Saturday, November 28, 2015

बेकरारी में है करार तो क्या कीजै

बेकरारी में है करार तो क्या कीजै
आ गया जो किसी पे प्यार तो क्या कीजै।


एक चयासा आदमी लपकता हुआ आया 'यादव टी स्टाल' में घुसा। आते ही सामने की बेंच पर पसर सा गया। उसके चेहरे पर 'ब्रिस्क वॉकिंग' घराने का पसीना चमक रहा था। जेब में धरे उसके मोबाईल से गाना बज रहा था जो ऊपर लिखा मैंने।

दुकान का नाम 'यादव टी स्टॉल' वहां बिक रहा था बेनजीर तेल। बगल में 'पंडित प्रोडक्ट्स' का विज्ञापन पुता हुआ था। मतलब अगड़े, पिछड़े और अल्पसंख्यक नाम वाले चमक रहे थे। दलित और दीगर लोगों का प्रतिनिधित्व नदारत था दुकान पर।

यादव टी स्टॉल जीसीएफ फैक्ट्री के पास है। फैक्ट्री से छूटे हुए लोग वहां चाय पीते हुए बतिया रहे थे। एक आदमी ने घुसते ही सवाल उछला- सन्डे चल रहा है क्या?

सन्डे चलने का मल्लब इतवार को फैक्ट्री इतवार को खुलेगी कि नहीं। फैक्ट्री खुलने का मतलब ओवरटाइम पर काम होना। सप्ताह के बीच जब किसी दिन छुट्टी होती है तो उस दिन के बदले किसी दिन ओवरटाइम पर काम होता है। उसी के लिए सवाल किया था उस आदमी ने।

फैक्ट्री से सम्बंधित निर्णय भले ही फैक्ट्री में लिए जाते हों लेकिन उनका समुचित प्रसारण ऐसे ही नुक्कड़ों पर और चाय-पान की गुमटियों से होता है।किसी भी संस्थान के पास स्थित चाय-पान की दुकाने उन संस्थानों के सूचना प्रसारण केंद्र होते हैं।

सुबह जब निकले आज छह बजे तो सड़क पर अँधेरे और उजाले की गठबंधन सरकार चल रही थी। उजाले के नाम पर बिजली के लट्टू जल रहे थे जगह-जगह। लोग टहल रहे थे। कुछ लोग तो इतनी तेजी से टहल रहे थे मानों उनके मन में उनको उजाला फैलने पर पहचान लिए जाने का मासूम डर फुदक रहा हो।

दो महिलाएं साथ-साथ टहल रही थी। दोनों के हाथ में लाठी घराने के लंबे डंडे थे। एक महिला हाथ में डण्डा सड़क के लंबवत लिए चल रही थी। दूसरी का डण्डा सड़क के समांतर लहराता हुआ चल रहा था। एक दूसरे के साथ-साथ टहलती हुई महिलाओं के हाथ के डंडे 90 डिग्री के अंतर में देखकर लगा कि अपना देश वास्तव में विविधताओं का देश है।


आसमान पर लालिमा छाई हुई थी। सूरज भाई की सवारी निकलने ही वाली लग रही थी। आसमान के चेहरे पर लालिमा देखकर लग रहा था जैसे कायनात का मेकअप पूरा हो गया है। हल्की लालिमा उसके चेहरे रुज की तरह पसरी हुई है। बस अब कुछ देर में ही सूरज की टिकुली लगाकर सबको दिखने लगेगी।

सड़क पर चार लोग एक-दूसरे के अगल-बगल टहलते हुए चले जा रहे थे बतियाते हुए। सड़क आधी कर दी थी उन्होंने। उनके बगल से गुजरते हुए मन किया टोंक दें कि थोड़ी सड़क दूसरों के लिए भी छोड़ दो भाई। लेकिन फिर नहीं बोले। क्या पता वो भी हमको गेट आउट बोल दें जैसे कल हरियाणा में मंत्री जी ने बोल दिया एक अधिकारी को।

व्हीकल मोड़ पर चाय की सब दुकानें बन्द थीं। हम एक मिनट के लिए सोचने के लिए रुके कि जीसीएफ की तरफ बढ़ें कि रांझी की तरफ। फिर जीसीएफ की तरफ बढ़ गए।

एक आदमी एक बिजली के खम्भे के चबूतरे पर बैठा अपने मोबाइल में घुसा हुआ था। आदमी की स्थिरता देखकर लगा कि उसको डर है कि अगर कहीं हिला तो मोबाइल का नेटवर्क चला जाएगा।

मोबाईल कम्पनियों के नेटवर्क के यही हाल हैं आजकल। अभी जहां होता है कुछ देर बाद वहीं नहीं होता है। कंचनमृग सा छलिया होता है नेटवर्क। चेतक के घोड़े की तरह:
’आदमी  जगह से हिला  नहीं
तब तक नेटवर्क उड़ जाता था”


मुझे लगता है कि मोबाइल कम्पनियों को अपने विज्ञापन में यह सूचनाएँ जरूर छपवानी चाहिए--'फैशन के दौर में गारन्टी की अपेक्षा न करें के शाश्वत नियम के तहत किसी जगह पर अगर किसी तकनीकी कारणों से नेटवर्क लगातार मिलता रहता है तो उसके लिए कंपनी जिम्मेदार नहीं होगी।'

एक जगह लुकमान कोचिंग का विज्ञापन लगा हुआ था। आठवीं से आगे के बच्चों की कोचिंग के लिए। मैं यह सोच रहा था कि लुकमान के पहले का हकीम किधर गुम हो गया।

चाय पीकर लौटते हुए रॉबर्टसन झील देखते हुए आये। एक बुजुर्ग महिला हाथ में लोटा लिये झाड़ियों की तरफ जा रही थी। उसके पीछे एक बच्ची भी प्लास्टिक के मग में पानी लिये चली जा रही थी। 'जहाँ सोच वहां शौचालय' वाली बात याद करके लगा कि शायद यहाँ न सोच पहुंचा है और न शौचालय। यह अलग बात है कि सोच और शौचालय दोनों की अगवानी स्वच्छ भारत अभियान का सेस चार्ज कटना शुरू हो गया है।

झील का पानी शांत लेटा हुआ था। झील के ऊपर जाने वाला तार भी अकेला लटका हुआ अपने ऊपर बैठने वाले पक्षियों के इन्तजार में दायें-बाएं हिल रहा है।

कोई छोटा जलचर पानी में उछला। जिस जगह उछला उस जगह से पानी की लहरें गोल-गोल घूमती हुई किनारे तक पहुंची। पानी हिलने लगा। ऐसा लगा लहरों में दंगा हो गया। किनारे पहुंचकर लहरें शांत हो गयीं। दूर झील का पानी इस हलचल से शांत अपने मस्त लेटा हुआ था। उससे कुछ पूछा जाता तो शायद कहता कि वह स्थानीय हलचल है। उससे हमें क्या लेना देना।

झील के पानी को देखते हुए कमरे पर लौट आये। अभी चाय पीते हुए बाहर देख रहे हैं तो सूरज भाई का काफिला धरती पर पहुंच चुका है। धरती ने मुस्कराती घास और खिले हुए अनगिनत फूलों के गुच्छो के साथ सूरज भाई का स्वागत किया है। सुबह हो गयी है। आप के इधर क्या नजारा है?

Post Comment

Post Comment

No comments:

Post a Comment

Google Analytics Alternative