Tuesday, June 23, 2015

साइकिल सेहत और जेब के लिये अच्छी सवारी है,

'रोज तीन-चार किलोमीटर साईकिल चलाओ बहुत है। योग-फोग, कसरत की कोई जरूरत नहीं। साइकिल से चलने से फायदा कि रस्ते में कोई मिल गया तो दो मिनट ब्रेक मारकर हालचाल पूछ लिए। मोटरसाइकिल में आदमी फुर्र से निकल जाता है। न हाल न चाल, न दुआ न सलाम।साइकिल से बढ़िया कोई सवारी नहीं।' एक भाई जी हमारी साइकिल के पिछले पहिये को अंगूठे से दबाते हुए बोले।

'योग हो, साइकिलिंग हो, वाकिंग हो, रनिंग हो, कसरत हो या और कोई एक्सरसाइज- हर एक के अपने फायदे होते हैं।'- दूसरे भाई जी ने बहस में व्यवस्था दी।

साइकिल अच्छी सवारी है।सेहत के लिए भी और जेब के लिए भी। लेकिन हिंदुस्तान दिखावे में मार खा रहा है। क़िस्त पर चार पहिया की गाड़ी ले आते हैं भले ही पेट्रॉल के लिए अलग लोन लेना पड़े। चार क़िस्त बाद बैंक वाले उठा ले जाते हैं गाड़ी क़िस्त न भरने के चलते।- बात लोन के व्यवहारिक पहलू की तरफ टहल ली।

दुकान पर जलेबी छन रहीं थीं। जलेबी ज्यादा बनानी थी इसलिए जहां जरा सी सिंकी जलेबी उसे जलेबी- बच्चा चिमटे से टेढ़ा करके एक किनारे कर दे रहा था और बची हुई जगह में जलेबी की नई लाइन बिछा दे रहा था। बगल की मेज पर समोसे अपने पेट में आलू भरे अच्छे बच्चों की तरह अनुशासन में बैठे थे। कड़ाही में उबलता तेल उनको तलने के लिए इंतजार कर रहा था।

बगल में फोन की बैटरी पर बहस चल रही थी। स्मार्ट फोन की बैटरी जल्दी खत्म हो जाती है। गेम खेलने से जल्दी खत्म होती है। पावर बैंक रखना चाहिए। आठ घण्टे ड्यूटी पर चल जाये बस बहुत है, फिर तो घर पहुंच जाएंगे। कोई यह बतकही देखकर धारणा बना सकता है कि हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी समस्या लोगों की बैटरी जल्दी खलास हो जाना है। बहुत जल्दी डिस्चार्ज हो जाती है।

क्या पता अगले चुनाव में कोई पार्टी वायदा करे- हम आपको देर तक चलने वाली बैटरी देंगे।

इस बीच पेड़ से एक फल टपककर नीचे गिरा। पक गया होगा तो गुरुत्वाकर्षण के अधीन नीचे गिरा होगा। क्या पता जिस जगह से गिरा हो उस जगह के आसपास के फल, पत्तियां, टहनियां फल के वियोग में गमगीन हों। पत्तियां हिलडुल कर सीना पीटती हुई विलाप कर रहीं हों। कोई फल की सुगन्ध के किस्से सुना रहा हो। कोई कह रहा हो बड़े भले फल थे खूब रसमय । जिस भी पक्षी को देखो उन पर ही चोंच मारता था। सूरज की हर किरण आकर उन पर ही विश्राम करना चाहती थी। हवा इधर से आये या उधर से, बिना इनको सहलाये निकलती नहीं थीं। इसी तरह की क्या पता और अनेक बातें पेड़ से फल के नीचे गिरने पर हो रहीं हों। पेड़ से फल के गिरने को पेड़ों की दुनिया में फल का भूलोकवासी हो जाना कहलाता हो शायद। पेड़ से फल का गिरना उसका मर जाना होता हो। फिर कोई ऐसा ही फल उगता हो पेड़ पर तो कोई फुनगी चहक कर कहती हो -इसकी शक्ल तो उनसे मिलती है।

अब इसको क्या कहेंगे कि जिस फल के बहाने इत्ती बातें कर गए हम उसका नाम तक नहीं जानते। आंवले जैसा दीखता वह फल आंवला ही था -कह नहीं सकता। वैसे कुछ कहने के लिए कुछ जानना जरूरी होता तो तमाम जनप्रतिनिधि गूंगे होते। आज का समय अपनी ही हांकते रहने का है। जहां चुप हुए तो दूसरे की सुननी पड़ेगी और फिर क्या होगा आप समझ सकते हैं।

लौटते में एक बच्ची एक बुढ़िया को लकड़ी के सहारे मन्दिर की तरफ ले जा रही थी। बुढ़िया को दीखता नहीं है। वह बच्ची के साथ उसकी लकड़ी पकड़े हनुमान मन्दिर की तरफ तेजी से जा रही है। आज मंगलवार है। ज्यादा लोग भीख देने आएंगे। मन्दिर पहुंचकर एक कोने में खाली जगह पर बैठ गई। वहां पहले ही मांगने के लिए बैठी महिलाओं ने उसके आ जाने का नोटिस किया और सब लोग दानियों का इन्तजार करने लगे। सबके पास अपने-अपने भिक्षा पात्र थे। भिक्षापात्र से राहत इंदौरी का शेर याद आ गया। उर्दू में भिक्षा पात्र को कांसा कहते हैं। शेर इस तरह है:
'वो खरीदना चाहता था कांसा मेरा,
मैं उसके ताज की कीमत लगा के लौट आया।'

शेर कितना गजब का है न! कवि कहना चाहता है कि उसके भिक्षा पात्र की कीमत किसी बादशाह के ताज से भी अधिक है। शायरी और कविता भी कितनी खूबसूरत कल्पनाओं में विचरण करने की सुविधा देती हैं।

कल उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में जलाकर मारे गए पत्रकार जगेंद्र के परिवार वालों को सरकार ने 30 लाख रूपये और दो नौकरी देकर उनकी सहायता की। कोई कहेगा की सरकार ने शहादत खरीद ली, कोई कहेगा सरकार ने सहायता की। आप पता नहीं क्या कहेंगे लेकिन हम तो यही कहेंगे कि भाई चल उठ अब दफ्तर जाने का समय हो गया।
 
तो भैया चलते हैं। आपका दिन शुभ हो, मंगलमय हो। जय हो, विजय हो।

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