कल दीवापली मनाई गई।आज फेसबुक पर लोगों की जगर-मगर तस्वीरें देखकर लगता है सब जगह उजाला ही उजाला रहा दीवाली के दिन। नीरज की कविता -'लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी, निशा की गली में तिमिर राह भूले' वाली बात चरितार्थ हुई होगी।
लेकिन जब रात की गली में अँधेरे के रास्ता भूलने वाली बात लिखी थी तबसे दुनिया बहुत आगे आ गई है। अब अंधेरे के पास 'गूगल मैप' है। वह रास्ता नहीं भूलता। अपने गंतव्य तक बिना भटके पहुँच जाता है।
रोशनी के साथ पटाखे भी खूब छुड़ाये गए। उल्लास के अट्टहास जैसे इस कर्म के बारे में Pushp Ranjan जी ने लिखा :
"आज सुबह से चिड़ियों का चहचहाना नहीं सुना. कुत्ते भौंकते थे, उनकी भी आवाज़ नहीं सुनी.
कुछ पटाखों की आवाज़ बर्दाश्त नहीं कर पाये, प्राण-पखेरू उड़ गए. जो जीवित हैं, डरे-सहमें। इंसान क्यों, और किसलिए फ़िक्रमंद हो? दुनिया का सबसे स्वार्थी और खुदगर्ज़ जीव !"
इस पोस्ट (https://www.facebook.com/share/p/14N85kcDgFJ/ ) में सहमे हुए जीवों के चित्र देखकर लगता है कि दीपावली का त्योहार कमजोर दिन वाले जीवों के लिए कितना भयावह होता है।
सुबह कुछ देर तक फेसबुक पर टहलने के बाद सूचना देखी कि फेसबुक से कुछ पैसे मिलने की आशा है। करीब साढ़े चार डालर मतलब क़रीब 396 रुपए। विवरण देखा तो पता चला कि हमारी जन्मतिथि 16 सितंबर लिखी है। आधिकारिक विवरण में यह 20 अप्रैल दर्ज है। पैसे का मामला, सोचा ठीक कर देंगे विवरण। लेकिन अभी तक कर नहीं पाये। करेंगे।
फेसबुक में रिलेशनशिप वाले कॉलम में कुछ भरा नहीं था। हमने विवाहित भर दिया। हमें लगा फेसबुक इसे अपने रिकार्ड में रख लेगा। लेकिन थोड़ी देर बाद बगल में बैठी श्रीमती जी बताया ये शादी की सूचना आ रही है। हमें लगा फेसबुक बहुत बड़ा चुगलखोर है।
मित्रों ने मजे लेते हुए टिप्पणी की। कुछ ने कल शादी होने की बात पर और कुछ ने शादी की सालगिरह मानते हुए बधाई दी। कुछ ने इसे वीरता पूर्ण कार्य माना, कुछ लोगों ने इस मौके पर न बुलाने पर नाराज होने की प्यारी प्रतिक्रिया दी। सबके मजे लेते हुए हमने सूचना अपडेट की -'09 फ़रवरी, 1989 को विवाहित' लेकिन तब तक लोग मजे लेकर फूट चुके थे।
कल दीवाली के मौके हमने अपने नए कविता संग्रह ' अंधेरे का बड़प्पन' का प्रचार भी किया। व्हाट्सएप पर आई सभी शुभकामनाओं की जवाबी शुभकामनाएँ देते हुए इस किताब (ई बुक) का ख़रीद का लिंक भेजा। डेढ़ सौ से ऊपर के संदेश का जवाब दिया होगा। इस अभियान में कल से आज अभी तक कुल 13 लोगों ने किताब डाउनलोड की। कुल रॉयल्टी अभी तक 975 रुपए हो गई है। एक किताब और डाउनलोड होते ही रॉयल्टी चार अंकों में पहुंच जायेगी। इतनी कमाई दीपावली के दिन के लिए बहुत है।
https://www.facebook.com/share/p/1GBv5fYGTB/
कुछ मित्रों ने बताया कि उनके पैसे कट गए लेकिन किताब आई नहीं। वे लोग पोथी डॉट कॉम को लिखें, किताब उनके मेल में आयेगी। पढ़ें कविताएँ। मजे की गारंटी है। इस किताब को जल्दी ही हम किंडल में भी रखेंगे ताकि विदेश में रहने वाले मित्र, सहेलियाँ भी इसे डाउनलोड कर सकें।
इसके प्रिंट संस्करण में पेज ज़्यादा हो रहे हैं। इससे कीमत काफ़ी हो जाएगी। सोच रहे हैं कि 'अंधेरे का बड़प्पन' का प्रिंट संस्करण कैसे बनायें कि क़ीमत बहुत ज़्यादा न हो । देखेंगे।
इस बीच पढ़ना भी चल रहा है। पिछले दिनों बंगला लेख़क शंकर का प्रसिद्ध उपन्यास चौरंगी पढ़ना शुरू किया। रोचक उपन्यास। शाहजहाँ होटल के रोचक विवरण। 365 पेज में 100 पेज पढ़ लिए। इस हफ़्ते पूरी होनी चाहिए।
चौरंगी के चक्कर में दूसरी अधपढ़ी किताबें ठहर गयीं। महीनों से पढ़ी जा रही कैच -22 दो तिहाई पर रुकी है। एक अद्भुत उपन्यास जिसे अभी तक पूरा नहीं पढ़ पाये, को दुबारा नए सिरे से पढ़ना है। लेकिन पहले एक बार तो पढ़ लें।
अपनी धीरे पढ़ पाने की आदत के चलते उन मित्रों से रक्श होता है जो जल्दी-जल्दी किताबें पढ़कर उनके बारे में लिख भी लेते हैं।
इस बीच Jagadishwar Chaturvedi जी द्वारा सुझाई पिक्चर देखी Find me falling . बहुत अच्छी लगी। नेटफ्लिक्स पर मौजूद यह पिक्चर वाक़ई में देखने लायक।
इस समय के इस चक्कर में डुओलिंगों का रोज़ उलाहना भी सुनते हैं। अभ्यास के लिए रोज टोंकता है। स्पेनिश के कुछ शब्द सीख गए हैं। अभ्यास भी रोज़ कर ही लेते हैं। लेकिन लगता है कि इसे और गंभीरता से करना चाहिए।
इस बीच उर्दू का 'क़ायदा' सीख गए थे। लेकिन अभ्यास न होने के चलते सारा अलिफ़, बे , पे , ते से अबोला सा हो गया है। जल्द ही फिर अभ्यास करेंगे।
पिछले हफ़्ते लक्षद्वीप घूमने गए। उसके यात्रा संस्मरण अभी लिख रहे हैं। यहाँ घूमने पर एक नई दुनिया के अनुभव से रूबरू होना था। एक बार फिर लगा की हमको घूमना चाहिए।
इधर-उधर की ऐसी-वैसी बातें सोचते हुए यह सब लिख गए। अब जरा सोचते हैं कि उठें और नहा आयें। 'कट्टा कानपुरी' के शब्दों में कहें तो :
मन कर रहा कि अब उठे , फ़ौरन नहा के आ जाएँ
लेकिन सोचते हैं कि दौड़ के दूकान से दूध ले आएं।
बाहर बगीचे में फूल खिला है अपने पूरे जलवे से
मन किया निकालें कैमरा, फूल को कैद कर लाएं।
आइडिये उछल रहे हैं सबेरे से स्वयं सेवकों की तरह,
हल्ला मचा रहे हैं हमको लगाएं, पहले हमको लगाएं।
देश की चिंता भी करने को बहुत पड़ी है यार इकठ्ठा
चूक गए तो कहीं और कोई ' देश चिंता' न कर जाए।
(17.07.2016)
कट्टा कानपुरी की इसी तरह की फौरन समझ में आने वाली कवितायें पढ़ने के लिए टिप्पणी में दिए लिंक पर पहुंचकर ई बुक डाउनलोड करें -'अंधेरे का बड़प्पन'। इन कविताओं को पढ़ने के बाद आपको भी लगेगा -'अरे इससे बढ़िया तुकबंदी तो हम भी कर सकते हैं ।'
किताब न भी खरीदना हो तो लिंक पर जाकर प्रिव्यू देख सकते हैं। कुछ कविताएँ पढ़ सकते हैं। प्रिव्यू मुफ्त है।
फोटो लक्षद्वीप के अगाती द्वीप की

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