Wednesday, July 01, 2026

मेट्रो सुलभ शौचालय

 


आज मेट्रो से यात्रा हुई। गंतव्य पर पहुंचे तो एक बुजुर्ग ने पूछा -'टोकन कहाँ डालना है?'

हमने बताया। उन्होंने टोकन डाला। एग्जिट से बाहर निकल आए। एग्जिट से बाहर निकलकर इधर-उधर ताकते हुए उन्होंने हमसे बाहर का रास्ता पूछा। बाहर का रास्ता मतलब मेट्रो स्टेशन से बाहर जाने का रास्ता। हमने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा -'चलो, हम भी बाहर जा रहे।'
हम साथ चल दिए।
मेट्रो से लिफ्ट से बाहर आने तक बातचीत हुई। हमने पूछा -'कहाँ से आ रहे ?'
बोले -'कहीं से नहीं। शौचालय जाना था। रास्ते में कहीं शौचालय नहीं दिखा। मेट्रो स्टेशन दिखा। हमने दस रुपए का टोकन लिया। मेट्रो के शौचालय का उपयोग किया। बाहर निकल आए।'
मतलब मेट्रो स्टेशन का उपयोग सुलभ शौचालय की तरह। इतने रुपए किसी सुलभ शौचालय का उपयोग करने में भी लग जाते।
आगे बातचीत करते हुए बुजुर्ग ने बताया कि सिद्धार्थनगर के रहने वाले हैं।
उनका प्रोस्टेट का आपरेशन हुआ है। पिछले महीने। डॉक्टर को दिखाने आए थे। लौटते समय शौचालय की जरूरत पड़ी तो मेट्रो की शरण में आए।
स्टेशन से बाहर निकल मैं अपने लिए गाड़ी बुक करने लगा। बुजुर्ग फिर पास आए। पूछा -' हमारे साथ एक गांव का आदमी आया था। उसको बाहर रोककर गए थे। पता नहीं कहाँ चला गया। मिल नहीं रहा।'
हमने कहा -' यहीं कहीं होगा। फ़ोन कर लो।'
उनके पास फ़ोन नहीं था। बुजुर्ग इधर-उधर अपने साथी को खोजने में लग गए। क्या पता साथी भी हल्का होने मेट्रो स्टेशन चला गया हो।
हमारी सवारी आ गई। हम बुजुर्ग को स्टेशन पर छोड़कर चले आए। बुजुर्ग को अब तक उनका साथी मिल गया होगा।

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