Tuesday, June 09, 2015

जो मार खा रोई नहीं

आज सुबह 5 बजे ही निकल लिए साइकिल पर। कुछ भारी चलती दिखी। सोचा हवा कम होगी। लेकिन देखा ठीक थी। फिर समझ आया। साइकिल मुंह फुलाये थे। तीन दिन चलाये नहीं न। थोड़ा आहिस्ते चलाते हुए मिजाज पुर्सी की तो फिर मूड ठीक सा हो गया साइकिल महारानी का।

रॉबर्टसन झील की तरफ गए। झील सोई हुई थी। पानी की ऊपर की सतह को चद्दर की तरह ओढ़े हुए। हवा के झोंके पानी की चादर को हिलाकर झील से अलग करने की कोशिश करती। लेकिन झील कुनमुनाकर फिर पानी की चद्दर और कसकर लपेटकर सो जाती। उजाला सूरज के पायलट की तरह झील के पानी पर उतर चुका है। कुछ पक्षी उजाले से बतिया रहे हैं। टी ट्वीट, टी ट्वीट करते हुए। शायद वे ट्विटर करते हुए सूचना दे रहे हों सूरज के आगमन की।

पहाड़ पर चूल्हे सुलग चुके थे। लोग एक चूल्हे की आग से दूसरे चूल्हे जला रहे थे। एक आदमी अल्युमिनियम की छुटकी सी पतीली में चावल धो रहा था। हर चावल आम आदमी के सपनों की तरह विखण्डित। कुंडम से आये हैं ये लोग। हम फिर पूछते हैं पानी बरसता है तो क्या करते हो? वो सामने के अधबने ओवरब्रिज की तरफ इशारा करता है- वो हैं न। वहां रुकते हैं।

चाय की दुकान पर रमेश मिलते हैं। आँख लाल। बोले - 'दो दिन से (पीने को) मिली नहीं।इसलिए नींद नहीं आईं। बच्चे बाहर गए हैं।पैसा सब खत्म।'

इस बीच दूध वाला आ गया। बताया डेरी में दूध महंगा हो गया है। गर्मी में हर साल मंहगा हो जाता है। लेकिन अभी उन्होंने दाम नहीं बढ़ाये। ग्राहक टूट जाएंगे। किलो भर लेने वाला तीन पाव और पाव भर लेने वाला आधा पाव लेने लगेगा।

अभी डेयरी से दूध 50 रूपये लीटर मिलता है। लोग शहर में 40 रूपये लीटर बेचते हैं। कितना पानी मिलाते होंगे समझा जा सकता है। लेकिन जबलपुर में दूध की कमी नहीं इसलिए यूरिया वगैरह से बनाकर दूध नहीं बेचते।
दूध वाले की मोटरसाइकल राजदूत है। बताते है 1980 की है।साईकिल देखते हुए फिर कहते हैं -'साइकिल सेहत के लिए अच्छी होती है। सेक्स पावर बढाती है। पुराने जमाने में लोग साईकिल चलाते थे। दस-दस बच्चे पैदा करते थे।अब लोग मोटर साईकिल पर चलने लगे। एक दो बच्चे में ही खलास हो जाते हैं। कुछ होता ही नहीं।'
खुराफाती सुझाव बिना 'मे आई कम इन सर ' कहे दिमाग में घुस आता है-जनसंख्या कम करने के लिए सब साईकिल वालों को मोटरसाइकिल बाँट देनी चाहिए।

एक नाटे कद का आदमी एक ग्लास में थोडा दूध नपवाकर चला जाता है। पैसे नहीं देता। दूध वाला कुछ कहता है जिसका मतलब शायद यही है कि अच्छा चूना लगाते हो।दूसरा आदमी पालीथीन में 25 रूपये का दूध नपवाता है। मुझको परसाई जी के चिरऊ महाराज याद आते हैं जिनके बारे में परसाई जी ने लिखा है:
'चिरऊ महाराज पांच बड़े कनस्तर दूध लाते थे और एक छोटा।पर बेचते सिर्फ पांच कनस्तर थे। छठे छोटे कनस्तर का दूध गरीब बच्चों को पिला देते। उन्हें देखते ही आसपास के बच्चे दौड़कर आते-चलो, चिरऊ महाराज आ गए। दूध पिएंगे। बच्चे आते जाते और चिरऊ महाराज छोटे ग्लास से उन्हें दूध पिलाते जाते। कहते थे- यही हमारा थोडा-बहुत पुण्य है। नहीं तो क्या धरा है जिंदगी में। पांच कनस्तर खाली हो जाते और कोई ग्राहक आकर कहता-इस कनस्तर में तो दूध है। यही दे दीजिये। वे कहते- भैया, यह बेचने का नहीं है। बच्चों को मुफ़्त पिलाने के लिए है। क्यों गरीब बच्चों के मुंह का दूध छीनते हो।'


लौटते हुए देखा तो चूल्हों की आग तेज हो गयी थी।धुँआ हवा हो गया था।

मोड़ पर एक जगह वीएफजे से रिटायर्ड कामगार मिले। 2008 में पेंशन पाये मिश्रजी बक्सर के रहने वाले हैं। बोले- 35 साल 8 महीने 11 दिन नौकरी की। खमरिया से आये थे वीएफजे। फैक्ट्री के लोगों से जुड़े कई किस्से सुनाये।

वहीं बात करते हुए एक महिला आई। गोद में छोटा बच्चा। गत्ते के एक कागज के टुकड़े में लिखा एक फोन नंबर मिलाने को कहती है। नम्बर ऑटो वाले का है।बताया-'घर खाली करना है। आदमी शराब पीकर हल्ला-गुल्ला करता है। मारपीट भी। मकान मालिक न कहा घर खाली कर दो। कौन रखेगा ऐसा किरायेदार। सामान इकट्ठा कर लिया है। घर बदलना है। आधारताल जाएंगे । ऑटो वाले ने बोला था - 6 बजे आ जाएंगे। अभी तक आया नहीं।'

हम सलाह देते हैं दूसरा ऑटो कर लो। वह कहती है कि दूसरा मंहगा पड़ेगा। वो सस्ते में ले जाएगा। वही लाया था सामान।

मैं फोन मिलाता हूँ।उठता नही। दूसरा नम्बर भी है लेकिन वह मिलता नहीं। गलत है। पहले वाला नम्बर फिर मिलाता हूँ -कोई जबाब नहीं।

इस बीच बात होती रहती है महिला से। नाम सविता है। 14 साल की थी जब शादी हुई।पति पाइप मिस्त्री है। दो लड़के हैं। बड़ा लड़का 15 साल का है। छोटा गोद में।


बड़ा बेटा भी साथ में है। बताया क़ि बेलदारी करता है। मसाला मिलाता है। 200 रूपये रोज मिलते हैं। चमकते दांत बताते हैं की पान बीड़ी सिगरेट की गिरफ्त से बचा है। हम उससे पूछते हैं कि पापा जब मम्मी को मारते हैं तो बचाते क्यों नहीं। हमको भी मारते हैं -बच्चा बताता है।

बच्चा कभी स्कूल नहीं गया। महिला कहती है-गरीब आदमी कहां से पढ़ावे अपने बच्चों को। लड़का चुपचाप सुनता है।

इस बीच फोन मिलाते रहते हैं। उठता है। ऑटो वाला बोलता है -आ रहे हैं 15 मिनट में।वह सामान समेटने चली जाती है। हम भी चले आते हैं।

सोचते हैं कि अनगिनत शिक्षा अभियान के बावजूद अनगिनत लोग बिना स्कूल का दर्शन किये बड़े हो जाते हैं। पढ़ाई के स्कूल को बंक करके सीधे जिंदगी के स्कूल में भर्ती हो जाते हैं। बाल विवाह अपराध होने के बावजूद 14 साल की लड़की का विवाह हो जाता है।घरेलू हिंसा अपराध होने के बावजूद अक्सर अपने शराबी पति से पिटती है। उस महिला की शक्ल के साथ निराला जी की कविता पंक्ति टैग सी हो गयी है- जो मार खा रोई नहीं।

मजाक मजाक में आठ बज गए। चलें दफ्तर के लिए तैयार होना है।

आपका दिन शुभ हो। मङ्गलमय हो।

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