Sunday, April 15, 2018

शहर में इधर-उधर घूमते हुये


चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं और बच्चा
लूडो खेलता परिवार
कल पंकज बाजपेयी से मिलकर वापस लौटे अफ़ीमकोठी की तरफ़ से। सामने जो सड़क दिखी उसमें घुस गये। जगह-जगह चाय और रोजमर्रा के सामान की दुकानें। एक गाड़ी में तमाम मुर्गे फ़ड़फ़ड़ा रहे थे। मुर्गों के पंख पकड़कर लड़के गाड़ी से उतारकर पिंजड़ों में बंद कर रहे थे। पिंजरे में पहुंचकर मुर्गे शान्त होकर कुकडूंकूं टाइप करने लगे।
एक गली में घुस गये। मोहल्ले का नाम दिखा दलेलपुरवा। जिन्दगी में पहली बार इस मोहल्ले आये। ऐसा मेरे ख्याल से सबके साथ होता है। जिस शहर में जिन्दगी बिता दी उसके सब मोहल्ले नहीं घूमे होते हैं। सब सड़कें नहीं नापी होती हैं।
कई हफ़्तों से मैं सोच रहा हूं चमनगंज जाकर वहां की सड़क पर एकाध घंटे टहलूं। चाय-शाय पिऊं। लेकिन हर बार टलता जाता है मामला। सोचा तो यह भी था कि मोहल्लों के नाम जो हैं वो क्यों पडे इनके बारे में जाना जाये। अब यह काम हमारे नामराशि Anoop Shukla बढिया से कर सकते हैं। वे कानपुर के चलते-फ़िरते-टहलने इनसाक्लोपीडिया हैं। उनसे अनुरोध करेंगे कि वे सिलेसिलेबार मोहल्लों के नामकरण का इतिहास लिखें। इसकी फरमाइश बहुत पहले Indra Awasthi मुझसे कर चुके हैं।

बहरहाल कल मूलगंज की से गुजरते हुये चौराहे पर लोगों की भीड़ देखी। ये मजदूर थे जिनको रोजगार की तलाश थी। लोग मोलभाव करके उनमें से कुछ को अपने साथ ले जा रहे थे। मुझे अंसार कंबरी का यह शेर याद आया:
“अब तो बाजार में आ गये हैं कंबरी
अपनी कीमत को और हम कम क्या करें?”
एक आदमी अपने दोनो हाथ पीछे विश्राम की मुद्रा में बांधे लगातार चला रहा था। करीब आधा किलोमीटर उसके पीछे चलते हुये मैंने देखा कि उसके हाथ पीछे ही रहे। संतुलन बनाने के लिये वह गर्दन एक तरफ़ झुकाये हुये था। आगे चलते हुये गर्दन झुकाये हुये वह विश्राम मुद्रा में ही एक गली में गुम हो गया। उसके मुडने के पहले मन में आया कि कहीं से राष्टगान बज जाये तो शायद वह विश्राम से सावधान मुद्रा में आ जाये। लेकिन तब शायद हमको भी फ़टाक से गाड़ी से निकलकर बाहर आ जाना पड़ता। इसलिये लगा अच्छा ही हुआ कि कहीं राष्ट्रगान नहीं बजा।
चौराहे के आगे एक आदमी सड़क किनारे अपनी साइकिल धरे उसकी आड़ में अपने नोट गिन रहा था। कुछ देर में नोट गिनकर उसने अपने कुर्ते की जेब के हवाले किये और चल दिया। हम भी आगे बढे।
एक जगह एक लड़का ऊंघाया हुआ मुर्गा बेंच रहा था। हममें उसको कोई ग्राहक सा दिखा। वह चैतन्य सा हुआ। उसकी चैतन्यता की इज्जत रखते हुये हमने मुर्गे के गोस्त के दाम पूछ लिये। उसने बताये साठ रुपये किलो। यह भी बताया कि हर मुर्गा लगभग दो किलो का है मतलब 120/- रुपये का। हमको फ़ोकटिया समझकर वह बालक फ़िर ऊंघनें तल्लीन सा हो गया।
एक झोपड़ी के पास दो बच्चियां अपने भाईयों और शायद अपनी मां के साथ बैठी लूडो खेल रही थीं। हम कुछ देर उनको खड़े देखते रहे। बच्चियों की गोटियां खुल गयीं थी। आगे बढ रहीं थीं। बच्चे और उसकी मां का खाता खुला नहीं था। वे पांसे को बार-बार हिलाकर 'लूडो की पिच ' पर डाल रहे थे। जैसे ही उनका खाता खुला वे चहकने लगे। महिला के हंसते हुये 45 डिग्री ऊपर की तरफ़ उठे पीले दांत ऐसे लग रहे थे जैसे किसी पान की गुमटी का पल्ला ऊपर उठ गया हो। खाता खुल जाने के बाद वे सब फ़िर अपनी-अपनी गोटियों को आगे बढाने में लग गये। हम चल दिये।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं, साइकिल और बाहर
कल नुमाईश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान हूँ।
दोपहर को एक आदमी करेंट बुक डिपो के सामने सड़क पर दिखा। तिपहिया पर सो रहा था। कपड़े एकदम मैले। नाखून बढे। बिजली का एक गले में होल्डर माला की तरह पहने हुये। उसके पास कुछ देर तक खड़े रहे। बात करने की कोशिश की। लेकिन उसने कोई ’लिफ़्ट’ नहीं दी। हम दुष्यन्त कुमार का यह शेर दोहराते हुये आगे बढ गये:
"कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।"
घर से कुछ दूर जाने के लिये पैदल निकले। बाहर ही रिक्शे वाला मिल गया। हाथ में कुष्ठ रोग है। हाल-चाल बोहनी-बट्टा के बारे में पूछा तो बोला-’ दस रुपये कमाई हुई। 28 रुपये खर्च हो गये खाने-पीने नाश्ता करने में। हमने कहा -’तो अब यहां आराम काहे कर रहे। सड़क पर निकलो। कुछ सवारी मिलेंगी।’
बोला-’ आज छुट्टी का दिन सवारी नहीं मिलेंगी। स्कूल भी बन्द है।’
उसके सवारी न मिलने वाले दावे को खारिज करते हुये हमने पैदल जाना स्थगित कर दिया। खुद सवारी बन गये। वह लगभग बेमन से हमको लादे हुये चौराहे तक ले गया। हमने उसको उसको पैसे देकर कहा- ’थोड़ी देर रुको तो हम वापस चलेंगे। कोई और सवारी मिले तो चले जाना लेकर।’
लेकिन बुजुर्ग रिक्शेवाला किसी सवारी को लादने के मूड में नहीं था शायद। बोला -’अब वापस जाकर वहीं आराम करेंगे। यहां धूप बहुत है। ’
थोड़ी देर बाद वापस लौटकर देखकर कि बुजुर्ग रिक्शेवाला रिक्शे में गुड़ी-मुड़ी होकर सो रहा था। हालांकि सर्दी नहीं थी लेकिन जगह की कमी के कारण जिस तरह पैर को सिकोड़े सो रहा था मुझे दुष्यन्त कुमार का शेर याद आया:
न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और लोग बैठ रहे हैं
न हो कमीज तो पावों से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।
शाम को शहर में जाम टाइप लग गया था। फ़ूलबाग में अम्बेदकर जयन्ती कार्यक्रम हो रहा था। हमने स्मार्टनेस दिखाते हुये एक गली में गाड़ी धंसा दी। सोचा कि फ़ूलबाग चौराहे पर निकलेंगे जाकर। गली आगे जाते हुये संकरी होती गयी। कहीं-कहीं तो इतनी कि गाड़ी की चौड़ाई भर की जगह बमुश्किल बची थी।
उसी गली के दो छोर पर दो बच्चियां प्लास्टिक के रैकेट टाइप लिये खड़ी थीं। गाड़ियों की आवाजाही के बीच सड़क खाली होने का इंतजार करती हुई बैडमिंटन टाइप कुछ खेल रहीं थीं। हमारी भी गाड़ी जब आगे निकल गयी तो देखा कि वे खेलने में मशगूल हो गयीं थीं। गली से निकलती गाड़ियों से उनका खेल प्रभावित नहीं हो रहा था।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बाहर
ड्रम का रूप बदलते कामगार
आज एक जगह प्लास्टिक के तमाम ड्रम देखे। कोपरगंज में। केमिकल के ड्रम खाली होने के बाद पानी और दीगर सामान रखने के ड्र्मों में बदले जा रहे थे। एक लड़का ऊपर का ढक्कन आरी से काट रहा था। दूसरा छेद कर रहा था। तीसरा लड़का ढक्कन को लगाते हुये रिबेट लगा रहा था। हमने पास खड़े होकर उनसे बतियाने की कोशिश की। वे अपने काम में जुटे रहे। फ़िर हमने उनसे पूछा कि इन बने हुये ड्रमों की कीमत कितनी होती होगी? फ़िर अपनी तरफ़ से अनुमान उछाल दिया - ’100-200 रुपये।’
ड्रम की कीमत 100-200 रुपये सुनते ही तीनों काम छोड़कर एक साथ हंस दिये। एक ने कहा- ’सौ-दो सौ में तो आजकल बाल्टी तक नहीं आती।’ फ़िर बताया -’साढे आठ सौ में बिकता है यह ड्रम।’
अपने बेवकूफ़ी के अनुमान पर उनकी हंसी की याद करके लगा कि जब नेता गण जनसभाओं में पांच-दस साल में सबको अनाज देने और सबको घर देने के वादे करता होंगे तो जनता कैसे हंसती होगी।
ऊपर की बात से परसाईजी की रचना चूहा और मैं भी याद आई जिसमें एक चूहा परसाई जी परेशान करके अपने लिये खाना सुनिश्चित करता है और परसाई जी लिखते हैं:
"मगर मैं सोचता हूँ - आदमी क्याई चूहे से भी बदतर हो गया है? चूहा तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है, मेरी नींद हराम कर देता है।
इस देश का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?"
(लेख का लिंक कमेंट बाक्स में। यह मजे की बात कि बदलाव के लिये उकसाता यह लेख बाल साहित्य में संकलित है।)
यह किस्सा कल और आज की घुमाई का। बाकी का किस्सा फ़िर जल्ली ही। तब तक आप मजे कल्लें। ठीक न !

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Wednesday, April 11, 2018

भीगी हुई सुबह औऱ बच के चलता आदमी

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, मुस्कुराते लोग, स्टेज पर लोग, वृक्ष, आकाश, बाहर और प्रकृति
दुकान साफ करता बालक

आज सबेरे अलार्म बजने के पहले छत बजी। बारिश हो रही थी। हल्की बारिश मतलब बूंदा-बांदी। लोकतंत्र में सरकारें चुनाव के ऐन पहले कल्याणकारी घोषणाओं की बारिश करने लगती हैं। मौसम भी ऐसे ही सुबह के पहले मेहरबान टाइप हो गया। हालांकि मौसम को चुनाव नहीं लड़ना। लेकिन तमाम बेमतलब काम देखा देखी भी काम होते हैं। तमाम लोग बेमतलब अपराध करते हैं। घर भरा है लेकिन बेमतलब , आदतन , गैर इरादतन भ्रष्टाचार करते हैं।


सड़क पर मानो पानी का छिड़काव किया गया है। क्या पता इन्द्र देव के यहां इसके लिये बादलों ने वर्षा वाउचर लगा रखे हों। क्या पता बूंदा-बांदी करके वहां झमाझम बारिश का बिल पेश कर दिया हो। कभी इस सबकी जांच हो तो क्या पता वहां भी बारिश घोटाला, पानी घोटाला सामने आये।
स्वर्ग में लगता है सूचना का अधिकार अभी लागू नहीं हुआ है। हुआ होता तो अब तक अनगिनत घोटाले सामने आते। अभी लगता है कि स्वर्ग की पत्रकारिता ’खाता न बही, जो नारद जी कहें वही सही’ वाले मोड में है। विपक्ष का भी अभाव है वहां शायद ! क्या पता आने वाले समय में स्वर्ग-सरकार के देवता विपक्ष के देवताओं पर स्वर्ग-संसद ठीक से न चलने देने का आरोप लगायें। ’चढावा-उपवास’ भी धारण करें।
ओह, हम भी कहां खुशनुमा सुबह छोड़कर घोटाला-गली में घुस गये। आसपास का कितना असर पड़ता है इंसान पर।
नुक्कड़ पर गंगापुल साइकिल ट्रैक का बोर्ड भूमिगत हुआ पड़ा था। पटरी से गुजरती ट्रेन तेज आवाज लगाती हुई लोगों को जगाने की कोशिश कर रही थी।
नुक्कड़ की गन्ने की दुकान पर एक बच्चा मग्धे के पानी से दुकान की सफ़ाई कर रहा था। हीरो के समर्थक उसके अपराधों को उसकी भलमनसाहत के पोंछे से साफ़ करते हैं वैसे ही बच्चा सलमान खान के पोस्टर पर गीला कपड़ा फ़ेरते हुये उसकी धूल पोंछ रहा था।
सलाउद्दीन नाम है बच्चे का। कक्षा तीन में पढता है। सुबह दुकान साफ़ करके स्कूल जायेगा। शुक्लागंज के ’प्राइवेट स्कूल’ में पढता है। शाम को स्कूल से आकर फ़िर दुकान पर बैठेगा। इस बीच उसके बड़े भैया दुकान देखेंगे। होमवर्क भी करना होता है बालक को।
बालक के बगल की ठेलिया खाली थी। पिछ्ली बार वहां बुजुर्ग मास्टर जी मिले थे। 26 फ़रवरी को। उनके बारे में पूछा तो पोंछा मारते हुये उसने बताया -’वो तो खत्म हो गये।’
मास्टर जी की किडनी खराब थी। अस्पताल में भरती हुये। खत्म हो गये। पिछले दिनों वित्त मंत्री जी की और उसके पहले विदेश मंत्री जी की किडनी बदलने के खबरें आईं। दोनों स्वस्थ भी हैं। लेकिन बुजुर्ग मास्टर अपनी ओरिजिनल किडनी के साथ ’शांत’ हो गये। (मास्टर से मुलाकात की पोस्ट का लिंक https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10213794764116775 )
आगे एक रिक्शे में बैठे दो लोग तन्मयता से सिगरेट पी रहे। बेड-टी की तर्ज पर रिक्शा सिगरेट। बेड टी का जिक्र ’कसप’ में ’हगन-चहा’ के रूप में है। सुबह चाय पीते हुये यह याद आया था। लिखने का मन हुआ ’हगन चहा, मगन चहा’ लेकिन थम गये। अभी फ़िर याद आया तो लिख ही गया। मतलब इंसान जो मन से कहना चाहता है वह कहने के रास्ते निकल ही आते हैं।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 3 लोग, लोग खा रहे हैं, भोजन और बाहर
दुकान के सामान को दुलराते दुकानदार। बीड़ी हाथ में। घरैतिन हमेशा की तरह नेपथ्य में
एक दुकान पर दो लोग खड़े बीड़ी पी रहे थे। उनसे बतियाये। पता चला कि सीतापुर के नैमिशारण्य से आये थे। दस साल पहले। यहां दुकान लगाई। किसी तरह जिन्दगी गुजर रही है। बच्चे लोग स्कूल नहीं जाते। खर्च कहां से उठायें?
हमने कहा -’तमाम सरकारी स्कूल हैं वहां क्यों नहीं भेजते?’
’भेजा रहन मरी कम्पनी के पास स्कूल, लड़ाई-झगड़ा हुइ गवा तो चोट-चपेट के डर ते नाम कटा दिया बच्चन का। कहुं चोट-चपेट लागि जाय तौ आफ़त।’- बच्चों की पढाई छूटना सबसे सहज काम है गरीबों में।
दुकान की फ़ोटो लेते हुये सब पन्नियां खोल दी दुकानदार ने। दुकान के सामान को दुलराने टाइप भी लगा। दुकान की महिला भी साथ आ खड़ी हुई।
लोग बारिश से बचने के लिये अपनी बरसातियां समेटते हुये दुकान सुरक्षित कर रहे हैं।
आगे गंगा पुल से गंगाजी को देखा। सदानीरा , पतितपावनी गंगा को एक कुत्ता टहलते हुये पार कर रहा था। गंगा में पानी की स्थिति पुराने जमाने के नबाबों के पास संपदा जैसी दिन-पर-दिन होती जा रही है।
साइकिल से स्कूल जाती बच्ची सीधे देख रही थी। लेकिन उसके साइकिल चलाने के अंदाज से लगा कि वह अपने चारों तरफ़ नहीं आठों तरफ़ देख रही है। सड़क पर अकेली जाती बच्ची का पूरा शरीर आंख बन जाता है। सुरक्षा के लिये जरूरी सा होता जा रहा है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: साइकिल और बाहर
टायर बंधन में जकड़े दो रिक्शे
लौटते में देखा दो रिक्शों के अगले पहिये जंजीर में जकड़े हुये थे। दाम्पत्य बंधन की तरह। दोनों पहिये जंजीर और ताले के बंधन में जकड़े एक-दूसरे के लिये बने हुये टाइप लगे।

आगे रिक्शे की आड़ में दो लोग चिलम सुलगा रहे थे। एक दियासलाई सुलगा रहा था , दूसरा चिलम थामे हुये थे। ये तो मासूम चिलमची थे। लेकिन समाज में यह काम बड़े पैमाने पर होता है। कुछ लोग नशे का जुगाड़ करते हैं, दूसरे आग लगाते हैं। समाज को सुलगाते हैं।

सड़क पार एक छोटी बच्ची अपने से भी छोटी बच्ची को साइकिल चलाना सिखा रही थी। बच्ची उलझ-उलझ जा रही थी। लेकिन दोनों की कोशिश जारी थी।
पप्पू की चाय की दुकान पर भीड़ बढ गयी थी। जाते समय एक बेंच थी। लौटते समय चारों बेंचों पर ग्राहक विराजमान थे। साइकिलों में झोले पर गेंहू और धनिया और दूसरे चुटुर-पुटुर गृहस्थी के सामान दिखे। फ़ेरी लगाने निकले हैं ये लोग। दिहाड़ी कमाने।
अपन का भी दिहाड़ी कमाने के लिये निकलने का समय हो गया। चला जाये। आप भी मज्जे करिये। मिलेंगे फ़िर कभी। जल्ली ही। अपना ख्याल रखियेगा। अपना ख्य़ाल रख लिया तो हमारा रखा हुआ समझना। ठीक न !
*पोस्ट का शीर्षक Nirmal Gupta जी की टिप्पणी के सौजन्य से।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10214152812427759

Monday, April 09, 2018

कुछ घण्टे लाइब्रेरी में

झंडा गीत के रचयिता श्यामलाल गुप्त 'पार्षद' की स्मृति में नाम रखा गया है शायद।
कल फूलबाग वाली लाइब्रेरी गए देखने। पहली बार। लाइब्रेरी का नाम सुना था। दिमाग में छवि थी कि बड़ी लाइब्रेरी होगी। लाइब्रेरियन होंगे। हाल होगा बैठ के पढने के लिए। किताबें इशू करने के लिए काउंटर टाइप कुछ होगा। इसी तरह की और सहज कल्पनायें।
लाइब्रेरी देखते ही सभी कल्पनाओं का कत्लेआम टाइप हो गया। लाइब्रेरी में एक बुजुर्ग टाइप बैठे थे। एक बहुत 'बुजुर्ग रजिस्टर' पर पेंसिल से नाम लिखवाया। लाइबेरी दर्शन की अनुमति दे दी।
लाइब्रेरी की किताबें पहली मंजिल के बरामदे में खुली और कुछ बन्द आलमारियों जमा थीं। किताबों पर जमीं धूल इस बात की गवाही दे रही थी कि सालों से उनको छुआ नहीं गया था। 'हुएहैं शिला सब चंद्रमुखी' की तर्ज पर किताबें किसी पाठक का इंतजार कर रहीं थीं कि कोई आकर उनको उल्टे-पलटे तो कम से कम धूल तो हटे। किताबों को अस्थमा तो होता नहीं जो धूल के मारे खांस-खांस कर लोगों को अपनी उपस्थिति का इजहार कराएं।
हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू की सब मिली-जुली संस्कृति का प्रचार कर रहीं थीं। विषय भी कोई तय नहीं। हिंदी की कहानी की किताब उर्दू की इतिहास की किताब की किताब से गलबहियां थीं। 'विंस्टन चर्चिल के भाषण के संकलन' के ऊपर 'उसने कहा था और अन्य कहानियां' सवार थी। इसी तरह का और भी मिलजुलपन।
पता चला कि पहले लाइब्रेरी जिलाधिकारी के अंदर में थी। अब कानपुर विकास प्राधिकरण देखता है। लाइब्रेरी का रखरखाव केडीए उसी तरह करता दिखा जैसे नालियों, सडको का करता है।
कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.
ये धूल जमी है किताब पर
कई रोचक किताबें दिखीं। 60 के दशक की एक किताब 'पैदल दुनिया का सफर' दिखी। 2/- की किताब। इसमें लेखक ने बताया कि वह कैसे पैदल दुनिया टहलने निकला। उनको विनोबा भावे ने कहा -'या तो पूरे ख़र्च का इंतजाम करके निकलो या फिर खाली हाथ।' खाली हाथ निकलोगे तो भी जनता भूखा नहीं रखेगी।
यात्रा पर निकलने के समय उनकी पत्नी गर्भवती थीं। पत्नी ने लिखा कि अगर पेट से नहीम होती तो वो भी साथ चलती। कई देश घूमने के बावजूद एक ही किताब लिखी गयी यह ताज्जुब है। अपन तो एक शहर का हिस्सा देखते ही पन्ने भर डालते हैं। पहले के लोग 'करते ज्यादा, गाते कम थे।'
एक किताब का शीर्षक दिखा -'कंस के समय महिलाओं की स्थिति।' और भी तमाम रोचक मनोरंजक और जानकारी वाली किताबें दिखीं।
माखन लाल चतुर्वेदी रचनावली पढ़ते हुए लगा कि कितनी ओज पूर्ण भाषा में संबोधन है। साहित्यकार को लाइट हाउस बताया। आज भी साहित्यकार लाइटहाउस हैं लेकिन अधिकतर की बिजली गुल है। समाज को रास्ता बताने वाला साहित्यकार खुद रास्ता खोजने के लिए गूगल मैप का मोहताज है। रचनावली फौरन खरीदने का तय किया।
लगभग 50 हजार किताबों वाली लाइबेरी की सदस्यता लेनी है। 750/- जमा होंगे। 50/- रुपये साल का किराया। कम से कम किताब पलेटने से धूल ही झड़ेंगी किताबों की। कभी कपड़ा ले जाएंगे और धूल झाड़ेंगे भी।
फिलहाल तो दफ्तर जाना है। इसलिए इत्त्ता ही।


Saturday, April 07, 2018

अंगूठे के नाखून पर कीड़ा




चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और बाहर
अंगूठे के नाखून पर कीड़ा
धूप में बैठे चाय पी रहे थे। साथ में मित्रों से फोनियापा भी चल रहा था। चाय और फोन दोनों 'फिनिश' हुए तो देखा बायें हाथ के अंगूठे पर टिड्डे जैसी आकृति का कीड़ा टाइप बैठा है। कीड़े की उमर का अंदाजा नहीं। यह भी नहीं पता कि वह अपनी दुनिया का नर है या मादा। लेकिन मजे से बैठा है।

उमर की बात तो अलग लेकिन 'बैठा' है लिखते ही मैं उसका 'कीड़े' का जेण्डर तय सा कर देता हूँ। पहली नजर में ही उसको नर बना देता हूँ। यह सोचते हुए कि सबेरे-सबेरे जैसे अपन निठल्ले बैठे हैं वैसे ही यह भी टहल रहा होगा। क्या पता यह अपनी दुनिया के हिसाब से 'ब्रिस्क वाकिंग' या 'मार्निंग फ्लाइंग' पर निकला हो।

कीड़ा हमारे अंगूठे के नाखून पर ऐसे बैठा है गोया किसी हेलीपैड पर हेलीकॉप्टर खड़ा हो। हमने अंगूठा हिलाया लेकिन कीड़ा हिला नहीं। जैसे धरती अपनी धुरी पर घूमती रहती है लेकिन हमको और तमाम लोगों को पता नहीं चलता उसी तरह कीड़ा भी हमारे अंगूठा हिलाने से निर्लिप्त आराम से बैठा है।

थोड़ी देर बाद कीड़े ने अंगड़ाई टाइप ली। शायद कविता याद आ गई हो उसे भी :
ले अंगड़ाई उठ हिले धरा
करके विराट स्वर में निनाद।


अंगड़ाई के बाद कीड़े ने अपने बदन को कई जगह से मोड़ा। तोड़ा-मरोड़ा। फिर तसल्ली से बैठ गया। शायद वर्जिश टाइप कुछ की हो। कपालभाति जैसी कोई क्रिया। कुछ पता नहीं। अपने आसपास के जीवों के बारे में हम कितना कम जानते हैं।

कुछ देर कीड़े को निहारने के बाद हमने उसकी फ़ोटो ली। फिर अनूठे (अंगूठे) को झटक दिया। यह इंसानी फितरत का नमूना है। काम निकलने के बाद झटक दिया। आशीर्वाद से पद पाकर सटक लिया।

कीड़ा न्यूटन के किसी नियम का पालन करते हुए जमीन पर गिरा। धप्प से गिरा या लदद से यह पता नहीं। लेकिन हमारी तुलना में वह इतना स्लिम-ट्रिम था कि वह धरती पर लैंड किया होगा। सेफली। लैंड करने के बाद किधर गया पता नहीं।

लेकिन लगता है कि कीड़ा बहादुर टाइप का होगा। यायावर भी। निकल पड़ा अकेले सुबह-सुबह। किसी को साथ लिए बिना। क्या पता अपने समाज में वापस जाकर 'नाखून आरोहण' कथा बताये जाकर। अपने इलाके का कोलम्बस, हिलेरी, तेनसिंग, वास्कोडिगामा कहलाये।

होने को हो तो यह भी सकता है कि हमारे घर की जासूसी करने आया हो। अखबार बांचकर गया हो जिसमें खबर छपी है कि सलमान को सजा सुनाने वाले जज का तबादला हो गया। शायद इस पर मेरी बाईट लेने आया हो। हमारे अंगूठे के साथ सेल्फी ली हो और अपने मन मर्जी का बयान मेरे नाम से छाप दिया हो।

यह सारा सोच कीड़े के नर होने की कल्पना के बाद का है। क्या पता है वह मादा हो। अगर ऐसा होगा तो हमारा सारा विमर्श बदल जायेगा। सौंदर्य के नए आयाम खोजे जाएंगे उसके बैठने, अंगड़ाई लेने और बेखौफ विचरने में। ऐसा 'कीड़ा समाज' वाकई बहुत उन्नत समाज होगा जहां की मादाएं बेखौफ किसी दूसरी प्रजाति के अंगूठे पर निडर बैठकर यायावरी कर सकें।

फिलहाल अपना समय-समाज इससे इससे ज्यादा लिखने की अनुमति नहीं देता। इसलिए फिलहाल इतना ही। बकिया फिर।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10214125394942339&set=a.3154374571759&type=3&theater

Friday, April 06, 2018

भलमनसाहत प्रचार की मोहताज नहीं होती



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विराट कोहली

सबेरे घर के बाहर बैठे चाय पी रहे हैं। धूप निकल आई है। बढिया वाली हवा बह रही है। आसपास के कुत्ते लगातार भौंक रहे हैं। शायद कुछ संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं। हम समझ नहीं रहे। कौन उठकर जाए बाहर देखने।
अखबार में पहले पेज पर विराट कोहली की फोटो है। सलमान खान अंदर हैं। आधा पेज पर सलमान से सम्बंधित खबरें हैं। किस्से-कहानियां, झलकियां भी। सोशल मीडिया गंजा पड़ा है सलमान खान की खबरों से। अपनी अक्ल और तरफदारी के हिसाब से लोग बयान जारी कर कर रहे हैं। मीडिया को भी एकाध दिन की तसल्ली हुई कि नया मसाला खोजना नहीं पड़ेगा।
कुछ दिन पहले सलमान खान 'हिट एंड रन' मामले में छूट भी गए थे। तब भी खूब स्टेटस बाजी हुई थी। कोई 'फुरसतिया' दोनों समय के स्टेटस का तुलनात्मक अध्ययन कर सकता है।
पास के स्कूल से प्रार्थना और उसके बाद राष्ट्रगान की आवाज रोज सुनाई देती है। 200 मीटर की दूरी से लाऊडस्पीकर से आती 'जन गण मन' की आवाज रोज सावधान कर देती है। यह भी लगता है कि स्कूल की असेम्बली में जब सब प्रार्थनारत हैं, सब राष्ट्रगान गा रहे हैं तो फिर ध्वनिविस्तारक की आवाश्यकता क्या है? शायद देशप्रेम के भाव से ज्यादा उसका हल्ला ज्यादा जरूरी है।
स्कूल से आवाज आ रही है:
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं इसकी , ये गुलसितां हमारा।
कुत्ते अब शांत हो गए हैं। चिड़ियां बोलने लगी हैं। बोल शायद पहले भी रहीं हों लेकिन कुत्तों की आवाज के शोर में शायद उनकी आवाज दब गई थी। दुनिया में भी ऐसा ही होता है कि जब किसी हिस्से में सबसे क्रूर घटनाएं हो रही होती हैं उसी समय उसके तमाम हिस्सों में उससे कई गुना प्रीतिकर किस्से दर्ज हो रहे होते हैं। क्रूरता के हल्ले में कोमलता के आत्मीय किस्से चर्चित हो नहीं पाते । लेकिन वे घटित हो रहे होते हैं। भलमनसाहत प्रचार की मोहताज नहीं होती।
मीडिया जब हाल में दंगों के क्रूरता के किस्से बयान कर रहा था उसी समय दंगों में अपना जवान बेटा खो चुका एक बाप अपनी कौम के लोगों को यह कहते हुए हिंसा से रोकने की कोशिश कर रहा था कि अगर किसी ने इसके बदले में कोई हिंसा की तो मैं शहर छोड़कर चला जाऊंगा। दंगो के शोर में मीडिया ने इस घटना को दिखाया नहीं । लेकिन ऐसा हुआ। हो रहा है। होता रहेगा।
पास की पटरी से रेल हवा को चीरती हुई आगे जा रही है। हवा ऐसे आवाज कर रही है जैसे उसके पर्दे हिल रहे हों।
सबेरे की चाय अब खत्म हुई। अब जवान अपने काम को निकलेगा। आप भी अपने काम से लगिये। लेकिन पहले मुस्कराइए । यह सोचते हुए कि आप इस खूबसूरत दुनिया के वासिंदे हैं। देखिये की पूरी कायनात आपके साथ मुस्करा रही है और उसकी और आपकी खूबसूरती में आठ चांद लग गए हैं।

Thursday, April 05, 2018

चश्मे की याद


सुबह दफ़्तर के लिये निकले। लगा कुछ छूट सा गया है। असुरक्षित सा महसूस हुआ। दस कदम चलने के बाद याद आया। मोबाइल चार्जिंग में ही लगा रह गया था। ’इस्स’ कहते हुये सर पर हल्की चपत लगाई। वापस लपके। मोबाइल जेब में धरा। सुरक्षा का एहसास मोबाइल के साथ ही, एक के साथ एक फ़्री वाले अंदाज में, आ गया।

मोबाइल का छूट जाना मतलब असुरक्षित सा हो जाना है। बिना मोबाइल आदमी ’जल बिन मीन’ सा हो जाता है। ऐसा लगता है बिना जिरह-बख्तर के पानीपत की लड़ाई में उतार दिये गये। बिना मोबाइल के कलयुगी इंसान की गत वही होती है जो महाभारत में बिना गांडीव के अर्जुन की होती होगी। ’लक्स कोजी’ बनियाइन का विज्ञापन आता है-’अपना लक पहन के चलो।’ बनियाइन पर भले लागू न हो लेकिन मोबाइल पर फ़ुल लागू होता है लक वाला फ़ंडा। कहीं के लिये निकलो, मोबाइल साथ ले के चलो। मोबाइल साथ में, लक आपके हाथ में।
दफ़्तर पहुंचकर राउंड के लिये निकले। सुबह-सुबह राउंड लेने से मातहत और अफ़सर दोनों को दिन भर निठल्ले रहने की छूट मिल जाती है। अफ़सर का आत्मविश्वास एवरेस्ट पर पहुंच जाता है तो मातहत का भी कंचनजंघा से नीचे तो नहीं रहता है। राउंड करते हुये अफ़सर को निपटाकर मातहत दिन भर की बला टल जाने का सुकून पाता है।
एक जगह तेजी से राउंड निपटाकर दूसरी जगह को लपकते हुये चश्मा जेब से निकालकर माथे पर लगाने की सोची। लेकिन जेब में चश्मा मिला नहीं। सर टटोला वहां भी विराजमान नहीं था चश्मा। जेब और माथे दोनों जगह चश्मा न मिलने का एहसास होते ही सामने साफ़ दिखता आदमी धुंधला दिखने लगा। सामने से आती गाड़ियों के आकार बदल गये। मतलब साफ़ था। दिमाग ने आंखों से चुगली कर दी थी -’ तुम बिना चश्मे के हो। साफ़ देखना बन्द करो।’ फ़लत: आंखें ’वर्क टु रूल’ के अनुसार काम करने लगीं। थोड़ी देर पहले साफ़ दिखने वाली चीजें धुंधला गयीं।
दिमाग की यह हरकत उसी तरह की थी जिस तरह अपराध करते कोई पकड़ा जाता है लेकिन असल अपराधी कोई और होता है। दंगा कराने वाले शांति का संदेश देते हुये अपने आदमियों को जल्दी से जल्दी बवाल फ़ैलाने के लिये आदेश देते हैं। चश्मा न होने पर आंख कुछ देर तक बदस्तूर अपनी ड्य़ूटी बजाती रही। लेकिन जैसे ही दिमाग ने उसको हड़काया -“ बिना चश्में के तुम साफ़ देख रही हो। पकड़ जाओगी।“ सुनते ही आंखों ने सकपकाकर साफ़ देखना बन्द कर दिया होगा।
बहरहाल, धुंधला देखते ही दौरा पूरा किया। आंखों को असहयोग के लिये मन किया हड़का दें। लेकिन सोचा -’ उस बेचारी की भी क्या गलती। जैसा हाईकमान बोलेगा वैसा ही तो करेगी। आंख कोई सांसद/विधायक तो है नहीं जो अंतरात्मा की आवाज के नाम पर मनमानी करे।’ इसलिये छोड़ दिया।
दफ़्तर पहुंचते ही अर्दली को चश्मा खोजने पर लगा दिया। फ़ाइल टटोलने लगे। दराज झांकने लगे। जमीन की पैमाइश भी कर डाली। फ़टाफ़ट खोजाई के बाद चश्मा मिला नहीं। शक हुआ कि जहां पहली बार राउंड पर गये थे वहां ही छूटा होगा चश्मा। और जा कहां सकता है?
अर्दली को बताया गया कि साहब सुबह राउंड पर चश्माविहीन थे। मतलब लोग राउंड करते अफ़सर के पहनावे पर निगाह रखते हैं। इसके बाद जिसने राउंड पर निकलते समय देखा था वह दिख गया। उसने भी कहा -’राउंड पर निकलने समय आप चश्मा नहीं लगाये थे।’ बाद में दफ़तर में घुसते हुये नमस्ते करने वाले ने भी बयान जारी किया कि दफ़तर बिना चश्मे के आये थे। बहुमत ने यह साबित कर दिया कि हम दफ़्तर बिना चश्मे के आये थे। सुकून हुआ कि चश्में की ही खोज हो रही हैं पतलून की नहीं। वरना कौन जानता है कि उसके बिना भी दफ़तर आने के बयान जारी हो जाते। बैठे-बिठाये कलयुगी आर्किमिडीज बन जाते।
दफ़तर से निराश होकर हमने घर पर आसरा किया। शायद घर में ही भूल गये हों। जितने कोने-अतरे हैं उससे दोगुने-तीन गुने में सघन तलाशी अभियान चलाया गया। फ़र्श पर छिपकली की तरह लेटकर बिस्तर के नीचे तलाशा गया। लेकिन चश्मा मुआ लोकतंत्र में शिष्टाचार की तरह नदारद ही दिखा। लगा कि हो न हो दफ़्तर में ही छूट गया हो।
लौटकर दफ़्तर-दफ़तर खोये चश्मे की खोज शुरू हुई। जिस भी मेज पर चश्मा दिखता लगता वह मेरा ही है। बिना चश्मे के होने के कारण यह धारणा बनाने में आसानी भी हुई। दूरी के कारण हमको हर मेज पर धरा चश्मा अपना लगता। चश्मे की तरफ़ हाथ बढाते हुये मेज पर बैठने वाले को ’चोर’ भले ने मान रहे थे लेकिन चोर से कम भी मानने का मन नहीं हो रहा था। लेकिन अफ़सोस यही कि चश्मा पास से देखते ही इस धारणा पर टिक नहीं पाते। चश्मा उसी का निकलता और हमें मजबूरन उसको शरीफ़ ही मानना पड़ता।
शाम तक पूरी कायनात में हल्ला मच गया कि हमारा चश्मा मिल नहीं रहा है। लेकिन अफ़सोस कि हमारे अलावा कोई इससे परेशान नहीं दिखा। परेशान तो सच कहें अपन भी नहीं थे क्योंकि चश्मे के साथ भी कोई बहुत साफ़ नहीं दिखता था क्योंकि चश्मा पुराना था और इस बीच हमारी नजर और गड़बड़ा गयी थी। लेकिन फ़िर भी चश्में के रहते थोड़ा सुकून का एहसास था जैसे लोकतंत्र में बावजूद अधोषित तानाशाही के जम्हूरियत का एहसास, भले ही कहने को हो, बना रहता है।
अब सड़क पर कार चलाते भी एहसास तगड़ा होता गया कि चश्मा विहीन हैं अपन। हर सामने आती गाड़ी देखकर लगता कि इसको भी पता है अपन को साफ़ दिखता नहीं। ठेलने के इरादे से आ रही है सामने से। लेकिन गाड़ी बिना ठोंके बगल से निकल जाती तो लगता कि वह मुझे सिर्फ़ धमका कर निकल गयी।
घर में आते तो लगता दफ़तर में खोया है। दफ़तर में सोचते घर में गुम हुआ। बीच में कार की तलाशी तो आते-जाते होती ही रहती।
मन किया कि हर जगह इस्तहार लगवा दें -’चश्में बेटे लौट आओ। तुम्हारे बिना आंखे सूनी हैं। नाक को तुम्हारी कमी खल रही है। तुम्हारे बिना चेहरे की रौनक दफ़ा हो गयी है। जल्दी आ जाओ।’ लेकिन चश्मे की भाषा ही नहीं पता थी तो इश्तहार कैसे छपवाते। डर यह भी लग रहा था कि इधर इश्तहार छपवायें, उधर चश्मा मिल जाये। बेफ़ालतू में पैसे बरबाद होंगे।
ऐसे ही होते करते दिन निकलते गये। लगा कि अब चश्मा रहा नहीं हमारे बीच। इस बीच एक मीटिंग की खबर आई। लगा चश्मा जरूरी है। नया बनवाया जाये। लौटते में पहुंच गये चश्मे की दुकान।
दुकान पर ’सेल्स महिला’ ने तरह-तरह के चश्मे दिखाने शुरु किये। हमने कहा अभी कामचलाऊ फ़्रेम दिखाओ। बाकी अच्छा मतलब मंहगा बीबी-बच्चे के साथ आकर पसंद करेंगे।
इस सीधी सी बात से साफ़ हो जाता है कि अपन खुद के खुद मंहगी चीजें खरीदने से बचते हैं। कामचलाऊ से ही काम चलाते हैं। दूसरी बात यह भी कि अपन को खुद की पसंद पर भरोसा नहीं। तीसरी बात यह कि ..। अब छोडिये तीसरी बात ! बात बढाने से क्या फ़ायदा। निकलेगी तो चश्मे से बहुत दूर निकल जायेगी।
चश्मे का फ़्रेम तय करते हुये हम अपने खोये चश्मे के जैसा ही फ़्रेम खोजते रहे। ऐसा नहीं कि उसमें हम बहुत हसीन लगते हों। या बहुत साफ़ दिखता हो उसमें। लेकिन जिसके साथ रह चुके उसकी आदत पड जाती है न। उससे बहुत ज्यादा अलग सोचना मुश्किल होता है। अगर आज देश के लिये कोई नयी व्यवस्था चुनने के लिये कहे तो जो चुनी जायेगी उसमें कमोवेश इत्ती ही अराजकता, इत्ती ही अनुशासनहीनता, इतना ही भ्रष्टाचार, इतनी ही भाई-भतीजावाद, ऐसा ही जातिवाद , समप्रदायवाद होगा। इससे अलग होगा तो हम शायद असहज रहें।
जल्दी ही अपने खोये चश्मे के फ़्रेम जैसा ही फ़्रेम मिल गया। बनावट, रंग और दीगर चीजों से ज्यादा उसकी कीमत पुराने चश्मे के अल्ले-पल्ले थी। इससे मुझे और कन्फ़र्म हुआ कि उस जैसा ही चश्मा है। यह बात अलग कि पुरानी फ़्रेम हमने दिल्ली से लिया था और यह दुकान कानपुर की थी।
जो फ़्रेम मैंने तय किया वह दुकान के सबसे सस्ते फ़्रेमों में था। बिक्री महिला ने हमको उससे अच्छे फ़्रेम दिखाने और उनको पसंद करने के लिये बहुत उकसाया लेकिन हम अपने निर्णय पर अडिग रहे। अपनी त्वरित निर्णय क्षमता पर हमें गर्व टाइप भी हुआ। अपने तय किये फ़्रेम से अलग उसने जो भी फ़्रेम दिखाया वह उससे मंहगा था लिहाजा हमें अच्छा नहीं लगा।
हमारे द्वारा सबसे सस्ता फ़्रेम करने को ’सेल्स महिला’ ने चुनौती के रूप में लिया। चश्मे में एंटी ग्लेयरिंग, पास और दूर के लिये अलग ग्लास तय करने की पेशकश की। हमने सबको ठुकराते हुये नजर टेस्टिंग के लिये अपनी आंखे हाजिर कर दीं।
नजर टेस्ट कराना भी बवाल है। हर बार ग्लास लगाते हुये पूछती यह अच्छा कि यह। यह अच्छा कि वह। वो तो कहो कि नजर टेस्ट कराने में पावर के हिसाब से दाम नहीं बढते। वर्ना हो सकता है कि अपन सबसे सस्ते वाले ग्लास के लिये हां बोलकर चश्मा तौलवा लेते, भले ही दिखने के उसमें देखने से बेहतर बिना उसके देखना होता।
बहरहाल, शाम को चश्मा लेने गये। लगाते ही दुनिया और खूबसूरत लगने लगी। टेस्ट करने वाली महिला भी। मन किया एक बार फ़िर चश्मा टेस्ट करवायें। लेकिन उसको घर जाने की जल्दी थी।
दुकान पर ही पता चला कि जिस दुकान से चश्मा बनवाया है वह साठ साल पुरानी है। उसके 84 साल की उमर के मालिक से भी मुलाकात हुई। चश्मा और अच्छा लगने लगा।
अब हाल यह है कि नये चश्मे के साथ नया सरदर्द मुफ़्त में मिल गया है। बीच-बीच में तारे टाइप नजर आने लगे हैं। लगता है चश्में में गूगल अर्थ फ़िट कर दिया हो जो बिना इंटरनेट के तारे-सितारे दिखा रहा है। चश्मा खरीदने में त्वरित निर्णय लेने में भले सफ़ल रहे हों लेकिन हफ़्ता भर बाद भी यह तय नहीं कर पा रहे कि गड़बड़ कहां हुई? चश्में की पावर तय करने में या चश्में के साथ सेटिंग में।
कई बार दुकान के सामने से निकल चुके हैं लेकिन अंदर जाने का मन नहीं हुआ। डर लग रहा है कि कहीं ग्लास बदलने की बात न उठ जाये। पैसे खर्च होने से बचाने की चाहत हमें इस नये चश्में के प्रति मोहब्बत पैदा हो गयी है।
पुराना चश्मा भी फ़िर से याद आ रहा है। गाने का मन हो रहा है- ’आ लौट के आजा मेरे मीत रे, तुझे मेरी आंखें बुलाती हैं।’

Tuesday, April 03, 2018

भारत माता की जय



फल वाला 
सबेरे-सबेरे फल वाला संतरे सजा रहा है। अखबार की कतरन संतरे के बिस्तर की तरह सजाई। पानी से गीला किया ताकि संतरे ठंडे रहें। गरमाये नहीं।
कतरन मराठी अखबारों की है। मराठी में समाचारों के टुकड़े कतरन में आधे-अधूरे से हैं। एक समाचार कई कतरनों में बंट गया होगा। कतरन का अधूरा समाचार अपने बिछुड़े समाचार को खोज रहा होगा। अखबार में साथ-साथ छपी खबर ठेलिये के अलग-अलग कोनों में पड़ी होंगी। अखबार के आठवें पेज की खबर पहले पेज की खबर के साथ गलबहियां कर रही होगी। नागपुर की कोई बहुत गर्म खबर कानपुर में संतरों के बिस्तर को ठंडा करने के काम आ रही होगी।
होर्डिंग पर एक सुंदरी सोना-चांदी का विज्ञापन कर रही है। 24 घण्टे अकेली महिला होर्डिंग पर अकेले खड़े डरती नहीं है। यह सोचे और फिर यह भी कि होर्डिंग पर है इसीलिए बची है। वरना पता नहीं कब दुर्गत हो गयी हो गई होती। या लटक गई होती शोहदो के डर से।
एक आदमी जेब में दोनों हाथ डाले सड़क मुआयना कर रहा है। जेब में हाथ डालकर रहने वाले लोग 'मुंहचुप्पा' बताये जाते हैं। हमने ऐसा सुना है किसी से। पता नहीं ऐसा सच है कि ऐसे ही किसी ने उड़ा दी ?
एक बुजुर्ग महिला शायद अपने नाती को स्कूल छोड़ने जा रही है। बच्चा आगे-आगे चपल गति से दायें-बायें भाग रहा। बुजुर्गा उसको पीछे से कंट्रोल करने की कोशिश करती है। लेकिन बच्चे की स्पीड ज्यादा है। बुजुर्गा की कोशिश देखकर ऐसा लगता है कि किसी राष्ट्रीय पार्टी के लोग अपने बच्चा संगठन को अपनी मर्जी के हिसाब से हाँकने की कोशिश में हैं लेकिंन बच्चा संगठन जबानी के जोश में अपनी मर्जी से चल रहा हो।
दो रिक्शे वाले आपस में बतिया रहे हैं। एक ने अपने पास से चार पूड़ियाँ निकालीं और टीन की छत पर फेंक दीं। बोला -'बन्दर खाएंगे।'
बताओ -'बिना सब्जी की पूड़ी अपने पूर्वजों को फेंककर खिला रहा है। कित्त्ता गलत काम है। बुजुर्गों का बिलकुल ख्याल नहीं। हमारा कौन ख्याल रखेगा।
सड़क पर सामने से आता ऑटो हमारे एकदम बगल में रुका। हम पीछे हट गए। क्या पता जबरियन बैठा लेता। शुक्लागंज छोड़कर पैसे भी धरा लेता। लेकिन बच गए।
समय हो गया दफ्तर का। चला जाये। काम पर लगा जाये। भारत माता की जय। वन्देमातरम।
भारतमाता की जय इसलिए बोली कि सबको पता चल जाए कि देशभक्त हम भी कम नहीं हैं।

Saturday, March 31, 2018

परदेशन से मुलाकात

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, मुस्कुराते हुए, खड़े रहना, बच्चा और बाहर
परदेशन अपनी फोटो देखती हुई

कल शाम टहलने निकले। कार से। खरामा-खरामा टहलते हुए सड़क के नजारे देखते।
एक ठेलिया वाला अपनी ठेलिये के पिछवाड़े को उचकाए चला जा रहा था। पिछले पहिये टेढ़े हो गए थे। सड़क पर चलते पहिये तो 'सरल आवर्त रेखा' बनाते।
एक आदमी भरी सड़क पर बैठ-बैठकर चल रहा था। हाथ के बल उचकते हुए। शायद उसकी टांगे खराब हो गईं थीं। चलने में तकलीफ थी।
कलट्टरगंज की तरफ निकले। चौराहे पर सिग्नल पर रुके। एक बच्चा गाड़ी पोंछने के लिए लपका। हमने उसको रोका तो उसने बेवश नाराजगी से मुझे देखा। आदत हो जाने के बावजूद के हम थोड़ा असहज हुए। सिग्नल हो गया। सैंट्रो सुन्दरी में बैठा जवान आगे बढ़ गया।
कलट्टरगंज हमेशा की तरह ऊंघ रहा था। 'झाड़े रहो कलट्टरगंज' , झड़ा हुआ कलट्टरगंज' लग रहा था। सड़क के दोनों तरफ दुकानों में से ज्यादातर में मुनीम, कैशियर बस्ते पर सर धरे सोते/ऊंघते दिखे।
कलट्टरगंज आने का कारण 'परदेशन' को उसकी फोटो देना था। पिछले साल एक सिंघाड़े की दुकान पर काम करते हुए मिली थी। फोटो खींचते हुए उनको फोटो देने का वादा किया था। महीनों पहले डेवलप कराई थी।लेकिन देने नहीं जा पाए थे। टलता रहा मामला। कल गए।
जहां परदेशन काम करते दिखी थीं वहां सन्नाटा था। पता किया काम बंद है अभी। सिंघाड़े का सीजन ख़त्म। सब मजदूर गांव लौट गए हैं।
हमने परदेशन का फोटो दिखाया तो दुकान वाले ने बताया आगे सौंफ की दुकान में काम करती है। अभी मिल जाएगी।
गलियों में होते हुए पहुंचे तो एक कोठरी में बैठी थीं परदेशन। अपने लिए 'बेना' बना रही थी। सरकंडो को सिलते हुए गर्मी में झलने के लिए पंखा। अधबना पंखा हाथ में लिए हुए झोपड़ी से निकली। फ़ोटो दिए तो खुश हो गयी।
फोटो देखते हुए आसपास आते-जाते लोगों को दिखाते हुए कहती -'देखो भैया हमार फोटो ले आये। तुम कहत रहव कि न अइहैं।'
लोग भी फोटो देखते हुए मजे लेते रहे-'तुम तो हीरोइन हुई गई परदेशन।'
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, मुस्कुराते हुए, खड़े रहना
चाय हो जाये
पास की चाय की दुकान पर चाय पी हम लोगों ने। बताया कि लोग कह रहे थे -' वो अखबार के लोग थे। फोटो अखबार में छप गयी होगी। कौन देने आएगा। हम भी सोच रहे थे कि फ़ोटो देने आये नहीं। अब बच्चों को दिखायेंगे कि ये देखो फ़ोटो। ये बहुत बढिया काम किये भैया तुम। फ़ोटो लै आये।'
चाय की दुकान 40 साल पुरानी। दुकान वाले ने बताया कि जब शुरू किए थे दुकान तो यहां जगह नहीं थी चलने की। चवन्नी की चाय बिकती थी। आज पांच रुपये की चाय।
परदेशन की फ़ोटो देखकर चाय की दुकान में एक ने चाय की दुकान पर लगा एक फ़ोटो दिखाते हुये हमारे लिये चुनौती उछाली - ऐसी फ़ोटो खैंचकर दिखाओ। श्वेत श्याम फ़ोटो में कोई आदमी किसी मंदिर में पूजा कर रहा था। हमने चुनौती अस्वीकार करके चाय पर ध्यान देना उचित समझा। चाय चकाचक बनी थी।
परदेशन ने पूछा -'भैया हमार आधार कार्ड खो गवा है। दवाई लेन जाओ तो आधार माँगत हैं सब। कैसे बनी?'
हमने पूछा नाम, पता या नम्बर हो तो बन जायेगा दूसरा। क्या नाम से है?
बोली -'कइयो तो नाम हैं। परदेशन, मुन्नी , चन्दा। अब याद नहीं कौन नाम लिखा है कार्ड मा। हां नम्बर शायद बैंक की पासबुक मा लिखा है। गांव मा है पासबुक।'
हमने कहा-' नम्बर मंगवा लेव। फिर बन जाई दूसर कार्ड।'
चलते हुए सकुचाए अंदाज में फ़ोटो के पैसे के लिए पूछा -'भैया कुछ पैसा पड़े हुएहैं फ़ोटो बनवाई। दे देब। लै लेव। '
हमने मना किया। तो बोली -'इत्ती दूर ते आये हौ। पेट्रोल ख़र्च हुआ होई।'
हम बोले-'मुलाकात हो गई। यही ख़र्च का भुगतान हो गया।'
गली तक विदा करने आई परदेशन। नम्बर दे आये हैं। आधार कार्ड की जानकारी मिलने पर बनवाने का आश्वासन देकर। आश्वासन देने में कुछ से जाता थोड़ी है।
सोचा मन में -'साल भर लगे फोटो देने में। कार्ड बनवाने में कित्ती देर लगाओगे। आलसी बहुत हो सुकुल। '
पिछली पोस्ट का लिंक यह रहा
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10210735100907107

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10214075636618412

Sunday, March 25, 2018

आत्मीय यादों का खूबसूरत गुलदस्ता

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 4 लोग, भोजन और बाहर
शब्बीर जी चाय की दुकान पर

मूलगंज चौराहे पर दिहाड़ी मजदूरों की भीड़ थी। लोग काम के इंतजार में खड़े थे। अपने-अपने औजारों के साथ। बढ़ई लोग आरी, रंदा, बसूले साथ। पेंटर तरह-तरह के ब्रश , कूचियों से लैस। लोग आते। भावताव करते। सौदा पट जाने पर ग्राहक के साथ चले जाते। आदमियों का मॉल टाइप लगा मूलगंज का चौराहा जहां आदमी आइटम के रूप में उपलब्ध थे।
एक बुजुर्गवार भी उन्ही में शामिल थे। सड़क किनारे गुजरती मोटी पाइप लाइन को बेंच बनाये बैठे। कुछ पूछताछ की तो खड़े होकर बतियाने लगे।
पता चला कि मूलत: बलरामपुर गोंडा जिले के किसी गांव के रहने वाले हैं। सन 1972 में कानपुर आये थे। 15 साल की उमर में। आधारकार्ड में जन्मदिन 23 अप्रैल 1957 लिखा है। मतलब आजादी की पहली लड़ाई के सौ साल बाद। आज की उमर ठहरी महीना कम 61 साल। पिता जीवित हैं। बढई का पेशा खानदानी है। पिता और दीगर रिश्तेदारों से काम सीखा। लड़के भी लकड़ी छीलते, सजाते हैं।
हमारे बतियाते हुये एक ग्राहक आ गया। उसको घर की चौखट बनवानी थी। पान भरे मुंह के चलते सर ऊपर करके बतिया रहा था। बतियाते हुये थोड़ा ऐंठ भी रहा था। ऐठते हुये यह भी जताता जा रहा था -’हमको बेवबूक मत समझना।’ ऐसा जताते हुये फ़ुल बेवकूफ़ लग रहे थे भाईसाहब। लेकिन हम ऐसा कह नहीं रहे। बस सोच रहे हैं ऐसा। अब जरूरी थोड़ी है कि जो हम सोचे वह सही ही हो।
काम विस्तार से समझाने के बाद उन्होंने पैसे पूछे। बुजुर्गवार ने दिहाड़ी बताई 800 रुपये। उन्होंने बताया -’दो घंटे का काम है। आठ सौ बहुत हैं।’ इसके साथ उन्होंने इस बार कह भी दिया -’हमको अनाड़ी मत समझो।’
बुजुर्गवार ने एक बच्चे नुमा बढई को काम फ़िर से बताने के बाद चले जाने के लिये कहा। लेकिन उसने काम दुबारा सुनने के बाद गरदन हिला दी- ’नहीं जायेंगे।’ कामगार तलाशने वाले भाईजी मुंह के पान को और चबाते हुये आगे बढ गये।
हमने बुजुर्गवार से पूछा -’जब आप लोग काम के लिये यहां खड़े हो तो काम के लिये मना क्यों किया?’
’उनको काम कराना ही नहीं था। हम आदमी देखकर समझ जाते हैं। जिस काम के लिये दिन भर लग जाता है उसको वो दो घंटे का काम बता रहे हैं। इसलिये हमने मना किया और उस लड़के ने भी।’ -बुजुर्गवार ने अपनी बात कही।
बताया कि इतवार को सबसे ज्यादा भीड़ रहती है काम के लिये आदमी खोजने वालों की। सुबह से शाम तक कभी शटर डाउन नहीं रहता इस आदमी बिक्री केन्द्र का। कभी भी ग्राहक आ जाता है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, लोग पैदल चल रहे हैं, लोग खड़े हैं, भीड़ और बाहर
ग्राहक का इंतजार करते दिहाड़ी मजदूर
कुछ देर की बातचीत के बाद उनके घर परिवार की बात होने लगी। बताया कि चार बेटे हैं, दो बेटियां। दो बेटियों और दो बेटों की शादी हो गयी। दो की बाकी है। सब अपना-अपना काम करते हैं। घर में काम चलता है। मुंबई भी गये थे। कुछ साल रहे फ़िर चले आये।
इसके बाद उन्होंने किन्ही झा जी की याद करते हुये बताया कि वे आते थे मिलने। अक्सर मिठाई लाते थे। कैंट में रहते थे। आदि-इत्यादि। अपने हुनर के कई किस्से सुनाये। बोले- ’हमारा काम 30 दिन का बंधा है। जाममऊ में। वहीं जाकर करेंगे काम। यहां बस ऐसे ही आ गये थोड़ी देर के लिये।’
इतनी देर की बातचीत में बुजुर्गवार को हमसे आत्मीयता सी हो गयी। बोले-’ चाय पियेंगे।’
हमने कहा - ’पियेंगे। लेकिन पिलायेंगे हम।’
हम-हम की आत्मीय बहस करते हुये बगल की चाय की दुकान पहुंच गये। बुजुर्गवार ने चाय वाले को बढिया चाय का आर्डर देते हुये कहा - ’पैसे हम देंगे।’
लेकिन हमने जबरियन पैसे थमा दिये। फ़िर चाय आने तक और उसके बाद चुस्कियाते हुये बतियाते रहे। हमने उनका नाम पूछा तो उन्होंने बताया - ’शब्बीर।’
हमने पूछा- ’शब्बीर माने पता है क्या होता है?’
बोले- ’शब्बीर माने सीधा।’
हमने बताया- ’शब्बीर माने होता है प्यारा। शब्बीर मने लवली। हमको अपने मित्र मोहब्बद शब्बीर की याद आ गई। उनके नाम का मतलब पूछकर हमने उनका नम्बर ही इसी नाम से सेव किया- Shabbir mane lovely.
शब्बीर माने लवली कहने पर शब्बीर बोले -’हमको अंग्रेजी नहीं आती।’
हमने कहा हिन्दी और उर्दू तो आती है। बहुत है। उर्दू वाली बात इसलिये कही कि हमने उनकी जेब में रखे कुछ कागजों में लिखी झांकती उर्दू देख ली थी। उन्होंने वे कागज निकालकर मुझे दिखाये। उर्दू लिपि में लिखा होने के कारण मुझे कुछ समझ में नहीं आया लेकिन फ़ौरन प्रमोद तिवारी की कविता पंक्तियां याद आ गयीं:
“हम उर्दू सीख रहे हैं नेट-युग में,
अब खुद जवाब लिखते हैं गाते हैं।
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं।“
हमने अपनी उर्दू सीखने की बात बताई तो शब्बीर बोले -’हम सिखा देंगे। कहां रहते हैं बता दो आ जाया करेंगे।’
हमने कहा सीख लेंगे। सिखाने वाले तो बहुत हैं। सीखने का समय ही नहीं मिलता। मेरी फ़ैक्ट्री में ही एक कामगार साथी हमको उर्दू की वर्णमाला किताब देकर गये हैं। पहले तो पूछते भी थे - ’रियाज कैसा चल रहा है।’ अब रियाज और पूछना दोनों बन्द।
जब जेब के कागज दिखा रहे थे शब्बीर तो हमने देखा कि उनके एक हाथ की तीन अंगुलियों के एक-एक पोर कटे हुये थे। बताया कि आरे में कट गये थे। हमको फ़िर अपने एक आत्मीय मित्र की याद आई जिनके एक हाथ की उंगलियां भी इसी तरह कटी हुई थीं। शब्बीर से बात करते हुये उन मित्र की याद भी करते रहे।
बलरामपुर गोंडा की रिहाइश जब बताई थी शब्बीर ने तो हमने अटलबिहारी बाजपेयी जी को याद किया था जहां से वे कभी चुनाव लड़ते थे। यह भी कि बलरामपुर में ही हमारे बड़े भाई की पहली नौकरी लगी थी।
मुंबई होकर लौटने की बात से जबलपुर पुलिया वाले रामफ़ल भी याद आ गये जो अपने मुंबई के भी किस्से सुनाते रहते थे।
एक ही इंसान से बात करते इतनी सारे लोगों की याद आने वाली बात से निदा फ़ाजली का यह शेर याद आ गया:
"हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना "
अमूमन यह शेर आदमी के बहुरुपियेपन और चालाकी की फ़ितरत बताने के लिये इश्तेमाल किया जाता है। लेकिन आज शब्बीर से मिलकर इस शेर के दूसरे मायने भी खुले। एक आदमी से मिलते हुये आप अपने साथ जुड़े हुये अनेक लोगों की यादें ताजा कर सकते हैं। शब्बीर जी मिलना कई दोस्तों और आत्मीयों को एक साथ याद करना जैसा रहा। क्या पता उनको भी हिचकियां आई होंगी।
एक शेर के नये मायने पता चले आज शब्बीर जी से मुलाकात के बहाने।
चाय पीते हुये एक प्यारा सा बच्चा भी आया चाय की दुकान पर। अपनी दुकान के लोगों के लिये चाय ले जा रहा था। मासूम बच्चा देखकर पास बुलाकर बात की। पढाई-लिखाई पूछी। पता चला - ’आठवीं में किसी पढता है। एक अंग्रेजी मीडियम स्कूल में। आज इतवार को पिता का हाथ बटाने आ गया। जूते चप्पल की दुकान है पिता की।’
सामने क्रिकेट खेलते बच्चों को देखते हुये हमने पूछा - ’क्रिकेट नहीं खेलते तुम।’
वह बोला-’हमको क्रिकेट नहीं पसंद। हम पतंग उड़ाते हैं।’ हमको फ़िर केदारनाथ सिंह जी की पतंग वाली कविता याद आ गयी:
"हिमालय किधर है?
मैंने उस बच्चे से पूछा जो स्कूल के बाहर
पतंग उड़ा रहा था
उधर-उधर – उसने कहा
जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी
मैं स्वीकार करूँ
मैंने पहली बार जाना
हिमालय किधर है!"
इस बीच शब्बीर जी अपने घर से बिना नाश्ता किये आने की बात और पास की दुकान से पूड़ी-सब्जी खाने की बात बताई। 10 रुपये में पांच पूड़ी-सब्जी। इसके बाद यह भी कहा-’कानपुर में गरीब आदमी का गुजर-बसर सस्ते में आराम से हो सकता है।’ हम इसमें कोलकता को भी जोड़ते हैं। अल्लेव कोलकता भी जुड़ गया यादों के गुलदस्ते में।
चाय की दुकान से विदा होकर हम वापस लौटे। उस जगह आये जहां हमारी सैंट्रो सुन्दरी खड़ी थी। सामने एक ’शुक्ला आर्म्स कारपोरेशन’ का बोर्ड दिखा। फ़ोटो खैंच लिया। भौकाल के लिये लोगों से कहेंगे ’कट्टा कानपुरी’ का असलहा केन्द्र है। हमारे फ़ोटो खैंचते ही वहां खड़े एक युवक ने पूछा - ’फ़ोटो किस लिये खींचा?’
हमने बताया- ’ऐसे ही खैंच लिया। अपन भी शुक्ला हैं। एतराज है तो बताओ मिटा दें।’
वो बोला-’ नहीं वो वाली बात नहीं लेकिन बेवकैमरा लगा है। दुकान में। साहब हमसे पूछेंगे।’
हमने देखा कि सही में एक बेवकैम सड़क की तरफ़ मुंडी किये फ़ोटो खैंचने में लगा था। हमारी भी फ़ोटो खैंच लिहिस होगा।
पता चला कि बच्चा मुंबई का है। राघव नाम है। कानपुर आया है काम के लिये। हमने पूछा -”यार, ये उल्टे बांस बरेली को। कानपुर के लोग मुंबई जाते हैं काम के लिये। तुम उधर से इधर आ गये।“
बोला- ’साहब को हमारा काम पसंद इसलिये ले आये।’
वहीं सड़क पर ही एक आदमी एकदम टुन्नावस्था समाधि मुद्रा में बैठा था। राघव ने बताया- ’सब नशेड़ी हैं। नशा किये पड़े रहते हैं।’
हमको इस बार रमानाथ अवस्थी जी या आ गये:
चाहे हो महलों में
चाहे हो चकलों में
नशे की चाल एक है!
किसी को कुछ दोष क्या!
किसी को कुछ होश क्या!
अभी तो और ढलना है!
नशे की बात चलते ही कैलाश बाजपेयी भी याद आ गये:
नदी में पड़ी एक नाव सड़ रही है
और एक लावारिश लाश किसी नाले में
दोनों ही दोनों से चूक गये
यह घोषणा नहीं है, न उलटबांसी,
एक ही नशे के दो नतीजे हैं
तुम नशे में डूबना या न डूबना
डुबे हुओं से मत ऊबना।
इतनी सारी यादों में डूबते-उतराते, सड़क पर अपनी सैंट्रो सुन्दरी चलाते हम तिवारी स्वीट्स हाउस पहुंचे। घर के लिये जलेबी- दही तौलवाई। अपने हिस्से की वहीं बैठकर खाई। इसके बाद दुलकी चाल से चाल से चलते हुये घर आ गये।
अब सारी यादों को तसल्ली से दोहराते हुये यह पोस्ट लिख रहे हैं। अगर हिचकी आये, तो खुद को हमारे द्वारा या अपने किसी अजीज के द्वारा याद किया हुआ समझना। दुष्यन्त कुमार की इस कविता को खास अपने लिये लिखा हुआ समझना:
"जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।
चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें।
हँसें
मुस्कुराएँ
गाएँ।
हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलाएँ।
अपने पाँव पर खड़े हों।
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।"

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खड़खड़ों, खम्भे और पेड़ का गार्ड ऑफ ऑनर

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति
पंकज बाजपेई अपने साज-सामान के साथ


सुबह निकलते-निकलते नौ बज गये आज। जलेबी-दही लाने का आदेश हुआ। घर में कन्या खिलाई जानी थीं। लौटने की समय-सीमा तय नहीं की गयी थी। सो सोचा पंकज बाजपेई जी से भी मिलते आयेंगे।

जाते समय ’तिवारी स्वीट्स हाउस’ रुके। सोचा पहले जलेबी पक्की कर लें। बाहर एक 100 नंबर वाली गाड़ी भी किनारे खड़ी थी। नाली की तरफ़ मुंह किये। लेकिन टुन्न टाइप नहीं थी। चुस्त-चौकस खड़ी थी। 100 नम्बर की गाड़ी मतलब पुलिस की गाड़ी । मतलब कानून व्यवस्था का वाहन।
कानून की गाड़ी को देखकर लगा कि इस गाड़ी के आगे-पीछे भी कईयो गाड़ियां कसी गई होंगी। असेम्बली में कईयों के पुर्जे एक ही ट्रे में साथ-साथ, ऊपर-नीचे लुढकते-पुढकते आये होंगे। कोई पुर्जा लगते-लगते हाथ से छिटक गया होगा। कईयों पुर्जे एक ही भट्टी में गलकर बने होंगे। आगे-पीछे बनी गाड़ियां असेम्बली लाइन से निकलकर अलग-अलग हो गयीं होगी। अलग-अलग बिक गयी होंगी। यह 100 नम्बर में लगी है। क्या पता इसके आगे वाली किसी टैक्सी स्टैन्ड में लगी हो, पीछे वाली दहेज में गई हो, उसके पीछे वाली में तस्करी का माल आर-पार हो रहा हो। मतलब कुछ भी हो सकता है। एक ही स्कूल में पढे लड़के जैसे अलग-अलग फ़ितरत के साथ आगे बढते हैं वैसे ही गाड़ियों के भी हाल। मतलब गाड़ी और इंसान की एक सरीखी नियति।
'तिवारी स्वीट हाउस' वालों ने बताया कि जलेबी दोपहर तक मिलेगी। आराम से आयें। हम 100 ग्राम जलेबी पंकज बाजपेयी के लिये तौलवा के चल दिये। 34 रुपये की पड़ी। रास्ते में आगे एक मंदिर के सामने पूजा-पाठ फ़ुल जोर दारी से हो रहा था।
पंकज भाई अपने ठीहे से नदारद थे। लगा कि वापस चले गये होंगे। गाड़ी किनारे ठढिया के उनके बारे में पास की दुकान से दरियाफ़्त करने की सोच ही रहे थे कि सामने से हिलते-डुलते नमूदार हुये पंकज भाई। देखते ही बोले-’ तुम आ गये। बहुत दिन बाद आये।’ साथ में- ’चिन्ता मत करना। हम हैं न!’ कहते हुये फ़िर-फ़िर कहते रहे- ’तुम आ गये। बहुत दिन बाद आये।’
इसके साथ ही पैर छूने वाली मुद्रा में हाथ से जमीन की तरफ़ इशारा करते हुये 45 डिग्री का कोण बनाया।
हमने पूछा - ’ अच्छा हमारा नाम तो बताओ। पिछली बार याद कराया था। कह रहे थे अबकी याद रखेंगे। भूलेंगे नहीं।’
नाम की बात कई नाम कयास करते हुये बोले उन्होंने- सुधीर, संतोष आदि। सब नाम तीन अक्षर के। हमने कहा -’अ से है नाम। भूल गये।’
फ़िर कई नाम अनुमान लगाते हुये बोले- ’अशोक, अनिल, अमित .. और भी कई नाम।’
हमने फ़िर हिंट दी - ’अ’ के बाद ’न’ आता है।
बोले- ’अनुपम।’
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, वृक्ष, आकाश और बाहर
खड़खड़े, खंभे और इमली का पेड़ सब सूरज भाई को सलामी देते हुए
हमने बताया तो कई बार दोहराते हुये बोले- ’अनूप, अनूप., अनूप...’। साथ ही कहा-’ अब याद रखेंगे। भूलेंगे नहीं।’
हमने बताया -’ पिछली बार जो लाये थे खाने के लिये वही लाये हैं। याद है पिछली बार क्या लाये थे?’
बोले- ’जलेबी, दही।’
मतलब खाने की चीज याद थी। उनको निकालकर दी तो झोले में धर ली। बोले - ’घर में जाकर आराम से खायेंगे।’
हमने पूछा -’चाय पियोगे?’
बोले- ’चाय अभी पी है। बाद में पियेंगे। अभी समोसा खिलाओ।’
समोसे की दुकान से दो समोसे लिये गये। दो नहीं तीन। एक अपने लिये दो उनके लिये। 15 रुपये में। हमने तो वहीं खड़े होकर खाना शुरु कर दिया। उन्होंने समोसे भी धर लिये। बोले -’घर जाकर खायेंगे।’
आज की ड्रेस में उनके कोट नहीं था। हल्का अंगरखा टाइप या ज्यादा ठीक होगा सलूका टाइप परिधान धारण किये थे। बताया कि नहाकर आये हैं। पता नहीं किस बात पर बोले-’ भाभी बहुत सफ़ाई पसन्द हैं। उनको हमारा चरण स्पर्श कहना।’
हमने पूछा - कौन भाभी?’ तो उन्होंने मेरी पत्नी के बारे में बताया। हमने सोचा कि यह कैसे पता कि वो सफ़ाई पसन्द है? बोले-’ हमको पता है।’
हमने कहा-’ आज तुम्हारे घर चलें?’
बोले- ’आज नहीं फ़िर चलना। अभी मामी हैं नहीं घर पर।’
चलते हुये हमने फ़िर पूछा -’चलो चाय पीते हैं।’
बोले-’ अभी नहीं अब शाम को पियेंगे। तुम हमको पैसे दे देव। हम पी लेंगे।’
हमने पूछा-’ कित्ते पैसे ?’
बोले- ’10 रुपये।’
इसके बाद हम चलने को हुये। वो भी चल दिये। गाड़ी मोड़कर लाये तो वे फ़िर अपने डिवाइडर सिंहासन पर आरूढ हो गये थे। हमने पूछा -’गये नहीं अभी तक?’
बोले- ’जायेंगे। अभी थोड़ी देर में।’
हमने अपने को हड़काया कि 100 ग्राम जलेबी, समोसा और एक चाय पर किसी इंसान के उठने-बैठने पर सवाल करने का हक समझने लगे तुम? आदमी हो या किसी युनिवर्सिटी के वीसी जो बच्चों के रोजमर्रा के जीवन पर फ़तवा देना अपना हक समझता है।
बहरहाल हम वापस लौट लिये। एक जगह पेट्रोल भरवाया। पेट्रोल वाले को चाबी देते हुये सामने खड़े खड़खड़ों की फ़ोटो खैंचने लगे। खलखड़े तोप की सलामी मुद्रा में खड़े थे। उनकी देखादेखी एक खम्भा भी झुककर खड़खड़ों जितना ही झुक सा गया था। इसके बाद देखा तो बगल का इमली का पेड़ भी वैसा ही खड़ा दिखा। मतलब पूरी कायनात एक तरह सी झुकी खड़ी थी। ऐसा लग रहा था कि सब मिलकर सूरज भाई को गार्ड ऑफ ऑनर सरीखा दे रहे हों।
घोड़े इस सब से निर्लिप्त आपस में हिनहिनाते, टांगे हिलाते वार्मअप टाइप करते खड़े थे। एकाध ने खड़े-खड़े जमीन पर लीद भी कर दी। अब जमीन पर लीद न करें तो कहां करें? उनके लिये अभी कहीं सुलभ शौचालय बने हैं न कहीं 'घोड़ा शौचालय' मल्लब 'हॉर्स टॉयलेट'।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग पैदल चल रहे हैं और बाहर
सड़क की तारकोल कार्पेट पर क्रिकेट मैच
फोटो लेकर फुरसत हुए तब तक देखा 150 से ऊपर का पेट्रोल टँकी में घुस चुका था। हमने सोचा इत्ती जल्ली कैसे इत्त्ता पेट्रोल घुस गया। न तो हमारी टँकी कोई सरकारी पार्टी है और न ही पेट्रोल कोई राजनेता जिसको हमारी टँकी में घुसने की हड़बड़ी हो। पूछने पर पम्प वाले ने बताया -'आप फोटो खैंच रहे थे। हमने दाब दिया।' हमने सोचा ठीक ही किय्या।
आगे एक बन्द मिल की चिमनी और उसके पास आज समाचार पत्र का दफ़्तर दिखा। दोनों को एक साथ देखकर कैप्शन उभरा -
’मिल की चिमनी और शहर का अखबार,
कभी ये दोनों आग उगलते थे यार।’
कैप्शन के उभरने के बाद सोचा उनका फ़ोटो भी लिया जाये। कई कोशिश के बाद फ़ोटो आया। मिल तो आ जा रही थी लेकिन अखबार का नाम हर बार दांये-बायें हो जा रहा था। जिस तरह मीड़िया जरूरी खबरों को गैरजरूरी हल्ले की आड़ में छिपाकर उनसे अवाम का ध्यान बंटाता है ऐसे ही अखबार के पास का पेड़ अखबार का नाम छिपा रहा था।
लाटूस रोड के दोनों तरफ़ कई बच्चों की टोलियां सड़क पर अद्धे-गुम्मे के विकेट बनाये सड़किया क्रिकेट खेल रहे थे। टेनिस की गेंद के धुर्रे उड़े हुये थे। बूढी गेंद गेंदबाज के हाथ से सीधी निकलने के बावजूद सड़क पर टप्पे खाते हुये अपने आप वाइड हो जा रही थी। शॉट मारने के लिये उठे बल्ले को गच्चा देते हुये विकेट के पीछे चली जा रही थी। क्या पता बाद में कहती हो- ’ किस्मत अच्छी थी, बैट-बैट बची।’
आगे पुराना मकान देखा जिसमें छत पर हवाई जहाज बनाया हुआ है। जहाज के पंखे हिल रहे थे। हम बचपन में गांधीनगर से चौक अपनी बुआ के घर आते-जाते इस जहाज को कौतुक से देखते थे। सोचते थे कि यह जहाज कैसे छत पर उतरा होगा।
थोड़ा आगे चलकर अपन मूलगंज चौराहे पहुंच गये। वहां गाड़ी एक किनारे खड़ी करके चौराहे के नजारे लेने लगे।

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कालजयी उपन्यास चित्रलेखा - एक अजीब ऊब-सी का उत्पाद


कानपुर में मेरे मित्र श्री बालकृष्ण शर्मा नवीन थे, निहायत औला-मौला आदमी। एक दिन कानपुर में उन्होंने कौशिकजी की मंडली में अनातोल फ़्रांस के ’थाया’ उपन्यास की बड़ी तारीफ़ की। तो जब मैं हमीरपुर पहुंचा तो वहां श्री भडकांकर कलेक्टर थे- इन्दौर की सुप्रसिद्ध लेखिका श्रीमती कमलाबाई के दामाद। श्रीमती कमलाबाई मेरी कविताओं से बड़ी प्रभावित थीं, तो उन्हीं के रिश्ते से मैं मिस्टर भडकांकर से मिला। कुछ रूखे से सहृदय आदमी, वह मुझे मानने लगे। उनकी एक निजी लाइब्रेरी थी। उस लाइब्रेरी में ’थाया’ उपन्यास की एक प्रति मुझे दिख गई, तो मैं उसे ले आया। मैं उसे आद्योपांत पढ भी गया और पढने के बाद मुझे लगा कि वह उतना महान उपन्यास नहीं है जितना नवीन ने बतलाया था। मैं भी वैसा उपन्यास लिख सकता हूं।
तो मैं हमीरपुर में सुबह अपने आफ़िस में बैठा। मेरे मुंशी मुवक्किल फ़ंसाने के लिये बाजार में निकल गये थे। एक अजीब ऊब-सी अनुभव कर रहा था। एकाएक सर को झटका दिया। वहीं बाजार से दो आने की एक कॉपी खरीद लाया, और उसमें मैंने लिखा- श्वेतांक ने पूछा , और पाप?"
उस समय मुझे क्या पता था कि मैं एक क्लासिक का श्रीगणेश कर रहा हूं। मैंने ’चित्रलेखा’ को लिखना आरम्भ कर दिया। उस उपन्यास को पूरा करने में मुझे दो वर्ष लगे। उन दो वर्षों में मैं कितना भटका, कितना घूमा इसकी अलग कहानी है।
भगवती चरण वर्मा के आत्मकथात्मक उपन्यास ’धुप्पल’ से।
* चित्रलेखा उपन्यास की शुरुआत करते समय भगवती चरण वर्मा की उमर थी कुल जमा 27 साल। पूरा करते 29 साल हो गयी होगी। आपको भी अगर कभी ऊब-सी महसूस हो तो इसको एक कालजयी सृजन का संकेत मानिये और कुछ लिखना शुरु कर दीजिये।
इसी बात पर अपने लेख- ’बोरियत जो न कराये’ का यह वाक्य याद आ गया-"दुनिया में जो भी होता है सब बोरियत से बचने के लिये होता है।" लेख का लिंक कमेंट बक्से में।’

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भगवतीचरण वर्मा अपने आत्मकथात्मक उपन्यास 'धुप्पल' में


मेरी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा यह है कि विश्व के अमर सहित्यकारों में मेरी गणना हो। तो अपने जीवन काल मे यह होता दिखाई नहीं देता। विश्व-साहित्य के संदर्भ में हिंदी-साहित्य नगण्य समझा जाता है। वैसे न तो वह नगण्य है न अन्य साहित्यों से नीचा है। लेकिन हम भारतवासी एक विकृति से बुरी तरह ग्रस्त हैं। हमें आत्महंता-योग प्राप्त हुआ है, यानी हम सब आत्मघाती हैं। अपने साहित्य और साहित्यकारों के हमीं सबसे बड़े दुश्मन हैं।
-भगवती चरण वर्मा अपने आतकथात्मक उपन्यास 'धुप्पल' में