Monday, September 29, 2014

विश्वकर्मा जी गियर बनाने में महारत रखते हैं

 आज अभी फैक्ट्री से कमरे पर लौटते हुए पुलिया पर एक भाई जी मिले। साइकिल के कैरियर पर लकड़ी लदी थी। कंचनपुर से 10 रूपये की खरीद के लाये थे । चूल्हा जलाने के लिए। बेलदारी करते हैं। पुलिया के पास खड़े होकर दिहाड़ी गिन रहे थे। हम चुपचाप चले आये।

 इसके पहले कल सर्वहारा पुलिया पर विश्वकर्मा जी मिले।2008 में फैक्ट्री से रिटायर। घर मरम्मत कराने के लिए ठेलिया पर बल्ली लिए धराये थे।'टेलीफून बीड़ी' पीते पुलिया पर आराम कर रहे थे। 

कानपुर की सन 1948 की पैदाइश है विश्वकर्मा जी की। आर्मापुर में। आर्मापुर इंटर कालेज के पहले बैच से निकले।1964 में अपरेंटिस किया। पिताजी भी आर्डनैंस फैक्ट्री में थे।वाहन निर्माणी में आये तब शुरू हुई थी फैक्ट्री। गियर शाप में काम करते थे। हर तरह का गियर बनाया। सीखा।अभी भी कभी काम पड़ता है तो बुलाये जाते हैं फैक्ट्री।

आर्मापुर के किस्से बताते हुए बोले- "पनकी पावर हाउस हमारे सामने बना। शाम को चले जाते थे। देखने। कभी कुछ काम भी कर देते थे।"

बात करते हुए सड़क के पार से आवाज आई-"अरे भाई छोड़ दो इनको जाने दो।" पता चला स्कूटर पर हमारे मोतीलाल  इंजीनियरिंग कालेज के सीनियर शुक्ल जी अपने स्कूटर से घर लौट रहे थे। हमको विश्वकर्मा जी से  बतियाते देखा तो वे भी आ गए पुलिया पर। शुक्लजी सिविल इजिनियारिंग की पढाई किये हैं लेकिन पिछले बाइस साल से होम्योपैथिक डाक्टरी कर रहे हैं। इस बारे में विस्तार से फिर कभी। 

विश्वकर्माजी ने शुकुलद्वय  का फोटो खींचा और तीनों लोग अपने-अपने गन्तव्य को गम्यमान हुए। ठेलिया वाला पहले ही बल्ली लेकर चला गया था।
आज अभी फैक्ट्री से कमरे पर लौटते हुए पुलिया पर एक भाई जी मिले। साइकिल के कैरियर पर लकड़ी लदी थी। कंचनपुर से 10 रूपये की खरीद के लाये थे । चूल्हा जलाने के लिए। बेलदारी करते हैं। पुलिया के पास खड़े होकर दिहाड़ी गिन रहे थे। हम चुपचाप चले आये।

इसके पहले कल सर्वहारा पुलिया पर विश्वकर्मा जी मिले।2008 में फैक्ट्री से रिटायर। घर मरम्मत कराने के लिए ठेलिया पर बल्ली लिए धराये थे।'टेलीफून बीड़ी' पीते पुलिया पर आराम कर रहे थे।

कानपुर की सन 1948 की पैदाइश है विश्वकर्मा जी की। आर्मापुर में। आर्मापुर इंटर कालेज के पहले बैच से निकले।1964 में अपरेंटिस किया। पिताजी भी आर्डनैंस फैक्ट्री में थे।वाहन निर्माणी में आये तब शुरू हुई थी फैक्ट्री। गियर शाप में काम करते थे। हर तरह का गियर बनाया। सीखा।अभी भी कभी काम पड़ता है तो बुलाये जाते हैं फैक्ट्री।

आर्मापुर के किस्से बताते हुए बोले- "पनकी पावर हाउस हमारे सामने बना। शाम को चले जाते थे। देखने। कभी कुछ काम भी कर देते थे।"

बात करते हुए सड़क के पार से आवाज आई-"अरे भाई छोड़ दो इनको जाने दो।" पता चला स्कूटर पर हमारे मोतीलाल इंजीनियरिंग कालेज के सीनियर शुक्ल जी अपने स्कूटर से घर लौट रहे थे। हमको विश्वकर्मा जी से बतियाते देखा तो वे भी आ गए पुलिया पर। शुक्लजी सिविल इजिनियारिंग की पढाई किये हैं लेकिन पिछले बाइस साल से होम्योपैथिक डाक्टरी कर रहे हैं। इस बारे में विस्तार से फिर कभी।

विश्वकर्माजी ने शुकुलद्वय का फोटो खींचा और तीनों लोग अपने-अपने गन्तव्य को गम्यमान हुए। ठेलिया वाला पहले ही बल्ली लेकर चला गया था।

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