Saturday, May 07, 2016

उठो, चलो, दफ्तर के लिए तैयार हो

कल सुबह जब दफ्तर जा रहे थे तो आगे जाने वाले ऑटो पर लिखा मिला -'जय भोले नाथ की, चिंता नहीं किसी बात की।'

भोलेनाथ की जय के पहले जय माता दी और श्री बाला जी का जयकारा भी लगाया गया था। जिस टेम्पो पर तीन देवी/देवताओं की कृपा हो जाए उसको किस बात की चिंता। कलयुग में तो लोग निर्बल बाबा की कृपा के सहारे निकाल लेते हैं काम।


कल शाम को लौटते समय जरीब चौकी पर रेलवे क्रासिंग बन्द मिली। हम पीछे लग लिए लाइन में। सिपाही भाई ने हमको आगे बढ़ने का इशारा किया। हम बढ़ लिए। लेकिन और आगे जगह नहीं थी तो थम गए। उसने कहा -'आगे बढ़ते काहे नहीं।' हमने कहा-'जगह कहां है? क्रासिंग तो खुले।' 

बाद में पता चला कि उसने यह सोचकर हमसे आगे बढ़ने के लिए कहा था कि हम रावतपुर की तरफ जाएंगे। मेरे पीछे बस खड़ी थी जिसको रावतपुर की तरफ जाना था। उसी को निकालने के लिए सिपाही ने मुझे आगे निकलने को कहा था।

बहरहाल, जब क्रासिंग खुलने में समय लगा तो हमें लगा सिपाही की इच्छा का सम्मान किया जाए। आगे बढ़ लिए यह सोचकर कि गुमटी या मोतीझील क्रासिंग से निकल लेंगे। लेकिन वो क्रासिंग भी बंद मिलीं। फिर रावतपुर गोल चौराहे तक आ गए। वहां तमाम सारी फल की ठेलिया लगीं थीं। उतरकर फल खरीदे। खरबूजा 35 रूपये किलो। दो किलो तौलवा लिए। दो दिन पहले विजय नगर में 50 रूपये किलो खरीद चुके थे खरबूजा। बन्द क्रासिंग के चलते कल 30 रूपये बच गए।

फल खरीदने में बचत के अलावा दूसरा फायदा यह हुआ कि देर से पहुँचने के बावजूद शिकायत नहीं मिली। गृहस्थ जीवन का आजमाया हुआ फंडा है कि जब कभी देरी हो जाए तो थोड़ा देर और करके वो काम करके घर पहुंचा जाए जो आपसे कई दिन से कहा जा रहा था और जिनको आप कई दिनों से कर न पा रहे हों।

इसी फंडे को आगे बढ़ाते हुए कुछ और घर के काम किये गए। प्रेस वाले न कल नाइंसाफी की। हमारे पहुंचने के पहले ही कपड़े हमारे घर देने के लिए निकल चुका था वर्ना वो क्रेडिट भी हमारे खाते में आता।

आज सुबह फिर टहलना स्थगित रहा। बगीचे में पक्षी हल्ला मचाते हुए हमको बुलाते रहे लेकिन हम आराम से उनकी आवाज सुनकर अनसुना करते रहे। लेकिन अब सामने की घड़ी की बात कैसे अनदेखा करें। बता रही है कि उठो, चलो, दफ्तर के लिए तैयार हो।

चलते हैं फ़िलहाल। जल्दी ही मिलते हैं। ठीक न


 

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