Friday, November 20, 2015

पुलिया पर गधों से मुलाक़ात

दोपहर को लंच के लिए फैक्ट्री आ रहे थे तो बंटी प्रजापति मिले पुलिया के पास। अपने तीन गधों के साथ कंचनपुर जा रहे थे। भांजा भी था साथ में।

पुलिया पर आदमी तो रोज ही मिलते रहे, दीखते रहे पर गधों से यह पहली मुलाक़ात थी।

बंटी गधों पर ईंट, गिट्टी, मौरम, बालू लादकर इधर-उधर पहुंचाने का काम करते हैं। ईंट की ढुलाई 300 रुपया प्रति हजार है। एक बार में एक गधे पर 50 ईंट करीब लद जाती हैं। मतलब एक फेरे में 3 गधों से 150 ईंट करीब ढुल जाती हैं। दिन भर में करीब 10 चक्कर लग जाते हैं। 10 चक्कर मतल...ब 1500 ईंट। 300 प्रति हजार के हिसाब से 450 रूपये करीब कमाई हो जाती है। कभी काम न मिला तो उस दिन कुछ और काम या दिहाड़ी गोल। महीने में 20 दिन का काम अगर मिला तो 9000 प्रति माह हो गए।

सातवें वेतन आयोग के हिसाब से किसी भी कर्मचारी का न्यूनतम वेतन 18000 होगा। मतलब असंगठित क्षेत्र के मजदूर का दोगुना।

बंटी के गधों की उम्र करीब 15 साल की है। आमतौर पर गधे 22 से 25 साल तक जीते हैं। आजकल एक गधा करीब 3000 रूपये का मिलता है।पहले 300से 400 में मिलता था।हाल में गधों की कीमत में बहुत बढ़ोत्तरी होती है।











सामान ढोने के बाद छुट्टा छोड़ देते हैं बंटी चरने के लिए। ऐसे ही एक गधे ने किसी पागल कुत्ते का जूठा खा लिया। वह भी पागल हो गया। मर गया।

एक बच्चा है बंटी का। आठवीं तक पढ़ा है। वह भी ढुलाई के काम में लगता है। साथ में भांजा था। वह अनपढ़ है।
बात करते हुए गधे पुलिया के पास की घास चरने लगे। बंटी प्रजापति बीड़ी फूंकने लगे। हम न घास खाते न बीड़ी पीते लिहाजा उनको वहीं छोड़कर लंच करने के लिए मेस आ गये।

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