Tuesday, September 30, 2014

जनसेवा का जोखिम




एक सू्बे के मुख्यमंत्री को आय से अधिक  संपत्ति के मामले में जेल हो गयी। बुरा हुआ। बहुत बुरा हुआ।  

 अब मुख्यमंत्री के भक्त धरना-प्रदर्शन करेंगे। बाजार, कारखाने, स्कूल बंद रहेंगे। अरबों-खरबों  की संपत्ति जलानी पड़ेगी उनको अपने नेता के समर्थन में। जितनी  संपत्ति बरामद हुई है उससे सैकड़ों गुना स्वाहा हो जायेगी।
 
सोचिये अगर मुख्यमंत्री को जेल होगी पचास-साठ करोड़ ज्यादा कमाने के लिये तो बाकियों के हौसले का क्या होगा? किस मन से देश सेवा के लिये आगे  आयेंगे लोग? कितना तो जोड़-तोड़, उठापटक, धांधली, धंधा करके आते हैं लोग राजनीति में जनता की सेवा के लिये। उसमें भी अगर जेल होने लगी तो इससे राजनीति में आने वालों का हौसला कमजोर होगा। 

वैसे भी राजनीति में दूसरे क्षेत्रों के छंटे हुये लोग आते हैं। तपे तपाये जनसेवक, कट्टर धर्माचार्य, छंटा हुआ गुंडा, पका हुआ माफ़िया, घाघ व्यापारी, रिटारयर्ड नौकरशाह राजनीति में इस लिये आता है कि सुकून से देश सेवा कर सके। अपनी इधर-उधर की कमाई को हिल्ले लगा सके। राष्ट्र के निर्माण में योगदान कर सके। अपना नाम देश, समाज के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा सके। राजनीति इनका अभयारण्य होती है। सुरक्षा की गारण्टी। अब अगर अभयारण्य़ में भी सुरक्षा की गारण्टी नहीं होगी तो क्यों लोग देश सेवा करने के लिये हुड़केंगे? कैसे देश का विकास होगा?

  राजनीति में लोग पैसे के लिये नहीं आते।पैसा तो अपने आप राजनीतिज्ञों के पास आता है। जनता के नुमाइंदे के पास जनता का पैसा आता है तो मना नहीं करते बनता उससे। राजनेता तो चुम्बक की तरह होता है और पैसा छीलन की तरह। कहां तक चुम्बक अपने को लोहे की छीलन से अलग रखेगा? जैसे आटे के चक्की में काम करने वाले के मजदूर का शरीर आटे से सराबोर हो जाता है वैसे ही अरबों-खरबों की योजनाओं की चक्की चलाते राजनेता के पास सौ-पचास करोड़ जमा हो जायें तो उसका क्या दोष? पानी ले जाने वाले लोहे के पाइप तक की सतह गीली हो जाती है। क्या इसे पाइप का भ्रष्टाचार कहेंगे?

अगर छापे में किसी की संपत्ति उसकी आय से ज्यादा पकड़ी गयी है तो इसका मतलब यही है वह देश सेवा के काम में इतना मशगूल रहा कि उसको खर्च करने का होश ही नहीं रहा। वह भारतीय संस्कृति के मितव्ययिता के सिद्धांत का अनुयायी रहा। वर्ना अगर उसने सारा कमाई ठिकाने लगा दी होती तो कौन पकड़ पाता उसको। किसी को समाज के सांस्कृतिक मूल्यों के पालन के लिये सजा देना क्या उचित होगा

सच पूछा जाये तो आय से अधिक संपत्ति में पकड़ का यह मामला भारतीय राजनीति के अदूरदर्शिता की  कहानी है। राजनीतिज्ञों को यह अंदाजा ही नहीं होता कि वे आगे चलकर कितना कमायेंगे। अगर इसका कुछ पूर्वानुमान कर सकते लोग तो पहले से ही अपनी संपत्ति बढाकर घोषित करते।  

बाजार के लिये जब कोई आइटम बनाया जाता है तो उसमें  ’फ़ैक्टर आफ़ सेफ़्टीरखा जाता है। मान लीजिये कोई स्कूटर 100 किलो सवारी के वजन के लिये बना है। अगर उसका फ़ैक्टर आफ़ सेफ़्टी’ 2 रखा गया है तो वह स्कूटर 200 किलो तक का वजन झेल लेगा। कोई लिफ़्ट 1000 किलो वजन के आदमियों को ले जाने के लिये बनी है और उसका सेफ़्टी फ़ैक्टर 2.5 है तो वह लिफ़्ट 2500 किलो वजन तक ढो लेगी। 

आज की राजनीति को बाजार ही चलाता है।  बाजार के दीगर सामानों की तरह राजनेताओं की भी कीमत होती है, खरीद/फ़रोख्त होती है, मोलभाव होते हैं इसलिये राजनेताओं को अपने भले के लिये अपनी संपत्ति में  ’फ़ैक्टर आफ़ सेफ़्टीलगाना चाहिये। मान लीजिये उसके पास अभी तीन करोड़ की संपत्ति  है और उसको लगता है कि लेकिन एक चुनाव के बाद वह सौ करोड़दूसरे के बाद हजार करोड़ और तीसरे के बाद  तीन हजार करोड़ तो उनको अपनी संपत्ति तीन हजार करोड़ घोषित करनी चाहिये। मतलब संपत्ति का फ़ैक्टर आफ़ सेफ़्टी’ 1000  रखना चाहिये।
 
 इससे जब कभी छापा पड़ेगा तो पकड़े नहीं जायेंगे। जितनी कम संपत्ति निकलेगी उतने की एफ़ आई आर लिखा दी जायेगी।बता दिया जायेगा कि जनता की सेवा में खर्च हो गयी संपत्ति। नेकी करके दरिया में डाल दी। कहां डाली याद नहीं! हमें तो सेवा से मतलब है।

जनता की सेवा का यह सुरक्षित तरीका है। देर-सबेर इसे अपनाना ही होगा राजनेताओं को वर्ना उनका जनता की सेवा करने का सपना अधबीचमें टूटता रहेगा।


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4 comments:

  1. आज की राजनीति को बाजार ही चलाता है। बाजार के दीगर सामानों की तरह राजनेताओं की भी कीमत होती है, खरीद/फ़रोख्त होती है, मोलभाव होते हैं इसलिये राजनेताओं को अपने भले के लिये अपनी संपत्ति में ’फ़ैक्टर आफ़ सेफ़्टी’लगाना चाहिये।
    ..बहुत काम का सुझाव दे दिया आपने मुफ्त में हमारी राजनेताओं को ...
    बहुत बढ़िया

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    1. धन्यवाद! वैसे नेता लोग बहुत समझदार होते हैं। और बेहतर तरीके जानते हैं बचने के! :)

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  2. कल को जब कोई नेता कोर्ट में शपथपूर्वक बयान देगा कि मेरे प्रेरणा स्रोत श्रीमान फुरसतिया जी थे। इन्हीं के बताये रास्ते पर चलते हुए मैंने थोड़ा-बहुत आटा अपने शरीर पर लग जाने दिया, सरकारी खर्च के माल का संवाहक होने के नाते कुछ माल खुद से सटा लिया; तो उसे दोष मत दीजिएगा। आपने तो यह सलाह खुलेआम अखबार में छपवाकर समाज के राजनेताओं को दी है।

    उन्हें ऐसी अक्ल की बात सिखाकर आपने भ्रष्टाचार के यज्ञ में जो घी की आहुति डालने का पुनीत कार्य किया है उसके लिए जमाना आपका ऋणी रहेगा। :)

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    1. समाज की उन्नति में सबको यथासम्भव योगदान करना चाहिये! हम और आप थोड़ा-थोड़ा योगदान करेंगे उससे समाज बहुत आगे जायेगा!

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