Wednesday, January 13, 2016

फ़ूलचन्द और मोहनकुमार से मुलाकात

फूलचन्द और मोहनकुमार
कल दोपहर दो लोग पुलिया पर बैठे बीड़ी का धुंआ खींच रहे। उनकी साइकिल सामने में खड़ी धूप खैंच रही थी।

जिस तेजी से धुंआ अन्दर-बाहर कर रहे थे फ़ूलचन्द और उनके साथी मोहनकुमार उससे लगा कि शायद वे बीड़ी पीते हुये कपालभाती सिखाने का अभ्यास कर रहे हों।

फ़ूलचन्द की उमर 65 साल। मोहनकुमार करीब 46 साल। बिल्डिंग बनाने का काम करते हैं। फ़ूलचन्द मिस्त्री हैं। मोहनकुमार बेलदार मतलब सहायक।

हमें लगा कि शायद मजूरी करते होंगे और आज मजूरी नहीं मिली तो पुलिया पर सुस्ताने लगे होंगे लेकिन फ़ूलचन्द ने बताया कि वे अब केवल मिस्त्री नहीं रहे। बिल्डिंग बनाने वाले ठेकेदार हो गये हैं। 100 लोगों तक लोगों को काम लगाते हैं। सैकड़ों मकान बना चुके हैं। आज भी कहीं काम लगा है। हमसे भी पूछा- ’ बनवाना होय आपको भी तो बताओ।’


साइकिल धूप सेंक रही है
फ़ूलचन्द ने अपने काम की शुरुआत बेलदारी से की। बताया कि वीएफ़जे और जीआईएफ़ जब बनी थी तो हमने बेलदारी की। शुरु में ढाई रुपया रोज और फ़िर चार रुपये रोज मिलते थे (साठ का दशक)। आज न्यूनतम मजदूरी सौ गुनी बढकर 300 पार हो गयी है।

अपने काम करने वालों को कितना पैसा देते हो? पूछने पर फ़ूलचन्द बोले-’200 से 300 तक। जैसा काम आता हो।’

लेकिन न्यूनतम मजदूरी तो 300 रुपया है। कम क्यों देते हो? - मैंने पूछा।

आप लोगों के यहां काम करने वाले ठेकेदार तो 180 - 200 रुपया देते हैं अपने कामगारों को। - फ़ूलचन्द का जबाब प्राइम टाइम के पार्टी प्रवक्ताओं सरीखा था जो अपनी पार्टी के ऊपर लगे किसी आरोप का जबाब दूसरी पार्टी के ऊपर और बड़े आरोप लगाकर देने को सबसे सटीक जबाब मानते हैं।

3 लड़के 2 लड़कियों वाले फ़ूलचन्द के सब बच्चों की शादी हो गयी है। नाती-नातिन हैं। भरा-पूरा परिवार है।
लगते नहीं 65 साल के यह सुनकर और युवा हो गये फ़ूलचन्द।

मोहनकुमार ने बेलदारी का काम दो साल पहले शुरु किया। इसके पहले कुछ करते नहीं थे। 3 बच्चे हैं। तीनों अपना-अपना कुछ-कुछ काम करते हैं।

इसके पहले कुछ क्यों नहीं करते थे ? यह सवाल पूछने पर बताया- घर की देखभाल करते थे। पिताजी जीआईएफ़ में काम करते थे। 1990 में नहीं रहे। माताराम को पेंशन मिलती है।

यह अपने में मजेदार बात सी है न कि 3 बच्चों का पिता 44 साल की उमर तक माताराम की पेंशन के सहारे घर परिवार की जिम्मेदारी निभाता रहे और उसकेबाद फ़िर कामधाम शुरु करे।

बीड़ी पीने के लिये टोंका तो फ़ूलचन्द बोले - ’बस यही एक नशा है। और कोई नशा नहीं करते नहीं। बीड़ी नहीं पियेंगे तो टट्टी नहीं उतरेेगी। बीमार हो जायेंगे। ’

क्या कहते इस बात पर? धूप सेंकते हुये मेस में आ गये।

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