Thursday, November 05, 2015

संकीर्णता दुर्गुण है, उदारता सद्गुण है

प्रश्न: भारत में मुसलमान साम्प्रदायिक हैं, ईसाई साम्प्रदायिक हैं, सिख साम्प्रदायिक हैं –तब बेचारे हिन्दू ही क्यों धर्मनिरपेक्ष रहें?

–गोंदिया से गोविन्द रामचन्द्र देशमुख

उत्तर: जो बात आप कह रहे हैं वह हिन्दुओं में सघन साम्प्रदायिक प्रचार का नतीजा है। मैंने विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, डॉक्टरों, अफसरों के मुंह से भी यह बात सुनी है।

पहली बात तो यह है कि सारे मुसलमान, ईसाई, सिख साम्प्रदायिक नहीं हैं। इनका एक हिस्सा ही साम्प्रदायिक है। यदि सारे सिख साम्प्रदायिक होते तो पंजाब में कांग्रेस की सरकार नहीं बनती। सारे मुसलमान साम्प्रदायिक होते, तो चुनाव में हिन्दू उम्मीदवार बहुत कम जीतते। जिस अनुपात में मुसलमान सांप्रदायिक हैं उससे ज्यादा अनुपात में हिन्दू पहले से ही साम्प्रदायिक हैं।

दूसरी बात यह है की संकीर्णता दुर्गण है, उदारता सद्गुण है। आप संकीर्णता को सदगुण समझते हैं। चाहते हैं कि हिन्दू भी संकीर्ण हो जाएँ। इस देश का भला उदारता, सहिष्णुता और धर्मनिपेक्षता पर है। लेकिन धर्म एक अधिरचना है, आधारभूत रचना नहीं। मगर धर्म का उपयोग साधारण मनुष्यों को बहकाने के लिए इस तरह किया जाता है गोया इस्लाम या हिन्दू धर्म से ही आर्थिक–सामाजिक समस्याएं सुलझ जाती हों। सही यह है कि धर्म शोषक वर्ग के हाथ में बहुत धारदार हथियार है। पाकिस्तान इस्लाम के लिए नहीं बना। वह पंजाब के जमीदारों और उत्तर प्रदेश के रईसों द्वारा शोषण की सुविधा के लिए बना।

धर्म पर आधारित राष्ट्र–राज्य में लोकत्रंत्र नहीं रहता। किसी इस्लामी देश में लोकतंत्र नहीं है। हिन्दू को सम्प्रदायिक बनाने की साजिश वे शक्तियां करती हैं जो सामन्तवाद और पूंजीवाद को जीवित रखना चाहती हैं।
आप इस तरह बात को रख रहे हैं जैसे हिंदुओं का धर्मनिरपेक्ष होना कोई सजा हो। जैसे यह कोई बुराई हो। यदि बहुसंख्यक हिन्दू भी साम्प्रदायिक हो जायेंगे तो उनका अपना नाश तो होगा ही, साथ ही देश में लोकतंत्र भी नहीं रहेगा और न हम स्वाधीन राष्ट्र रह सकेंगे।
‪#‎परसाई‬
–16, दिसम्बर 1984 को देशबन्धु समाचार में
'पूछो परसाई से' स्तम्भ में।

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