आप सभी मित्रों, सहेलियों को दीपावली की बधाई। मंगलाकामनायें।
दीपावली उजाले का त्योहार है। नीरज जी कविता 'जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाये' को याद करने का त्योहार है। नीरज जी की यह कविता कालजयी है। हमेशा याद की जायेगी।
दीपावली उजाले का त्योहार है। उजाले का महत्व तभी है जब तक अँधेरा है। अँधेरा ख़त्म होते ही उजाले का महत्व कम हो जाता है। अंधेरे-उजाले के धूप-छाँह वाले रिश्ते पर 'कट्टा कानपुरी' के भी कुछ शेर मुलाहिजा फ़रमायें:
जरा सा जुगनू भी चमकने लगता है अंधेरे में,
ये अंधेरे का बड़प्पन नहीं तो और क्या है जी!
उजाले ने रात भर अंधेरे की जमकर कुटम्मस की,
रोशनी थरथराती रही अंधेरे के बारे में सोचते हुये।
दीवाली पर अंधेरे के खिलाफ़ वारंट निकल गया,
वो दुबका रहा रात भर जलते दिये की आड़ में।
कम रोशनी ज्यादा से भन्नाई सी रहती है,
अंधेरों में आपस में कोई दुश्मनी नहीं हो्ती।
कल उजालों के गीत बहुत गाये गये!
इसी बहाने गरीब अंधेरे निपटाये गये।
अंधेरे ने रोशनी से जरा सी छेड़छाड़ की,
उजाले ने रपटा लिया उसे बहुत दूर तक!
असल में अंधेरे की अपनी कोई औकात नहीं होती,
इसकी पैदाइश तो उजालों में जूतालात से होती है।
(22.10.2014)
'कट्टा कानपुरी' का यह कलाम अनूप शुक्ल के हाल में ही प्रकाशित कविता संगह -'अंधेरे का बड़प्पन' में संकलित है। किताब अभी ई बुक फार्म में है। कीमत मात्र पचास रुपये है। मिठाई, पटाखे, खील बतासा खरीदते हुए इसे डाउनलोड करके पढ़ते रह सकते हैं। किताब खरीदने के लिए अपना ई मेल जरूर भरें ताकि किताब आपके ईमेल में आपको मिल सके।
'कट्टा कानपुरी की कवितायें' प्रकाशित करने के लिए उकसाने वालों में धीरू भइया (Dhirendra Raj Veer Singh ) सबसे प्रमुख हैं। वे बतायें कि उन्होंने अभी तक 'अंधेरे का बड़प्पन' डाउनलोड करें ।
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