Monday, September 01, 2014

मोबाइल के अच्छे दिन

पिछले दिनों हमारा मोबाइल पानी में गिर गया। पानी घुस गया। मोबाइल बैठ गया। जिस मोबाइल में अनगिनत फोन नंबर थे। फ़ोटो थे और कई जानकारियां थीं उसने काम करना बन्द कर दिया। सूचनायें मोबाइल में हैं लेकिन हम तक नहीं पहुंच रहीं । शयद ऐसे  जैसे कि देश समृद्ध हो रहा है लेकिन गरीब  मर रहे हैं।अन्न गोदामों में सड रहा है लेकिन लोग भूखों मर रहे हैं।

हमारे लिये तो मोबाइल कोमा में गया। उसको होश नहीं आ रहा। गया है सर्विस सेंटर। लौटकर जब आयेगा तो शायद पुराने नंबर मिट गये हों। फोटो गायब हो जायें। सब कुछ नया-नया हो। अभी नया है। साल नहीं हुये खरीदे हुये। बल्कि खरीदा कहां था। बच्चे ने उपहार दिया था। पच्चीस साल शादी के हुये तब। मंहगा मोबाइल किस्तों में खरीद कर दिया। पिता प्रेम की किस्तें अभी पूरी नहीं हुयीं। लेकिन मोबाइल बैठ गया।

अभी तो नया है मोबाइल। वारण्टी पीरियड में है। लेकिन पानी में गिरा है तो वारण्टी लागू न होगी। लेकिन अभी साल  नहीं हुआ रिपेयर के लिये ले लिया सर्विस सेन्टर वाले ने।  एकाध साल हो गये होते तो क्या पता सर्विस सेंटर वाला कहता -"इसमें जितना खर्चा आयेगा उससे अच्छा तो नया ले लीजिये।"

असल में तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है आजकल कि कुछ पूछो न! हर नयी चीज पाकिस्तान की सरकार सरीखी हो गयी है। जहां जरा खराबी दिखी लोग कहते हैं- बदल डालो।

मोबाइल का खराब होना आदमी के कोमा में जाने जैसा ही है। आदमी जब कोमा में जाता है तो बाहरी दुनिया से संपर्क स्थगित हो जाता है। होश में आने पर कभी-कभी अपने साथ जुडे लोगों को पहचान नहीं पाता। कभी कुछ दिन बाद याद आता है। कभी जिन्दगी भर के लिये भूल जाता है। टोट्टल मेमोरी लॉस। मने कि स्मृति लोप।

स्मृति लोप  कैसा होता होगा। कुछ ऐसा जैसे कि यादों के द्वीप को बाकी की दुनिया से जोड़ने वाली सडक बह गयी हो। यादें सिकुडी बैठीं हैं राहत के इंतजार में। कोई आये और उनको उठाकर, बचाकर के जाये। जुड जाये कनेक्शन बाहरी दुनिया से। फ़िर से उनकी आवा-जाही शुरु हो जाये दुनिया में। कभी जुड़ने में देर हो जाती है तो शायद यादें निराश होकर मर जाती हों। उनकी सांस टूट जाती हो। कभी-कभी कोई याद बहुत देर होने के बाद भी जिन्दा बच जाती है जैसे कि किसी भूस्खलन के मलवे से ( जिसमें सैकडों लोग जिन्दा दफ़न हो जाते हैं ) कोई बच्ची जीवित बच जाती है। जिन्दगी मुस्कराती है।

संकट के समय विरोधी अपना विरोध भुलाकर अस्तित्व बचाने के लिये एक हो जाते हैं। सांप, नेवला, आदमी, जानवर बाढ़ के समय एक ही पेड़ के नीचे खडे होकर बाढ उतरने का इंतजार करते हैं। धुर विरोधी एक साथ चुनाव लड़ते हैं।

 सर्विस सेंटर में पड़ा मोबाइल कुछ-कुछ ऐसे सोच रहा होता जैसा अस्पताल में पड़ा मरीज सोचता है। मोबाइल के फोन नंबर, पते, फोटो, फ़ाइलें जो कभी  आधुनिक सोसाइटियों के बासिन्दों की तरह एक-दूसरे को पहचानतें तक न हों वे क्या पता एक-दूसरे  को दिलासा दे रहे हों चिन्ता न करो। हम जल्दी ही ठीक होकर सर्विस सेंटर से बाहर जायेंगे।  हम एक बार से सीने के पास वाली जेब में बैठकर घनघनायेंगे। कभी वाइब्रेशन तो कभी साइलेंट मोड में जायेंगे। हमारे खींचे हुये फ़ोटो भी फ़िर से क्यूट, स्वीट, ब्यूटीफ़ुल कहलायेंगे। हमारे भी अच्छे दिन आयेंगे।

मोबाइल के मुंह से अच्छे दिन की बात सुनकर लगा कि उस बेचारे को भी पता नहीं कि अभी वारण्टी पीरियड की देहरी नहीं लागी है अगले ने पर मूल कीमत का एक तिहाई रिपेयर में ठुकने वाला है।

 मोबाइल भी देश के आम आदमी की तरह भोला है। अच्छे दिन का इंतजार कर रहा है।

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1 comment:

  1. गजबै लिखा है, मोबाइल पुराण ;-)

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