Friday, May 13, 2016

व्यंग्यकार लोग बहुत जल्दी बुरा मान जाते हैं


कल दिल्ली आना हुआ। ठहरने की जगह दरियागंज के पास ही थी सो Sushil Siddharth जी से मिलने गए। उनके केबिन में पहुँचते ही चाय मंगा ली सुशील जी ने। बिस्कुट साथ में। पानी तो खैर पहुँचते ही पिला दिया उन्होंने।
हमने सुशील जी को बताया कि हम जबलपुर से कानपुर आ गए हैं तो सुशील जी ने कहा -'हाँ हमने देखा था। आपने फोटो लगाया था। कई सुंदर महिलाएं आपको छोड़ने आयीं थीं।' मतलब 'सुंदरता' को सुशील जी ध्यान से नोटिस करते हैं। 
बहुत दिनों से हम सुशील जी से कह रहे थे कि उनको अपने व्यंग्य लेखों के वीडियो बनाने चाहिये। लेकिन उनका कहना था कि उनको बनाना आता नहीं। हमने कहा था कि हम बता देंगे। कल मिलते ही हमने सबसे पहला काम यही किया और सुशील जी का जनसन्देश में छपा सबसे ताजा व्यंग्य लेख रिकार्ड करवाया।जितना किया, बढ़िया रिकार्ड किया। लेकिन इसके बाद उसको 'यू ट्यूब' में रिकार्ड करके बताने को हुए तब तक उनके फोन की बैटरी 'बोल' गयी। पर काम भर की जानकारी हो गयी। अब शायद सुशील जी जल्दी ही अपने व्यंग्य वीडियो अपलोड करना शुरू करें।
वैसे कहने को तो Alok Puranik भी कह चुके हैं कि वे व्यंग्य लेख रिकार्ड करेंगे। लेकिन कर नहीँ पाते। समय की कमी सब बड़े लेखकों के पास है। 
बातचीत के दौरान यह बात हुई कि हम लोग पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के मामले में अक्सर पूर्वाग्रह से प्रभावित होते हैं। जो लेखक मुझे पसंद होते हैं उनकी रचनाओं को हम अच्छी नजर से देखते हैं। उनका लिखे में हम अच्छाई खोज ही लेते हैं। इसका उलट भी सही होता ही होगा।
इस बीच संतोष त्रिवेदी भी धड़धड़ाते हुए पधारे। कोरम पूरा होते ही सुशील जी ने अपने बगल के चैंबर के साथी से फोटो खिंचवाया। जो फोटो अच्छी आईं उनको स्निग्ध भाव से निहारते हुए एक फोटो ऐसी खिंचवाई जिससे लगे कि हम लोग कोई गहन चर्चा कर रहे हों। पर जो फोटो आई उससे साफ़ लग रहा था कि ये चर्चा नहीँ कर रहे, फोटो खिंचा रहे हैं।
सन्तोष त्रिवेदी को जैसे ही फोटो उनके मोबाईल में मिली वैसे ही उन्होंने उसको फेसबुकिया दिया। शीर्षक दिया -'व्यंग्य की तिकड़ी गिरफ्तार।' हमने कहा -'तुमको लिखने में शब्दों का ख्याल रखना चाहिए। अब बताओ गिरफ्तारी दिखाओगे तो गिरफ्तार करने वाला भी तो होगा कोई। वह कहां हैं चर्चा में।' सुशील जी बोले -'ठीक बात।'
सुशील जी जब बोल दिए ठीक बात तो हमने लोहा गरम देखकर एक और हथौड़ा जड़ दिया -'संतोष त्रिवेदी अपने स्टेटस कई बार ऐसे लिखते हैं जैसे वो खुद के लिए लिख रहे हों। 'ओनली फॉर मी' मोड वाले लगते हैं।' सुशील जी फिर बोले -'ठीक बात।' सुशील जी जिस तरह से हमारी बात से सहमत हो रहे थे उससे मन किया और भी खूब सारी खिंचाई कर लें संतोष की, सुशील जी ' ठीक बात ' कहकर समर्थन करेंगे ही लेकिन फिर छोड़ दिए। संतोष भी अपनी खिंचाई के विरोध में डायलॉग बोलने लगे थे।
बतियाते हुए वहां अनुपस्थित लोगों की बुराई, भलाई और खिंचाई शुरू हुई। समय बहुत कम था फिर भी कई मित्रों की खिंचाई कर डाली हम लोगों ने। इस बीच संतोष ने जल्दी-जल्दी कुछ लेखकों के लेखन की बुराई की। बुराई को पक्का रंग देने के लिए यह भी कहा -'आदमी के तौर पर बहुत अच्छे हैं, पहले मैं उनका प्रसंशक था।' मतलब सिद्गान्त की बुराई है यह। उसूल की बात है। कोई जलन वाली बात नहीं।
बात होते-होते दफ्तर का समय हो गया सुशील जी का। हम लोग उनके दफ्तर से उठकर बाहर चाय की दुकान पर आ गए। फुटपाथ की चाय की दुकान पर जमीनी बुराई-भलाई हुईं। सुशील जी ने चाय वाले बच्चे से कहकर बढ़िया फोटो खिंचवाया। सुशील जी को फोटो खिंचवाना अच्छा लगता है। फोटो अच्छा लगता है तो और अच्छा लगता है।
इस बीच सुशील जी ने चर्चा के दौरान कहा कि व्यंग्यकार लोग बहुत जल्दी बुरा मान जाते हैं। संतोष जी ने बताया कि उनको किसने-किसने ब्लाक किया और उन्होंने किसको किया। संतोष ने व्यंग्य लेखन से जुड़ी सरोकारी चिंताओं को जितनी शिद्दत से जाहिर किया उससे लगा कि उनके स्लिम-ट्रिम होने का राज यही है कि वे व्यंग्य की चिंता में दुबले होते रहते हैं।
इस बीच सुशील जी के व्यंग्य संग्रह 'मालिश महापुराण' की समीक्षा की बात चली। हमने कहा -' जितनी समीक्षाएं इस व्यंग्य संग्रह की हुई हैं साल भर में उस लिहाज से तो यह गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में आना चाहिए। लेकिन गिनीज बुक वालों को कोई चिंता ही नहीँ।
संतोष त्रिवेदी के व्यंग्य संग्रह की भी बात चली। संतोष ने उसके खिलाफ कुछ डायलॉग मारा। मेरा मन किया कि उनकी बात का विरोध करें लेकिन कर नहीँ पाये क्योंकि चाय की दुकान पर भजिया के पैसे भी संतोष ने दिए थे। भजिया में नमक मिला था। अब संतोष का नमक खाया था तो विरोध कैसे करते। सहमत हो गए।
सुशील जी ने अपने व्यंग्य उपन्यास के पहले ड्राफ्ट लिख लेने की बात बताई। बड़ा धाँसू उपन्यास होगा ऐसा आभास हुआ बातचीत से। अगला व्यंग्य संग्रह भी आने वाला है जल्द ही।
बातचीत फिर हालिया सम्मान के बहाने व्यंग्य में राजनीति के बारे में हुई। हमारा कहना था कि राजनीति कहां नहीँ है। परसाई जी तो कहते थे कि जो कहता है कि वह राजनीति नहीं करता, वह सबसे बड़ी राजनीति करता है।
वैसे भी व्यंग्य की दुनिया में ले देकर तीन-चार ही संस्थाएं हैं जिनसे जुड़कर लोग आपस में मिल मिला लेते हैं। इनका भी विरोध करके बन्द करा देंगे इनको भी तो क्या मिलना-जुलना होगा। खराब लेखन की आलोचना करने वाले यह भी समझें कि हमारे समय के सबसे अच्छे व्यंग्यकार ज्ञान जी का साल भर में 500 किताबों एक संस्करण मुश्किल से निकलता है। तो जो खराब लिखने वाले हैं चाहे वो सपाटबयानी वाले लेखक हों या सरोकारी हल्ले वाले लेखक वो कम से कम अच्छे लेखक के आने तक मंच तो संभाले हुए हैं। जब अच्छे लेखक आएंगे तो छा जाएंगे।
बातें बहुत सारी हुईं। बातें करते हुए सुशील जी को उनके घर के लिए विदा करते हुए संतोष ने फाइनल सेल्फी ली। इसके बाद हम लोगों ने फिर से एक बार और चाय पी। संतोष ने पानी की बोतल भी ले ली। इस बार पैसे हमने दिए। रास्ते भर संतोष हमें उस बोतल से पानी पिलाते रहे ताकि बोतल से छुट्टी मिले।
आईटीओ से मेट्रो पकड़कर हम जनपथ उतरे। संतोष आगे चले गए।
अच्छा लगता है इस तरह मेल मुलाकात करना। आमने-सामने बुराई करके हाजमा दुरुस्त हो जाता है। तबियत झक्क हो जाती है। चेहरे पर रौनक आ जाती है। 'हंसता हुआ नूरानी' चेहरा वाला गाना याद आ जाता है। मुखमंडल कमल सा खिल जाता है। है कि नहीँ।
बहुत अच्छा लगा सुशील जी आपसे मिलकर । अब फटाक से अपना वीडियो बनाइये। संतोष जी व्यंग्य की चिंता में और दुबले मत होइए। थोड़ा मस्त रहिये और लिखना शुरू किये और हाँ स्टेटस 'ओनली फॉर मी' वाले मोड की बजाय पब्लिक ऑप्शन वाले लिखा करिये।
अपने बारे में कुछ नहीँ कहेंगे हम। वैसे कहने को मथुरा वाले शर्मा जी कह रहे थे कि फोटो में खूबसूरत नजर आ रहे हैं। इस फोटो को प्रोफाइल पिक्चर बनाइये।
मौज लेने का मौका कोई छोड़ता नहीँ है। 
(साल भर पहले की पोस्ट है। Sushil जी का व्यंग्य उपन्यास अभी पूरा होना है। व्यंग्य संग्रह आ गया। संतोष त्रिवेदी अब धड़धड़ाते हुए किताबघर नहीँ जा पाते। बाकी सब शायद यथावत है।  )

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