Sunday, January 17, 2016

'व्यंग्य विसंगतियों को कम से कम शब्दों में व्यक्त करने वाली विधा है

मदन कश्यप ज्ञान जी के लेखन के बारे में बात करते हुये

'व्यंग्य विसंगतियों को कम से कम शब्दों में व्यक्त करने वाली विधा है।' कुछ ऐसी ही बात कह रहे थे बोलने वाले जब हम किताबघर के स्टॉल पर पहुंचे। हमको पता नहीं था कि वक्ता कौन हैं पर पूछने पता चला की मदन कश्यप जी हैं।

जितेंद्र श्रीवास्तव ज्ञान जी के लेखन के बारे में बोलते हुये
सामने Gyan Chaturvedi जी बैठे अपनी तारीफ़ सर झुकाये सुन रहे थे। मदन कश्यप जी के बगल में और कुछ व्यंग्यकार बैठे थे। संतोष त्रिवेदी ज्ञान जी की बायीं तरफ से मोबाइल पर रिकॉर्डिंग और फोटोबाजी में लगे थे। दांयी तरफ से Sushil Siddharth जी कुशल संचालन कर रहे थे। (संतोष-सुशील जी को बाएं-दायें लिखने के बाद 'जे बिनु काज दाहिने बाएं' लिखने का मन किया पर हमने मन को डपट दिया -हर समय मजाक ठीक नहीं होता)। मदन जी के बाद सुशील जी ने जीतेन्द्र श्रीवास्तव को बोलने के लिए बुलाया। उन्होंने कबीर, नागार्जुन आदि कवियों की कविताओं के व्यंग्य की याद करते हुए ज्ञान जी पर अपनी बात कही। कविताओं में व्यंग्य की बात चलने पर सुशील जी ने अदम गोंडवी की गजल का शेर पढ़ा:

"काजू भरे प्लेट में व्हिस्की गिलास में
उतरा है राम-राज्य विधायक निवास में।"

विवेक मिश्र ज्ञान जी के बारे में बोलते हुये
इसके बाद में साहित्य में क्षेत्रवाद लागू हुआ और इसकी डंके पर घोषणा करते हुए सुशील जी ने विवेक मिश्र जी को बुलाया जो कि बुन्देलखण्ड से हैं जहां से ज्ञान जी भी हैं। बुन्देली आदमी की खसियत बताते हुए विवेक जी ने कहा- 'बुन्देली आदमी कभी सीधे बात नही करता। उससे आप वह कभी नहीं कहलवा सकते जो वह कहना नहीं चाहता। वह वही कहेगा जो कहना चाहता है।'

बाद में लगे हाथ ज्ञान जी के वक्तव्य से इस बात की पुष्टि भी हुई। :)

सुभाष चन्दर ज्ञान जी के बारे में अपनी बात कहते हुये
अगले वक्ता थे इस साल का व्यंग्यश्री पुरस्कार पाये व्यंग्यकार Subhash Chander जी। चश्मा माथे के ऊपर चढ़ाकर जब सुभाष जी ने बोलना शुरू किया तो मुझे अपने सीनियर याद आये। याद आने का कारण यह कि उनका भी नाम Subhash Chander है और वे भी जब बोलना शुरू करते हैं तो चश्मा माथे के ऊपर चढ़ा लेते हैं। संयोग यह भी कि दोनों की पैदाइश भी हरियाणा की है।

सुभाष जी ने ज्ञानजी की तारीफ़ करते हुये कहा कि उन्होंने व्यंग्य की विधा में अनेक नए प्रयोग किये। प्रयोग तो तमाम लोगों ने किये लेकिन ज्ञानजी ने जो प्रयोग किये उनके साथ उनकी पठनीयता और रोचकता बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हुई। इसीलिये ज्ञान जी ज्ञान जी हैं।

ज्ञान जी अपनी बात कहते हुये
इस बीच और लोग आते गए। सुनीता शानू और Archna Chaturvedi आयीं। Alok Puranik और Avinash Vachaspati पहुंचे। लखनऊ व्यंग्य घराने के अनूप श्रीवास्तव जी और Pankaj Prasun भी मौजूद थे। Kamlesh Pandey जी अपनी किताब के विमोचन के लिए तैयार थे जो की भावना प्रकाशन के स्टॉल पर हुआ था।
अंत में ज्ञान जी ने अपनी किताब 'रन्दा' के बहाने कुछ बातें साझा कीं। बताया कि 'सहारा समय' के सम्पादक मंगलेश डबराल उनके व्यंग्य 'रंदा' स्तम्भ में छापते थे। अच्छा पैसा देते थे। यह लिखते समय मुझे याद आ रहा है कि ज्ञान जी ने सहारा श्री के बारे में कुछ नहीं कहा जो बेचारे महीनों से पैसों के ही चक्कर में जेल में बन्द हैं। :)
सुशील सिद्धार्थ, ज्ञान चतुर्वेदी और सुभाष चन्दर


ज्ञान जी ने नए समय में व्यंग्य लेखन की बढ़ती चुनौतियों की बात कहीं। राजनीति पर व्यंग्य लिखने वाले लोग राजनीति की बहुत सतही समझ रखते हैं। राजनीति इतनी आसानी से समझ में आने वाली चीज नहीं है। सोशल मिडिया पर आज व्यंग्य लेखन बहुत कम शब्दों में कहने का चलन है।समय और बाजार की ऐसी मांग है। लेकिन कला अगर अच्छी होगी तो उसकी मांग बाजार में हमेशा रहेगी।

सुशील सिद्धार्थ ज्ञान जी के साथ

ज्ञान जी ने 'हम न मरब' उपन्यास में प्रयुक्त गालियों के बारे में बात की। महिलाओं के एक एनजीओ द्वारा कुछ किताबें खरीदी गयीं। उनके अनुभवों को बताते हुए बताया कि उनको किताब में कहीं गालियां नहीं अखरीं।।इसके बाद ज्ञान जी केवल गालियों के नाम पर उपन्यास खारिज करने की बात को इसी तरह का उदाहरण बताया जैसे कोई स्वादिष्ट खीर खाने के बाद खीर के स्वाद की बात न करके सिर्फ उसमें आये एक कंकड़ का स्यापा करे।

इसके बाद ज्ञान जी ने 'हम न मरब' उपन्यास में आई गालियों को लेकर उनकी आलोचना करने वालों से मजे लेते हुए कहा--'जिन लोगों को इस उपन्यास में आई गालियों से सांस्कृतिक ठेस पहुंची है मैंने उसके प्रति खेद व्यक्त करता हूँ। उनसे माफ़ी मांगता हूँ।

इतने में ही वहां प्रेम जनमेजय जी आ गए। ज्ञान जी और प्रेम जी लपककर गले मिले और बात आगे बढ़ी। मिठाई बंटी। काफी चली और ज्ञान जी के साथ लोगों ने खूब फोटो खिंचाये।

अनूप श्रीवास्तव, सुशील सिद्धार्थ, ज्ञान चतुर्वेदी और संतोष त्रिवेदी
बातचीत के दौरान सुशील जी और सुभाषजी थे। सुशील जी ने खुद और सुभाष जी को 'रंदा' किताब समर्पित किये जाने की बात का उल्लेख करते हुए इसको इस किताब की खास बात बताया। ज्ञान जी फौरन किताब का समर्पण खोलकर पूरा पढ़ा और बताया कि समर्पण में कन्डीशन भी अप्लाई हैं। पूरा समर्पण इस प्रकार है:
"आप ईर्ष्या न करें, स्वार्थो का बीजगणित न साधें, अपनी कमजोरियों को विधा की विशेषता बनाने पर जोर न दें, वस्तुपरकता का हाथ छोड़कर जुगाड़ की कलम से फतवे जारी न करें, आपमें विधा की समझ भी हो, चिंता भी और उसके प्रति पूरा समर्पण भी, विधा जब आपका कैरियर नहीं , आपकी मुमुक्षा बन जाये- तब- आप वैसे सक्षम आलोचक तथा व्यंग्यकार बन पाते हो जैसे ये दोनों हैं बहुत प्यार तथा सम्मान से सुभाष चन्दर और सुशील सिद्धार्थ को समर्पित।"

पता नहीं ज्ञान जी ने क्यों इसे पढ़ा वहां। शायद वे बाकी लोगों को बताना चाह रहे हों कि ये दो लोग ऐसे हैं इसलिए इनको प्यार से किताब समर्पित की। हो तो यह भी सकता है कि ज्ञान जी ने इसलिए पढ़ा हो पूरा समर्पंण कि वे दोनों समर्थ व्यंग्यकारों से कहना चाह रहे हों कि 'यार, यह समर्पण एडवांस चेक की तरह है। ये ये गुण धारण कर लो फटाक से और ये चेक कैश करा लो। तुम तो समर्थ हो ही। यह कोई बड़ी बात नहीं तुम्हारे लिए।  :)

किताब घर पर विमोचन के बाद लोग भावना प्रकाशन की तरफ लपके।वहां सुभाष चन्दर जी द्वारालिखित ' हिन्दी व्यंग्य का इतिहास' का तीसरा संस्करण और कमलेश पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह का पहला संस्करण अपने विमोचन की राह देख रहे थे। उसका किस्सा अगली पोस्ट में।

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