Tuesday, June 30, 2015

धरती की गति


सुबह खबर देखी टेलीविजन में कि आज का दिन एक सेकेण्ड बड़ा होगा। धरती की अपनी धुरी पर घूमने की गति कुछ कम हुई है। घड़ी और धरती का तालमेल बिठाने को दिन एक सेकेण्ड बड़ा किया जाएगा।

वो तो कहो धरती पर बस नहीं वरना कोई सरकार अध्यादेश जारी करती कि घड़ियां जैसी की तैसी रहेंगी, धरती को आज के दिन अपनी धुरी पर जल्दी घूमना होगा और एक सेकेण्ड पहले अपना चक्कर पूरा करना होगा। चक्कर पूरा करके ठीक आधी रात की सेल्फ़ी लेकर सब जगह अपलोड करनी होगी।

धरती की गति धीमी क्यों हुई इस पर क्या कहा जाए? धरती का वजन तो बढ़ा नहीं। सामानों का केवल रूप परिवर्तन हुआ। डायनोसोर थे सो चट्टानों में बदल गए, पेड़ पौधे थे वो कटकुट कर ठिकाने लग गए, फर्नीचर, कोयले,कार्बन डाइऑक्साइड में बदल गए। जो भी बदलाव हुआ, भले ही देखने में खराब लगे हमें लेकिन उससे धरती का वजन तो बढ़ा नहीं होगा। जो आबादी बढ़ी वह भी तो यहीं का खा-पीकर बढ़ी होगी। उससे वजन थोड़ी बढ़ा होगा धरती का। 

उलटे कुछ कम ही हुआ होगा धरती का वजन। इतने उपग्रह भेजे गए अंतरिक्ष में, इतने यान टहल रहे हैं धरती की वजन परिधि से बाहर निकलकर। इससे तो धरती का वजन कम ही हुआ होगा। धरती कुछ स्लिम ,ट्रिम ही हुई होगी ।

कहने को तो कोई कह सकता है कि धरती पर पाप बढ़ रहा है। अपराध बढ़ रहे हैं जमीन पर। इससे धरती का मन दुखी हो गया होगा। इसीलिये वह अनमनी हो गयी होगी यह सोचते हुए कि बताओ हमारे यहां के लोग इतने गड़बड़ हो कर रहें। दुनिया के हर अपराध पर धरती सेकेण्ड के करोडवें, अरबवें,खरबवें सेकेण्ड के लिए ठिठक जाती होगी। उसी से उसको अपनी धुरी पर घूमने में समय कुछ ज्यादा लगता होगा। 

लेकिन देखा जाए तो धरती में प्यार भी तो बढ़ रहा है। दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जिनके मन में  इतना प्यार है जितना पहले कभी नहीं रहा। इतना स्नेह है लोगों के मन में कि उसमें कई पृथ्वियां ऐसे डुबकियां लगाती रहें जैसे किसी झील में मछलियाँ, जैसे किसी हलवाई की दूकान में रसमलाइयां, जैसे किसी  प्रेम डूबे जोड़े की आँखों में तितलियाँ। धरती इन खूबसूरत नजारों को देखने में डूब जाती होगी और अपनी धुरी पर घूमना भूल जाती होगी। जब याद आता होगा तब -हाय अल्ला, ओरी मोरी मैय्या करती सरपट दौड़ती होगी लेकिन कुछ देर तो हो ही जाती होगी न। वही धरती के कम होने का कारण बनती होगी।

सच पूछा जाए तो इस डम्प्लॉट दुनिया में एक सेकेण्ड की क्या गिनती है। जहां 300000 किमी प्रति सेकेण्ड की रफ़्तार से की प्रकाश गति से भागते हुए भी अगर कोई चले तो भी अरबों-खरबों वर्षों तक टहलते हुए भी दुनिया का कोई ओर-छोर न मिले। ऐसे में एक सेकेण्ड इधर-उधर होना क्या मायने रखता है भला। 

धरती को तो शायद पता भी न चला हो कि उसकी गति पर कोई निगाह रखते हुए अपनी घड़ियां ठीक कर रहा है।वह तो अपनी धुरी पर अविराम घूमती रहती है करोड़ों अरबों वर्षों से। उसको इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि आदमी अपनी घड़ी तेज करता है धीमी, कैलेंडर का पन्ना बदलता है या प्रधानमंत्री।

यह तो हम इंसान हैं जो धरती को अपनी बपौती समझ गदर काटते रहते हैं। अपने को सबसे बुद्धिमान प्रजाति समझते हुए दुनिया की सबसे बड़ी बेवकूफियां करता रहता है। जिस धरती पर रहता है उसी को बर्बाद करने की हरकतें करता रहता है। उसके  बाद स्यापा करता और धरती के नष्ट होने का स्यापा करता है।

सच कहा जाए तो धरती इंसान की धरती विरोधी हरकतों के चलते धरती थोड़ी नष्ट होगी। गर्मी बढ़ने पर समुद्र का स्तर बढ़ेगा तो शहर डूबेंगे, आदमी तबाह होगा। धरती तो ऐसे ही अपनी धुरी पर घूमती रहेगी। हो सकता है आज से सैकड़ों साल बाद कोई और उन्नत प्रजाति के लोग धरती के बारे में अपनी राय बनाते हुए लिखें कि पहले धरती पर डायनासोर रहते थे जो किसी उल्कापिंड के चलते खत्म हुए। उसके बाद इंसान बुद्धिमान प्राणी थे। उन्होंने अपनी बुद्गिमानी और लालच के चलते ही धरती का वातावरण इतना बर्बाद कर लिया कि निपट गए।
ओह हम भी किधर टहला रहे हैं आपको। एक सेकेण्ड के हिसाब किताब का किस्सा घण्टे भर से सुना रहे हैं। ये अच्छी बात नहीं है न। लेकिन इतनी खराब भी नहीं है न। अरे गुस्सा मती होइए। सरिता शर्मा जी की यह कविता पर  फरमाइए वह जिसे हिंदी में मुलाहिजा कहते हैं:

पहले कमरे की खिड़कियां  खोलो
फिर हवाओं में खुशुबुएं घोलो
सह न पाउंगी तल्खियां इतनी
मुझसे बोलो तो प्यार से बोलो।

आपका दिन शुभ हो। मंगलमय हो।

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Monday, June 29, 2015

उठ जाग मुसाफिर भोर भई

चूँकि साइकिल शाम को ही मिल गयी सो सुबह भी टहलने निकले। निकलते ही पानी रिमझिमाने लगा। मन किया वापस लौट लें। सो वापस लौटे और एक पालीथीन में मोबाइल और पैसे रखकर फिर निकल लिए। भीगते हुए। बारिश में वर्षों बाद भीगने का आनन्द लेते हुए।

सड़कों के किनारे जगह-जगह फुटपाथों पर , दुकानों के आगे लोग सो रहे थे। एक दूकान के बाहर 2-3 फिट की जगह पर कुछ लोग जग कर अंगड़ाई लेते हुए दिखे। सीतापुर के महमूदाबाद के रहने वाले ये लोग यहां इमारती सामान की दूकान पर काम करते हैं। सरिया और अन्य सामान ठेलिया पर धरकर ग्राहक के पहुंचाते हैं।
बारिश हो रही थी। हमने पूछा-अभी धीमी है। तेज हो जायेगी तो क्या करोगे? बोले- 'अभै बईठ हन। ज्यादा जोर होई तौ ठाड़ हुई जाब।' यह भी बोले-'मौसम के हिसाब से जाड़े का मौसम सबसे नीक है। ओढ़ बिछा के पर रहौ मजे ते।'

सीतापुर की बात चली तो याद आया कि अवधी के प्रसिद्ध कवि पण्डित वंशीधर शुक्ल पास ही लखीमपुर के मन्योरा गाँव के रहने वाले थे।प्रसिद्ध गीत:

उठ जाग मुसाफिर भोर भई,
अब रैन कहां जो सोवत है।
के अलावा उन्होंने कई और अद्भुत गीत अवधी और खड़ी बोली में लिखे। पहले कांग्रेसी और बाद में समाजवादी हो गए। भाई साहब Ashok Kumar Avasthi ने उनके साथ की यादें साझा करते हुए बताया:

'उनको हम लोग मामा कहते थे। विधायक भी रहे। अपना सारा पैसा लोकहित में खर्च करते रहे। आजीवन फक्कड़ रहे। नंगे पैर चलते थे। चाय-पकौड़ी के शौक़ीन थे। स्वतन्त्रता के बाद किसान आंदोलन में भागेदारी की। आशु कवि थे। एक बार हमने कहा मामा हमारे लिए कविता लिखो तो उन्होंने कुछ ऐसा लिखा:

'हम अशोक हैं, हम अशोक हैं
भोला बच्चा हमें न समझो
दिल का कच्चा हमें न समझो'

जिसने लोकप्रिय वे थे अगर सरकार का विरोध न करते तो बहुत सफल होते। लेकिन वो हमेशा सरकार के खिलाफ जनता के हित में आवाज उठाते रहे। उस समय के लोग  अलग ही तरह के  स्वाभिमानी लोग थे।'

आगे पालीटेक्निक चौराहे पर चाय पी। दूकान पर मिले निर्मल कुमार तिवारी।बहराइच के एक गाँव के रहने वाले। कक्षा 6 पास। घर में बाग़-बगीचा सब था लेकिन घाघरा नदी की कटान में बह गया। पढ़ाई छोड़कर चाय की दूकान पर काम करते हैं। रात में निर्मल चलाते हैं दूकान। दिन में मालिक खुद। 3000/- और रहने खाने के बदले रात भर काम। बड़ा भाई दिल्ली में काम करता है। दो छोटे भाई गाँव में रहते हैं।

कुछ 100 नम्बर वाले पुलिस वाले आये। एक ने दूकान से बिस्कुट निकालकर खाना शुरू कर दिया। बाकी दूसरी दूकान पर लगे। पुलिसवाले चाय, नास्ता, पान मसाला और त्योहारों पर दारू के लिए पैसे लेते हैं ठेला लगाने देने के बदले। 

चार साल पहले आये थे घर से नौकरी करने निर्मल। पढ़ते होते तो अब तक हाईस्कूल कर लिये होते लेकिन जिंदगी के स्कूल में दाखिला लेने के बाद स्कूल की पढ़ाई छूट गयी। चलते समय बोले- फिर आइयेगा अंकल।
आगे चले तो पता चला फैजाबाद रोड पर आ गए। पता चलने पर  लौटे। एक जगह एक बुजुर्ग बांस काट छीलकर सामान बनाने के लिए तैयार कर रहा था। हमको Rajeshwar Pathak की कविता की लाइनें याद आई:
हम तो बांस हैं,
जितना काटोगे,उतना हरियायेंगे.

हम कोई आम नहीं
जो पूजा के काम आयेंगे
हम चंदन भी नहीं
जो सारे जग को महकायेंगे
हम तो बांस हैं,
जितना काटोगे, उतना हरियायेंगे.

बांसुरी बन के,
सबका मन तो बहलायेंगे,
फिर भी बदनसीब कहलायेंगे.

जब भी कहीं मातम होगा,
हम ही बुलाये जायेंगे,
आखिरी मुकाम तक साथ देने के बाद
कोने में फेंक दिये जायेंगे.

हम तो बांस हैं,
जितना काटोगे ,उतना हरियायेंगे.
लौटकर गोमती नगर की तरफ मुड़े। सोचा Amit को दर्शन दिया जाए। मोड़ पर डामिनोस की पिज्जा की दूकान पर कई मोटरसाइकिलें टेढ़ी खड़ी थीं। लोग कहते हैं पिज्जा की डिलिवरी तुरन्त होती है।मन किया वहीं आर्डर दें और यह भरम खत्म करें। लेकिन फिर नहीं दिया आर्डर।

अमित के घर की घण्टी बजाई तो उस समय पौने सात बजने वाले थे। आँखे मलते हुए आने में जो समय लगा उतने में हास्टल के दिन याद कर लिए। विंग का पहला कमरा था अमित का। आते-जाते भड़भड़ा देते थे। जितनी देर यहां लगी खोलने में उतनी देर में तो दरवाजा पूरा बज गया होता। लेकिन हास्टल और घर , लकड़ी के दरवाजे और लोहे के गेट के अंतर ने हमें ऐसा कुछ करने नहीं दिया।

अमित ने बहुत बढ़िया चाय बनाई। पीने के पहले तारीफ का अनुरोध किया। हमने उदारता का परिचय देते हुए पीने के पहले ही तारीफ कर दी। प्रि ड्रिंक तारीफ। पीने के बाद लगा कि तारीफ बेकार नहीं गयी। 

चाय पीकर हम फ़ूट लिए।काफी देर हो चुकी थी। और देर होने पर खतरा था हड़काये जाने का खतरा था।
खरामा-खरामा साइकिल चलाते हुए वापस लौटे।हल्की बारिश हो रही थी। चश्मा उतारकर हमने जेब में धर लिया। बहुत दिन बाद ऐसी बारिश में भीगने का मजा लिया। सीतापुर वाले लोग दुकान के पास चूल्हा सुलगाकर खाना बना रहे थे। घर में सब लोग जग गए थे। सुबह हो चुकी थी। जो लोग अभी भी सो रहे हों उनके लिए फिर से पेश है पण्डित वंशीधर शुक्ल का गीत:

उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है

खोल नींद से अँखियाँ जरा और अपने प्रभु से ध्यान लगा
यह प्रीति करन की रीती नहीं प्रभु जागत है तू सोवत है.... उठ ...

जो कल करना है आज करले जो आज करना है अब करले
जब चिडियों ने खेत चुग लिया फिर पछताये क्या होवत है... उठ ...

नादान भुगत करनी अपनी ऐ पापी पाप में चैन कहाँ
जब पाप की गठरी शीश धरी फिर शीश पकड़ क्यों रोवत है... उठ ....

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Sunday, June 28, 2015

पैसा सबको दौड़ाता है

बहराइच के कमलेश सबेरे का खाना खाते हुए
सबेरे-सबेरे नाई की दूकान खोजने निकले हैं नबाबी शहर में। दूकान दिखी लेकिन बन्द है। पता चला आठ बजे खुलती है।

सोचा आगे देखे। एक दूकान पर काम करते बच्चे ने हाथ घुमाकर बताया कि उधर है। घूमकर आये तो सब दुकानें बन्द मिलीं। सामने की पट्टी पर एच ए एल का गेट खुला था। तमाम बच्चे अगल-बगल बैठे थे। शायद कोई इम्तहान है। कोई इंटरव्यू भी हो सकता है।

सड़क पर ही तमाम लोग ईंटों के चूल्हे बनाते रोटी बनाते दिखे। 8-10 चूल्हे अलग-अलग जल रहे थे। सड़क पर बने चूल्हों में सिंकी रोटियों को सिंक जाने के बाद सड़क पर ही ईंटो के सहारे खड़ा करते जा रहे थे बनाने वाले। फिर प्लास्टिक की छोटी डलिया कम थाली ज्यादा में रखते जा रहे थे। आलू और कुछ कुछ और की सूखी सब्जी।
सड़क पर जब किसी नाई की दूकान नहीं मिली तो फिर घूमकर उसी जगह आ गए जहां पहले पूछा था। अबकी बार एक दूकान के बरामदे पर रोटी खाते कमलेश से पूछा तो बताया -'हियन है दूकान आगे। मुला अबहिन खुली नाय हुईहै। 9 बजे खुलति है।'

कमलेश बहराइच के एक गाँव के रहने वाले हैं। गाँव कई लोगों के साथ दिहाड़ी पर काम करने आये हैं। 10-12 साल से आते जाते रहते हैं। ईंटा-गारा मजूर काम करते हैं। आजकल 280 रुपया दिहाड़ी मिल रही है।

कुछ लोग एचएएल में मजूरी करते हैं।ठेकेदार ठेका लेते हैं । मजूर बाजार से लाते हैं। ठेकेदार कोई भी हो मजूर वही रहते हैं। जैसे सरकार किसी की भी हो जनता वही रहती है।


कमलेश के साथ रामसेवक
गाँव में 10 बीघा खेती है। खेती के समय गांव चले जाते हैं। जब वहां काम नहीं होता तो शहर आ जाते हैं। गाँव में परिवार है। बच्चे पढ़ते हैं। सामान के नाम पर कुछ कपड़े और कुछ बर्तन। यहीं दूकान के बाहर सो जाते हैं। प्लास्टिक के बर्तन के फायदे बताते हुए कहते हैं--10 रुपया की है। हिराय-बहाय (खोने-बह जाने) की चिंता नाय।
नहाना-धोना सरकारी नल पर या जहां काम करते हैं वहीं कर लेते हैं। दुष्यंत कुमार कहते ही थे:

न हो कमीज तो पावों से पेट ढँक लेंगे
बहुत मुनासिब हैं ये लोग इस सफर के लिए।
गाँव में 10 बीघा जमीन है फिर काहे मजूरी करन आवत हौ शहर? हमारे इस बेवकूफी के सवाल पर कमलेश ने कहा-'घर माँ फालतू बईठ के का करी।सबै आवत हैं पैसा के खातिर। हम बहराइच ते हियन आयेन। हियाँ के लोग और आगे जाते हैं।'

सही ही है। बहराइच का आदमी मजूरी करने लखनऊ आता है। लखनऊ का मुम्बई, बंगलौर, गुड़गांव जाता है। फिर वहां से और आगे यूरोप,अमेरिका लन्दन न्यूयार्क जाता है। पैसा सबको दौड़ाता है।

यह पैसा ही तो है जो सबको नचाता है।योजनाओं में घपले करवाता है। करोंडो जिसके पास है उसको अरबों का लालच लगवाता है। दंद-फन्द करवाता है। फिर भगोड़ा बनवाता है। सरकारें हिलाता है।

पता नहीं लखनऊ के स्मार्ट सिटी बनने की योजना है कि नहीं। लेकिन जब बनेगा तो उसमें कमलेश जैसे लोगों के लिए कुछ होगा कि नहीं? जब स्मार्ट सिटी बन जाएगा लखनऊ तब सड़क पर ईंटों का चूल्हा बनाकर रोटी सेंकने की अनुमति होगी कि नहीं।

इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। वैसे भी अभी तो सरकार,विपक्ष और मीडिया आईपीएल के लफ़ड़े से निपटने में लगी है। इस चुनौती से सबको मिलकर एकजुटता के साथ निपटना जरूरी हैं नहीं तो लफड़ा हो सकता है।

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Saturday, June 27, 2015

प्रदूषण मुक्त वाहन प्रमाणपत्

दो दिन पहले कानपुर में कार के कागज देखे। कागज तभी देखे जाते हैं जब शहर से बाहर जाना हो। रजिस्ट्रेशन और बीमा के कागज तो ठीक थे, हमेशा की तरह, लेकिन प्रदूषण वाला कागज अपनी उमर पूरी कर चुका था। दो महीने घर नहीं आये। कार का रेडियेटर का पंखा खराब था सो कार खड़ी रही। बाहर नहीं निकली तो कागज भी नहीं बने। दो दिन पहले कानपुर आये। कार बनवाई तो देखा उसके प्रदूषण प्रमाणपत्र पिछले माह खल्लास हो चुका था।

अब जब पता चला तब तक शाम के 6 बज गए थे। लेकिन अगले सुबह दिन बाहर निकलना था सो प्रदूषण प्रमाणपत्र बनवाना जरूरी था। सड़क की जिस पट्टी पर 'यहां प्रदूषण प्रमाण पत्र बनता है' हम उसकी दूसरी पट्टी पर जाम में फंसे थे। जाम क्या एक तरह से समझिये झाम में फंसे थे। लग रहा था कि ऐसा न हो कि जबतक जाम खत्म हो तब तक दूकान बन्द हो जाए।

प्रदूषण प्रमाणपत्र की दूकान बन्द होने के एहसास मात्र से हम इतना घबरा गए जितना की आजकल लोग यह सोचकर हो रहे होंगे की ललित मोदी कहीं उनका नाम न ले ले। हमने गाड़ी उसी तरफ लगाई और जाम की नदी पार करके डिवाइडर को फांदकर दूकान पर पहुंच ही गए। पुराना प्रदूषण प्रमाणपत्र दिखाया। उसने दो मिनट में अगले 6 माह के लिए सड़क की दूसरी पट्टी पर खड़ी हमारी गाड़ी के प्रदूषण जांच में पास होने का प्रमाण पत्र बना दिया। मात्र 50 रूपये में।

अपना काम होने के बाद जैसे लोगों का जी रिश्तेदारों का काम कराने के लिए हुड़कता है वैसे ही हमें घर में खड़ी अपनी मोटर साइकिल भी याद आई। घर में फोन करके उसका नम्बर पूछा और उसका भी प्रदूषण प्रमाणपत्र बनवाया। 40 रूपये में।

अपना काम निकलने के बाद हम पर सामाजिकता ने हल्ला बोला। गाड़ी हमारी 16 साल पुरानी और मोटरसाइकिल 11 साल पुरानी। दोनों में से किसी का भी इमिशन टेस्ट नहीं हुआ। कोई जांच नहीं हुई कि इनके निकले हुए धुंए में कार्बन मोनोआक्साइड कितनी है और सल्फर साइआक्साइड कितनी। सच तो यह भी कि उस दुकान पर कोई औजार या सुविधा भी नहीं थी जिससे इमिशन टेस्ट होता हो। बस गाड़ी का नम्बर बताओ, प्रदूषण प्रमाणपत्र ले जाओ।

दो प्रमाण पत्र जो मिले और जो अगले 6 महीने काम आएंगे, दोनों फर्जी हैं लेकिन हमे सुकून है कि हमारी पास अपनी गाड़ियों के प्रदूषण मुक्त होने का प्रमाणपत्र है।

जिन लोगों को प्रदूषण मुक्त वाहन प्रमाणपत्र देने का ठेका मिलता है वो लम्बी (और चौड़ी भी ) रकम देने के बाद मिलता है। लेकिन वे किसी प्रमाणपत्र देते समय कोई जांच किये बिना प्रमाणपत्र दे देते हैं। लोग भी बनवाते हैं । न बनवाएं तो जुमाना ठुकता है।

यह बात मैंने अपने शहर के बारे में लिखी। वह भी एक अनुभव के आधार पर। आपके शहर में शायद गाड़ी की सही में जांच करके प्रमाणपत्र बनता हो। गाड़ी में प्रदूषण की मात्रा ज्यादा होने पर प्रमाणपत्र न बनाया जाता हो और गाड़ी 'सड़क बदर' हो जाती हो।

वैसे आजकल कुछ भी गलत जैसा होते दिखने में अनहोनी जैसा कुछ नहीं लगता। फर्जी डिग्री वाले लोग मंत्री बन जाते हैं। फर्जी काम करने वाले अपराधी जैसे आदमी को मंत्री, सन्तरी, पत्रकार, जज, वकील भागने में सहायता देते हों ऐसे में एक कार और एक मोटर साइकिल ने कौन किसी की भैंस खोली है जो उनको फर्जी प्रमाणपत्र न मिल सके।

क्या पता जब लोग फर्जी डिग्री और अन्य घपलों से ऊब जाएँ या फिर ध्यान बंटाने के लिए ' प्रदूषण प्रमाणपत्र घोटाले' पर चिल्लाते हुए बहस करें और किसी ट्रांसपोर्ट मंत्री का इस्तीफ़ा मांगने के लिए गला फाड़ते हुए हल्ला मचाएं। बाद में सरकार को मामले में कड़ा कदम उठाते हुए किसी चिल्लर परिवहन अधिकारी को लाइन हाजिर करके मामले को रफा-दफा करना पड़े।

नीचे की फोटो जबलपुर की आफिसर्स मेस की छत की चाहरदीवारी पर इकट्ठा पानी में पड़ते सूरज के बिम्ब की। खैंचवार हैं Sagwal Pradeep अपने आई फोन से।

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