Friday, February 26, 2016

दिल में किसी का प्यार बसाना अच्छा है


समीर यादव स्कूल जाते हुए
आज सुबह साईकल स्टार्ट की और निकल ही पड़े। मेस के बाहर लोग लपकते हुए टहल रहे थे। जितनी तेजी से लोग जाते दिख रहे थे उससे भी ज्यादा तेजी से आते दिखे। कुछ ऐसे ही जैसे जितनी तेजी से अपने यहां विकास होता है उससे भी ज्यादा तेजी से कुछ लोग विनाश करके हिसाब बराबर कर देते हैं।

हो सकता है विनाश करने वालों की मंशा विकास करने वालों को रोजगार देना हो। पुराने जमाने में कुछ प्रजा वत्सल राजा अकाल के समय दिन में निर्माण कराते थे। मजदूरों को निर्माण की मजूरी देते थे। रात को अगले दिन बने हुए को गिरवा देते थे। उसकी भी मजदूरी देते थे। इससे अकाल के समय प्रजा का पेट पलता थी। आजकल अकाल नहीं पड़ा लेकिन दिमाग में अकल का अकाल तो पड़ा ही है।

फैक्ट्री के पास चाय की दुकान पर केंद्रीय विद्यालय के समीर यादव से मुलाक़ात हुई। कक्षा 8 में पढ़ते हैं। साईकल पर स्कूल जा रहे थे। बीच में टॉफ़ी खरीदने के लिए रुके थे। 5 रूपये की टॉफ़ी खरीदी। एक मुंह में डाली। छिलका डस्ट बिन में फेंका। बाकी बोले दोस्तों को खिलाएंगे।

दोस्त लोग भी कुछ-कुछ लाते हैं। कोई आइसक्रीम तो कोई कुछ और। सब मिलकर खाते हैं। स्कूल में फ़ुटबाल खेलते हैं। पहले क्रिकेट भी खेलते थे। लेकिन फिर बैट टूट गया। एक खो गया। स्कूल से मिलता नहीं। अब फ़ुटबाल खेलते हैं।


सूरज भाई रॉबर्टसन झील में नहाते हुए
गणित अच्छा लगता है। सोशल खराब। आगे चलकर बायो लेने की सोचते हैं। हमने पूछा-'जब गणित अच्छा लगता है तो उसको छोड़कर बायो क्यों लोगे? बोले--'देखेंगे, हाई स्कूल के बाद तय करेंगे।जैसे नंबर आएंगे वैसा करेंगे।'

पापा जीसीएफ में वेल्डर हैं। हमने पूछा -'वेल्डिंग पता है कैसे करते हैं।' पता नहीं था उसको। हमने बताया कि वेल्डिंग में जोड़ने का काम होता है। उदाहरण देकर समझाया।

वेल्डिंग रॉड अपना अस्तित्व खत्म करके दो समान, आसमान टुकड़ों को जोड़ने का काम करती है। ऐसे ही समाज में भी तमाम लोग जोड़ने का काम करते हैं। लेकिन हमको दीखते नहीं। हमको तो सिर्फ तोड़ने वाले दीखते हैं। जोड़ने वाले शायद इसलिए नहीं दीखते क्योंकि उनका अस्तित्व जोड़ने में ही खत्म हो जाता है-वेल्डिंग रॉड की तरह।

पापा कभी-कभी पिटाई भी कर देते हैं। साल में एकाध बार। पिटाई खेलकर घर लेट आने पर ही होती है। लेकिन घंटे-दो घण्टे में कुछ सामान लाकर मना भी लेते हैं।


होमवर्क करती हुई दीपा
फेसबुक खाता है समीर का लेकिन फोन पापा के पास रहता । एक बार स्कूल ले गये फोन तो स्कूल वालों ने जब्त कर लिया। एक महीने बाद दिया। अभी तो परीक्षाएं चल रही हैं इसलिए फोन बन्द।

स्कूल तक हम लोग साथ गए। फिर समीर स्कूल चले गए। हम आगे बढ़ गए।

रॉबर्टसन लेक देखी। सूरज भाई झील में नहा रहे थे।पूरी झील चमक रही थी। पानी ख़ुशी के मारे इठला रहा था। लहरें इधर से उधर और फिर उधर से इधर भागती हुई बनी बावली घूम रही थी। किरणों की संगत में उनकी खूबसुरती कई गुनी बढ़ गयी थी। ऊपर तारों पर बैठे पक्षी सब कुछ कौतुक भाव से निहार रहे थे। हमको देखकर सूरज भाई जोर से चहके। झील का पानी और चमक गया।

पास ही एक आदमी बेर के पेड़ से गिरे हुए बेर बीन रहा था। तोड़ रहा होता तो शायद गाना बजने लगता:
'मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो
कहीं काँटा चुभ जाएगा।'
बेकरी की दुकान पर बिस्कुट लेने रुके। एफ एम पर गाना बज रहा था:

'दिल में किसी का प्यार बसाना अच्छा है
पर कभी-कभी।'

दीपा के पापा दीपा की चुटिया करते हुए
गाने में शमा, परवाना सब थे। सुबह-सुबह शमा परवाना सुनकर लगा कहीं रात तो नहीं हो गयी।लेकिन ऐसा था नहीं।

शोभापुर रेलवे क्रासिंग पर देखा ट्रेन बहुत तेज भागती चली जा रही थी। लगता है कल के बजट से उत्साहित होकर ख़ुशी जाहिर कर रही थी।

दीपा अकेली थी अपने टपरे पर। बैठी चाय पी रही थी। पापा कहीं गए थे। बोली-'कहां चले थे इत्ते दिन।' हमने बताया घर गए थे। बोली-'हम इतवार को आपके उधर गए थे। पूछा तो बताया कि ससुराल गए हैं।'

हमने पूछा-'स्कूल गयी थी? होमवर्क किया ? वह हाँ बोली तो हमने कहा दिखाओ। उसने दिखाया। अधूरा था। 'मैं गांधी बन जाऊं' कविता लिखनी थी। आधी लिखी थी। वहीं बैठकर हमने लिखवाई। 'च' को 'ज' लिखा था। 'चादर' को 'जादर'। ठीक कराया। और भी वर्तनी की गलतियां।

हल्के से लिखती है पेन्सिल से दीपा। बेमन से। जैसे सरकारी योजनाओं की घोषणा हो जाने पर सरकारी अमला बेमन से उनका क्रियान्वयन करता है। किसी तरह निपटाते हुए वैसे ही दीपा होमवर्क करती है। हमने बैठकर कविता पूरी करवाई।

दीपा के पापा आ गए। स्कूल जाने के लिए बिटिया की चुटिया बनाई। बताया कि दो दिन से स्कूल नहीं जा रही दीपा। उसके जूते कहीं खो गए हैं। पापा कहते हैं कहीं भूल गयी। दीपा कहती है घर से कोई ले गया। अब 'फटका' तो लगा नहीँ घर में।लगा होता तो कोई न ले जा पाता। स्कूल में डांट पड़ेगी। 120 रूपये में आएंगे जूते।
हमको अपने साथ कक्षा 1 में पढ़ने वाला साथी मोतीलाल याद आया। वह पढ़ने में अच्छा था। उसके पिता शायद रिक्शा चलाते थे। नंगे पाँव आता था। लेकिन तब गुरूजी इस बात के लिए डांटते नहीं थे। वह सरकारी स्कूल था। टाट पट्टी वाले स्कूल। सरकारी स्कूल में गरीब अमीर बच्चे एक साथ पढ़ते थे। सम्पन्न बच्चों को भी गरीब बच्चों के साथ रहकर उनके बारे में जानकारी रहती थी।अब स्कूल लोगों की आर्थिक हैसियत के हिसाब से अलग-अलग हो गए हैं। Sharad

लौटते में देखा एक आदमी अपने कुत्ते को टहला रहा था। कुत्ता जबर था। वह आदमी को अपने हिसाब से घसीट रहा था। लग रहा था कि कुत्ता आदमी को टहला रहा था।

वैसे यह हर जगह हो रहा है अब। पालतू कुत्ते मालिकों को टहला रहे हैं। मालिक इसी में खुश कि कुत्ते की जंजीर उसके हाथ में हैं। कुत्ते जबर हो रहे हैं।

सुबह भी हो ही गयी।


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