Sunday, January 17, 2016

पुस्तक मेले से वापसी

ज्ञान जी कमलेश पाण्डेय जी के साथ
पुस्तक मेले में पहुंचते हुए हमको पांच बज गए थे। पहुंचते ही हम अंदर जाने के लिए लपके लेकिन पता चला कि मेले का टिकट भी लेना है। यह बात किसी पुस्तक मेला यात्री ने अब तक बताई न थी।

खैर टिकट की लाइन में लगे तो पता चला कि टिकट काउंटर वाले के पास फुटकर पैसे नहीं थे। ज्ञान जी की किताब के विमोचन का समय हो चुका था लेकिन फुटकर पैसे के अभाव में हम अटके हुए थे। कुछ लोग दस बीस रूपये छोड़कर टिकट मेले की तरफ लपक रहे थे। पर हम अस्सी रूपये कैसे छोड़ दें यह समझ नही आ रहा था। खैर कुछ देर के बाद फुटकर पैसे आये काउंटर पर और हम लपकते हुए हाल नम्बर 12 अ की तरफ पहुंचे। गेट पर ही मिली बस की सहायता से।
किताबघर प्रकाशन की स्टॉल पर ज्ञान जी को सुनते लोग
 वहां जिससे भी पूछा उसने किताबघर का नया रास्ता बताया। मैं मुक्तिबोध की कविता की तर्ज पर 'घूम गया कई मोड़' दूकान की खोज में। जब दुकान मिली तब तक विमोचन हो चुका था और मदन कश्यप जी बोलना शुरू कर चुके थे।

हमने सोचा था मेले में खूब किताबें खरीदेंगे लेकिन खर्च बचा इस बहाने कि एक तो रास्ते में कोई एटीएम नहीं मिला कि पैसे निकाल लें। मशीन से पैसा लेने का इंतजाम दुकान वालों के पास था नहीं। इसके अलावा जब तक विमोचन का काम और गुफ्तगू निपटी तब तक मेला भी निपट गया था कल का।

ज्ञान जी के साथ अनूप शुक्ल। फोटो खींची सन्तोष त्रिवेदी ने।
दौड़ते भागते हुए हिन्द युग्म का स्टॉल दिखा जहां मेरे कई मित्रों की पुस्तकों का विमोचन हुआ। वीनस केसरी का अंजुमन प्रकाशन दिखा नहीं। चीनी और दूसरे देशों की पुस्तकों को देखने की हसरत ने तो सर ही नहीं उठाया।  :)
अरविन्द पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह 'आत्मालाप' का विमोचन करते हुए सुशील सिद्धार्थ, सुभाष चन्दर, प्रेम जनमेजय और
 
मेले के बाहर निकलते ही एक भेलपुरी के खोमचे से भेलपुरी ली। जितनी की टिकट मेले की उतनी की ही भेलपुरी। किताबों का स्वाद तो पढ़ने पर मिलेगा। भेलपुरी तत्काल स्वादिष्ट लगी। भूखे जो थे।

सुशील सिद्धार्थ, अनूप श्रीवास्तव, , प्रेम जनमेजय और ज्ञान चतुर्वेदी जी। पीछे अनूप शुक्ल।
भेलपुरी बेचने वाले बालक राहुल ने बताया कि कल मेले में 800 रूपये की बिक्री हुई। रोज इतनी ही होती है। इसमें आधा फायदा हुआ। शाहजहाँपुर के रहने वाले , कक्षा 9 पास बालक राहुल ने बताया कि आम दिनों में वह इण्डिया गेट के पास खोमचा लगाता है लेकिन मेले के दौरान यहां आ गया। उसके पिता और भाई भी इसी तरह के काम करते हैं। उससे कुछ देर और बतियाकर हम वापस लौट लिए।

वापस लौटने के रास्ते और तरीके कई लोगों से पूछे।।हर एक ने अलग-अलग रास्ता बताया। कोई बोला मेट्रो पकड़ लो। दो जगह बदलकर चले जाना। किसी ने कहा ऑटो कर लो।300 रूपये लेगा सीधे उतार देगा ठीहे पर। बहुमत जनता की सलाह बस से जाने की थी। उसी को मानकर हम बस स्टैंड की तरफ चल दिए।

निर्मल गुप्त जी के आने में देरी हुई पर उनकी भेंट हो ही गयी ज्ञान जी से।
बस स्टैंड तो कई मिले लेकिन हमारा वाला काफी देर में मिला। लोगों से पूछते-पूछते आगे बढ़ते गए। एक जगह फुटपाथ पर एक युवा लड़का-लड़की टहल रहे थे। हमने उनसे रास्ता पूछा तो उन्होंने इतने अच्छे से और इत्मिनान से बताया कि हमारा मन किया उनसे पूछने का कि आपकी समझ ने व्यंग्य किसको कहते हैं? हिंदी व्यंग्य की आज की स्थिति के बारे में आपकी क्या राय है? लेकिन फिर हमको लगा कि यह उनकी भलमनसाहत की बात के जबाब में ठीक नहीं होगा। नहीं पूछे।

ज्ञान जी सुशील सिद्धार्थ और सन्तोष त्रिवेदी के साथ।
आगे बस स्टैंड मिला और जरा सी देर में बस भी। 20 रूपये के टिकट में एक घण्टा चलने के बाद जहां उतरे पता चला कि हमारा गन्तव्य दो किमोमीटर पीछे छूट गया था। यह तब हुआ जब एक यात्री और कंडक्टर ने जिम्मा लिया हुआ था कि मैं चिंता न करूँ वे हमें सही जगह उतार देंगे। जब हम अपनी तरफ से लगभग अपने जोखिम पर उतरे तो दोनों ने ही बिना किसी अपराध बोध के कहा - 'आपको पीछे वाले स्टॉप पर उतरना था।'
खैर हम 2 किमी पीछे पैदल चलते, पूछते और भटकते हुए वापस आये और अंतत: अपने ठीहे पर पहुंचे।
गन्तव्य पर पहुंचने के दौरान अपनी यात्रा को लेखन से जोड़कर देखते हुए सोचता रहा मैं की यात्रा कोई भी रास्ता बताने वाले लोग कई मिलेंगे लेकिन रास्ते का और यात्रा किस तरह की जाए इसका चुनाव खुद को ही करना होता है। इस प्रक्रिया में भटकाव और देरी भी हो सकती है लेकिन लगे रहे तो मंजिल अवश्य मिलती है। मंजिल कितनी जल्दी मिलती है यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे चुने हुए रास्ते कैसे हैं और हम रास्ते में मिलने वालों संकेतों को कितनी अच्छी तरह पढ़ने में सक्षम होते हैं।

मेले के बाहर भेलपुरी बेंचते राहुल।

बात कुछ ज्यादा ऊँची हो गयी और काम भर की बोरिंग भी इसलिए अब पुस्तक मेले का किस्सा खत्म।
यह पोस्ट दिल्ली से मुम्बई जाते हुए 10000 मीटर ऊंचाई पर हवाई जहाज पर लिखी जा रही। मतलब देखिये हम हिंदी को जमीन से 10 किमी ऊँचा तो उठा ही दिए। मुम्बई से रात तक गोवा पहुंचेंगे। वहां हफ्ते भर की ट्रेनिंग के दौरान गोवा के किस्से सुनायेंगे आपको।

ठीक है न।

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