Friday, October 31, 2025

"मज़े मज़े में धारदार व्यंग्य"-अरविंद तिवारी




 [ वरिष्ठ व्यंग्यकार और गीतकार Arvind Tiwari अरविंद तिवारी जी मेरे लेखन पर हमेशा प्रोत्साहित करने वाली टिप्पणियां करते रहते हैं। मेरे लेखन के 'नैसर्गिक व्यंग्य दृष्टि' होने की बात कहते रहे हैं। अरविंद तिवारी जी ने मेरे कविता संकलन "अंधेरे का बड़प्पन" को पढ़कर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी भेजी है। यह मेरे लिए उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणी है। आप भी पढ़िए इसे। कविता संग्रह डाउनलोड करने का लिंक टिप्पणी में दिया गया है। विदेश में रहने वाले मित्र इसे किंडल पर पढ़ सकते हैं। किताब का प्रिव्यू मुफ्त में पढ़ सकते हैं। ]

अनूप शुक्ल ब्लॉग की दुनिया में जाना पहचाना नाम है।उनके पास व्यंग्य दृष्टि है इसलिए उनका लिखा रोचक होता है।वह मूलतः व्यंग्यकार हैं।उनके वृतांत व्यंग्य शैली में होते हैं।उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से वह पुरस्कृत भी हैं।उन्होंने "कट्टा कानपुरी" नाम से व्यंग्य क्षणिकाएं लिखीं हैं।उनके अनुसार यह लेखन मज़े मज़े में किया है। यहां मज़े से आशय व्यंग्य करने से है।इन क्षणिकाओं का संकलन आया है "अंधेरे का बड़प्पन"।यह शीर्षक चर्चित व्यंग्यकार आलोक पुराणिक Alok Puranik ने दिया है।यह संकलन अनूप जी ने सेल्फ पब्लिशिंग द्वारा ('ई बुक') से प्रकाशित किया है।कीमत पचास रुपए मात्र है।
व्यंग्य क्षणिकाएं हालांकि बहुत पहले से लिखी जाती रहीं हैं पर अज्ञेय के ज़माने से इनका लेखन बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। हम उनकी, 'सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं...' कविता को व्यंग्य क्षणिका ही मानेंगे।धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान और कादम्बिनी जैसी अनेक पत्रिकाओं ने इन क्षणिकाओं को खाद पानी देने का काम किया था।सरोजनी प्रीतम,मिश्रीलाल जायसवाल और दिनकर सोनवलकर जैसे अनेक कवियों ने इस विधा को ऊंचाइयों तक पहुंचाया।आज भी क्षणिकाएं बहुत लोकप्रिय हैं।
अनूप शुक्ल अपनी इन क्षणिकाओं के लिए खाद पानी अपने परिवेश से लेते हैं।उनका व्यंग्य कई बार महीन दिखाई देता है।__
"तुम अभी बदले नहीं
इसलिए बहुमत में हो"
कई बार उनकी सामान्य सी लगने वाली क्षणिका भी बेहद रोचक बन जाती है।___
"चांद की आवारगी बढ़ रही प्रतिदिन
किसी दिन पकड़ा गया तो क्या होगा।
हर गोरी के मुखड़े पर तंबू तान देता है
कोई मजनू थपड़िया देगा तो क्या होगा।"
या
"चांद ने सूरज को समझा दिया आहिस्ते से
भटक जाओगे अंधेरे में गर रात को न निकला मैं"
तुर्की के प्रसिद्ध लेखक ओरहान पामुक कहते हैं :
"लिखना वस्तुतः उस समय का अध्ययन करना है जिस समय से हम गुजर रहे हैं।"
अनूप शुक्ल इन क्षणिकाओं के माध्यम से अपने समय को ही व्यक्त करते हैं।एक व्यंग्य क्षणिका देखें:
"भला हो इश्क का जो उनको निकम्मा कर दिया
वरना वे भी किसी कौम के रहनुमा हो गए होते।"
यह हमारी सियासत पर करारा व्यंग्य है।
आजकल स्थित ऐसी है कि व्यक्ति हंसे तो कैसे हंसे।इस देश में बिंदास होना मना है:
"हंस मत यार बेफालतू फंस जाएगा,
मस्त बिंदास का इल्ज़ाम लग जाएगा।"
इस क्रूशियल समय में विरोधाभास चरम पर है।सहज गतिविधि शंका के दायरे में है।तब अनूप शुक्ल कहते हैं:
"सुबह से मेरी तारीफों के पुल उसने बांध रखे हैं
इतना उतर गए हैं हम उसकी निगाह से।"
अनूप शुक्ल की इन रचनाओं में कई जगह बिंब लाजवाब हैं।ये बिंब सायास नहीं आए हैं।सहज ही आ गए हैं:
"दिन घुसा दफ़्तर में
अकड़कर घंटी बजाई,
उजाला आया ठिठुरते
साहब! केहिका बुला लाई।"
आजकल बिना किसी गुट में रहे जीना संभव नहीं है।इसलिए कवि कहता है:
"भाई इधर रहो या उधर
किसी न किसी दल में रहो।
अकेले रहे तो निपट जाओगे
दल में भी रहो तो चुप रहो।"
बेशक कथ्य,शिल्प और भाषा का ध्यान रखकर ये क्षणिकाएं नहीं लिखी गईं पर इन सबका अभाव कहीं भी दिखाई नहीं देता।
वैचारिक व्यभिचार के इस दौर में जब कुछ भी लिखकर पोस्ट कर दिया जाता हो और उसे कविता मानने और मनवाने की होड़ चल रही हो तो ऐसे समय में अनूप शुक्ल की ये क्षणिकाएं बेहद सुकून देती हैं, क्योंकि ये हमारे जीवन अनुभव के बेहद करीब हैं।ये हमारे छद्म नकाब को हटाने का काम भी करती हैं।हमें यथार्थ के धरातल पर ले जाती हैं।हमे यह भी याद रखना है कि कविता मनुष्यता की खोज का साधन है,ईश्वर की खोज का नहीं।इसलिए ये क्षणिकाएं कविता की कसौटी पर भले ही खरी न उतरती हों,मनुष्यता के प्रति इनकी प्रतिबद्धता असंदिग्ध है।ये क्षणिकाएं एहसास की हांडी को तजुर्बों की नर्म आंच पर रखने की कवायद करती हैं।भाषा सहज और लोकजीवन से संपृक्त है।
अनूप शुक्ल जी को शुभकामनाएं।
[ वरिष्ठ व्यंग्यकार और गीतकार Arvind Tiwari अरविंद तिवारी जी मेरे लेखन पर हमेशा प्रोत्साहित करने वाली टिप्पणियां करते रहते हैं। मेरे लेखन के 'नैसर्गिक व्यंग्य दृष्टि' होने की बात कहते रहे हैं। अरविंद तिवारी जी ने मेरे कविता संकलन "अंधेरे का बड़प्पन" को पढ़कर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी भेजी है। यह मेरे लिए उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणी है। आप भी पढ़िए इसे। कविता संग्रह डाउनलोड करने का लिंक टिप्पणी में दिया गया है। विदेश में रहने वाले मित्र इसे किंडल पर पढ़ सकते हैं। किताब का प्रिव्यू मुफ्त में पढ़ सकते हैं। ]
अनूप शुक्ल ब्लॉग की दुनिया में जाना पहचाना नाम है।उनके पास व्यंग्य दृष्टि है इसलिए उनका लिखा रोचक होता है।वह मूलतः व्यंग्यकार हैं।उनके वृतांत व्यंग्य शैली में होते हैं।उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से वह पुरस्कृत भी हैं।उन्होंने "कट्टा कानपुरी" नाम से व्यंग्य क्षणिकाएं लिखीं हैं।उनके अनुसार यह लेखन मज़े मज़े में किया है। यहां मज़े से आशय व्यंग्य करने से है।इन क्षणिकाओं का संकलन आया है "अंधेरे का बड़प्पन"।यह शीर्षक चर्चित व्यंग्यकार आलोक पुराणिक Alok Puranik ने दिया है।यह संकलन अनूप जी ने सेल्फ पब्लिशिंग द्वारा ('ई बुक') से प्रकाशित किया है।कीमत पचास रुपए मात्र है।
व्यंग्य क्षणिकाएं हालांकि बहुत पहले से लिखी जाती रहीं हैं पर अज्ञेय के ज़माने से इनका लेखन बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। हम उनकी, 'सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं...' कविता को व्यंग्य क्षणिका ही मानेंगे।धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान और कादम्बिनी जैसी अनेक पत्रिकाओं ने इन क्षणिकाओं को खाद पानी देने का काम किया था।सरोजनी प्रीतम,मिश्रीलाल जायसवाल और दिनकर सोनवलकर जैसे अनेक कवियों ने इस विधा को ऊंचाइयों तक पहुंचाया।आज भी क्षणिकाएं बहुत लोकप्रिय हैं।
अनूप शुक्ल अपनी इन क्षणिकाओं के लिए खाद पानी अपने परिवेश से लेते हैं।उनका व्यंग्य कई बार महीन दिखाई देता है।__
"तुम अभी बदले नहीं
इसलिए बहुमत में हो"
कई बार उनकी सामान्य सी लगने वाली क्षणिका भी बेहद रोचक बन जाती है।___
"चांद की आवारगी बढ़ रही प्रतिदिन
किसी दिन पकड़ा गया तो क्या होगा।
हर गोरी के मुखड़े पर तंबू तान देता है
कोई मजनू थपड़िया देगा तो क्या होगा।"
या
"चांद ने सूरज को समझा दिया आहिस्ते से
भटक जाओगे अंधेरे में गर रात को न निकला मैं"
तुर्की के प्रसिद्ध लेखक ओरहान पामुक कहते हैं :
"लिखना वस्तुतः उस समय का अध्ययन करना है जिस समय से हम गुजर रहे हैं।"
अनूप शुक्ल इन क्षणिकाओं के माध्यम से अपने समय को ही व्यक्त करते हैं।एक व्यंग्य क्षणिका देखें:
"भला हो इश्क का जो उनको निकम्मा कर दिया
वरना वे भी किसी कौम के रहनुमा हो गए होते।"
यह हमारी सियासत पर करारा व्यंग्य है।
आजकल स्थित ऐसी है कि व्यक्ति हंसे तो कैसे हंसे।इस देश में बिंदास होना मना है:
"हंस मत यार बेफालतू फंस जाएगा,
मस्त बिंदास का इल्ज़ाम लग जाएगा।"
इस क्रूशियल समय में विरोधाभास चरम पर है।सहज गतिविधि शंका के दायरे में है।तब अनूप शुक्ल कहते हैं:
"सुबह से मेरी तारीफों के पुल उसने बांध रखे हैं
इतना उतर गए हैं हम उसकी निगाह से।"
अनूप शुक्ल की इन रचनाओं में कई जगह बिंब लाजवाब हैं।ये बिंब सायास नहीं आए हैं।सहज ही आ गए हैं:
"दिन घुसा दफ़्तर में
अकड़कर घंटी बजाई,
उजाला आया ठिठुरते
साहब! केहिका बुला लाई।"
आजकल बिना किसी गुट में रहे जीना संभव नहीं है।इसलिए कवि कहता है:
"भाई इधर रहो या उधर
किसी न किसी दल में रहो।
अकेले रहे तो निपट जाओगे
दल में भी रहो तो चुप रहो।"
बेशक कथ्य,शिल्प और भाषा का ध्यान रखकर ये क्षणिकाएं नहीं लिखी गईं पर इन सबका अभाव कहीं भी दिखाई नहीं देता।
वैचारिक व्यभिचार के इस दौर में जब कुछ भी लिखकर पोस्ट कर दिया जाता हो और उसे कविता मानने और मनवाने की होड़ चल रही हो तो ऐसे समय में अनूप शुक्ल की ये क्षणिकाएं बेहद सुकून देती हैं, क्योंकि ये हमारे जीवन अनुभव के बेहद करीब हैं।ये हमारे छद्म नकाब को हटाने का काम भी करती हैं।हमें यथार्थ के धरातल पर ले जाती हैं।हमे यह भी याद रखना है कि कविता मनुष्यता की खोज का साधन है,ईश्वर की खोज का नहीं।इसलिए ये क्षणिकाएं कविता की कसौटी पर भले ही खरी न उतरती हों,मनुष्यता के प्रति इनकी प्रतिबद्धता असंदिग्ध है।ये क्षणिकाएं एहसास की हांडी को तजुर्बों की नर्म आंच पर रखने की कवायद करती हैं।भाषा सहज और लोकजीवन से संपृक्त है।
अनूप शुक्ल जी को शुभकामनाएं।
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Thursday, October 30, 2025

अंधेरे का बड़प्पन


 

पिछले दिनों कविता संग्रह 'अंधेरे का बड़प्पन' का ई बुक संस्करण प्रकाशित किया। फेसबुक पर और व्हॉट्सएप पर लोगों को लिंक भेजा। 300 से ऊपर लोगों ने बढ़ाई दी। कुछ लोगों ने किताब ख़रीद भी ली। अभी तक 35 किताबें बिकी। प्रति किताब 37.50 रुपए प्रति किताब रॉयल्टी के हिसाब से कुल 1312.50 रुपए जमा हो गए।
हमने पोथी से पूछा कि जिन मित्रों ने किताब ख़रीदी है उनके नाम बता दे तो उनको धन्यवाद दे दें। मिलने पर चाय भी पिलायेंगे। दस रुपये खर्च करेंगे अपने पाठकों पर। लेकिन पोथी ने बताया नहीं। कहा यह ग्राहकों की निजता का हनन होगा।
हमने यह भी दीपावली पर उपहार स्कीम भी लांच करने की सोची थी। किताब ख़रीदो दस रुपये वापस पाओ। लेकिन फिर सोचा कि कहीं मित्र लोग यह न कहने लगें -' पहले दस रुपये भेजो खाते में तब ख़रीदें।'
अब हम को सरकार थोड़ी हैं जो वोट देने का पहले दस हज़ार दे देती है। सरकार में देने वालों का पैसा उनका ख़ुद का तो होता नहीं। वे कुछ भी दे सकते हैं। जनता का पैसा, जनता को दे दिया। हम कैसे दे दें भाई? हमको अपना खर्च भी चलाना है। हमको फौरन बात समझ में आ गई। हमने स्कीम लांच करते ही वापस ले ली। हम को सरकार थोड़ी हैं जो सैकड़ों लोगों की मौत के बाद चुनाव के मौके पर स्कीम वापस लें।
कुछ मित्रों के खाते से (अभी तक तीन) पैसे कट गए लेकिन किताब अभी तक आई नहीं है। उन्होंने हमें अपने भुगतान के स्कीन शॉट भेजे हैं। हमने पोथी वालों को लिखा है। आशा है उनके खाते में किताब पहुँच जायेगी।
कविता संग्रह पर कुछ मित्रों की प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। Pankaj Prasun ने बताया कि पढ़ी हुई कविताओं में उनको 'घर से बाहर जाता आदमी' अच्छी लगी। उनका यह भी मानना है कि कुछ दोहों पर कुछ मेहनत होती तो अच्छे बन सकते थे। मतलब ऐसे ही हैं।
हमारे एक ने कहा -"आपको अपनी casual लिखाई इसमें शामिल नहीं करनी चाहिए थी।"
फेसबुक मित्र Arvind Jain जी ने संग्रह की कविता पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा -"सर आप गद्य बहुत अच्छा लिखते हैं कृपया उसी पर फोकस करें ।" मतलब कि कवितायें सब ऐसी ही हैं।
इस संग्रह का विचार जब किया था तब इसमें केवल 'कट्टा कानपुरी' के नाम से लिखी ग़ज़ल, शेर शामिल करने का विचार था। बहुत पहले विभाग से अनुमति भी ली थी -'कलाम-ए-कट्टा कानपुरी' के नाम से प्रकाशित करने की। फिर देर हुई। कुछ और कविताएँ भी शामिल हुईं। नाम भी बदल गया। संग्रह 'अंधेरे का बड़प्पन' से प्रकाशित हुआ।
'कट्टा कानपुरी' का कलाम प्रकाशित करने का आग्रह/समर्थन Dhirendra Raj Veer Singh जी का था। बाद में दूसरी कविताएँ भी शामिल हुईं। यह ऐसा ही रहा कि चुनाव के समय सरकार बनाने का दावा करे वाली पार्टी को गठबंधन सरकार बनाने पर बाध्य होना पड़े। उन्होंने मेरे सिग्नेचर शेर का स्क्रीन शॉट लगाकर किताब खरीद लेने की सूचना भेजी :
"तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
कि भीग तो पूरा गए पर हौसला बना रहा।"
रमानाथ अवस्थी जी ने अपनी कविता ' मेरे पंख कट गए हैं' को मामूली कहते हुए कहा था - 'कविताएँ मेरी सब मामूली हैं।'बड़े कवि/लेखक अपने सारे रचनाकर्म को मामूली ही मानते हैं। इसी तर्ज पर अपनी कविताओं के बारे में कोई गलतफ़हमी नहीं है मुझे। बल्कि कोई कहे यह कवितायें हैं नहीं तो हमें उससे भी एतराज नहीं होगा।
'कट्टा कानपुरी' के नाम से लिखे अधिकांश शेर हल्के-फुल्के अंदाज़ में लिखे गए हैं। उनका मूल भाव है :
"हमारी चिरकुटइयां देखकर हमें बहुत काबिल न समझ,
कहीं कोई ऊंची बात निकल गयी तो देखते रह जाओगे!"
इन शेरों के कोई गहरे मतलब नहीं है। लेकिन यह पक्का है कि जो भी पढ़ेगा इस कविता संग्रह को वो सोचेगा कि ऐसी कविताएँ तो हम भी लिख सकते हैं। इसी बहाने नए कवि पैदा होंगे। हमारे मित्र Vinod Tripathi जी ने दो दिन पहले तय किया कि वे भी कविता लिखा करेंगे। क्या पता उनके इस निश्चय के पीछे मेरे कविता संग्रह का प्रकाशन रहा हो।
इस कविता संग्रह का फार्मेट तय करने में Ibbar Rabi जी के कविता संग्रह से सहायता मिली। उन्होंने अपनी एक पेज पर एक कविता की बजाय कविताएँ एक के बाद एक प्रकाशित की थीं। हमने भी यही तरीका अपनाया। इस तरह एक-एक शेर भी प्रकाशित हो गये इसमें। किसी शेर को यह मौका नहीं मिला कि वह किताब से बाहर रहकर अपनी नाराजगी जाहिर करे।
किताब का किंडल संस्करण भी प्रकाशित हुआ है (लिंक टिप्पणी में)। देश के बाहर रहने वाले मित्र इसे डाउनलोड कर सकते हैं।
किताब का प्रिंट संस्करण भी जल्दी ही लायेंगे। फ़िलहाल तो इसे कम पेज में तैयार करने का तरीका खोज रहे हैं।
किताब का लिंक मैं अपने सभी मित्रों को उनके मेसेज में भेजूँगा। भले ही वे किताब न ख़रीदें लेकिन संग्रह का मुफ्त में उपलब्ध 'प्रिव्यू' तो पढ़ सकते हैं। मुफ्त में मिलने वाली किसी चीज से अपने मित्रों को वंचित करना ठीक नहीं। किसी दोस्त को यह मौक़ा क्यों दें कि वह कहे -'हमको क्यों नहीं बताया किताब के बारे में।'
किताब का समर्पण करते हुए मैंने लिखा है :
"ब्लॉगिंग और फेसबुक के पाठक मित्रों को
और उन साथियों को भी
जो भले ही कभी पढ़ते न रहे हों।
लेकिन मिलने पर पूछते ज़रूर थे
-“तुम्हारा कविता का काम कैसा चल रहा है, बना रहे हो न कविता ! “"
इसमें आप भी शामिल हैं। इसलिए आपको बतायी सारी बातें। बाकी सब चकाचक है।
किताब डाउनलोड करने का लिंक यहाँ (पोथी) और यहाँ (किंडल) दिया है।


https://www.facebook.com/share/p/1DhyweX4gT/

Monday, October 27, 2025

लक्षद्वीप के निर्जन द्वीप कल्पती की सैर




 लक्षद्वीप का मतलब एक लाख द्वीप वाला समूह होता है। लेकिन वास्तव में यहाँ केवल 36 द्वीप हैं। इनमें भी केवल दस में लोग रहते हैं। बाकी 26 द्वीप निर्जन हैं। यहाँ कोई नहीं रहता।

जिन द्वीपों में लोग रहते हैं उनमें सबसे कम आबादी (2011 के अनुसार) बित्रा (Bitra) द्वीप में (271) और सबसे अधिक कावरत्ती (11221) की है। कावरत्ती लक्षद्वीप की राजधानी है। 2011 के सेंसेक्स के अनुसार लक्षद्वीप की कुल आबादी 65473 है। अब एक लाख हो गई होगी। इतनी आबादी तो दिल्ली, नोयडा के एक मोहल्ले/सेक्टर की होगी।
'बनाना बोट राइड' के बाद शाम को हम लोग पास का निर्जन द्वीप कल्पती (Kalpati) देखने गए। छुटका सा द्वीप है कल्पती। कुल क्षेत्रफल 0.085 वर्ग किलोमीटर। मतलब वर्गाकार हिसाब से देखें तो क़रीब 300 मीटर लम्बा, 300 मीटर चौड़ा द्वीप। कोई रहता नहीं वहाँ पर। इतनी ज़मीन नोयडा में पहुँच जाये तो अरबों के कीमत के सैकड़ों फ्लैट बन जायें।
शाम की चाय पीने के बाद हम कल्पती के लिए निकले। यह यात्रा 'ग्लास बोट राइड' के नाम से दर्ज थी टूर में। पता नहीं था कि क्या होती है 'ग्लास बोट राइड।' जब चले नाव में बैठकर कल्पती के लिए तब भी यही पता था कि निर्जन द्वीप जा रहे हैं। लेकिन जब चले नाव में बैठे तो उसकी तली में लगे शीशे से नीचे समुद्र दिखा। तब पता चला कि यही ग्लास बोट है। ग्लास बोट माने वह नाव जिसके नीचे काँच लगा हो ताकि हम उससे नीचे समुद्र के पानी का नजारा देख सकें।
समुद्र का पानी बहुत साफ़ था। काँच के नीचे कहीं-कहीं सतह की बालू तक दिख रही थी। बीच-बीच में समुद्र के अंदर मछलियाँ, शैवाल और चट्टाने भी दिख रहीं थीं। कोई रंगबिरंगी मछली दिखती तो हम लपककर उसको देखने से अधिक उसकी फ़ोटो लेने की कोशिश करते रहे। इंसानी फ़ितरत है यह। कोई चीज खूबसूरत दिखे तो उसको देखने की बजाय फौरन उसको अपने कैमरे के कब्जे में कर लो।
पानी में कई जगह कछुए भी दिखे। बड़े-बड़े कछुए। कभी नाव के बगल से निकलते दिखते। कभी नाव के नीचे के कांच से दिखते। कई बार फ़ोटो लिए वीडियो बनाए हमने।आधे-अधूरे। आधे-अधूरे लिखते हुए मोहन राकेश जी का लिखा हुआ नाटक 'आधे-अधूरे' याद आ गया।
कछुओं की उमर दस - बीस साल से लेकर 150 साल तक हो सकती है। हमको दिखने वाले कछुए की उम्र पता नहीं कितनी हो? क्या पता वह भी वरिष्ठ कछुआ हो। क्या पता उनके यहाँ भी सरकारी नौकरी का चलन हो। बात होती तो पता करते उनसे कि उनके यहाँ भी चुनाव-उनाव होते हैं क्या? उनके यहाँ भी पेंशन बंद हो गई है क्या? उनके यहाँ के नेता भी झूठ बोलने में उस्ताद हैं? उनके यहाँ भी कोई नॉन बायलॉजिकल कछुआ है क्या?
आगाती से कल्पती करीब पाँच किलोमीटर दूर है। करीब आधे घंटे में हम कल्पती पहुँच गए। सफेद बालू में कुछ पक्षी घूमते दिखे। वे शायद वहीं रहते होंगे। आपस में कहतें भी होंगे -'जब तक आदमी यहाँ रहने नहीं आते तब तक आराम से रह लो। उनके आने के बाद यहाँ रहना हराम हो जाएगा।'
हमसे पहले भी कई लोग नाव से वहां आये थे। घूम रहे थे। हम नाव से उतरकर द्वीप के अंदर घूमने लगे। अंदर जंगल के बीच पगडंडियाँ थीं। कुछ देर बाद फिर समुद्र। चारो तरफ़ समुद्र से घिरा है द्वीप। किसी तरफ़ से भी चलो, थोड़ी देर बाद समुद्र दर्शन होता है। हर तरफ़ लहरें इठलाते हुए कहतीं मिलतीं -
" अजी हमसे बचकर कहाँ जाइयेगा)
जहाँ जाइयेगा हमें पाइयेगा।"
जंगल में घुसते ही एक जगह कुछ लोग मछली भूनते दिखे। आपस की बातचीत से लग रहा था कि बंगाली हैं। तीन-चार मछलियाँ, जो शायद उन्होंने वहीं पकड़ीं थीं, भूनते हुए वे मजे से बतिया रहे थे। हमने उनका फ़ोटो लिए, वीडिया बनाया। वे तसल्ली से आपस में बतियाते हुए मछली भूनते रहे।
हमारे वहाँ घूमते हुए शाम हो गई थी। सूरज डूबने वाला था। विदा होते हुए सूरज भाई ख़ूबसूरत लग रहे थे। ट्रिक फ़ोटो के ज़रिए कुछ लोग सूरज को हाथ में लेते हुए फ़ोटो खिंचा रहे थे। हमारे साथ के लोगों ने भी कई जगह, अलग-अलग अंदाज में फोटो खिंचाये।
कुछ स्थानीय लोगों के साथ भी हमने फ़ोटो खिंचाए। उनमें से एक को फ़ोटो भेजे भी। फोटो भेजने के बाद उनसे बात भी हुई। स्थानीय जीवन के बारे में जानकारी भी मिली। उनमें से एक बालिका से अगले दिन लैगून बीच पर मुलाक़ात भी हुई। हमें तो याद नहीं था लेकिन उसने मिली-जुली भाषा में बताया -' हम मिले थे। कल्पती आई लैंड। आप फोटो सेंड।'
फोटो खिंचाते हुए, अपने-अपने हिसाब से , कल्पती को जितना देख सके देखा। बाकी दूसरों के देखने के लिए छोड़कर हम वापस आगती के लिए लौट लिए।
लौटते समय अंधेरा हो गया था। नीचे पानी नहीं दिख रहा था।न कोई मछली, न चट्टान, न कछुआ। उनके यहाँ भी शाम हो गई हो गई होगी। सब अपने-अपने घर लौट गए होंगे।
नाव के ग्लास को लकड़ी के पटरे से ढँक दिया गया था। जाते समय ग्लास के नीचे का पानी देखते हुए हम सोच रहे कि अगर कहीं यह काँच उखड़ जाये और समुद्र का पानी नाव में आ जाये तो नाव बचेगी कि डूबेगी। उस समय तो नहीं लेकिन अभी इसे लिखते समय मुझे रामनाथ अवस्थी जी कविता याद रही है :
वह जो नाव डूबनी है, मैं उसी को खे रहा हूं,
तुम्हें डूबने से पहले, एक भेद दे रहा हूं।
मेरे पास कुछ नहीं है, जो तुमसे मैं छिपाता।
मेरे पंख कट गये हैं,वरना मैं गगन को गाता।
यह लिखते हुये याद आया कि रमानाथजी एक बार हमारे घर रहे दो दिन तो उन्होंने बताया कि इसे सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी ने उनसे पूछा भी पूछा भी क्या ये पंक्तियां खासतौर से उनके लिये लिखीं गई हैं। बाद में उनकी सरकार गिर गई थी।
पूरा गीत आप टिप्पणी में दिए लिंक में पढ़ और सुन सकते हैं।
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