Saturday, November 07, 2015

शुरुआत ही अपने आप में बहुत है

बिहार में किसकी सरकार बनेगी यह तो कल पता चलेगा पर अपन के शरीर में आलस्य की सरकार चल रही है। जग जाते हैं पर उठने का मन नहीं करता। पहले देर करते हैं उठने में। फिर जब काम भर की देरी हो जाती है तो उठ जाते हैं। उठकर सोचते हैं आज बहुत देर हो गयी। अब चला जाए फैक्ट्री। इसी चक्कर में रोज बाहर निकलना स्थगित हो जाता है।

आज भी यही क्रम चला। जगे, उठने में देर की, देर करने के बाद उठे, बाहर निकले, देखा कि उजाला काम भर का हो गया था। एक बार फिर सोचा कि आज फिर देर हो गयी। निकलना कैन्सल। पर फिर झटके में कमरा बन्द करके बाहर निकल ही लिए।

साईकल स्टार्ट करके सड़क पर आये तो मौसम और हवा की ख़ूबसूरती देखकर एहसास हुआ कि तीन दिन क्या मिस क़िया। फौरन मन किया आलस्य को हड़काएं। लेकिन फिर याद आया कि आलस्य को तो हम कमरे पर ही छोड़ आये हैं। फिर सोचा जब मिलेगा हड़कायेंगे।

साईकल चलाते हुए याद आया कि कहा जाता है -'वेल बिगिन इज हाफ डन' अच्छी शुरुआत मतलब आधा काम पूरा। हमारी समझ में शुरुआत ही अपने आप में बहुत है।

चाय की दुकान पर फैक्ट्री के एक साथी मिले। बातचीत हुई तो बताने लगे कि घर 6-7 किलोमीटर दूर है। मोटर साईकल से आते हैं। पहले साइकिल से आते थे। पिछले साल तक मोटर साईकल भाई के पास थी। फिर भाई की शादी हुई तो उसको मोटर साईकल दहेज में मिली। उसकी वाली गाड़ी इनको मिल गई। इनकी साईकल छूट गयी। शरीर आराम तलब हो गया। घुटने जल्दी खराब होंगे। सांस जल्दी फूलेगी। मतलब दहेज की प्रथा दूर तक मार करती है।


चाय पीकर लौटे तो देखा एक दृष्टिबाधित व्यक्ति सड़क पर लाठी इधर-उधर करता हुआ आगे चला आ रहा था। बीच सड़क पर चलते हुए डिवाइडर पर चढ़ गया। ऊंचाई का एहसास होते ही उतर गया। इसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह सड़क पर इधर इधर टहलते हुए आगे बढ़ता रहा। फैक्ट्री गेट के सामने खड़े लोग हल्ला मचाकर उसको रास्ता बताते रहे।

पता चला कि वह फैक्ट्री के गेट नंबर 3 के पास बैठता है। वहीँ माँगता रहता है। कुछ लोग कुछ दे देकर अपना परलोक सुधार लेते हैं। यह भी पता चला कि कुछ मसाला पुड़िया भी बेंचता है। उससे भी कुछ आमदनी हो जाती है।

मंदिर के सामने बैठकर भीख माँगने और फैक्ट्री के बाहर भीख माँगने में अंतर होता है। मन्दिर वाला भिखारी तो कभी चला जाए कुछ न कुछ मिल ही जाएगा। लेकिन फैक्ट्री गेट पर मांगने वाले को फैक्ट्री शुरू होंते समय अपने धंधा स्थल पर पहुंचना होता है। देर किये तो कामगार अंदर हुए और गयी दिहाड़ी।

किसी की जन्मजात आँख न होना कितना बड़ा नुकसान है उस व्यक्ति के लिए यह एहसास हम नहीं कर सकते हैं। सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं कि वह सूरज की किरणों को नहीं देख सकता। फूल नहीं देख सकता। खूबसूरत से खूबसूरत वस्तु उसके लिए वैसी ही है जैसी कोई खराब दिखने वाली वस्तु।

भगवान के खिलाफ इस बात का कोई एक्शन नहीं होता कि कैसे वे किसी को बिना आँख के धरती पर भेज देते हैं। उनका क्वालिटी विभाग इतना लापरवाह क्यों है? उसके खिलाफ वे कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते। लेकिन कार्रवाई करे कौन। भगवान की पहुंच हर जगह है। केस ही रजिस्टर नहीं होगा उनके खिलाफ। समरथ को नहिं दोष गुसाईं।

सड़क पर हम बाईं तरफ साईकल चला थे। एक कुत्ता दायी तरफ हमारी साईकल के साथ-साथ चल रहा था। दुलकी चाल से चलता हुआ कुत्ता बड़ा स्मार्ट लग रहा था। हम उसके साथ साईकल चलाते रहे।कुछ देर बाद वह मैदान की तरफ मुड़ गया। एक झाड़ी के पास हल्का होने लगा। झाड़िया कुत्तों का वाशरूम होती हैं।

हमारे आगे एक बुजुर्ग महिला तेज-तेज टहलती हुई जा रही थी। उनकी पीठ की झुर्रियां उसके हर कदम के साथ हिलते हुए शायद उससे कह रहीं थीं -'अरे जरा धीरे चलो माता जी।'

देर हो गई थी इसलिए हम आगे नहीं गए फिर। लौट आये। लौटकर अख़बार में छपी कई खबरों में से एक पर रुक गए। अमेरिका में एक बेटी ने अपने विक्षिप्त हो चुके पिता को ठीक करने में सहायता की और एक तरह से उनको नई जिंदगी दी। कई दिनों तक बेटी पिता के साथ लगातार कैमरा थामे चलती रही। पूरा समाचार आप खुद पढ़िए।

सप्ताहांत है। आप अच्छे से रहिये। स्वस्थ रहिये। सानन्द रहिये।

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