Sunday, June 14, 2015

हिरैनी घाट पर नर्मदा दर्शन




साईकिल पर (बकौल इंद्र अवस्थी) अश्वमेघ
आज शुरुआत हमारी ही फ़ोटो से हुई। टहलने निकले तो Sagwal Pradeep साथ चले- स्कूटी पर।कह रहे हैं कुछ दिन से कि साइकिलिंग का वीडियो बनाएंगे। फोटो खिंचा सूरज को लगा कि उसकी गैरहाजिरी लगाई जा रही है। वह' वर्क टु रूल' पर आ गया। चेहरे की तरफ धूप की सप्लाई रोक दी।

प्रदीप का जीसीएफ के साथियों विवेक और अमित के साथ ट्रेकिंग पर जाने का हिसाब बना। हम ट्रेकिंग पर नहीं गए। एक तो साइकिल बुरा मान जाती दूसरे पैर के अंगूठे में चोट के चलते चलने में तकलीफ थी।

ट्रेकिंग को मना किया तब तक साइकिल वीर Rajiv Ajai Kumar Rai का फोन आ गया। उनको बुला लिया और साइकिलिंग पर निकल लिए।

पहला पड़ाव रहा चिंचू की चाय की दूकान। Priyam Tiwari ने कल घणी तारीफ़ की इस दुकान की। पता चला चिंचू भैया तो घर पर थे। चाय पी गयी। सुबह की पहली थी सो अच्छी लगी।

आगे गोरा बाजार मिला।एक से पूछा तो बोले कि अंगेजों के जमाने में यहां घोड़े बिकते थे इसलिए नाम पड़ा गोरा बाजार।

सड़क पर सब्जी की दुकानों पर महिलाएं अपनी दूकान जमा रहीं थीं।



चिंचू की चाय की दूकान
आगे बिलहरी में राजुल बिल्डर की कई कालोनी दिखीं। एक जगह ड्रम में पानी भरे कई लोग खुल्ले में नहा रहे थे। खड़े-खड़े सर पर पानी गिराते। साबुन रगड़ते। गाना गाते। पता चला कि यहां किसी राजनेता के घर की शादी में मण्डप बनाने आये हैं। मैदान पर खूब बड़ा पंडाल लग रहा था। कई दिन से बन रहा है।

मण्डप बनाने का ठेका दिल्ली के किसी टेंट हाउस को मिला है। मजदूर कलकत्ता के रहने वाले हैं।दिल्ली की कम्पनी के कलकतिया मजदूर जबलपुर की शादी के लिए तम्बू-कनात तान रहे थे। लाखों का काम होगा। जनसेवक के पास जनता की सेवा करते हुए इतना पैसा मंगलकार्य में खर्च करने के लिए है। मुक्तिबोध की पंक्तियाँ ऐसे ही याद आ गईं:

उदरम्भरि अनात्म बन गए
भूतों की शादी में कनात से तन गए
किसी व्यभिचार के बन गए बिस्तर।

मजदूरों में से एक नहाने के बाद अंगौछे से पीठ रगड़ता हुआ कोई बंगाली गाना गुनगुनाता पंडाल की तरफ चला गया। हम भी आगे बढ़ लिए।


सब्जी बेचती महिलाएं
हम भटकते-पूछते हुए जमतरा गांव पहुंचे। सन्तोष कुमार रायकवार की दूकान पर चाय पी। ताजे बने समोसे खाये। स्वादिष्ट। संयोग कुछ ऐसा बना कि आज कई दिन बार उनकी दुकान पर चाय-समोसा हुआ।



आगे बढ़े तो पता चला कि नीचे कच्चे में उतरना था। हमको बताया गया था कि वहां घाट पक्का बना है। हम लौट लिए। लौटकर पूछते हुए भदभदा घाट पहुंचे।रास्ते में गौर नदी मिली। पूछते हुए कुछ ज्यादा ही आगे निकल गए। ITBF केंद्र दिखा आगे। नदी नदारद। पूछकर फिर लौटे और घाटी-तलहटी नुमा जगह पहुंचे। पता चला यह गौर नदी है। बहुत छोटी धार का झरना सा बह रहा था। दुबला पतला। झरना बाद में जिन चट्टानों से होकर बहता होगा वे गोरी -गोरी थीं और दूर की चट्टाने काली कलूटी। नदी की जलधार के संपर्क में जो चट्टानें आती हैं वे सफेदी की झनकार पा जाती हैं।


जबलपुर की शादी में तम्बू - कनात लगाने आये दिल्ली
की कम्पनी के कलकतिया मजदूर खुले में नहाते हुए
एक घर के बाहर एक दम्पति अपने घर की बाउंड्री ठीक कर रहे थे। हमने उनके घर के बाहर लगे हैण्डपम्प से पानी पिया। बिटिया संजना ने हैण्डपम्प चलाया। कुछ दिन पहले ही उसकी शादी हुई है। हफ्ते भर ससुराल रहकर मायके आई है। नौवीं पास करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी। 18 साल की उम्र में शादी हुई। ससुराल में सब लोग अच्छे है। पति किसी गैरज में काम करता है।

लौटते हुए रामसेवक यादव मिले। एक पैर से साईकिल चलाते हुए। बेलदारी करते थे रामसेवक। एक दिन बिजली के तार के सम्पर्क में आ गये। दायां पैर और हाथ झुलस गया। पैर ज्यादा भुंज गया।ठेकेदार कमजोर था। ठीक से इलाज नहीं करा पाया। पैर कटाना पड़ा। दायां हाथ की हथेलियाँ भी प्रभावित हुईं। पैर प्लास्टिक का।पहले जयपुर से बनवाया था। अब जबलपुर का बना पैर पहनते हैं।

रामसेवक की साइकिल के कैरियर पर एक सिलाई मशीन रखी थी। वे हवा भरने का और पुराने कपड़े सुधारने का काम करते हैं। कपड़े का काम खुद सीखकर करना शुरु किया। रामसेवक के हौसले की तारीफ़ करते हुए हमने हवा भरवाई।


एक पाँव बिजली के चपेट में आने से कटवाना पड़ा रामकुमार
यादव को। साइकिल के कैरियर पर सिलाई मशीन
जिससे कपड़े सिलते हैं रामसेवक
सबेरे के 10 बज चुके थे। घूम तो खूब लिए थे। लेकिन नर्मदा दर्शन नहीं हुए थे। बहुत भटकने के बाद भी नर्मदा तट न दिखा। अजय राय ने लौटने की बात कही। राजीव न हां न न में। हमने अपनी वरिष्टता का फायदा उठाते हुए तय किया कि फायदा उठाते हुए फिर से नर्मदा दर्शन की कोशिश करने की बात तय की।

फिर लौटे पूछते हुए। वहीं पहुंचे जहां से लौट गए थे।इस बार लौटे नहीं। आगे बढ़े। और इस बार हम नर्मदा किनारे पहुंच गए। जिस जगह से वापस लौट गए थे पहले उससे 100 मीटर की दूरी पर बह रही थी 'सौंदर्य की नदी नर्मदा।' अगर लौटने का तय नहीं करते तो वंचित रह जाते नर्मदा दर्शन से। लेकिन अगर पहली बार में ही नर्मदा दिख जाती तो फिर गौर नदी का भदभदा घाट छूट जाता। जो हुआ अच्छा ही हुआ।


जमतरा गाँव के संतोष रायकवार की चाय की दूकान
जमतरा गाँव के पास का यह घाट हिरैनी घाट कहलाता है। गौर नदी यहीं नर्मदा से मिलती हैं। इस तरह गौर-नर्मदा संगम के दर्शन हुए।

नदी की जलधार कलकल-छलछल करती हुई। साफ़ नीला पानी। लोग नदी में नहा रहे थे। लोगों को नहाते देख हमसे रहा नहीं गया और हम कमीज और बनियाइन उतारकर नदी के पानी में बिना 'में आई कमिन नर्मदा मैया' कहे उतर गए। पाँव में नदी के पत्थर चुभ रहे थे। लेकिन एक्यूप्रेशर सा मजा आ रहा था।

हम नदी के भीतर एक चट्टान पर ऐसे बैठ गए जैसे वह सोफा हो। देखते-देखते राजीव और फिर अजय राय भी नदी में दाखिल हो गए। अजय राय का बचपन बक्सर के पास एक गाँव में नदी किनारे नदी में नहाते बीता है।पानी देखकर उसमें उतरने से रोक नहीं पाते।


नदी के पानी में साइकिल चलाते अतुल शर्मा
पास में बच्चे नदी में मस्ती करते हुए खेल रहे थे। नदी की तह से घास उठाकर उसको गेंद की शक्ल देकर एक दूसरे को मार रहे थे। नदी की घास से घास तड़ी (गेंद तड़ी) खेल रहे थे। कुछ देर बाद वे पानी में खो-खो खेलने लगे।

अपन नदी के पानी में वर्षों बाद उतरे थे। अंतिम याद 1983 की साइकिल यात्रा के दौरान विजयवाड़ा/ विसाखापट्टनम के पास की एक नदी में घण्टो बैठने की थी।

नर्मदा का पानी इतना साफ है कि नदी में डूबे पांव ऊपर से दिख रहे थे। कई बार पानी में डुबकियां लगाते हुए करीब घण्टे भर नदी के 'चट्टान सोफे' पर बैठे रहे। लोगों को तैरते देख तैरना न जानने का अफसोस हुआ। लेकिन साफ जलधारा में बैठने और डुबकी लगाने के अनिर्वचनीय अनुभव ने अफ़सोस को नदी की कलकल जलधारा में प्रवाहित कर दिया।


नदी के पानी खेलती नहाती बच्चियां
नर्मदा के कई घाट देखे अब तक। भेड़ाघाट,ग्वारीघाट, तिलवारा घाट। सब अपने में सुंदर। लेकिन जो आनन्द मुझे हिरैनी घाट पर नदी के पानी में नहाने में आया वह कहीं नही मिला पहले। अद्भुत, अनिर्वचनीय। वह आनन्द गूंगे का गुड़ ही है। महसूस किया जा सकता है। बयान बाहर है।

नदी के पानी में बैठे हुए तय किया कि साइकलिंग के लिए लम्बा निकलते समय एक तौलिया, कपड़े और पानी का इंतजाम रख कर चलना चाहिए।

नदी से निकलकर और घूमे आसपास। आसपास के गांव के लोग नहा रहे थे। एक बुजुर्ग महिला पॉलीथिन की सीमेंट की बोरियां धो रहीं थीं सामान रखने के लिए। एक बच्चा अपनी साइकिल पानी में धो रहा था। साइकिल पानी में चलाते हुए। एक बच्ची नर्मदा नदी का पानी एक गगरी में भरकर नदी से बाहर आते बहुत प्यारी लग रही थी।जब तक हम फोटो खींचे वह बाहर आ गयी थी।

लौटते हुए दोपहर हो गयी। गीले कपड़े पहने ही साईकिल चलाने के कारण थोडी भारी चल रही थी साईकिल। लेकिन खरामा खरामा कपड़े सूखते गए। हम अपने ठीहे पर पहुंचे। थके हुए थे। खाये पिए और सो गए। शाम को उठे तो सोचा आज का किस्सा सुनाया जाये आपको।

बताइये कैसी लगी आपको आज की यात्रा। क्या आपका भी मन किया नदी दर्शन का। अगर हाँ तो देर मत करिये। जो साधन हो उससे जो भी नदी पास में हो उस तक पहुँचिये। उसके पानी में उतरिये। अनिर्वचनीय आनंद को अनुभव कीजिये।

 फिलहाल इतना ही। नर्मदे हर।

अनूप शुक्ल और राजीव कुमार                                                                                               अनूप शुक्ल और अजय राय









हवा भरते रामसेवक यादव -फकत हौसले से निबाह है



फ़ेसबुक की टिप्पणियां


महेन्द्र मिश्र आज की यात्रा बहुत बढ़िया लगी ... फोटो भी उम्दा लगी


  • Om Prakash Tiwari पहले चित्र को प्रोफाइल चित्र बनाये

    बहुत ही अच्छा हे ।।

  • Priyam Tiwari जो चाय बना रहा है वो रज्जन है। इलाहाबाद का है। चिंचू के यहां नौकरी करता है। पहले दुकान बहुत छोटी थी। कैंटोन्मेंट वाले बुलडोज़र लेकर आते, तोड़ जाते। शाम को दुकान फिर गुलज़ार।

  • चंदन कुमार मिश्र तो आप रोज़ साइकिल से ही जाते हैं? अस्सी के दशक में भी घूम रहे थे साइकिल से, पढा था हमने शायद

  • Pawan Yadav साइकिल के ब्रांड एम्बेसडर हो जाएँगे आप। (हो गए भी हैं)

  • Hirendra Kumar Agnihotri बहुत सुन्दर वर्णन है. नदियां बहुत आकर्षित करती हैं। नदियां तन और मन दोनों को निर्मल करती हैं. जैसा आज आपने महसूस किया. क्या यायावरी तबियत पायी है आपने.

  • Pandey Rekha बहुत अच्छा वर्णन किया है ,पढ़कर कर मजा आ जाता है....

  • Shailendra Sangar Photos aap ki classic rahati hai pure India ka durshan ho jata hai

  • Ram Singh ययावर लेखक अनूप शुक्ल की एक और घुमक्कड़ी , इस बार यात्रा और यात्री दोनों ही हर हाल में खुश दिखे - ' सुधिजनों ने कहा भी है कि सफर का सुख पहुचने में नहीं , चलने में है । एक रहस्यपूर्ण उक्ति है - ' मुसाफिर ही खुद मंजिल है '
    अपने आसपास से जुड़े रहना यही
    ...और देखें

  • Ashok Agrawal बहुत बढ़िया , निर्मल आनन्द ।
    आसपास में ही कितने रोचक चित्र हैं , पारखी नजर से आत्मीय चित्रण

  • Raj Narayan Shukla सजीव वर्णन का लाभ पाकर कल्पना लोक मे नर्मदा दर्शन दूर रह कर भी ! धन्यवाद !!

  • Manoj Yadav abhi padhi nhi hai.kal tasalli se padhenge aapki abhivyakti .aaj kewal pic dekh ke hi khush ho gye.shubh ratri sir

  • Raag Bhopali वाह....तैरना भी सीख लीजिए। अभी मौक़ा है।
    वैसे हमारे मध्यप्रदेश की नदियाँ हैं ही साफ़ सुथरी क्योंकि पवित्रता का बोझा नहीं ढोतीं

  • Mahesh Shrivastava kya baat hai aaj sham tak dekhte rahe laga ki are aaj to sundey hai , jee nahi laga to abhi dekh rahe hai 12--30 per ab neend theek jamegi

  • Mithlesh Nagar यात्रा का सुन्दर वर्णन । नर्मदे : हर

  • Suman Tiwari डिंडौरी से भेड़ाघाट की यात्रा पढ़ी थी आज की यात्रा भी मज़ेदार रही लेकिन अफसोस कि हम नहीं कर सकते हैं क्योंकि घुटने नाराज़ हैं।



  • Suraj P. Singh आज की यात्रा कुछ अधिक ही सुंदर! कैमरा लेकर ऐसी यात्राओं का सहभागी होते तो मजा आ जाता।

  • RB Prasad बहुत सुन्दर वर्णन है. हम तो अदृश्य रूप में आप के साथ रह कर वाह सरे कार्य करते हैं जो आप करते हैं. बेहतरीन .

  • Shwetank Gupta · ब्रजभूषण झा और 8 others के मित्र
    वाह! नर्मदा मैया की जय!!

  • Samaresh Dutta · Sujit Bose और 3 others के मित्र
    Bhagaban aapka bhala kare or cycle chalane ke liye aur shakti de.taki apke upalabdhya roj parsake

  • Jyoti Tripathi मन शीतल हुआ या यूँ कहिए जी तर गया।

  • Krishn Adhar नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिम् कुरु..।पिता जी आज भी स्नान करते समय देश की पवित्र नदियों का आवाहन करते हैं।आप स्वयं सन्निधि प्राप्त करने पहुंच गये,एक वार भेड़ाघाट मै भी हो आया हूं ..इसी तरह पुनर्स्मरण कराते रहें,धन्यवाद

  • Satish Tewari अप्रतिम सौन्दर्य बोध कराने के लिए साधुवाद

  • Mukesh Sharma अकेले रहते है ।आटा पिसाना नहीं है।फिर सायकल में कैरियर क्यों ? क्या सायकल अश्वमेध के लिए आदरणीया को वामांग बिठाने का प्रबंध अभी से कर रखा है ?

  • Santosh Srivastava चलले फिरले मे मजा बहुत.

    ओके लिखले मे मजा बहुत.
    ...और देखें













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    1 comment:

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