1935 की पैदाइश है। हमारे साथ के खेले, खाये 300-400 लोग
हमारे देखते-देखते चले गए। अब तो:
सदा भवानी दाहिनी सन्मुख रहें गणेश
पांच देव रक्षा करें, ब्रह्मा, विष्णु, महेश।
इसके बाद वहीँ चाय की दुकान पर देवी भजन सुनाने लगे:
'अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।'
हमने उनका भजन गाते हुए वीडियो बनाया। चलते समय हमने कहा -'आओ चलो बैठो
पीछे चलते हैं।' छट्ठू सिंह बैठ गए पीछे कैरियर पर। हम 100 मीटर करीब चले।
देखा हवा बहुत कम थी दो लोगों के लिए। सुबह कोई था नहीं हवा वाला। रिम
हिलने लगा तो छट्ठू सिंह उतर गए। फिर हम चले आये।
रास्ते में टेसू के
फूल मिले, सूरज भाई खिले हुए मिले। पुलिया बैठे दो बुजुर्ग मिले। हम साईकल
मोड़कर उनसे बतियाये और कहा-'आइये आपको चाय पिलाते हैं मेस में।'
वो बोले-' आपसे बातचीत हो गयी बस यही बहुत है। हम आपका इंतजार कर रहे थे।'
कमरे पर आकर सोचा कि एक दिन उन सब लोगों को इकट्ठा किया जाए जिनसे अलग-अलग मोड़ पर बात होती है और सबके अनुभव एक साथ सुने जाएँ।
यह सोचने के साथ ही बाहर देखा। सूरज भाई मुस्करा रहे थे। मानों कह रहे हों-'यू आर क्रेजी।'
सूरज भाई की मुस्कान देखकर लगा -'सुबह हो गयी।'
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