Thursday, November 19, 2015

निर्रथक और बेनतीजा बहस

सुबह जल्दी जग गए। जग गए का मतलब उठ जाना नहीं होता न। जल्दी जगे तो फिर सो गए। फिर जगे। मल्लब किस्तों में कई बार सोये। जब सोये तो जगे भी। फाइनली 5 बजे जगे और हिम्मत करके टीवी खोल दिया। 'पेरिस पर्दा' खुला गया। धड़ाधड़ फायरिंग हो रही थी। हम सहमकर सिकुड़ गए। न सिकुड़ते तो क्या पता एकाध गोली के साथ हमारा भी गठबंधन हो जाता। फिर तो पक्का प्रमुख समाचार बनता।

टीवी पर फायरिंग खत्म होते ही बहस होने लगी। आतंकवादियों पर आतंककारी बहस। किसी ने बताया कि पुतिन बोले हैं कि 40 देश आईएसआईएस वालों को पैसा देते हैं। हथियार देते हैं।पेट्रोल खरीदते हैं उनसे। पता नहीँ कौन देश हैं। पर आतंकवादी गतिविधियों पर विकसित देश के रवैये देखकर मेरे जेहन में मेराज फैजाबादी का यह शेर चहलकदमी करने लगता है:
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फिर जलते हुए शहरों में पानी बेचना ।


बाजार है भाई। अपना हथियार भी बेचना हैं यहां और सुरक्षा तकनीक भी। मजबूरी है यह सब करना।
जब ज्यादा सुबह हुई तो निकल लिए साइकिल स्टार्ट करके। मेस से निकलते ही दो टेम्पो धड़धड़ाते हुए सामने से निकले।स्कूल जाने वाले बच्चे अंदर बैठे थे। उनके बस्ते टेम्पो की छत पर थे। बच्चे टेम्पो के अंदर और बस्ते छत पर ठिठुर रहे थे।

मोड़ पर एक गाय खड़ी पूंछ उठाकर जलधार से धरती को सींच रही थी। उठी पूँछ के नीचे पतला गीला गोबर चिपका हुआ था। ऐसा लग रहा था कि गाय का पेट खराब है। दस्त लगे हुए हैं। शायद बाजार की कोई उल्टी-पुल्टी चीज खा ली। आम इंसान होता हो सब खाना बन्द करके खिचड़ी पर उतर आता। पर ये तो गौ माता हैं। ये या तो पूजा के काम आती हैं या फिर दंगे के। इनको कहां नसीब यह सब सुविधाएँ। इनके पेट के लिए तो वही सड़क का खाना और इफरात में पालीथीन ही सुरक्षित हैं।

एक बुजुर्ग धोती पहने तेजी से चलते चले जा रहे थे। धोती दोनों तरफ घुटनो के ऊपर तक उठी हुई थी। सड़क की हवा उचककर घुटनों से होते हुए और ऊपर जाँघों तक पहुंच रही थी। शायद हवा की ठंडक से बचने के लिए ही बुजुर्ग वार तेजी से चले जा रहे थे।

स्कूल के सामने बच्चे जमा होकर अंदर जाने की तैयारी कर रहे थे। कुछ बच्चे गाड़ियों से आ रहे थे। सामने से आने वाली गाड़ियों के इंडिकेटर बायीं तरफ और पीछे से आने वाली गाड़ियों के इंडिकेटर दायीं तरफ का बल्ब जलाते दिख रहे थे। इससे एक बार फिर लगा कि कहीं पहुँचने के लालच में आदमी तो आदमी गाड़ी तक अपनी सुविधा के हिसाब से वामपंथी या दक्षिणपंथी हो जाती है।

आज फिर दीपा से मिलने गए। वह थी नहीं अपने ठीहे पर। न उसके पापा का रिक्शा। शायद गाँव गए हों।
वहीं ओवर ब्रिज के नीचे एक आदमी अपनी पत्नी के साथ खाना बनाते हुए एक जंग लगे लोहे की बेडौल प्लेट पर अपनी बीड़ियां सुखा रहा था। बताया कि खुद बनाता है अपने लिये बीड़ी। तम्बाकू गांव से लाता है। पत्ती शहर से। कैंची से पत्ता काटकर तम्बाकू भरकर बीड़ी बना लेता है। दिन में 10-15 बीड़ी फूंक लेता है।

कुंडम के रहने वाले उस दिहाड़ी मजूर ने बताया कि आजकल कटाई का सीजन चल रहा है इसलिए ज्यादातर लोग गाँव गए हैं। इसीलिये पुल के नीचे मजदूर दिख नहीं उसके अलावा। वह भी गया था घर। धान काटकर लौट आया। दिहाड़ी में रोज 250/- मिल जाते हैं।

बात करते हुए दातुन चबाते हुए उस आदमी की साथिन कपड़े उठाकर नहाने चल दी। कुछ देर बाद वह आदमी भी। चूल्हे पर दाल अकेले चुपचाप धीरे-धीरे फुदकती हुई चुरती रही।

'चुरती' से याद आया कि हरदोई में लोग हरद्रोही मतलब भगवान का विरोधी होने की परम्परा निभाते हुए 'र' का उच्चारण नहीं करते। हरदोई को 'हद्दओई' कहते हैं। उरद(उड़द) की दाल फुदुर-फुदुर चुरती है का 'र' गोल करके 'उद्द की दाल फुद्द-फुद्द चुत्त है' कहने का रोचक चलन है।

लौटते हुए एक बुजुर्ग बेंत लेकर टहलते हुए दिखे। हाथ से बेंत जिस तेजी से हिला रहे थे उससे लगा कि वे बेंत से अपने आगे की हवा को धकियाकर अपने आगे निकलने की जगह बना रहे हों।

सड़क पर चहल पहल बढ़ गयी थी। ऊपर आसमान में भी सूरज भाई पूरे धज के साथ बिराजे हुए थे। उनको देखकर ऐसा लग रहा था कि आसमान के स्टूडियो में किसी एंकर सरीखे बैठे हैं। बस बाकी के प्रवक्ता आ जायें तो निर्रथक और बेनतीजा बहस शुरू करें।

सामने बगीचे में धूप खिली हुई है। कठिन समय में खुशनुमा उम्मीद सी। चिड़ियां चहचहा कर गुडमार्निंग कह रहीं हैं। आपको भी सुनाई दे रहा होगा। अब चलिये। दिन की शुरुआत कीजिये। अच्छे से रहिये। मस्त। बिंदास।

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