Tuesday, January 13, 2015

देवी मानती ही नहीं

आज सर्वहारा पुलिया पर धूप सेंकते रामप्रसाद मिले।पनागर में रहते हैं।ड्राइवरी का काम करते हैं। कुछ दिन पहले तक बीएसएनएल में ठेके पर गाड़ी चलाते थे। 5000 रूपये महीने मिलते थे। इस बार ठेका किसी दूसरी फर्म को मिला तो काम ठप्प ड्राइवरी का। अब जो गाड़ी मिल जाती है उसको चला लिए हैं। जब काम नहीं मिलता तो इधर-उधर टहलते हैं।

रामप्रसाद कोल हैं। घर में खेती भी है। बाल-बच्चों के बारे में पूछने पर बताया कि बच्चे नहीं हैं। शादी हुई थी तब जब जबलपुर में बड़ा वाला भूकम्प आया था।

बच्चों के लिए डाक्टर को दिखाने की बात पर बताया डाक्टरों को दिखाने के अलावा अपने यहां पूजारियों को भी दिखाया। लकड़बाबा को भी। लोगों ने बताया कि देवी की पूजा करनी होगी। वो खुश होंगी तभी कुछ होगा। लेकिन देवी की पूजा में अड़चन है।

अड़चन यह कि देवी की पूजा में बलि देनी होगी। माँस बनाना खाना होगा।लेकिन रामप्रसाद की पत्नी और खुद रामप्रसाद शाकाहारी हैं। इसलिए देवी मान ही नहीं रहीं हैं। जब तक मांस नहीं चढ़ाया जायेगा तब तक देवी मानेंगी नहीं।  लफड़ा है।

रामप्रसाद के बारे में यह लिखते हुए सोच रहा हूँ आजकल हर अगला अपने यहां की महिलाओं को चार बच्चे कोई कोई तो पांच बच्चे पैदा भी करने का नारा लगा देता है। लेकिन तरकीब कोई नहीं बताता कि इसमें किस देवी/देवता की पूजा करनी होगी। किस अस्पताल में डिलिवरी होगी। कहाँ रहेंगी इतनी सन्तानें? किन स्कूलों में पढ़ेंगी?क्या खायेंगी?

ओह हम भी कहाँ से कहां पहुंच गये। टीवी पर बहस आ रही है-"दिल्ली में अगली सरकार किसकी बनेगी?" 

आप किसकी सरकार बनवा रहे हैं। खैर छोडिये । सुनते हैं बहस। :)

ठिठुरन बैठी ठाठ से सबको रही कंपाय

ठिठुरन बैठी ठाठ से सबको रही कंपाय।
स्वेटर,मफलर मिल ठंड से पंजे रहे लड़ाय।

पवन सहायता कर रहा ठंडक की भरपूर।
करो अंगीठी गर्व तुम इसका भी अब चूर।

कोयला कल तक था बुरा बंद पड़ी थी ‘टाल’।
अब वो ‘कलुआ’ हो गया सबसे अहम सवाल।

गर्म चाय ठंडी हुई ज्यों ब्लागर के जोश।
गर्मी की फिर कर जुगत,बिन खोये तू होश।

गाल,टमाटर,सेब सब मचा रहे हैं धमाल।
कौन चमकता है बहुत कौन अधिक है लाल।

किरणें पहुंची खेत में लिये सुनहरा रंग।
पीली सरसों देखकर वो भी रह गईं दंग।

सूरज निकला ठाठ से ऐंठ किरण की मूंछ।
ठिठुरन सरपट फूट ली दबा के अपनी पूंछ।

-कट्टा कानपुरी

Sunday, January 11, 2015

अपि स्वर्णमयी अतीत न में रोचते

सबेरे जल्दी नींद खुल गयी। 5 बजे।'नींद खुल गयी' से ऐसा लगता है न कि जैसे नींद को बाँध के रखा गया हो सोने से पहले। सुबह खूंटा तुड़ा लिया हो अगली ने।

नींद खुलते ही पहले मोबाइल खोला फिर आँख।मोबाइल आजकल ज्यादातर लोगों के सबसे करीबी होते हैं। चिपक के सोते हैं लोग मोबाइल से। आगे नहीं लिखेंगे मोबाइल के बारे में।आप खुदै समझ लीजिये।

बाहर कौआ कांव-कांव बोल रहा है।चिड़िया भी कोई चिं चिं चिं कर रही है। बोल तो और भी पक्षी रहे हैं लेकिन उनकी आवाज बूझ नहीं पा रहे हैं।हम अपने आसपास के पक्षी और पेड़ों के बारे में बहुत कम जानते हैं। हमारे अहाते में ही कई पेड़ हैं जिनके नाम अपन को नहीं पता। लेकिन कोई शर्मिंदगी नहीं। सब जानने का ठेका हमने ही लिया है क्या? गूगल को काहे के पैसे मिलते है। वो रखे इस सबका हिसाब।

सुबह जगकर स्मार्टफोन पर सर्फिंग करने लगे।सोचने लगे कि पहले की ऋषि मुनि ब्राह्ममूहूर्त में जग कर क्या करते होंगे।पक्का नेटसर्फिंग करते वे देवताओं से वरदान की डील करते होंगे।न जाने क्या-क्या फ़ाइल आती-जाती होंगी। होंगे।उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सराएं उनसे चैट करती होंगी।

क्या पता विश्वामित्र ने त्रिशंकु को 'विनजिप' करके फ़ाइल में स्वर्गलोक भेजा हो। वहां फ़ाइल पूरी डाउनलोड करने के पहले ही स्वर्ग का नेट कनेक्शन कट गया हो।डीसी हो गया हो। इधर विश्वामित्र के यहाँ वह फ़ाइल डिलीट हो गयी हो।स्वर्ग वालों ने त्रिशंकु की फ़ाइल नेट कनेक्शन के न होने के चलते गुरुत्वबल से वापस भेजनी चाही हो।लेकिन देवताओं को पता ही नहीं रहा होगा कि इसके लिए रॉकेट चाहिए होता है।पता होता तो अपने यहां एक ठो 'नासा' या फिर 'इसरो' खोलते और रॉकेट से त्रिशंकु को वापस भेज देते।

बताइये देवताओं के तकनीकी रूप से पिछड़ेपन के चलते एक राजा बेचारा एक अटकी हुई फ़ाइल बनकर रह गया।

कहने का मतलब यह कि हमारे यहाँ महाभारत काल में विज्ञान इतना उन्नत था कि आदमी को बिना रॉकेट और यान के सीधे स्वर्ग भेज देते थे। अगर उस समय की तकनीक अमेरिका वालों के पास होती तो आज कल्पना चावला ज़िंदा होती। बहुत उन्नत विज्ञान था महाभारत काल में। भौत भौत। इतना कि जितने की आप कल्पना नहीं कर सकते।

हम भी देखिये, किधर फंस गए। हम आँख खुलने के बाद के किस्से बता रहे थे। आँख खुलने के बाद हम करवटें बदलते हुए बारी बारी से वामपंथी, कट्टरपन्थी ( दक्षिणपंथी )और सेकुलर होते रहे।मतलब बाएं,दायें और सीधे लेटते रहे।


पहले हम आम इंसान की तरह पेट के बल भी लेटते थे। लेकिन एक दिन पेट के बल छिपकली मुद्रा में लेटे तो न जाने क्या हुआ कि पल्स रेट 180 पहुंच गया। घण्टे भर ईसीजी,बीपी और कार्डियोलॉजिस्ट होता रहा। बाद में हफ्ते भर ट्रेडमिलटेस्ट, इको और न जाने क्या-क्या होता रहा। लेकिन कुछ निकला नहीं।

इतना कुछ होने के बाद भी कुछ निकला नहीं। 5000 ठुक गए बस। पहले का जमाना होता तो ऋषि मुनि नाड़ी पर हाथ रखकर बता देते -'मस्त रहो'।फीस के नाम पर केवल कन्दमूल फल में काम चल जाता।बहुत उन्नत समय था। बहुत ज्ञानी थे अपन के पूर्वज। ये आज के पश्चिम के वैज्ञानिक लोगों का ज्ञान उनके ज्ञान के सामने उचक- उचक कर हैण्डपम्प बोले तो चांपाकल से पानी भरता था।

अक्सर हम अपने अतीत के प्रति मोह ग्रस्त होते हैं। वह समय बहुत अच्छा था।मधुर था। अतीत वैसे भी हमेशा अच्छा लगता है। बुरा बीता तो यह लगता है कि बुरा समय बीत गया, अच्छा बीता तो यह सोचकर कि कितना सुहाना बीता।

कथाकार अखिलेश ने अपनी एक किताब में यह सवाल उठाते हुए पूछा है कि कितने लोग हैं जो अपने अतीत में पूरा का पूरा लौटना चाहेंगे। पूरा का पूरा मतलब पूरे के पूरे उस समय में जिसको वे ' मिस ' करते हैं। ऐसा करने के लिए अपना आज का सारा तामझाम छोड़कर उस समय में जाना होगा जिस समय को वे सबसे बेहतर मानते हैं।

आपका तो पता नहीं लेकिन कम से कम मैं अपने ऐसे किसी अतीत को इतना खुशनुमा नहीं पाता जिसके लिए मैं अपना वर्तमान छोड़ना चाहूँ। अभी मुझे वर्तमान में बहुत सारे काम करने हैं। मेरा बच्चा अभी हॉस्टल गया है उसकी खैरियत पूछनी है,पत्नी को फोन करना है, दोस्तों से बात करनी है, थर्मस में रखी चाय पीनी है।सबसे पहले यह स्टेट्स पूरा करना है।

मेरा कोई अतीत इतना हसीन नहीं जिसको पाने के लिए मैं अपना यह खूबसूरत झंझट वाला वर्तमान त्यागना चाहूँ।और जब मैं किसी स्वर्णिम अतीत में नहीं जाना चाहता तो मेरा देश भी नहीं जा पायेगा। अगर जाना चाहेगा तो हमको छोड़कर जाएगा और लटक जाएगा त्रिशंकु की तरह। पूरी फाइल अतीत में डाउनलोड ही न होगी। वहां का कम्प्यूटर बताएगा-'अनूप शुक्ल वाली फ़ाइल मिसिंग है।आपरेशन पूरा नहीं हो सकता।'

देवभाषा में कहें तो:
"अपि स्वर्णमयी अतीत न में रोचते
वर्तमान: अद्य च स्वर्गादपि गरीयसी।"
अतीत कितना भी स्वर्णिम हो लेकिन उसमें जाना मुझे पसंद नहीं। वर्तमान और आज मेरे लिए स्वर्ग से भी महान हैं।

बोल सियावर रामचन्द्र की जय। थर्मस में रखी हुई चाय की जय।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207106212987177

Thursday, January 08, 2015

वे आये, उन्होंने मारा और वे चले गये

फासिस्ट विरोधी से बहस नहीं करता, उसका मुंह तोड़ देता है। -परसाई

कल दोपहर के बाद फ़ेसबुक पर सूचना देखी फ़्रांस में वहां की प्रसिद्ध व्यंग्य पत्रिका चार्ली हेब्दो  के संपादक समेत दस लोगों को कुछ आतंकवादियों ने गोली मार दी। वे पत्रिका के दफ़्तर में आये, पत्रिका वालों को मारा और चले गये। नेट पर पत्रिका के कुछ कार्टून  दिखे। फ़्रेंच में हैं तो मतलब तो नहीं समझ आया लेकिन फ़ोटुयें देखकर लगता है कि पत्रिका धार्मिक कठमुल्लेपन की खिल्ली उड़ाती थी। उसी के प्रतिशोध में पत्रिका के लोगों को उड़ा दिया गया।

अभिव्यक्ति के मामले में फ़्रांस दुनिया का सबसे अव्वल देश माना जाता है। स्वतंत्रता, समानता और बराबरी के हिमायती देश में पत्रकारों के हाल हुये तो बाकी जगह क्या होगा?

पत्रकारों को मारने वाले मुस्लिम बताये जाते हैं। हाल में मुस्लिम आतंकवादियों  की गतिविधियां ज्यादा हो रही हैं। इसलिये दूसरे धर्म की कट्टरपंथियों की बांछे ,(बकौल श्रीलाल शुक्ल) वे उनके शरीर में जहां कहीं होती हों, खिली हुई हैं। वे बलभर मुस्लिम धर्म की बुराई करने में लगे हुये हैं। लेकिन सच्चाई यह है धर्म के नाम पर किसी भी  धर्म के अंध अनुयायी लोग मौका मिलते ही गदर काटने से बाज नहीं आते। उदार और उद्दात्त मूल्यों की स्थापना की मंशा से शुरु हुये धर्म धंधे से जुड़कर बाद में क्रूर होते गये। उद्दात्त मुखौटे के भीतर उनके इतने घाघ तरीके छिपे होते हैं कि खुदा खैर करे।

पता चला कि आतंकी फ़्रांस में ही पैदा हुये थे। इससे यह साबित होता है कि आधुनिक देश में पैदा होने का मतलब जाहिलियत से मुक्त हो जाना नहीं होता। जाहिलियत ऐसी चीज है जिसे आप अपने साथ कहीं भी ले जा सकते हैं।

किसी भी धर्म के अंधे अनुयायी उसके सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। धर्म के प्रचार-प्रसार के उसके अच्छे तत्वों की नुमाइश की जाती है। बुरे तत्व दायें-बायें कर दिये जाते हैं ताकि उनको देखकर जनता भड़के नहीं और आंख मूंदकर धर्म मानने लगे। लेकिन आजकल के  लोग अपने धर्मों की इतनी भयंकर मार्केटिंग करने लगे हैं कि कोई भी भला आदमी डरकर उससे हाथ जोड़ ले।

मुस्लिम धर्म दुनिया में इतना फ़ैला हुआ है तो जरूर इसमें कुछ मूलभूत अच्छाइयां होंगी। इसके बारे में विद्वान लोग बता सकते हैं। लेकिन इतना पक्का है कि बिना कुछ अच्छाईयों के सिर्फ़ ताकत के जोर से कोई धर्म इतना नहीं फ़ैल सकता। लेकिन आज का समय असहिष्णुता का है। सो धर्म के मानने वाले अपनी अच्छाइयां भूलकर खराब माने जाने वाले काम करने में लगे हुये हैं।

मुस्लिम धर्म के आतंकवादी आजकल इतने सक्रिय हैं। वे दुनिया के उन्नत माने जाने वाले देशों के लोगों के खिलाफ़ जेहाद कहीं छिटपुट, कहीं संगठित करने में लगे हुये हैं। दुनिया के उन्नत माने जाने वाले देश यह समझते हैं कि वे जो भी कर रहे हैं सही कर रहे हैं। उन देशों की हरकतों को उन देशों में प्रचलित धर्म वालों के आक्रमण की तरह देख रहे हैं मुस्लिम आतंकवादी। संगठित आक्रमण का जबाब छिटपुट जेहाद से दे रहे हैं। आतंकवादियों का फ़ायदा तो निश्चित है। जीत गये तो यहां मजे हैं। मारे गये तो जन्नत में मजे।

पत्रिका के लोग मारे गये। वे अचानक मारे गये। उनमें से कुछ लोग अपना काम कर रहे होंगे। कोई कार्टून बना रहा होगा। कोई व्यंग्य लेख लिख रहा होगा। अपनी दिमागी कल्पना पर खुश हो रहे होंगे। यह सोचकर कि जब यह पूरा होगा तो लोग देखकर खुश होंगे। पढकर मुस्करायेंगे। उनको क्या पता रहा होगा कि दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको मुस्कराना पसंद नहीं है। ऐसे भी लोग हैं दुनिया में जिनको लगता है कि अगर वे हंसेंगे तो उनका अस्तित्व खतम हो जायेगा। ऐसे लोग हैं दुनिया में जिनको लगता है कि अगर उनकी विसंगतियां उनको दिखा दी गयीं तो वे अंधे हो जायेंगे।

पत्रिका के लोग मारे गये। वे बहादुर लोग थे। उनको पता था कि वे जो कर रहे हैं इसके चलते उनकी जान जा सकती है। फ़िर भी वे अपना काम करते रहे। मारे भले गये लेकिन दुनिया के हर धर्म के कठमुल्लों को आईना दिखा गये वे। उनकी बहादुरी को सलाम। उनकी साहस को सलाम। उनकी शहादत को सलाम।

मेरी पसंद

कोई छींकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की शांति
भंग न हो जाए
मगध को बनाए रखना है तो
मगध में शांति
रहनी ही चाहिए
मगध है, तो शांति है।

 कोई चीखता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की व्यवस्था में
दखल न पड़ जाए
मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए
मगध में न रही
तो कहां रहेगी ?
क्या कहेंगे लोग ?
लोगों का क्या?
लोग तो यह भी कहते हैं
मगध अब कहने को मगध है
रहने को नहीं।

 कोई टोकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध में
टोकने का रिवाज़ न बन जाए
एक बार शुरू होने पर
कहीं नहीं रुकता हस्तक्षेप -।

वैसे तो मगधनिवासियों
कितना भी कतराओ
तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से -।

जब कोई नहीं करता
तब नगर के बीच से गुज़रता हुआ
मुर्दा
यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है -
मनुष्य क्यों मरता हो?
श्रीकांत वर्मा
(`मगध´ संग्रह से)
 
 



 

Tuesday, January 06, 2015

ये तो हमारे यहां बहुत पहले हो चुका है






आजकल लोग कहते घूम रहे हैं कि भारत दुनिया का सबसे ज्ञानी देश था। जहाज वहाज उड़ते थे यहां। सर्जरी वर्जरी होती थी।

इस पर दूसरे इस बात की खिल्ली उड़ा रहे हैं। अगर था यह सब तो गुल किधर हो गया।

 क्या पता रहा हो सब कुछ लेकिन रख-रखाव के अभाव में खराब हो गया हो। पुराने जमाने में ऋषि लोग ज्ञानी बहुत होते थे। वे उन सारी चीजों को बना लेते थे जो आज आधुनिक कही जाती हैं। लेकिन उनके संचालन का काम करने के लिये लोग नहीं मिलते थे इसलिये वे चीजें पड़े-पड़े, खडे-खड़े खराब हो जाती होंगी। कबाड हो जाती होंगी।  बाद में दूसरे देश वाले हमारा कबाड़ उठाकर ले गये और धो-पोछकर, मांजकर चमका कर चला रहे होंगे।

यह कुछ ऐसे ही हुआ होगा जैसे कि सरकारी कारखाने में उन्नत तकनीक की मशीनें रखरखाव और देखभाल के अभाव में कबाड़ हो जाती हैं। कुछ मंहगी मशीनें तो खुलती ही नहीं हैं। जिस बक्से में आती हैं उसी में धरी रहती हैं। कबाड़ हो जाने पर इनकी नीलामी की जाती है। कबाड़ी लोग इनको सस्ते दामों में खरीदते हैं। फ़िर उन मशीनों से ही वही सामान बनाकर सरकार को ही सप्लाई करते हैं जिसको बनाने के लिये सरकारी कारखानों में मशीनें लगाई गयीं थीं।

अपने देश के लोग दिमाग से बहुत तेज थे। आज भी तेज हैं। दुनिया में कोई भी खोज हो रही होती है वे चुपचाप निठल्ले उसे देखते रहते हैं। जैसे ही खोज की घोषणा होती है वे खट से अपने किसी पुराने ग्रन्थ से कोई श्लोक  पटककर कहते हैं- "ये तो हम पहले कर चुके हैं। इसमें कौन बड़ी बात है।"

दुनिया में जो भी आधुनिक हो रहा है और आने वाले सैकड़ों सालों में होने वाला है वह हम हज्जारों साल पहले ही कर चुके हैं। क्या जरूरत है अब दुबारा वह सब करने की। फ़ालतू का टाइम वेस्ट। जो मजा गीता बांचने में है वह मजा वैज्ञानिक खोज में कहां ? ये लोग भी देखना जब खोज बीन करके थक जायेंगे तब बोर होकर गीता पढ़ने लगें। उनको भी समझ आयेगा- "काव्य शास्त्र विनोदेन कालो गच्छ्ति धीमताम।" मतलब विद्वान लोगों का समय काव्य शास्त्र से मनोविनोद करने में ही खर्च होना चाहिये। ये खोज-वोज फ़ालतू का समय बर्बाद करना है।

मैं सूरज से संबंधित पोस्टें लिखता हूं। उनमें सूरज को भाई कहकर संबोधित करता हूं। उनको चाय पिलाता हूं। हंसी-मजाक भी करता हूं। यह सब कल्पना की उड़ान है। क्या पता कल को कोई हमारी पोस्टें पढ़कर सैकड़ों साल बाद किसी विज्ञान कांफ़्रेंस में कहे- "जिस सूरज की सतह पर जाने की बात आज हो रही है उस सूरज को 21 सदी में हमारे पूर्वज अनूप शुक्ल अपने पास बुला लेते थे। वह रोज उनके साथ चाय पीता था। भारत विज्ञान के मामले में दुनिया का सबसे उन्नत देश था , है और रहेगा।"

कभी कल्पना करता हूं कि कभी रिसर्च के मामले  में हम इतने आगे हो जायेंगे कि जब हवा की जरूरत होगी तो पानी के अणु H2O को तोड़कर आक्सीजन सूंघ लेंगे और जब कभी पानी चाहिये होगा तो हवा से आक्सीजन और किसी दूसरी चीज से हाइडोजन निकालकर दोनों को रगड़कर पानी बनाकर पी लेंगे। लेकिन यह लिखने से हिचकता हूं इसलिये कि आगे कोई भी रिसर्च होगी तो वह हमारी इस उपलब्धि के सामने बौनी हो जायेगी।

हमारी समस्या यही है कि दुनिया में कहीं कुछ नयी खोज होती है हम भागकर अपनी हज्जारों साल पुरानी श्रेष्ठ संस्कृति से कोइ उद्धरण खोज लाते हैं कि यह तो पहले ही हो चुका है अपने यहां। हमारा स्वर्णिम अतीत हमें कुछ भी करने से रोकता है। जैसा मुस्ताक अहमद युसुफ़ी ने अपने उपन्यास  ’खोया पानी’ की भूमिका में लिखा है:

"कभी कभी कोई समाज भी अपने ऊपर अतीत को ओढ़ लेता है. गौर से देखा जाये तो एशियाई ड्रामे का असल विलेन अतीत है. जो समाज जितना दबा-कुचला और कायर हो उसे अपना अतीत उतना ही अधिक उज्जवल और दुहराये जाने लायक दिखायी देता है. हर परीक्षा और कठिनाई की घड़ी में वो अपने अतीत की ओर उन्मुख होता है और अतीत वो नहीं जो वस्तुत: था बल्कि वो जो उसने अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार तुरंत गढ़ कर बनाया है."
अगर हो चुका है, पहले कर चुके हैं तो दुबारा क्यों नहीं कर पाते? उससे बेहतर क्यों नहीं हो पाता? इस सवाल का जबाब इस चुटकुले में है शायद:

"एक मास्टर साहब ने बच्चों ने पूछा- ’अगर दो आदमी दो बैलों के मिलकर एक खेत को तीन दिन में जोत लेते हैं तो बताओ तीन किसान तीन बैलों के साथ उसी खेत को कितने दिन में जोत लेंगे?’

कई बच्चों ने अलग-अलग जबाब दिये। लेकिन क्लास के सबसे शरारती बच्चे  ने सवाल नहीं लगाया/ मास्टर के पूछने  पर उसका जबाब था- ’मास्टर साहब जब एक बार खेत जुत चुका है तो उसे दुबारा जुतवाने की क्या जरूरत?"

हमारा देश दुनिया की कक्षा का सबसे शरारती बच्चा है। दुनिया में कुछ भी नया होगा तो हम उसको चुपचाप निठल्ले बने देखते रहेंगे। कोई पूछेगा तो कहेंगे- ये तो हमारे यहां बहुत पहले हो चुका है। दुबारा करने से क्या फ़ायदा?





Monday, January 05, 2015

पीके पर प्राइम टाइम बहस

 पिछले दिनों पीके फ़िल्म को लेकर काफ़ी हल्ला-गुल्ला हुआ।  जल्दी ही यह 300 करोड़ की कमाई करने वाली फ़िल्म बनने वाली है। कमाई तो खैर जो है सो है लेकिन हल्ला-गुल्ला वाली पर बहस करने के लिये एक टीवी चैनल ने अपने यहां प्राइम टाइम बहस आयोजित की। सुनिये उस बहस के कुछ अंश:

एंकर: जैसा कि आपको पता ही है कि हम यहां पीके फ़िल्म के बारे में बात करने के लिये इकट्ठा हुये हैं। पीके को लेकर समाज में तमाम तरह की बातें हो रही हैं। देश के नामचीन लोगों ने  इस पर अपने-अपने विचार व्यक्त किये हैं। हम यहां इसी मुद्दे पर बात करेंगे। हमारे स्टूडियो में अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ मौजूद हैं। हम जानेंगे उनके विचार। शुरुआत करते हैं विशेषज्ञ नं 1 से। हां आप बताइये आपकी नजर में यह फ़िल्म कैसी है?

विशेषज्ञ 1: फ़िल्म अच्छी है। 300 करोड़ कमाई कर ली है। समाज की बुराइयों पर चोट करती है। जबरदस्त हलचल मचा दी है समाज में। एक फ़िल्म की सफ़लता के लिये इससे अच्छा और क्या चाहिये?

विशेषज्ञ 2: घंटा अच्छी है फ़िल्म। फ़िल्म नकारात्मक संदेश देती है। विकास विरोधी है। हमारे धर्म की खिल्ली उड़ाती है। ऐसी फ़िल्म को आप अच्छा कैसे कह सकते हैं?

विशेषज्ञ 1: देखिये आप असंसदीय भाषा प्रयोग कर रहे हैं। ’घंटा’ की जगह कोई और शब्द प्रयोग करिये।

विशेषज्ञ 2: अरे भाई ’घंटा’ शब्द असंसदीय कैसे हो गया?  ’घंटा’ स्कूलों में बजता है। आप तो फ़िर स्कूलों में  ’घंटा’ बंद करा देंगे। सारे स्कूल बंद हो जायेंगे तो फ़िर बच्चे पढेंगे कहां? इसके अलावा हमारी पार्टी का मत है कि इसका विरोध करते हुये  ’घंटा’  शब्द पर जोर दिया जाये। हम इसके अलावा और कुछ नहीं बोल सकते हैं।

विशेषज्ञ 3: आप ’खाक’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं  ’घंटा’ की जगह।

विशेषज्ञ 2: अरे भाई कैसे कर सकते हैं। हमारे इलाके में मुस्लिम वोटर तो हैं नहीं जो ’खाक’ बोलने से कुछ फ़ायदा हो। इसलिये हम जो बोल दिये सो बोल दिये।

एंकर: देखिये समय कम है। हम बेकार की बहस में न पड़ें तो अच्छा। चलिये एक कमर्शियल ब्रेक लेकर फ़िर तय करेंगे कि यह फ़िल्म विकास विरोधी है या सांप्रदायिक? हल्ला-गुल्ला वाली है या सामाजिक संदेश देने वाली।

ब्रेक के बाद बहस शुरु हुयी तो फ़िल्म को विकास विरोधी बताने वाले विशेषज्ञ ने बात आगे बढाई:

विशेषज्ञ 2: फ़िल्म विकास विरोधी है क्योंकि यह फ़िल्म के हीरो को बिना कपड़े के दिखाती है। देश में सब लोग हीरो-हीरोइनों की नकल करने में पगलाये घूमते हैं। जवान लोग कपड़ा पहनना बंद कर देंगे। सब कपड़े की मिलें बंद हो जायेंगी। इसके अलावा देखिये फ़िल्म में हीरो-हीरोइन को साइकिल पर प्यार करते दिखाया गया है। इससे आटो मोबाइल सेक्टर को कितना बड़ा झटका लग सकता है इसकी कल्पना की है आपने। लोग मोटर साइकिल और कार छोड़कर साइकिल पर इश्क फ़रमाना शुरु कर देंगे। हुलिया बिगड़ जायेगा आटो सेक्टर का।

विशेषज्ञ 4: लेकिन इससे देश की एयरलाइंस कम्पनियों को तो बढावा मिलेगा। लोग हवाई जहाज पर बैठकर विदेश जायेंगे इश्क करने। एयरपोर्ट तक तो आटो सेक्टर के ही सहारे रहेंगे न!

विशेषज्ञ 2: इस फ़िल्म में जो धर्म की खिल्ली उडाई गयी है उससे तो खैर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। धार्मिक कर्मकांड को खिल्ली से कोई खतरा नहीं। वो तो कबीर के जमाने से उड़ रही है। लेकिन ये जो हाथ पकड़कर भाषा डाउनलोड करने वाला सीन है वो खतरनाक है अपने समाज के लिये। इसको देखकर कोई भी लड़का किसी भी लड़की का हाथ पकड़ेगा और कहेगा- भाषा डाउनलोड कर रहे हैं। इस पर मुझे एतराज है।

विशेषज्ञ 4: अरे भाई जब आप खुले आम लड़कों-लड़कियों को हाथ पकड़ने में रोक लगाओगे तो वे बहाने खोजेगे ही। हाथ होता ही है पकड़ने के लिये है। केदारनाथ सिंह जिनको इस बार ज्ञानपीठ इनाम मिला है वो तक कहे हैं:

"उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए"

केदारनाथ सिंह की भाषा भी भोजपुरी है। इस फ़िल्म में भी भोजपुरी डाउनलोड हुयी है। लेकिन क्रेडिट नहीं मिला केदारनाथ जी को। फ़िल्म वाले सब ऐसे ही गड़बड़ करते हैं।

एंकर: आप लोग अच्छे से बहस कर रहे हैं। लेकिन  समय कम ।  कार्यक्रम खत्म करने से पहले हम आपसे जानना  चाहेंगे कि फ़िल्म में नंगे आदमी के हाथ में रेडियो दिखाने का क्या मतलब है। एक एक वाक्य में अपनी बात कहें:

विशेषज 1: इससे यही पता चलता है कि आज देश की सरकारें आदमी को नंगा करने पर लगी हुई हैं और बहलाने के लिये उसको तरह-तरह के खिलौने थमा रही हैं।

विशेषज्ञ 2: मेरा तो मानना है कि एलियन जिस भी ग्रह से आया होगा वहां तक हमारे प्रधानमंत्री के चर्चे पहुंचे होंगे। वहां के लोगों ने फ़िल्म के नायक को धरती पर इसीलिये भेजा होगा कि वह किसी भी तरह एक ठो रेडियो यहां से ले जाये ताकि वे लोग भी प्रधानमंत्री की ’मन की बात’ सुन सकें और अपने ग्रह का विकास कर सके।

विशेषज्ञ 3: धरती पर बढ़ते प्रदूषण की तरफ़ इशारा है यह। हीरो बताता है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ के चक्कर में ग्लोबल वार्मिंग के चलते आने वाले समय में इतनी गर्मी बढेगी कि कपड़े पहनकर रहना मुहाल हो जायेगा।

विशेषज्ञ 4: मुझे तो ऐसा लगता है कि यह एलियन अपने यहां की खाप पंचायत द्वारा भगाया गया कोई नवयुवक है। वहां भी तमाम आधुनिकता के बावजूद प्रेम पर इसी तरह की पाबंदी होगी जैसी अपने यहां हैं। नवयुवक इस गोले पर आया तो नवयुवती किसी और गोले पर गयी होगी। गयी क्या भगायी गयी होगी। फ़िल्म में विदेश में प्यार का सीन का मतलब भी यही है कि अगर मोहब्बत करनी है तो विदेश जाना पड़ेगा या फ़िर दूसरे गोले पर। बहुत भयावह इशारा है यह। हमें सावधान हो जाना चाहिये और दुनिया को इस लायक बनाना चाहिये ताकि हम अपने कवि की इन पंक्तियों को अपने आसपास ही महसूस कर सकें:

उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए

बहस खतम हो गयी। कार्यक्रम के बारे में आप अपनी राय यहीं नीचे के कमेंट बक्से में दे दीजिये।

 

Sunday, January 04, 2015

’ई बुक’ कैसे बनायें

पुलिया पर दुनिया (e-book)पिछले दिनों हमने अपनी ’ई-बुक’ बनाई- ’पुलिया पर दुनिया’। इस किताब में हमने ’सर्वहारा पुलिया’ पर बैठे लोगों से बातचीत करते हुये जो पोस्ट फ़ेसबुक पर अपलोड की थीं उनको इकट्ठा करके किताब बना डाली। अपलोड कर दी। अब इसको लोग आनलाइन खरीद सकते हैं। अभी तक कुल 44 किताबें बिक चुकी हैं।

यह किताब पोथी.कॉम , आनलाइनगाथा, notnul, scribd, eBay, या फ़िर  गूगल प्ले से खरीद सकते हैं। ई-बुक की कीमत 50 रुपये है। प्रिन्ट एडीशन की कीमत अलग-अलग साइट पर अलग -अलग है। पोथी.कॉम पर रंगीन प्रिंटेड किताब के दाम 799 रुपये+डाकखर्च अलग हैं। (कौन खरीदेगा इत्ती सस्ती किताब ?  :) )

इस किताब के बारे में रविरतलामी ने अपने ब्लॉग में लेख लिखा- पुलिया पर फ़ुरसतिया तो उसपर योगेन्द्र पाल की टिप्पणी थी-

"सर पोथी.कॉम से pdf पब्लिश करवाना चाहता हूँ, यदि आप प्रोसेस जानते हो तो कृपया बताएं

वैसे एक लेख यदि स्व:ई-पुस्तक प्रकाशन (kindle, kobo, epub, mobi, pdf) के लिए लिख दें जिसमें यह शामिल हो कि किस प्रकार से हम अपनी पुस्तक को बेच सकते हैं तो बहुत अच्छा रहेगा"
रविरतलामी जी ने हमसे आग्रह किया कि हम बतायें कि कैसे ई-बुक प्रकाशित कर सकते हैं। तो हम उनकी आज्ञा के अनुपालन में यह लेख लिख रहे हैं।

अभी जब मैंने अपनी ई-बुक कैसे प्रकाशित करें  पर गूगल सर्च किया  तो 0.55 सेकेन्ड में 561000 परिणाम मिले। इनमें सबसे पहला लेख बालेंदु शर्मा दाधीच का है- ऐसे छपेगी आपकी ई-बुक। इस लेख में ई-बुक से संबंधित बहुत उपयोगी जानकारी दी गयी है। इसे बांचकर आप अपनी ई-बुक बना सकते हैं।

मैंने अपनी किताब ’पुलिया पर दुनिया’ बनाने के लिये पोथी.कॉम की सुविधा का उपयोग किया। इसमें सारी जानकारी बहुत सहज तरीके से दी हुई है।  हर तरह की समस्या के लिये समाधान हैं यहां। आप इसका उपयोग करके अपनी ई-बुक प्रकाशित कर सकते हैं।

ब्लॉगर और फ़ेसबुक पर जो साथी अपने लेख, कविता, कहानी या रिपोर्ताज लिखते हैं वे अपनी ई-बुक बड़ी सहजता से बना सकते हैं। इसके लिये उनको सिर्फ़ अपने लेख,कविता, कहानी या रिपोर्ताज सब माइक्रोसाफ़्ट आफ़िस में कॉपी कर लें। यह काम हो गया तो समझिये आधा काम हो गया। इसके बाद अपना परिचय, भूमिका और समर्पण आदि तैयार कर लें। इसे भी किताब के साथ जमा लें। फ़िर किताब का मुखपृष्ठ बना लें। अगर बनाने में दिक्कत है तो पोथी.कॉम वाले भुगतान के आधार पर बना देते हैं। इसके बाद किताब को पोथी.कॉम पर चढा दें मतलब अपलोड कर दें।  बस आपकी किताब तैयार और आप किताब के लेखक हो गये।

मैंने अपनी किताब ’पुलिया पर दुनिया’ ई-बुक बनायी तो उसमें करीब दो हफ़्ते का समय लगा। यह समय फ़ेसबुक से लेख उठाकर माइक्रोसॉफ़्ट में कॉपी करने, भूमिका लिखने, लिखवाने और कवर पेज बनाने में लगा। इसका सब काम मैंने खुद किया या अपने दोस्तों की मदद ली। सामग्री और मुखपृष्ठ तैयार होने के बाद किताब अपलोड होने/ प्रकाशित होने में सिर्फ़ एक दिन का समय लगता है।

किताब के दाम रखना लेखक के हाथ में होता है। ई-बुक तो आप मुफ़्त में भी बेच सकते हैं या फ़िर कुछ दाम रखकर। मैंने अपनी किताब के दाम 50 रुपये रखे हैं। फ़िर भी अभी तक कुल जमा 44 किताबें ही बिकी हैं। ई-बुक में पोथी.कॉम पर कुल बिक्री का  75% रॉयल्टी के रूप में मिलता है। यहां से अभी तक कुल 40 किताबें बिकी हैं जिनकी कीमत 2000 रुपये है। मतलब  मुझे 1500 रुपये रॉयल्टी के मिलेंगे। दूसरी साइटों पर अलग-अलग दरें हैं रॉयल्टी की।

एक साइट पर मैंने किताब के दाम 49 रखे तो साइट ने डांट सा दिया यह कहते हुये- "एक किसान भी अपनी किसी चीज का इतना कम दाम नहीं रखता  :) ।"

प्रिंट कराने की सुविधा में किताब के दाम किताब प्रकाशित करने वाली साइट और आपको मिलकर तय करने होते हैं। यहां किताब के दाम इस हिसाब से तय किये जाते हैं कि अगर कोई एक किताब भी मांगे तो वह भी प्रिंट करके भेजी जा सके। इस हिसाब से मेरी ब्लैक एंड व्हाइट  किताब की  कीमत  199 रुपये और रंगीन किताब की कीमत 799 रुपये रखी गयी है। अभी तक प्रिंट वर्जन में मेरी कोई कोई किताब बिकी नहीं है।

पोथी.कॉम के अलावा अन्य अनगिनत साइट हैं जहां से आप अपनी ई-बुक प्रकाशित कर सकते हैं।

यह लेख अपने उन साथियों की सहायता और उकसावे के लिये लिखा गया जो अपने लेखन को किताब के रूप में लाना चाहते हैं। अगर किसी को किसी सहायता की आवश्यकता हो मुझे मेल कर सकता है- anupkidak@gmail.com पर या फ़िर फ़ोन भी कर सकता है -9425802524 पर।

तो क्या सोचना है आपका अपनी किताब  प्रकाशित करने के बारे में। कर ही डालिये- जो होगा देखा जायेगा।
 

रामफल से मुलाक़ात


आज दोपहर को फिर रामफल से मिलना हुआ। मिलने पर बोले-हम समझे कहीं बाहर चले गए आप।


तबियत ठीक-ठीक। रूपये में चार आना फायदा है। बात करते हुए उनका लड़का, बहुरिया और बच्चे आ गए। रामफल ने लपककर नातिन को गोदी में लिया। प्यार किया।पुच्चियाँ लीं। बीस रूपये जेब से निकालकर उसको दिए। बच्ची ने बैग में धर लिए। इसके बाद रामफल अपने नाती को प्यार करने में मशगूल हो गए।

बेटे ने बताया कि अब रामफल को सुनाई ठीक देता है। लेकिन अक्सर घर में मशीन निकाल देते हैं। पर पुलिया पर आते समय मशीन साथ लाते हैं। आज भूल गए तो बेटे ने घर से लाकर दी। 

तबियत के बारे में बताया कि रामफल पहले बीड़ी बहुत पीते थे।फेफड़े में छेद हो गया। डाक्टर ने जिंदगी का खतरा बताया तब छोड़ी। उसी के चलते सांस और बीपी की तकलीफ है। रामफल की पत्नी भी शुगर, बीपी, अस्थमा की दवाई खाती हैं।

रामफल का बेटा 10 वीं तक पढ़ा है। मोटर मैकनिक का काम जानता है लेकिन दूकान बन्द हो जाने के चलते मजूरी का काम करता है। न्यूनतम मजदूरी आजकल 300 के आसपास है लेकिन न्यूनतम मजदूरी का चक्रव्यूह ऐसा है कि सौ-सवा सौ रूपये इसमें खेत हो जाते हैं। दिन में मजूरी करने के बाद रात में अपने बहनोई ( जो कि हाल में ही खत्म हो गए) की जगह चौकीदारी का काम करता है ताकि बहन का परिवार चलता रहे। बहन के बच्चे पढ़ने में अच्छे हैं । उसको आशा है कि साल दो साल में बहन के बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे।

इस बीच रामफल का भतीजा उनका ठेला बाजार में लगवाने के लिए आ गया। वह फल का सब काम जनता है लेकिन करने के नाम पर सिर्फ रामफल का ठेला ढोता है। हमने पूछा की कुछ करते क्यों नहीं तो चुपचाप सुनता रहा।

रामफल से एक किलो का पपीता,आधा दर्जन केले और दो संतरे लेकर हम वापस आ गए। कीमत 50 रूपये। लंच में मेस के खाने की जगह आधा पपीता और दो केले खाये गए। पत्नी की फल खाने की हिदायत का पालन हो गया -रामफल से मुलाक़ात के बहाने।

Saturday, January 03, 2015

है सरकार रजाई की अब

कोहरे से सब पटा पड़ा है
पड़ रही सर्दी बड़ी विकट,
पेड़ खड़े स्टेचू जैसे
पत्ती गई फूल से चिपट।

चाय चल रही घर दफ्तर में
मुंह से निकल रही है भाप,
बर्फ गिरी हिल स्टेशन पर
घर में दुबक के बैठो आप।

है सरकार रजाई की अब
सब उसकी शरण में आये,
अच्छे दिन का किस्सा छोडो
कोई अब गर्म पिलाये चाय।

-कट्टा कानपुरी

Thursday, January 01, 2015

अरे नए साल जी आओ आओ


अरे नए साल जी आओ आओ
यहीं कहीं तुम भी सट जाओ
मजे करो खूब झन्नाटे से
झंझट भेजो सब सन्नाटे में।

देओ बधाई हाथ मिलाओ
गले मिलो औ खूब मुस्काओ
करो संकल्प जी नए साल में
नया जोश हो नए साल में।

-कट्टा कानपुरी

Monday, December 29, 2014

आलराउंडर हैं


आज दोपहर को पुलिया पर शेरू (स्वेटर में) और श्याम कश्यप से मुलाक़ात हुई। शेरू दिन में बेलदारी का काम करते हैं। शाम को पापड़ बेचते हैं। आज भी बाजार से पापड़ लेकर लौटते हुए रस्ते में पुलिया पर बैठकर धूप ने सुस्ताने लगाने लगे।पापड़ का अर्थशास्त्र समझाते हुये बताया शेरू ने कि बाजार से पापड़ 60 रूपये किलो मिलते हैं। एक किलो में करीब 40 पापड़ चढ़ते हैं। मतलब डेढ़ रूपये का एक पापड़। उसे गरम करके पांच रूपये का बेचते हैं। दो घण्टे में सौ सवा सौ बचा लेते हैं।

कश्यप जी के काम के बारे में पूछा तो बताया - आलराउंडर हैं। मतलब जो काम मिल जाए कर लेते हैं। आज कोई काम नहीं मिला तो आराम कर रहे हैं पुलिया पर।

Thursday, December 25, 2014

पचमढ़ी की एक सुबह

रजनीगन्धा कितने की है?

पांच रूपये की। लेकिन तुम न खाना।

पचमढ़ी की एक चाय की दूकान पर चाय वाली और उनकी पत्नी के बीच यह संवाद हुआ।चाय वाले प्रकाश अपने पिता के साथ पचास साल पहले छपरा से पचमढ़ी आये थे।यहीं बस गए। हमने पूछा तो बोले-पेट सब करवाता है।
महिला बताने लगी-"साला यहां दो दो स्टोब लगातार जलते थे। गाड़ियों की लाइन लगती थी। अब लोग आने कम हो गए।धंधा चौपट। दो तीन साल और निकल जाएँ बस।"

दो तीन साल क्यों? पूछने पर बताया-"तब तक हमारी गुड़िया खड़ी हो जायेगी। नर्स की ट्रेनिंग कर रही है छिंदवाड़ा से।"

पचमढ़ी में पर्यटक कम आते हैं अब। ट्रैक्टर बन्द हो गया। सूर्योदय दर्शन बन्द हो गया। जानवरों को डिस्टर्ब होता है। जब सनराइज के लिए लोग जाते थे तो खूब चाय बिकती थी सुबह। सनसेट भी हफ्ते में एक दिन बन्द हो गया।जंगल वालों को छुट्टी चाहिए।


"चार भाई हैं हम। दो भाई ठेकेदारी करते हैं। पहले लैबरी की। गोली के छर्रे बीने।जंगल में लकड़ी का काम क़िया। फिर ठेकेदारी में आया। अभी एक करोड़ साठ लाख का ठेका मिला। ये सीमेंट का काम(सड़क और फुटपाथ के बीच डिवाइडर ) उसी ने किया।"-आग तापते हुए प्रकाश ने बताया।

दूकान अतिक्रमण हटाने वालों ने हटा दी। फ्रिज और मीटर भी ले गए। किसी तरह बिजली का कनेक्शन लेकर बल्ब जला रहे हैं।

चाय कुछ कम थी ग्लास में। हमने कहा- ठीक है। लेकिन फिर से स्टोब जलाकर चाय बनाई। 130 किमी दूर छिंदवाड़ा से आये दूध की चाय 10 रूपये की। होटल में चाय 35 रूपये की है।

पचमढ़ी की एक सुबह। सूरज भाई मुस्कराते हुए गुड मार्निंग कर रहे हैं।

Sunday, December 21, 2014

रामफल से परिवार के लोगों की मुलाक़ात

 आज इतवार है।परिवार के लोग आये हैं कानपुर, लखीमपुर,हैदराबाद और मनिपाल से। लोग बोले -सबसे पहले रामफल यादव जी से मिलवाओ।

आज रामफल वैसे तो पुलिया पर मिलते हैं लेकिन आज फैक्ट्री ओवरटाइम पर चल रही है सो फैक्ट्री के पास ही ठेलिया लगाये थे। रामफल यादव के साथ फोटो में अजय दीक्षित, अनन्य शुक्ल,सुमन शुक्ला और किरण दीक्षित। दूसरी फोटो में हमको( बड़े बेटे सहित )भी खड़ा कर दिया गया रामफल यादव के साथ।
अपडेट:रामफल की ठेलिया से फल भी खरीदे गए।बाद में रामफल ने एक संतरा हमारी श्रीमती जी को अपनी तरफ से भेंट किया।

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Saturday, December 20, 2014

नर्मदा सबका भला करती हैं

नर्मदा किनारे ग्वारी घाट । एक श्रद्धालु घाट की आखिरी सीढ़ी पर बैठकर सर पानी में छुआकर माँ नर्मदा को प्रणाम करता है। लोग पास की दुकानों से फूल दीप खरीदकर नदी में प्रवाहित कर रहे हैं। दीप नदी में डगमगाते हुए तैरना शुरू करके फिर आगे सरपट तैरते जा रहे हैं।

पास में ही नर्मदा सफाई के लिए बोर्ड पर अनुरोध लिखा है- दीप को नदी में प्रवाहित न करें। लोग बोर्ड की तरफ पीठ करके नदी में दीप प्रवाहित करते हुए दनादन फोटोबाजी कर रहे हैं।

आरती शरू होने वाली है।पण्डित जी बता रहे हैं -जगत जननी माँ नर्मदा के दर्शन मात्र से सब कष्ट दूर हो जाते हैं।

एक बच्चा ,जो रोज माँ नर्मदा के दर्शन करता होगा, घाट पर भेलपुरी बेच रहा है। रीवा का रहने वाला। पिता किसान। हाईस्कूल की छोड़कर तीन साल पहले छोड़कर जबलपुर आ गया। भेलपुरी बेचता है। अकेले रहता है। कष्ट दूर करता है।

बच्चे की शर्ट पर रोमन में न्यूट्रान लिखा है।पूछने पर बताता है-"ऐसे ही कढ़ाई है।" कल को कोई वैज्ञानिक न्यूट्रान को देखने का दावा करेगा तो हमारी पोस्ट बांचकर कोई कहेगा-इसमें कौन बड़ी बात। हमारे यहां तो बच्चे न्यूट्रान की कढ़ाई शर्ट पर किये घूमते हैं।

आरती शुरू हो गयी है।आज की आरती सेना के कुछ अधिकारियों के सौजन्य से है। पैसा दिया है उन्होंने। एक समय के बाद कोई भी धर्म बिना पैसे के चल नहीं पाता। घर्म का प्रसार उसके प्रचार में खपाए गए पैसे के समानुपाती होता जाता है।

घाट के किनारे चाट वाला माँ नर्मदा के प्रति आस्था जताते हुए कहता है। माँ हमारा पालन करती है। हम गलत पैसा नहीं लेंगे। शंका हो तो दस बार पूछिये हम ग्यारह बार बताएँगे।

'हर हर नर्मदे' के साथ भक्तों की तालियों के साथ नर्मदा स्तुति शरू हो गयी है। नर्मदाष्टक पाठ "त्वदीय पाद पंकजम,नमामि देवि नर्मदे" के साथ शुरू हो गया है। आवाजें लयात्मक होती जा रही है।पांच भक्त नर्मदा की तरफ मुंह किये चौकी पर चढ़े चंवर डुला रहे हैं।

नर्मदाष्टक पाठ के बाद नर्मदा आरती शरू हो गयी।भक्तगण झूमते हुये ताली बजाते हुए आरती पाठ कर रहे हैं। ताली के नाम से मुझे परसाई जी की बात याद आ गयी- "देश का गणतंत्र ठिठुरते हुए लोगों की तालियों पर टिका है।" इसी तर्ज पर कहा जा सकता है क्या कि-" किसी भी धर्म का धंधा आरती की लय में डूबे भक्तों की तालियों पर टिका होता है?"

नर्मदा नदी से जुड़े सामान्य जन के मन में नर्मदा मैया के प्रति अगाध श्रद्धा है।

अमृतलाल बेगड़ जी ने एक संस्मरण में लिखा-"जब मैंने वृद्धा से उसकी पोती के तारीफ़ करते हुए कहा-आपकी पोती बहुत संस्कार शील है। आपने उसे बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। इस पर वृद्धा ने जबाब दिया-नर्मदा की नहाईं छोरी है। संस्कार कैसे अच्छे नहीं होंगे।"

आरती आयोजन से दूर घाट पर कुछ बच्चे खेल रहे हैं। एक चार पांच साल का बच्चा गुब्बारे बेच रहा है। दो बच्चियां - 'एक रुपया दे दो' कहती हुई घाट पर टहल रही हैं।

पूजा आरती के बाद, जिन लोगों ने आरती के लिए चन्दा दिया, उनको सम्मानित किया जा गया। उनके सुख समृद्धि की कामना की गयी।

नर्मदा सबका भला करती हैं। आपका भी करें। नर्मदे हर।

ये तस्वीर मेरे बेटे Saumitra Mohan ने खींची।

बच्चे सुखी रहें और का चाहिए?





सुबह जबलपुर रेलवे स्टेशन पर बतियाते हुये बुजुर्ग कुली कामगार। बातचीत के जो अंश हमने सुने:

दोनों लड़के ऑटो चलाते हैं।

ऑटो निजी है कि किराए का?

निजी है। अब तो दोनों रहने का ठिकाना भी बना लिए हैं।

यह बढ़िया हुआ। बच्चे सुखी रहें और का चाहिए?


और कुछ दुःख-सुख की बातें करते हुए एक बुजुर्ग ने जेब से चुनौटी से तम्बाकू और चूना निकाला।दोनों को हथेली में रगड़ता रहा कुछ देर तल्लीनता से। लगा मानो अपने दुःख को रगड़कर मसल रहा हो या फिर सुख और दुःख को रगड़कर एक कर रहा हो। कुछ देर में चैतन्य चूर्ण बन गया तो दोनों ने थोडा थोडा लेकर दाँत के नीचे दबा लिया और आगे बतियाने लगे।

Friday, December 19, 2014

जीवन क्या जिया

कल रामफल को देखने गए उनके ठीहे पर। सुनने की मशीन तहा के जेब में धरे थे। बोले-"अब्भी रखा है।लंच का टाइम हो गया।झूठ नहीं बोलेंगे आपसे।"

हमारे सामने मशीन लगाकर हमारे साथी सरफराज से बोले-"आप पूछिये सेव क्या भाव है।"
सरफराज ने पूछा-"अनार क्या भाव है।"

रामफल ने अनार के भाव बताये।फिर सेव के भी।मशीन की मदद से उनको साफ़ सुनाई देने लगा है। अभी आदत न होने के कारण अटपटा लगता है। लेकिन लगता है आदत हो जायेगी कुछ दिन में।

परसों रात हो गयी थी। रामफल के साथ उनके घर तक गए थे। रामफल ने चाय पीने को कहा।लेकिन देर हो जाने के चलते हमने फिर आने की बात कहकर चाय नहीं पी।चले आये।

कल रामफल कह रहे थे-"कल आपने हमारे यहाँ चाय नहीं पी।हम शुद्ध यादव हैं। बिना नहाये ठेले को हाथ नहीं लगाते। झूठ नहीं बोलते। कोई नशा नहीं करते।"

रामफल को शायद लगा हो कि छुआछूत और ज़ात बिरादरी के चलते उनके यहां चाय नहीं पी।जबकि उनको मेरा नाम भी नहीं पता। मैंने कहा-"आएंगे। जल्द ही चाय पीने।"

जितना हाई ब्लड प्रेशर था/रहता है रामफल के उतने में सामर्थ्य वान लोग अस्पताल में भर्ती हो जाएँ। 220/110 लेकिन वो रोजी कमा रहे हैं।सिर्फ यह मानते हुए कि साँस की तकलीफ है बस।चयवसनप्रास से ठीक हो जायेगी। लेकिन जब कान दिखाने ले गए तो कई बार साँस के बारे में बताया। डॉक्टर ने बीपी की समस्या बताते हुए कुछ दवाएं दीं।

कल जब पूछा तो बताया कि दवा से आराम है। फिर धीरे से कहा -दवाई खाने से आराम हो गया।

मैंने उनको दस दिन की दवाई दी तो बड़े ध्यान से उसको लेने का तरीका समझा।75 पार रामफल में ठीक होने की जबरदस्त इच्छा है। हमारी अम्मा की तरह। अम्मा भी डेरिफाइलिन और बीपी की दवाएं लेतीं थी। रामफल भी उन्हीं से ठीक बने रहेंगे।

बातचीत में रामफल बार बार नेहरूजी का जिक्र करने लगते-"दो बैलों की जोड़ी चलती थी। वो आये थे। हमने उनको देखा है। उन जैसा कोई प्रधानमन्त्री नहीं हुआ।"

कल हमारे कुछ मित्रों ने हमारे काम को नेक बताते हुए तारीफ़ की। ज्ञानजी Gyan Dutt Pandeyने शाम को फोन करके कहा-"हम तो आपको ऐसा ही समझते थे।आप तो बढ़िया आदमी निकले।" हमने कहा- "कभी धोखा हो जाता है समझने में( हैं तो अपन ऐसे ही)।"

पचास साल के हुए थे तो हमारे मित्र Arup Banerjee ने ऐसे ही कहा था-पचास के बाद हमको समाज सेवा करना चाहिये। हम सोच रहे हैं क्या किया जाये। हम लोग मन से बहुत अच्छे काम करना चाहते हैं। लेकिन कहीँ भलाई बेकार न चली जाए इसलिये संकोच कर जाते हैं। आलस कर जाते हैं। नेकी कर कुएं में डाल इसीलिये कहा गया होगा ताकि चुपचाप भलाई का काम करें । लोगों को पता चलेगा तो लोग शायद बेवकूफ समझें।

रामफल को सुनने की मशीन लगवाने के 2000/-लगे। उनके सुकून को देखते हुए इतना खर्च कुछ मायने नहीं रखता। अम्मा को हर महीने 2000/- पहली तारीख को उनके खाते में भेजकर हम बताते थे-"तुम्हारे पैसे भेज दिए हैं।"वो खुश होकर कहतीं थीं- "ये बढ़िया किया।"उनका एटीएम हमारे पास रहता था।कभी उन्होंने पैसे अपने ऊपर खर्च नहीं किये। हम लोगों को ही अपने खाते से उधार देती थी। तकादा करती थीं।

रामफल की सुनने की मशीन के पैसे हमने यह समझे की अम्मा के खाते में भेज दिए। फिर खर्च भी खुद कर दिए।सुनेंगीं तो कहेंगी अम्मा- "ये बढ़िया किया।"

बचपन से लेकर आखिरी पढ़ाई होने तक हम लगातार वजीफा पाते रहे। बहुत कम पैसे में इंजीनियर बन गए। इस सब में समाज और सरकार का पैसा लगा। हम इस समाज के कर्जदार हैं।इसमें रामफल जैसे लोगों के पैसे भी किसी न किसी बहाने लगे होंगे।तो अगर कुछ उधार इसी बहाने चुक जाये तो सुकून की बात है।

यह सब ऐसे ही सोचते हुए कि जितना कुछ मिलता है उतना वापस नहीं करते हम समाज को। किसी न किसी बहाने दबाये रहते हैं।इस चक्कर में समाज दीवालिया होता जाता है।

अपडेट:
मुक्तिबोध की कविता की पंक्तियां:
"अब तक क्या किया
जीवन क्या जिया
लिया बहुत बहुत ज्यादा
दिया बहुत बहुत कम
मर गया देश
और जीवित रह गए तुम!!"

Wednesday, December 17, 2014

रामफ़ल की कान मशीन

अपने मित्र Alok Prasad की सलाह पर आज रामफल को कान के विशेषज्ञ डाक्टर को दिखाना तय हुआ था। दोपहर बाद लेने गए तो पता चला रामफल अपने जिस भाई को ठेलिया पर छोड़कर जाने की सोचे थे वो नागपुर चले गए। मतलब जाने में अड़चन। लेकिन फिर हमारे कहने पर रामफल पास के पंक्चर बनाने वाले के पास अपनी ठेलिया खड़ी की।उसको फल के दाम बताये और हमारे साथ चल दिये।

डॉक्टर ने कान देखा और बताया कि कान चेक कराने होंगे। वाणी हियरिंग एड में। तय हुआ कि रामफल और हम दोनों अपनी अपनी दूकान बन्द करके शाम को कान की जांच कराने जायेंगे। साढ़े छह बजे जाना तय हुआ।

दोपहर को तो रामफल जैसे थे वैसे साथ चले गये। लेकिन शाम को अपने बेटे का साफ स्वेटर पहनकर आये थे। हमनें कहा -जँच रहे हो तो मुस्कराते हुए बोले-लड़का बोला- ' साहब के साथ जा रहे हो। ये पहनकर जाओ।'
जाँच में पता चला कि रामफल के कान 60% ख़राब हैं।सुनने की मशीन लगवानी होगी। हमने कहा - लगा दो।सुनने की मशीन लगते ही रामफल यादव के कान ठीक काम करने लगे। वो खुश हो गए। एकाध दिन में शायद मशीन के साथ सहज हो जाये।

जब कान के डॉक्टर को दिखाने ले गए थे दोपहर को तो रामफल बोले- "सांस की तकलीफ भी है।" डाक्टर ने देखा। बीपी बहुत था। डाक्टर ने ईसीजी कराने की सलाह दी थी। एक दो बार और बीपी देखकर ब्लड प्रेसर की दवा नियमित लेने की सलाह दी।

कान की मशीन लगवाकर अपने अस्पताल गए। रामफल का बीपी चेक कराया। ईसीजी कराया।बीपी दोपहर से भी ज्यादा था। इतने बीपी पर भी रामफल चल फिर रहे थे तो इसलिए कि शायद इसके साथ जीने की उनको आदत सी हो गयी है।

हाई बीपी कम करने की दवा देकर कुछ देर बाद बीपी देखा गया तो कुछ कम हुआ लेकिन फिर भी काफी हाई था। रात और सुबह की दवा दिलाकर रामफल को घर भेज दिया।मतलब छोड़कर आये।


रामफल से मुलाकात पुलिया पर हुई।किताब 'पुलिया पर दुनिया' के वो प्रमुख किरदार हैं।पुलिया के स्टेटस बांचने वाले मित्र आलोक प्रसाद के सुझाने पर रामफल के कान दिखाने ले गए।उनकी सुनने की समस्या तो हल हो गयी। दिल और सांस की तकलीफ भी शायद नियमित दवा से ठीक हो जाए।

रामफल के कान इलाज की फ़ीस डाक्टर ने ली नहीं। मशीन के भी पैसे कम किये। 2000/- की पड़ी मशीन। उसके 70%करीब 'पुलिया की दुनिया ' किताब की रॉयल्टी से मिल गए। मलतब किताब की कमाई किताब के प्रमुख किरदार के इलाज ने इस्तेमाल हुई।इससे बढ़िया क्या हो सकता है भला।

नीचे फ़ोटो ने वह जगह जहां रामफल दोपहर को ठेलिया लगाते हैं। दूसरी तस्वीर में अपने कान की जांच कराते रामफल यादव।
(साथियों की टिप्पणियों से ऐसा लग रहा है जैसे हमने कोई बड़ा नेक काम किया।हमको आलोक पुराणिक की किताब का शीर्षक याद आ गया - "नेकी कर अख़बार में डाल।" आज सोशल मिडिया का जमाना है तो कहा जाएगा- "नेकी कर फेसबुक पर डाल।" smile इमोटिकॉन )

Tuesday, December 16, 2014

सम्वेदनहीन होता समाज

कल अखबार में खबर छपी- माँ बेटी ने ऑटो चालक को चप्पलों से पीट दिया।
घटना के अनुसार कार में पति-पत्नी और उनकी बेटी थे।ऑटो चालक ने ऑटो मोड़ा,जिससे कार में टक्कर लग गयी।टक्कर लगते ही महिला और उसकी पुत्री गुस्से में उतरी और ऑटो चालक को खरी खोटी सुनना शुरू कर दिया।इसी दौरान उसकी पुत्री ने चप्पल उतारकर ऑटो चालक को मारना शुरू कर दिया। उसने भागने की कोशिश की तो युवती की माँ ने उसकी कॉलर पकड़ी और दोनों ने उसकी धुनाई शुरू की। सड़क पर मजमा लग गया लेकिन किसी ने बीच-बचाव करने की कोशिश नहीं की।ऑटो चालक के साथ मारपीट होते देख एक युवक को भी जोश आया व उसकी कालर पकड़कर पीटने लगा। भीड़ को युवक इस तरह की एंट्री नागवार गुजरी।इसके बाद तो ऑटो चालक को छोड़कर भीड़ ने युवक को खदेड़ खदेड़ कर पीटा।इसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची और मामले को शांत कराया।

अखबार में तीन फोटो छपे हैं।हर फोटो में ऑटो चालक पिट रहा। देखकर लगा कि आम जिंदगी में कितना गुस्सा है लोगों में। कार है तो उसका बीमा भी होगा। बन जाती। ऑटो चालक कि गलती रही होगी। लेकिन क्या इसके लिए उसको सरे राह चप्पलों से पीटा जाना उचित है? 

यह पिटाई एक लड़की और उसकी माँ के द्वारा ऑटो चालक की पिटाई नहीं बल्कि एक संपन्न द्वारा विपन्न की पिटाई है। कार द्वारा ऑटो की पिटाई है। अगर गलती कार वाले की होती तो क्या ऑटो वाला उसको अकेले उसको इतनी ही सहजता से पीट देता? 

भीड़ इस पूरे मामले में तमाशबीन रही। ऑटो चालक को पिटते देख किसी ने लड़की और उसकी माँ को समझाने की कोशिश नहीं की। भीड़ भी सम्पन्न के साथ है।भीड़ को पिटता हुए एक आदमी का दर्द नहीं दिखा।वह तमाशबीन बनी रही। 

बाद में जब एक युवक भी लड़की और उसकी माँ की तरफ से ऑटो चालक को पीटने लगा तब भीड़ ने उस युवक को दौड़ा दौड़ा कर पीटा। लगता है आज अपने समाज में हर व्यक्ति गुस्से में भरा हुआ है। सोच विचार नहीं करता। करणीय अकरणीय नहीं देखता।गुस्सा पहले उतारता है। विचार बाद में करता है।

घर जाकर ऑटो वाला अपना गुस्सा शायद अपने बीबी बच्चों पर उतारे। पिटना कमजोर की नियति है।
सबसे खतरनाक रुख अखबार का है। इस घटना में ऑटो चालक पीटा गया है। प्रथम दृष्टया ऑटो चालक इसमें पीड़ित है। पिटा है। उसको पीटने वालों ने उसकी गलती के लिए नहीं अपने सपन्नता के अहंकार में पीटा। लेकिन अखबार की रिपोर्टिंग से ऐसा कहीं से नहीं लगता कि उसकी सम्वेदना पिटने वाले के साथ है। इस घटना की रिपोर्टिंग में अख़बार की भाषा कॉमिक है। मजे लेने वाली है। 

अखबार जनता को खबरें देने के साथ साथ उनके मानस को प्रभावित करते हैं। जब अखबार लिखता है
"फिर दोनों ने उसकी धुनाई शुरू कर दी", " एक युवक को भी जोश आया", "भीड़ को इस युवक की इस तरह की एंट्री नागवार गुजरी", "इसके बाद तो ऑटो चालक को खदेड़ -खदेड़ कर पीटा" तो साफ लगता है कि वह पिटते हुए लोगों का उपहास कर रहा है। अख़बारों की यह प्रवृति रिपोर्टरों की सम्वेदनहीनता की परिचायक है।

ज्यादातर रिपोर्टर बहुत कम पैसे में देर रात तक अख़बारों में काम करते हैं।ऑटो वाला भी उनकी ही तरह खटता होगा। उनको यह समझ होनी चाहिये कि पिटा हुआ ऑटो वाला उनकी ही तरह होगा। अपने ही तरह के व्यक्ति के पीटे जाने पर इस तरह की मजे लेती हुई  रिपोर्टिंग सहज सम्वेदना की खिल्ली उड़ाती है।

कार वाले द्वारा ऑटो चालक को पीटने की घटना बताती है कि सपन्न होने की हड़बड़ी में हम सम्वेदन हीन होते जा रहे हैं।

ऑटो चालक की पीटे जाने की कॉमिक रिपोर्टिंग बताती है कि सनसनीखेज खबर के चक्कर में पत्रकारिता अमानवीय होती जा रही है।

Monday, December 15, 2014

खेल खेल में गाली

कल अखबार में देखा कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों में हॉकी मैच जीतने के बाद शर्ट उतारी और गालियां दीं। बाद में माफ़ी मांग लीं।
खिलाड़ी लोगों ने ऐसा क्यों किया यह पता नहीं चला लेकिन ऐसा करना नहीं चाहिए उनको। इससे गलत सन्देश जाता है।जो बच्चे मैच देख रहे होंगे वे सोचेंगे कि जीतने के बाद शर्ट उतारना जरूरी होता है सो वे खेलना छोड़कर शर्ट उतारना सीखने लगेंगे।
खिलाड़ियों ने भारत के अख़बार पढ़े होंगे।देखा होगा आये दिन नेता लोग गाली गलौज करते हैं फिर मॉफी मांग लेते हैं।"जैसा देश वैसा भेष" की महान परम्परा का पालन करते हुए उन्होंने गाली गलौज कर डाली होगी। उनको पता नहीं होगा कि यह काम यहां के राजनेताओं के अधिकार क्षेत्र में ही आता है। खिलाड़ियों को अभी गाली-गलौज करने की सुविधा हासिल नहीं है।
शर्ट शायद उन्होंने सौरभ गांगुली को देखकर उतारी हो। लेकिन उनको पता होना चाहिए  कि शर्ट उतारना केवल क्रिकेट में स्वीकार्य है।बाकी के खेलों के खिलाड़ियों के लिए यह प्रतिबंधित है अभी। हॉकी के खिलाड़ियों को क्रिकेट के खिलाड़ियों से बराबरी का प्रयास नहीं करना चाहिए।
हो सकता है खिलाड़ी लोगों को इमरान खान से प्रेरणा मिली हो। इमरान खान आये दिन सरकार को गरियाते रहते हैं।वे भी वर्ल्ड कप जीते हुए हैं। कप्तान की हैसियत से। बड़ी बात नहीं कि कभी सेना उनको देश की कप्तानी सौंप दे।खिलाड़ी लोगों ने सोचा होगा कि क्या पता आगे चलकर कभी इमरान उनको अपनी टीम में रख ले उनकी गाली गलौज और कपड़े उतारने की प्रतिभा को देखते हुए।
हो सकता है मैच के पहले खिलाड़ियों ने " अपना लक पहन के चलो " वाला विज्ञापन देखा हो। मैच जीतते ही सोचा हो कि अब तो जीत गए।लक उतार के धर दें।अगले मैच में काम आएगा।
पता चला है कि पाक कप्तान ने कहा कि एशियाड में भारत के खिलाड़ियों ने बदतमीजी की थी  उसका हिसाब उन्होंने यहाँ चुकाया।यह तो राजनैतिक दलों के प्रवक्ताओं जैसे बयान हुए। एक पार्टी पर जब भ्रष्टाचार ,दंगे के आरोप लगते हैं तो उसका प्रवक्ता अगली पार्टी किस्से बताते हुए कहता है- "ये तो बहुत कम है।आपकी पार्टी के समय तो इससे ज्यादा गड़बड़ हो चुकी है।"
अब जो हुआ सो हुआ। अब तो उन्होंने माफ़ी भी मांग ली। गाली गलौज का तो खैर कोई नहीं। यह तो आम जीवन का हिस्सा हो गयी है अब।लेकिन उनको कपड़े उतारने से पहले सोचना चाहिए कि भयंकर जाड़ा पड़ रहा है। ठण्ड ने पकड़ लिया तो अगला मैच खेलने लायक नहीं रहेंगे।
क्या पता वे आस्ट्रेलिया से इसी लिए हारे हों बाद में। आपका क्या कहना है?

Sunday, December 14, 2014

ब्लॉगिंग -चन्द यादें कुछ इरादे

2004 में जब ब्लॉग लिखना शुरू किया तो विन्डोज़ 98 का जमाना था। हिंदी में सीधे लिखने के लिए कोई फांट नहीं था। जय हनुमान की सुविधा का उपयोग करके तख्ती पर लिखते थे। डायल अप कनेक्शन इंटरनेट था। किर्र किर्र करके कनेक्ट होता था।जब नेट लगता था था तो फोन नहीं हो सकता था।एक समय में एक काम।
अक्सर लम्बी लम्बी पोस्ट लिखते।कभी पूरी पोस्ट उड़ जाती। उन दिनों ऑटो सेव का जमाना नहीं था।तब एक पोस्ट लिखना वीरता का काम था। पोस्ट लिखने पर मजा भी उसी अनुपात में आता था।

जाड़े के दिनों में मेरी एक ही तमन्ना रहती थी-धूप में बैठकर ब्लॉगिंग की। इसके लिए इंतजाम किया गया। 10-15 मीटर लम्बा तार जुगाड़ लिया गया। लैपटाप लेकर बगीचे में बैठते। कभी नेट कट जाता तो भागकर भीतर आते। देखते कि कहाँ से लफड़ा हुआ। वाई-फ़ाई कनेक्शन तो बहुत बाद में आया।

तबसे मामला बहुत आगे आ चुका है। आज तो हर जगह नेट से जुड़े हुए हैं। जाड़े में रजाई के अंदर घुसे हुए पोस्ट लिख सकते हैं। कनाडा/होनूलूलू /झुमरी तलैया के दोस्तों से चैटिया सकते हैं। सुविधाएं बढ़ी हैं। लिखना सहज हुआ है। अब तो ये सुविधा भी आ गयी है कि बोलकर टाइप हो सकता है। जय हो।

लिखने की सुविधा जितनी सहज हुयी है। लिखना उतना ही कम होता गया।ब्लॉग पर। पिछले कई महीनों से ब्लॉग पर जो पोस्ट डालीं वे फेसबुक की पोस्ट हैं जो वहां से यहां ले आए। फेसबुक उतरन पोस्ट्स।
फेसबुक पर लिखना सहज है। इसलिए वहां लिखते हैं। फेसबुक पर लिखते समय यह भाव रहता है जैसे बाजार में खड़े हैं। लोग हमें लिखते हुए टाइप करते हुए देख रहे हैं। जैसे ही हम पोस्ट करेंगे इसे फौरन देखा जाएगा। लाइक किया जाएगा। टिपियाया जायेगा। दस मिनट में बीस टिप्पणियॉ आ जाएंगी। 

ब्लॉग पर लिखना एकान्तिक साधना जैसा है। हम अकेले में लिख रहे हैं। कोई हमें देख नहीं रहा है। सृजन सुख है यह। अगर ब्लॉग पोस्ट को सोशल मिडिया पर साझा न किया जाए तो क्या पता कितने लोग पढ़ें। 

मेरा ब्लॉग मैं जब अपडेट नहीं करता तब भी 100 के करीब लोग देखते हैं रोज। अब सोचा है नियमित अपडेट करूँगा। रोज नहीं तो नियमित तो अपलोड करूँगा ही। पहले ब्लॉग पर लिखूंगा फिर उसे शेयर करूँगा और कहीं। ब्लॉग भले ही पुराना हो गया लेकिन है तो मेरा ब्लॉग ही। अंतर्जाल पर मेरी पहचान मेरे ब्लॉग के ही चलते है। इसको अब और उपेक्षित नहीं करना।और उतरन नहीं पहनाना। 

आज की इस पोस्ट में इतना ही। बकिया और फिर जल्दी ही। शायद नियमित भी। मजे कीजिये आप भी इतवार के।

फ़ोटो रजाई में बैठे हुए उस मुद्रा का जिसमें यह पोस्ट लिखी गयी।

Friday, December 12, 2014

किताब खरीदने से बचने के चंद बहाने

अनूप शुक्ल ने किताब प्रकाशित की है 'पुलिया पर दुनिया'। यह भी बताया है कि इसको ऑनलाइन खरीदा जा सकता है। उनके इस आह्वान से बचने के कुछ सटीक तर्क ये हैं:
1.अरे हम तो आपको रोज ऑनलाइन पढ़ते रहते हैं। अब किताब में क्या कुछ नया तो है नहीं।

2. भाईसाहब हमको अपनी हस्ताक्षर सहित प्रति भेजिए न --सस्नेह। हमसे भी पैसा लेंगे?

3.हमारे यहां पैसे का भुगतान ही नहीं हो रहा। बहुत कोशिश की। हो ही नहीं रहा।

4.हमको पीडीएफ फ़ाइल भेजिए हम आपको रॉयल्टी का पैसा भेजते है 37.50 रुपया। पोथी.कॉम को काहे का फालतू भेजना।

5.इस वीकेंड को करते हैं खरीद। अभी जरा बिजी हैं।

6.मुझे इलेक्ट्रानिक ट्रांजेक्शन आता नहीं। बेटा,पति आएंगे वही करेंगे।

7.ये किताब तो ठीक है। आप अपनी व्यंग्य वाली छपवाईए। हम उसको खरीदेंगे। पक्का।

8.कितनी बिकी ? 18 . गुड। मैं 100 वीं प्रति खरीदूंगा।

9.आप मुझे किताब भेज दीजिये। मैं पैसे मनीआर्डर से भेज दूंगा।

10.क्या भाई, तुम्हारी किताब भी पैसे देकर खरीदनी पड़ेगी?तब तो हो चुका। भेजो यार पहली प्रति।

11.वाह लिखने से कमाई भी करने लगे।ये बढ़िया। अब नौकरी छोड़ कर फूल टाइम लेखन करने लगो। खूब बिकेंगी किताबें। हम भी खरीदेंगे तब। गुड लक।

12.पचास रूपये दाम तो ज्यादा हैं। हमने तो अपनी मुफ़्त में भेजी थी यार। कम से कम मुझे तो भेजो 'रिटर्न गिफ्ट'।

13.यहाँ 50 रूपये के भुगतान के लिए 100 रुपया ट्रांजैक्शन फीस लग जाती है।भारत आएंगे तब खरीदेंगे।

14.वो उसने खरीदी है न! उसी के कम्प्युटर पर पढ़ लेंगे।

15.बच्चों के इम्तहान हो जाएँ फिर छुट्टियों में आराम से खरीद कर पढ़ेंगे।

इनमें से कोई भी अपना कर आप मजे में अनूप शुक्ल की किताब खरीदने से बच सकते हैं।

 लेकिन अगर खरीदने का मन करे तो इस लिंक पर आकर खरीद सकते हैं। कीमत मात्र 50 रुपये।

Tuesday, December 09, 2014

ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा

लो आ गयी उनकी याद
पर वो नहीं आये।

गाना धीमे बज रहा है। पूछा तो चाय वाले ने बताया-'मौसम की गड़बड़ी है।रेडियो स्टेशन से ही धीमे बज रहा है।'

आसमान में सूरज भाई ऐसे दिख रहे हैं मानो अपने चारो तरफ रुई लपेटे अधलेटे हैं।लगता है उनके यहाँ कोई दर्जी नहीं है।होता तो रुई समेट के ठीक ठाक रजाई सिल देता।

सूरज भाई बादलों की रुई के बाहर मुंह निकाले किरणों को ड्यूटी बजाने का निर्देश दे रहे थे।किरणों ने जब देखा कि सूरज खुद अलसाये हुए हैं तो वे भी आराम-आराम से अपना काम अंजाम दे रही हैं। कोहरा, जो कल किरणों को देखते ही फूट लिया था, आज बेशर्मीं से टिका हुआ था।कहीं कहीं तो किरणों को छेड़ भी दे रहा था। किरणें भी बचबच कर टहल रहीं थीं। झाड़ी, घने पेड़ के नीचे जाने की बजाय खुल्ले में कई किरणों के साथ सावधानी से टहल रहीं थीं।

धरती के कुछ हिस्से सूरज की इस किरण और ऊष्मा सप्लाई से नाराज होकर सूरज की तरफ मुट्ठी उठाकर शेर पढ़ रहे थे:

वो माये काबा से जाकर कर दो
कि अपनी किरणों को चुन के रख लें
मैं अपने पहलू के जर्रे जरे को
खुद चमकना सिखा रहा हूँ।

सूरज भाई इस शेर को सुनकर बमक गए और बादलों का सुरक्षा कवच तोड़ कर बाहर निकल आये।चेहरा तमतमाया हुआ था।इधर उधर माइक की तलाश की लेकिन शुक्र है कि मिला नहीं होगा वर्ना चमकना छोडकर भाइयों बहनों करने लगते। सूरज अरबों बरसों से अपना काम करता आ रहा है इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वहाँ लफ़्फ़ाजी के लिए माइक और रेडियो नहीं है।

गाना बजने लगा:

'तुमने क्या समझा हमने क्या गाया
जिंदगी धूप तुम घना साया।'

जाड़े के मौसम में यह गाना बेमेल है।जाड़े में घूप की जरुरत होती है साये की नहीं।लेकिन जैसा हो रहा है वैसा की गाना भी बजेगा। चोरों से निजात दिलाने के लिए गुंडे सर्मथन मांग रहे हैं।

तू न मिली हम जोगी बन जायेंगे
तू न मिली तो।

गाना लगता है किसी बूढ़े राजनेता का बयान है।वह सत्ता से कह रहा है अगर मुलाक़ात नहीं हुई तो समझ लो। जोगी ही बनकर बदला लेंगे। तुझे अपने इशारे पर नचाएंगे।सत्ता हलकान है-'इधर सठियाया राजनेता उधर ढोंगी जोगी।वह जाए तो जाए कहाँ।'

'ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा
तेरा गम कब तलक मुझे तोड़ेगा।'

Sunday, December 07, 2014

नेहरू जैसा प्रधानमन्त्री नहीं हुआ




सुबह मेस के दोस्तों ने बताया कि पुलिया पर रामफल यादव पूछ रहे थे -"साहब हैं नहीं क्या? दिल्ली गए हैं क्या?"

दोस्तों ने उनको हमारे यहीं होने की सूचना दी तो खुश हुए।

हम आज मेस से चाय लेकर रामफल से मिलने गए। थर्मस में चाय देखकर खुश हो गए। लेकिन पियें कैसे यह सोचकर इधर-उधर देखने लगे।हमने जेब से कागज ग्लास निकाले तो खुश हो गए। बोले -"गजब हैं साहब।"

चाय पीते रामफल को मैंने 'पुलिया पर दुनिया' किताब की पांडुलिपि दिखाई। अपनी फोटो देखकर खुश हो गए।रामफल का लड़का अपने बच्चों के साथ वहां आया था। सबके साथ पुलिया पर फ़ोटो सेशन हुआ।

आज रामफल से वीडियो वार्ता भी हुई।उन्होंने बताया -"सात साल की उम्र में बाप के मरने पर घर से निकला था।सर पर कफ़न बांधकर। मुम्बई भी रहा। अमरावती। बड़ी बहन थी यहाँ उसने बुला लिया। कप-प्लेट भी धोये हैं। "

नेहरू जैसा प्रधानमन्त्री नहीं हुआ। गाँव-गाँव घुमते थे वो। इंदिरा जी ने कोई गन्दा काम नहीं किया। जंगल में फैक्ट्री लगाई। इसीलिये यहां फल बेंचकर कमाई कर लेते हैं।


जब इंदिरा गांधी को गोली लगी तो हम सतपुड़ा में फल बेंच रहे थे। गेट नम्बर 3 के पास सरदार की दूकान को आग लगा दी। गुरुग्रंथ भगवान सीवर में नाली में फेंक दिए।सब देखा हमने।

जया बच्चन के बारे में फिर बताया-"यहीं फब्बारे के पास घर था उसका। वहीं हम ठेला लगाते थे।स्कूल पढ़ने जाती थी।उसका बाप जीसीएफ में काम करता था।"

आजकल तबियत कुछ नासाज है रामफल की। बताया -"डाक्टर ने हाथ देखा,आला लगाया और दवाई दी।500 ठुक गए। कोई फायदा नहीं हुआ। फिर चयवनप्रास लाये जिसमे लड़की की फ़ोटो बनी होती है। 250 का मिलता है। एक ने कैंटीन से 160 का ला दिया। एक किलो खाएंगे तबियत दुरुस्त हो जायेगी।"

ऊँचा सुनाई देने की बात पर बोले-"बच्चियों ने बहुत इलाज करवाया। कोई फायदा नहीं हुआ। खानदानी बीमारी है।"

आज सोचा है किसी ईएनटी डाक्टर को रामफल यादव के कान दिखाए जाए। दिखाएँगे जल्द ही।

अस्सी पार के रामफल की चुस्ती देख कर लगता नहीं कि उनकी इतनी उम्र है।

ओ सनम तेरे हो गए हम

"ओ सनम तेरे हो गए हम
प्यार में तेरे खो गए हम।
जिंदगी को मेरे हमदम
आ गया मुस्कराना।"

चाय की दूकान पर इस गाने को सुनकर सूरज भाई की तरफ देखा तो उनका चेहरा बसन्तकुमार की तरह खिलखिल हो रहा था। उन्होंने लजाने की भी कोशिश की लेकिन किरणों ने टोंक दिया -'क्या दादा आप भी न! अरे गाना है। कोई आपकी लव स्टोरी थोड़ी है। इंज्वॉय इट। डोंट ब्लश।'

सूरज भाई कुछ कहते तब तक गाना बजने लगा:

"माना जनाब ने पुकारा नहीं
क्या मेरा साथ भी गवारा नहीँ।"

सब लोग गाना सुनते हुए गपियाने लगे।

सुबह निकले आज तो देखा रौशनी की चद्दरें फैली हुई थीं।लगता है आज सूरज ने अपने घर के सब कपडे धोकर सुखाने के लिए टांग दिए हैं।आसमान में।बीच बीच में धूल के कण इधर-उधर टहल रहे थे आवारगी करते हुए। सूरज भाई उनको उजाले का डंडा फटकारते हुए दौड़ा रहे थे। वे दिखाने के लिए इधर-उधर होते। लेकिन फिर थोड़ी देर में वापस आ जाते आर टी ओ दफ्तर और कचहरी में दलालों की तरह।

सड़क पर भीड़ कम थी।एक महिला एक कुत्ते को जंजीर में बांधे और दूसरे को खुल्ला टहला रही थी। जंजीर हाथ में थामे वह खुल्ले कुत्ते को कह रही थी- 'जॉनी इधर आओ।कम हियर। डॉन्ट गो अवे।'

लेकिन जॉनी किसी मुक्त अर्थव्यवस्था वाले विकासशील देश में महंगाई, क़ानून व्यवस्था सरीखा इधर-उधर अपनी मनमर्जी से टहल रहा थी। जंजीर में थमा कुत्ता भी जॉनी की तरह मुक्त होने के लिये कसमसा रहा था।

"चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाए
सावन जब अगन लगाये उसे कौन बुझाए।"

जाड़ा में सावन का यह गाना बजते हुए बता रहा था कि अपने यहाँ देर है लेकिन अंधेर नहीं।सावन को आग लगाने का मौका मिलेगा लेकिन आराम से। अकबर इलाहाबादी के हिसाब से:

"रंज लीडर को बहुत है
मगर आराम के साथ।"

चाय की दूकान के बगल में समोसे बन रहे हैं।समोसे के अंदर मसाला भरते हुए दूकान वाला पानी लगाते हुए प्यार से उसकी परत को बंद कर रहा था।मानों समोसे को फुसलाते हुए कह रहा हो- "खौलती कड़ाही में कूदने के लोगों के पेट में हलचल मचा देना पुण्य का काम है। इस नेक काम को करने से जन्नत नसीब होगी तुमको और अगले जन्म में पूड़ी पराठा पैदा होंगे।"

समोसे का दिमाग पहले से ही निकाला जा चुका है सो वह अपने पेट में मसाले को विस्फोटक की तरह बांधे आत्महंता आतंकवादी की तरह खौलती कड़ाही में कूदने को तैयार है।

"चोरी चोरी कोई आये
चुपके सबसे हां दिल दे जाए।"

यह गाना बता रहा है ' वन्स अपान ए टाइम ' लोग दिल के लेन देन का काम कितना लजाते हुए करते थे। आज की तरह थोड़ी जब दिल का आदान-प्रदान मेल मुलाक़ात में विजिटिंग कार्ड की अदला-बदली की तरह होता हो।

सूरज भाई बड़े प्यार से रिक्शे वाले को भुजिया खाते हुए देख रहे थे। उनके बिना कहे तमाम किरणें उसके चेहरे को चमकाने लगीं। कुछ देर में रिक्शेवाला का चेहरे पर तृप्ति ने अपना तम्बू तान लिया। भुजिया और रोशनी आपस में लड़ने लगे कि तृप्त का भाव उनके कारण आया है।

मैंने सूरज भाई से पुछा-इनके अच्छे दिन कब आएंगे। सूरज भाई कुछ कहते तब तक गाना बजने लगा:

"फ़साना जिसे अंजाम तक पहुंचाना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।"

सूरज भाई बिना कुछ बोले चाय का गिलास जमीन पर धरकर आसमान में जा विराजे। किरणों, उजाले, रौशनी ने उनके सम्मान में और चमककर उनका स्वागत किया।

सुबह हो गयी।

Friday, December 05, 2014

खाना एवन बनाते हैं साहब

आज महेश भेंटाये सर्वहारा पुलिया पर।हलवाई का काम करते हैं। जलेबी और दीगर मिठाइयां ठेले पर धरे बेंच रहे थे।गुड़ की जलेबी बता रहे थे बहुत बढ़िया बनाते हैं।

बांदा जिला के रहने वाले महेश जबलपुर में ही बस गए हैं अब। हलवाई के रूप में कई बार बस सेवाओं के साथ भारत दर्शन, नर्मदा परिक्रमा और कन्याकुमारी यात्रा कर चुके हैं। एक बच्चा है। स्कूल में पढता है।

पान मसाले से रंगे दांत । बोले -'ऐसे ही आदत पड़ गयी।'


यह भी बोले-'खाना एवन बनाते हैं साहब। कभी खाकर देखिये।'

हमें लंच के लिए देर हो रही थी। सो मेस चले आये।

जलवा सूरज भाई का


सुबह निकले तो पक्षियों ने चिंचियाते हुए गुडमॉर्निंग की।बच्चे स्कूल जा रहे थे।स्कूल के सामने ऑटो रुका और बच्चे धड़धड़ाते हुए उतरे।ऐसा लगा बच्चों से भरा ऑटो स्कूल के सामने पहुंचते ही 'अनजिप्ड ' हो गया हो।

बायीं तरफ से सूरज भाई चमक रहे थे।दीवारों पर धंसे कांच के टुकड़ों पर पड़ती रौशनी उनको और नुकीला बना रही थी।कांच के टुकड़े दीवारों को खतरनाक बना रहे थे।सुरक्षा के लिए इस्तेमाल की गयीं चीजें भी खतरनाक दिखती हैं।

चाय की दूकान पर गाना बज रहा था -'सुजलाम्, सुफलाम मलयज शीतलाम।'

कुछ जवान लड़के आये और दुकानदार से चुहल करने लगे। दुकानदार ने भी की।कोई भी दूकान चलाने के लिए बहुत नाटक करने पड़ते हैं। दूकान चाहे चाय की हो या राजनीति की बिना नाटक के चलती कहाँ है।

लड़कों ने दूकान पर लटका हुआ लाइटर चलाकर हाथ सेंका।चाय पी और चले गए।एक आदमी बीड़ी मुंह में दबाये दोनों हाथैलियों को हाथ से रगड़ रहा था। 'ऑटो सुट्टा मोड' में बीड़ी पीते वह सड़क पर जाते हुए मोटरसाइकिल सवार को ताक रहा था।मोटर साइकिल वाला एक हाथ से सिगरेट मुंह में दबाये हेलमेट दूसरे आधे हाथ में लिए बाकी के आधे हाथ से मोटरसाइकिल चला रहा था। सिगरेट की तलब सुरक्षा पर भारी थी।

एक व्हील चेयर पर बैठे एक भाई साहब एक कागज़ में कुछ गुणा भाग लगा रहे थे। पता चला कि सट्टे का नंबर लगा रहे हैं। चार रूपये की पर्ची पर जीतने पर 60 रूपये मिलते हैं।आज तक जीते नहीं लेकिन सट्टा लगाते रहते हैं। देश की आम जनता की तरह आशावादी नजरिया है।

पप्पू नाम है इनका। 93 में कटनी में रेलगाड़ी की चपेट में आ जाने पर पैर कट गया था।इंटर तक पढ़े हैं। घर वालों के साथ रहते हैं। कमाई के लिहाज से कुछ करते नहीं। सट्टा लगाते हैं जिसमें नंबर कम ही लगता है।

लौटते हुए सूरज भाई की सरकार का विस्तार हो चूका था।हमने चाय के लिए पुछा तो बोले-तुम पियो हमको अभी रौशनी की सरकार चलानी है।बहुत काम है।

मन तो किया कहें - यू टू सूरज भाई!

लेकिन फिर नहीं बोले।देख रहे है जलवा सूरज भाई का!

सुबह हो गयी।

Thursday, December 04, 2014

बर्तुहारी की तलाश

आज पुलिया पर रामनारायण सिंह जी मुलाक़ात हुई।समस्तीपुर बिहार के रहने वाले हैं।बेटा वीएफजे में आडिट में है।उसके पास मिलने आये हैं।

बात चलने पर बताये कि वे बर्तुहारी मतलब अपनी कन्या के लिए वर खोजने आये हैं।राजपूत हैं उसी हिसाब से वर खोज रहे हैं।बिटिया पटना से समाज शास्त्र में स्नातक है। मध्य प्रदेश के लड़के से शादी नहीं करनी बिटिया की।बिहार तरफ का ही लड़का खोज रहे हैं। हमसे भी कहा कोई निगाह में तो बताना।

उनकी बात सुनकर परसाईजी का एक लिखा एक संवाद याद आया-"हमारे मुल्क की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है।"

रामनारायण जी ने बताया कि 2008 तक वे बिहार,बंगाल और नेपाल तक फिल्मों के वितरण का काम देखते थे। अभी कुछ नहीं करते।

बात करते हुए हाईकोर्ट वाले तिवारी जी आ गए और सिंह जी से बतियाने लगे। अपन चुपचाप फैक्ट्री निकल लिए।

Wednesday, December 03, 2014

वे ऊपर भाग गये

पुलिया पर बैठे थे ये तीन लोग। हमने फ़ोटो खींचने की बात कही तो नीली धोती वाली महिला ने कहा -रुको जरा पल्लू सर पर रख लें। दोनों महिलाओं के पति फैक्ट्री के रिटायर्ड कर्मचारी थे। नीली धोती वाली महिला ने बताया कि उनके पति 2008 में रिटायर्ड हुए थे।

हमने पूछा -अभी कहाँ हैं पति? इस पर वो बोली- वे भाग गए।


हमने भाग गए का मतलब पूछा तो बताया भाग गए मतलब ऊपर भाग गए।

निधन हो जाने के लिए जबलपुर में आने के बाद मैंने 'बराबर हो गए', 'शांत हो गए' के बाद यह 'ऊपर भाग जाना ' भी जाना।

साथ के आदमी ने बताया कि ऊपर भाग गए मतलब निधन हो गया। तीन बहुओं और पांच नातियों वाली महिला ने हँसते हुए बताया -एक और नाती होने वाला है।

दूसरी महिला के पति का भी निधन हो चुका है। वह भी अपने परिवार के बारे में बता रही थी कि उसकी भी बहु माँ बनने वाली है।

दोनों लोग पास के बैंक में पेंशन के इन्तजार में पुलिया पर धूप खा रहीं थीं।