Monday, February 01, 2016

पुलिया पर दुनिया

मैं जब तब अभी तक की अपनी एकमात्र किताब ’पुलिया पर दुनिया’ के बारे में लोगों को बताता रहता हूं। जहां कहीं जाता हूं तो अपनी किताब की प्रति साथ ले जाता हूं। इष्ट-मित्रों को दिखाता और पूछता हूं -"कैसी लगी किताब?"

ज्यादातर लोग प्रोत्साहन के लिहाज से कह देते हैं- बहुत अच्छी है, अभिनव प्रयोग है, ऐसा लेखन कम होता है। आदि-इत्यादि।"

इस तरह की प्रसंशात्मक टिप्पणियों से मन खुश हो जाता है।

आज मेरे एक अभिन्न मित्र से मेरी मुलाकात हुई तो मैंने आदतन अपनी किताब उनको दिखाई और पूछा - "कैसी लगी किताब?"

मैं यह बात भूल गया था कि उन मित्र को अपनी किताब के बारे में पहले भी बता चुका था और वे मेरे कई बार ध्यान दिलाये जाने पर आनलाइन संस्करण में 50/- खर्च करके किताब डाउनलोड करके पढ़ भले न चुके हों लेकिन देख चुके थे।

मित्र ने जो प्रतिक्रिया की वह पहले की प्रतिक्रियाओं से एकदम अलग थी। उसने कहा- " यार , तुम्हारी हरकतें तो उस बुजुर्ग महिला सरीखी हैं जो षोडसी कन्या की तरह साज-सिंगार करके हर आने-जाने वालों से पूछती है- बताओ मैं कैसी लग रही हूं। "

हमें झटका लगा। लेकिन बात सच भी थी इस लिये कुछ कह भी नहीं सकते थे इसलिये चुप हो गये। मित्र ने यह सोचकर कि हमें कहीं ज्यादा बुरा न लग जाये समझाते हुये कहा-" तुमने किताब लिख दी। तुम्हारा काम खतम। अब पाठक खुद बतायेगा कैसी है किताब। हर पोस्ट लिखने के बात क्या सबसे पूछते हो -कैसी है पोस्ट! "

इसके बाद और खुश करने के लिये कह भी दिया-" किताब बढिया है। अब अगली भी जल्दी से लिखो।"
हमें समझ नहीं आया कि षोडसी कन्या की तरह लजा जायें या 'साठसी' महिला की तरह कहें - ' चल हट , तेरी मजाक की आदत अभी गयी नहीं।  :)

वैसे ’पुलिया पर दुनिया’ खरीदनी हो तो आनलाइन लिंक यह है। खरीदिये, पढिये और बताइये कैसी लगी किताब ! :)
http://www.bookstore.onlinegatha.com/…/पुलिया-पर-दुनिया-.ht…

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