कल एक जगह सड़क किनारे मोटरसाइकिलें खड़ी देखीं। चालीस पचास होंगी। पता किया तो मालूम हुआ ये जेप्टो का डिलीवरी पॉइंट है। जेप्टो भी ब्लिंकिट की तरह घरेलू सामान पहुँचाने का काम करती है। मोटरसाइकिलों में जेप्टो के डिलीवरी करने वाले लोग अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे।
ब्लिकिट और जेप्टो की डिलीवरी प्रक्रिया के बारे में कौतूहल था। कल इसे पास से देखा। अंदर गए। लोहे के जंगले के पीछे खूब बड़ा स्टोर था। अलमारियों में सामान रखा था। अंदर लोग सामान उठाए इधर-उधर घूमते हुए पैकेट में सामान रखकर डिलीवरी वाले लोगों को दे रहे थे। सामान मिलते ही लोग डिलीवरी के लिए लपकते थे।
वहाँ मौजूद लोगों से सामान का आर्डर मिलने से लड़के डिलीवरी तक हिसाब समझा। जेप्टो/ब्लिंकिट को आर्डर मिलने पर उसका डिलीवरी पर्सन कंप्यूटर से तय होता है। बाहर खड़े डिलीवरी वाले आदमी के पास संदेश जाता है। उसके मोबाइल पर काउंटर नंबर आता है। वहाँ पहुंचकर वह सामान उठाता है। काउंटर पर लगे स्कैनर से उसे डिलीवरी का पता मिलता है। वहाँ पहुंचकर सामान डिलीवर करके वह ‘सामान डिलीवर किया’ का मेसेज करता है। अगली डिलीवरी के लिए उसका नम्बर लग जाता है।
वहाँ डिलीवरी के लिए तैयार लोगों से बातचीत हुई। कई तरह के लोग काम के लिए आते हैं। कुछ स्थानीय कुछ आसपास के गाँव से आने वाले। कई लोगों के लिए यह पूरे समय का रोज़गार है। कुछ के लिए पार्टटाइम काम। पार्टटाइम काम करने वाले वो लोग हैं जिनको कहीं दूसरी जगह भी काम मिला है। छुट्टी पाने पर यहाँ काम करने आ जाते हैं। ऐसे लोगों में कुछ लोग किराए पर बाइक भी चलाते हैं।
अमेरिका और विकसित देशों में जेबखर्च के लिए होटलों और रेस्तरां में पार्ट टाइम काम करना आम बात मानी जाती है। भारत में बाइक सेवा और डिलीवरी सेवा में पार्टटाइम काम का चलन बहुत तेजी से बढ़ा है।
एक बच्चा ग्रेजुएशन की पढ़ाई करते हुए दो से तीन घंटे डिलीवरी का काम करता है। वहाँ मिला। उसने बताया कि पास की कॉलोनी में सामान डिलीवर करके आया है। प्रति किलोमीटर 14 रुपए मिलते हैं। किसी खास समय अंतराल में काम करने पर अतिरिक्त पैसे भी मिलते हैं। पिछली डिलीवरी के उसे 24 रुपए मिले। दो-तीन घंटा काम करने से उसे अपने कमरे का किराया और जेबखर्च भर के पैसे मिल जाते हैं।
बच्चे ने बताया कि वह ग्रेजुएशन की पढ़ाई के साथ कंपटीशन की तैयारी भी कर रहा है। यूपी पीसीएस और सिविल सर्विसेज की। मैं कल्पना करता हूँ की कुछ साल बाद बालक किसी कंप्टीशन में सफल होकर मीडिया की इंटरव्यू देते हुए बताएगा कि मैं डिलीवरी का काम भी करता था। मीडिया में सुर्खियों में खबर आएगी -‘ जेप्टो का डिलीवरी मैं बना अधिकारी।’
लेकिन ऐसा सबके साथ नहीं होता। कुछ लोग ही ऐसा कर पाते हैं। बाक़ी बहुत लोग उमर भर इसी तरह के काम करते रह जाते हैं। उनका किसी मीडिया में कोई जिक्र नहीं होता। मीडिया की निगाह चमकीले लोगों पर ही रहती है। इससे आगे वह देख नहीं पाता।


No comments:
Post a Comment