Saturday, June 13, 2015

कैसी आधुनिकता और कैसा विकास

खाना बनाने के लिये ईंधन बीनकर लौटती महिलायें
ये फ़ोटो दो दिन पहले का है। दोपहर को जब मैं लंच के बाद दफ़्तर वापस जा रहा था तब ये महिलायें लकड़ी बीनकर वापस जाती हुई दिखीं। आसपास के पेड़ों के पास गिरी लकड़ियों को बीन बटोरकर ईंधन के लिये घर ले जा रहीं थीं। पानी की बोतल लकड़ियों के साथ समानान्तर बंधी हुई थी। सुबह की निकली होंगी ये लोग। दोपहर को लौट रही हैं।

हम बड़ी तेजी से आधुनिकता की तरफ़ बढ़ रहे हैं। जितनी तेजी से बढ़ रहे हैं हल्ला उससे भी ज्यादा जोर का मच रहा है। लेकिन आसपास के हालात देखते हैं तो सवाल उठता है कि यह कैसी आधुनिकता है और कैसा विकास है जिसमें महिलायें भीषण गर्मी में दोपहर तक ईंधन का इंतजाम करती दिखें। 


खाने का जुगाड़ करते हुये
यह दृश्य जबलपुर का है। शहर के बीच इलाके का। जबलपुर काम भर का अच्छा शहर माना जाता है। संस्कारधानी कहलाता है। राजनीति में घपलेबाजी न होती तो शायद राजधानी भी बनता। जब इस शहर के बीचोबीच इस तरह के दृश्य रोजमर्रा के हैं तो बाकी शहरों और दीगर इलाकों का क्या हाल होगा? गांवों, गलियों में विकास के क्या हाल होंगे? वहां जिन्दगी कितनी चुनौती भरी होगी?

दो दिन पहले साइकिल पर ढोलक लादकर ले जाते हिकमत अली अपनी ढोलक बेचने कुंडम की तरफ़ जा रहे थे। वहां के गावों में बेचने की मंशा से। कुंडम और आसपास के तमाम गांवों के लोग रोजी-रोटी के लिये यहां आसपास दिखते हैं। पहाड़ के पास, ओवरब्रिज के नीचे और इधर-उधर। जब ये लोग वहां से आये हैं पेट पालने के लिये मजदूरी करने तो वहां जो रह गये होंगे वो इस तरह की खरीद करते होंगे? वैसे भी गांव-घर में ढोलक तो मांगकर भी बजा लेते हैं लोग। फ़िर हिकमत की ढोलक कौन खरीदेगा?


मेरे गम का दरिया अथाह है,
फ़कत हौसले से निबाह है।
हिकमत अली की उमर 27 साल की है। जिन्दगी के संघर्षों से जूझते हुये उसकी मन:स्थिति ऐसी है कि कहता है- अपनी तो उमर कट गई। बस पांच दस साल और। 35 -45 तक जियेंगे। बच्चे का इलाज करवाया लेकिन बिगड़ गया। आगे के पैसे नहीं। सरकारी इलाज कैसे होगा इसका पता नहीं था। प्राइवेट में 10 हजार ठुके लेकिन गड़बड़ हुई सो फ़िर जायेगा वहां। अपने देश की बहुत बड़ी आबादी ऐसे ही लोगों की है।

एक तरफ़ हम बहुत तेजी से विकास कर रहे हैं। मंगल तक पहुंच गये। दीगर जगहों तक जाने के पयाने बांधे हुये हैं। लेकिन अपने आसपास की आबादी तक न पहुंच पा रहे।

ये सब बातें बेतुकी, बेतरतीब सी लगती हैं लेकिन लगता है इनमें कुछ न कुछ जुड़ाव भी है। क्या है कुछ समझ नहीं आता। लेकिन कुछ तो है। नहीं क्या?

मेरी पसंद

तेरी याद का ले के आसरा मैं कहां -कहां से गुजर गया,
उसे क्या सुनाता मैं दास्तां वो तो आइना देख के डर गया।
मेरे जेहन में कोई ख्वाब था उसे देखना भी गुनाह था,
वो बिखर गया मेरे सामने सारा जुर्म मेरे ही सर गया।
मेरे गम का दरिया अथाह है, फ़कत हौसले से निबाह है,
जो चला था साथ निबाहने वो तो रास्ते में उतर गया।
मुझे स्याहियों में न पाओगे, मैं मिलूंगा लफ़्जों की धूप में,
मुझे रोशनी की है जुस्तजू, मैं किरन-किरन में बिखर गया।
-डा.कन्हैयालाल नंदन

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