Tuesday, May 24, 2016

पानी के साथ आंधी फ्री

कल सूरज भाई से जरा गर्मी की शिकायत क्या कर दी बड़ी जोर भन्ना गए। शाम को घर पहुँचते हुए सागर को कान पकड़कर साथ ले गए होंगे। भरी होगी पिचकारी पानी की बादलों में और रात होते-होते झमाझम बरसा दिया पानी।

इतनी तेज बरसाया पानी कि हुलिया टाइट कर दी सबकी। पानी के साथ आंधी फ्री। अब पेड़ आंधी के लिए तो तैयार नहीँ थे। आंधी आई तो हड़बड़ा गए। किसी की हड्डी टूटी तो किसी की पसली। किसी की
कमर ही लचक गयी। कई बूढ़े पेड़ तो भरभरा के जहाँ थे वहीँ बैठ गए। कोई बिल्डिंग पर गिरा तो कोई सड़क पर।

एक पेड़ तो बेचारा बीच सड़क पर बैठ गया। जड़ से उखड़कर साष्टांग करने लगा आंधी महारानी को। आंधी महारानी फिर भी मानी नहीं। उसकी पीठ पर तेज हवा के कोड़े बरसाती रहीं।

आंधी के चक्कर में कई पेड़ सहारे के लिए बिजली और टेलिफोनों के तारों पर टिक गए। अब तार में कहां इतना दम कि पेड़ का वजन उठा ले। पेड़ के चलते तार भी टूट गए। टूट क्या गये समझ लो लचक गये। जैसे मुगलेआजम  पिच्चर में अनारकली मारे डर के कुर्ते को पकड़कर झूल जाती है और फिर कुर्ता चर्र देना फट जाता है वैसे ही पेड़ जब बिजली के तार पर टिका तो तार भी बेतार हो गया।

आंधी-पानी के हल्ले-गुल्ले में बिजली गुल हो गयी। अँधेरे ने सब तरफ कब्ज़ा कर लिया। हवा भी सांय-सांय करने लगी।

सुबह जब जगे तो सब तरफ पेड़ों की टूटी टहनियां पड़ी थीं। पूरी सड़क पर पत्तियों की लाशें पड़ी थी।जगह-जगह जाम लगा हुआ था। एक जगह पूरा पेड़ पूरी सड़क को घेरे धराशायी हुआ पड़ा था। हमने पहले तो सोचा गाडी मोड़कर दूसरी तरफ़ से निकल लें लेकिन फिर सोचा क्या पता वहां दूसरा पेड़ गिरा हो। हमने गाड़ी फुटपाथ पर चढ़ाकर पेड़ के बगल से निकाल ली। हमारी देखादेखी और लोगों ने भी ऐसे ही गाड़ी निकली। फुटपाथ सड़क हो गयी।

आगे ओवरब्रिज पर लोहे की आधी से ज्यादा बैरिकटिंग सड़क पर फर्शी सलाम मुद्रा में जमीन पर लुढ़की थी। बाकी जो खड़ी थी वह भी लग रहा था अब गिरी तब गिरी।

सामने सूरज भाई एकदम मूछों पर गर्मी का ताव देते हुए डटे हुए थे। हमसे पूछे-- हाउ डू यू डू? हम बोले--कुछ पूछो मत भाई। बहूत बवालिया हो आप।

सूरज भाई ठठाकर हंसे। शायद कहना चाह रहे हों--सुबह हो गयी।।

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