Wednesday, June 24, 2015

चायवाले का नाम कभी चाय नहीं होता

सबेरे के सात बजने वाले हैं। जबलपुर में होते तो अब तक किसी चाय की दूकान पर 5 रूपये खरच दिए होते। लेकिन आज तो घर जाने के लिए ट्रेन में बैठे हैं। चाय नसीब न हुई अब तक।

ट्रेन खरामा खरामा दुलकी चाल से चल रही है। ट्रैक पर चलती रेल ऐसे लग रही है मानो किसी बहुत बड़े स्वीमिंग पूल में कोई तैराक अपनी लेन में तैरता आगे जा रहा हो। आगे जाता तैराक पानी को पीछे धकेलता जाता है। ट्रेन भी पटरी पर उचकती- तैरती आगे बढ़ती हुई अपने अगल-बगल की जमीन को पीछे धकेलती जा रही है। ट्रेन आगे बढ़ रही है। जमीन पीछे छूट रही है।

अत: सिध्द हुआ कि आगे की तरफ बढ़ता व्यक्ति अपने साथ के लोगों को पीछे छोड़ता जाता है। दोनों की बिछुड़ने की गति आगे बढ़ते व्यक्ति की बढ़ने की गति और ललक के समानुपाती होती है।

जहां हमने बिछुड़ने की बात लिखी ट्रेन पतारा स्टेशन पर खड़ी हो गयी। स्टेशन की इमारत पर सौर ऊर्जा के पैनल लगे हैं। एक क्रम में 30-35 डिग्री पर झुके हुए। मंगते को झुकना ही पड़ता है भाई! सूरज भाई जब आते होंगे तो इन पैनलों को अपने सम्मान में बिछे देखकर कर करोड़-दो करोड़, अरब- खरब फोटान मुट्टी में लेकर इनकी तरफ उछाल देते होंगे। सोलर पैनल राजा बेटा की तरह सारे फोटान बिजली बनाने के लिए जमा कर देते होंगे। जो बिजली बनती होगी उससे कमरा रोशन होता होगा। उस समय सोलर पैनल सो जाते होंगे। सुबह फिर सूरज की अगवानी में करने के लिए। रौशनी बटोरने के लिए।

बाहर खेत सब गंजे खड़े हैं। फसल कट गयी है। सफाचट मैदान में किसी खेत में खड़ी फसल और इक्के दुक्के पेड़ ऐसे लग रहे हैं कि किसी घिसे हुए रेजर से दाढ़ी बनाने के बाद चेहरे पर जगह- जगह कुछ छूट ही जाता है।
सूरज भाई अभी दिखे नहीं हैं। पूंछेंगे तो कहेंगे कि भाई जी जबलपुर में ही तो हैं। उनका क्या पता कि अपन इस समय कानपुर की तरफ पतारा रोड पार कर रहे हैं। कोई नहीं दुनिया भर में तो ड्यूटी करते हैं। जरुरी थोड़ी कि हर समय हमको दिखें ही। सूरज कोई 'कामकाहिल' थोड़ी है जो कि हर समय दांत चियारता 'बॉस परिक्रमा' करता रहता है।

सूरज भाई भले न दिखें लेकिन उनकी बच्चियां मुस्कराते हुए बादलों की ओट से दिख रहीं हैं। वे पक्का बादलों से निकलने वाली बूंदों की खोज में हैं। जैसे ही बूंदे आसमान से जमीन की ओर चलेंगीं , किरणें उन बूंदों पर सवार हो जाएंगी। 'चल मोरी बुंदिया टिक - टिक' कहते हुए पूरे आसमान में सवारी करेंगी बूंदों पर। खुश होकर अपना सफेद ऊपरी कपड़ा उतार कर फेंक देंगी और अपना सतरंगा परिधान सबको दिखाएंगी।बूंदों के साथ मिलकर इंद्रधनुष बनाएंगी। इंद्रधनुष  उनकी इच्छाओं का आईना है। इसीलिए मोहक दीखता है। खूबसूरत लगता है।

रास्ते में एक तालाब दिखा। किनारे मकान और पेड़। तालाब में जमा पानी किसी कम आमदनी वाले परिवार की बचत सा प्यारा लग रहा है। जरा सा पैसा बचते ही जैसे हम लोग इठलाते हुए तमाम तरह की मनोरम इच्छाएं इठलाने लगती हैं वैसे ही तालाब के सीने पर लहरें इठला रही हैं । तालाब में ही पंत जी का नौका विहार याद आ गया:
लहरें उर पर कोमल कुंतल
लहराता ताल तरल सुंदर।

भीमसेन स्टेशन पर गाड़ी रुकी। दूर खड़े एक चाय वाले को आवाज देकर बुलाया-चाय,चाय। चाय वाला आया नहीं। देखा तक नहीं मेरी ओर उसने। कैसे सुनता? उसका नाम चाय थोड़ी होगा। चायवाले का नाम कभी चाय नहीं होता। लेकिन दूर होने पर बुलाते उसको हम चाय के ही नाम से हैं। जैसे आदमी कोई वोट बैंक थोड़ी होता है। लेकिन दूर से लोग उसको वोट बैंक कहकर ही बुलाते हैं। उसी तरह बरतते हैं। जैसे बैंक में पैसे का इंवेस्टमेंट करते हैं वैसे ही वोट बैंक को भी इधर-उधर लगाते,लड़ाते-भिड़ाते हैं लोग।

कानपुर आने वाला है। पटरी किनारे की झपड़ियों में जिंदगी का अतिक्रमण दिखने लगा है। एक बच्ची पतंग उडा रही है। एक घर के सामने खड़े रिक्शे की सीट पर दो बच्चे बैठे कुछ खेल रहे हैं। कुछ बच्चे पटरी के पास से गुजरती रेल को कौतुक से देख रहे हैं।

एक चारपाई पर बैठी औरत अपना सर खुजलाते हुए उबासी लेते ट्रेन को अपनी बिटिया (जिसकी आँख में शायद कौतुक हो )के साथ ताक रही है। उसी चारपाई सामने टांग पर टांग धरे लड़का 'सोचासन' करता लेटा है। पीछे हथेली पर सुर्ती फटकते बैठा आदमी साथ के आदमी से बतिया रहा है।

गाडी जूही डिपो पार कर गयीं। जूही में सुना है आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी रहते थे। पटरी के किनारे सीमेंट के स्लीपर पर उकडू बैठे तमाम बच्चे 'जहां सोच वहीं शौचालय' को अपना पिछवाड़ा दिखाते हुए ठाठ से निपट रहे थे। वैसे भी वह विज्ञापन लड़कियों के लिए है। लड़कों पर लागू नहीं होता तो अमल कैसा।

गोविन्दपुरी स्टेशन पर गाडी रुकने के पहले चार्जर और चश्मा सहेजा। फिर आदतन नीचे उतरकर 'चार्जर छूट तो नहीं गया' सोचते हुये बैग की जामा तलाशी ली। बैग ने गुस्सा होकर कुछ सामान बाहर फेंक दिया। सबको और खुद को समेटकर बाहर आये।

सीढ़ी पर ही परिचित ऑटो वाले भाई मिल गए। कानपुर आते ही ख़ुशी हुई। बताये की 56 वर्ग गज की आवास विकास से मिली जमीन पर 5 लाख खर्च करके मकान बनवाये हैं।

पता चला कि अभी तक पानी नहीं बरसा। हम अबभी बोलते हैं इंद्र देव को और फोन करते हैं -बरखा रानी जरा जम के बरसो।

घर पहुंचते ही चाय पानी के साथ घर इंतजार करता मिला। जिस किसी ने यह कहा होगा वह अपने घर में ही बैठकर कहा होगा:
गर फ़िरदौस बर रुए ज़मीनस्त
हमिअस्तो,हमिअस्तो,हमिअस्तो।
चलिए आप मजा करिये। मस्त रहिये। जो होगा देखा जाएगा।

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