Monday, January 11, 2016

हनुमान मंदिर के पास ही रहते हैं अंकलजी

दोपहर लंच के बाद हम आफ़िस जा रहे थे। सामने से कुछ महिलायें अपने सर पर लकडियां लिये आती दिखीं। सबके सर पर कटी जंगली लकड़ी का गट्ठर था। लकड़ियां रस्सी से बंधी हुई थीं। वे तेजी से घर की तरफ़ जा रही थीं । हम सोच रहे थे कि उनमें से कोई पुलिया के पास सुस्ताने के लिये रुके तो उनसे बात करते हुये फ़ोटो खींचेगे। लेकिन कोई रुका नहीं। सबको घर लौटने की जल्दी थी शायद।

अचानक एक महिला के सर पर रखे लकड़ी के गट्ठर से कु...छ लकड़ियों के टुकड़े सरककर सड़क पर गिर गये। महिला ठिठककर रुक गयी। सड़क पर पड़ी लकड़ी को देखने लगी। हम बगल से गुजर रहे थे। उसकी लकड़ी सड़क से उठाकर उसके सर पर रखे लकडियों के गट्ठर के ऊपर रख दिया। वह चलने को हुई तो हमने रोककर उनका फ़ोटो लिया। फ़ोटो खींचते हुये हमने पूछा कि कहां से लेकर आ रहीं लकड़ी ? तो उन्होंने बताया कि गेट नंबर 3 के पास लोग जंगल काट रहे हैं वहीं से लेकर आई।

जंगल कटने की बात से याद आया कि फ़ैक्टी के अंदर और बाहर जहां-तहां उगी घास और जंगली झाडियां कटने का ठेका हुआ है। शायद आजकल बाहर कटाई का काम चल रहा है। शनिवार को मेस के आसपास कटिंग का काम हुआ। उस दिन दोपहर को एक महिला मेस के पास लकड़ी के दो गट्ठर इकट्ठा किये उनको घर ले जाने की तैयारी कर रही थी। लकड़ी तो उसने गट्ठर बनाकर और रस्सी से बांधकर सर पर रख ली। इसके बाद एक मोटी झाड़ी , जिसको गट्ठर में बांधना संभव नहीं था, को उठाकर सर पर रखने की कोशिश करती रही। एकाध कोशिश के बाद लकड़ी की झाड़ी तो उसने सर पर रख ली लेकिन झाड़ी के कांटो में उसकी धोती का पल्ला फ़ंस गया। लकड़ी का गट्ठर और झाड़ी को सर पर रखे-रखे धोती के पल्लू को छुड़ाने की कोशिश करते में झाड़ी का कांटा शायद उसकी उंगली में चुभ गया। दर्द से उबरने के लिये उसने उंगली कुछ देर के लिये मुंह में रख ली और घर की तरफ़ चली गयी।

यह सब मैं पुलिया की तरफ़ से मेस की तरफ़ आते हुये देख रहा था। मेस के पास पहुंचने मैं उसके पास पहुंच गया था। बातचीत करने की कोशिश करते हुये पूछा- ’ कहां रहती हो? ये दूसरा वाला गट्ठर नहीं ले जाओगी?

’ यहीं हनुमान मंदिर के पास ही रहते हैं अंकलजी । अभी इसको घर रखकर आते हैं फ़िर उसको भी ले जायेंगे।’ -कहते हुये वह घर चली गयी। बाद में दूसरा गट्ठर भी ले गयी होगी।
 

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