कल शाम को सड़क किनारे इलेक्ट्रॉनिक सामान बिकते देखे। सौ रुपये के पाँच। सड़क किनारे रखे सामान के लिए आवाज आ रही थी -‘ऑफ़र, ऑफ़र बम्पर ऑफ़र। सौ रुपए के पाँच आइटम।दो LED लाइट, एक चार्जिंग वाली लाइट, एक डाटा केबल और एक मोबाइल स्टैंड।’
दुकान के बगल में एक लड़का चार्जिंग वाली लाइट को ऊपर उछाल कर सड़क पर गिराकर उसकी मजबूती का प्रदर्शन कर रहा था। लाइट को ऊपर उछलते और नीचे गिरते देखकर मुझे कृष्ण बिहारी 'नूर' साहब का शेर याद आया :
ज़िंदगी से कटता रहा, जुड़ता रहा मैं,
जैसे कोई माँ बच्चा खिलाए उछाल के
सौ रुपए के पाँच आइटम लेने वालों की भीड़ लगी थी। कुछ तमाशबीन थे। कुछ हमारे जैसे खलिहर वीडियोबाज। 'बाजार से गुजरा हूँ लेकिन ख़रीदार नहीं हूँ' घराने के लोग।
हमको वीडियो बनाते देखकर LED लाइट टेस्टिंग करने वाले ने लाइट और ऊपर उछलकर सड़क पर गिराई। लाइट टूटी नहीं।
सौ रुपए में पाँच आइटम बिकते देखकर मुझे अपने यहाँ के जनप्रतिनिधियों की याद आ गई। क्या उनके दाम भी इसी तरह लगते होंगे। कोई पैसे वाला किसी पार्टी से संपर्क करता होगा-‘ सौ करोड़ में पाँच प्रतिनिधि, बम्पर ऑफ़र।’
हो सकता है कोई जनप्रतिनिधि मेरी बात से नाराज न हो जाए। कहे -‘ हमको इतना सस्ता समझ लिया है। इतने में तो लागत भी नहीं निकलेगी।’
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