सबेरे दूध लेने गए। धूप निकल आई थी। सूरज भाई दिख नहीं रहे थे। लेकिन सूरज की किरणें सड़क पर कालीन की तरह बिछी थीं। हमको लगा इधर कहीं से सूरज भाई निकलेंगे और हमको टिपियाते हुए कहेंगे- कहां टहल रहे हो सुबह-सुबह?
सड़क किनारे धूप की कालीन पर बैठा एक कुत्ता अपनी टांग से अपना कान खुजा रहा था। कान खुजाते हुए वह चकरघिन्नी की तरह सड़क पर घूमता भी जा रहा था। टांग के पंजे कान में तेजी से कंघी जैसे करने के बाद उसका घूमना बंद हो गया। कान खुजलाने के बाद उसके चेहरे पर परमानंद की आभा पसर गई।
दूध वाले की दुकान खुल गई थी। दूध लेने के बाद पास के ही एटीएम से पैसे निकालने गए। कार्ड घुसा ही नहीं। कई बार कोशिश करने के बाद लगा कि कुछ गड़बड़ है। बाहर निकलकर बगल की दुकान वाले से पता किया तो उसने बताया कि शाम से खराब है एटीएम। पास ही दूसरा एटम भी था। वहां से पैसे निकालने गए। चौकीदार ने बताया -' कौनौ
बदमाशी कीहिस होई। खराब हुईगा होई। आजकल कोहू का कौनौ भरोसा थोरी है।'( किसी ने बदमाशी की होगी।खराब हो गया होगा। आजकल किसी का कोई भरोसा थोड़ी है।)
दोपहर बाद मेट्रो में बगल में बैठे बुजुर्ग से बात हुई। शरीफ, सावधान, गंभीर बुजुर्गों की तरह छुटका बैग लटकाए हुए गंभीरता से बैठे हुए थे। चुप, शान्त। बतियाने के लिहाज से उनसे मैने कहा -' आपकी शर्ट का रंग अलग तरह का है। था काले और स्लेटी रंग को मिलाकर बना कोई रंग।' फिर तो रंग के बारे में कयास लगने लगे। लेकिन तय नहीं हुआ कि कौन सा रंग था उनकी कमीज की।
उन्होंने बताया कि उन्होंने खुद पसन्द किया है कमीज का रंग। यह भी बताया कि घर के लोगों के कपड़े भी वही खरीदते हैं।हमने पूछा इसका क्या मतलब है? उनकी पसंद पर घर वालों को भरोसा है या उनके आगे किसी की चलती नहीं?
इस पर उन्होंने बताया कि उनकी पसन्द पर घरवालों को भरोसा है। यह बड़ी बात लगी। मेरी तो कपड़ों की पसंद पर मुझे खुद इत्मीनान नहीं। इसीलिए कभी कोई सामान खरीदने का कोई झंझट नहीं।
पता चला कि वो बुजुर्ग बैंक से बारह साल पहले रिटायर हुए। बैंक ऑफ इंडिया ने मुलाजिम थे। मुंबई में छह साल नौकरी के अनुभव बताए। वहां जावरी बाजार इलाके की उनकी बेंच में अरबों रुपए का लेनदेन होता था। बातचीत करते हुए मेट्रो रुकी तो अचानक झटके से खड़े हो गए कहते हुए -' अरे मेरा स्टेशन आ गया। बातचीत करते हुए समय पता ही नहीं चला। '
हम कहने वाले थे कि हर यात्रा के साथ ऐसा होता है। लेकिन जब तक कहें तब तक वो उतर गए थे। मेट्रो चल दी थी थी। हमारा डायलॉग मारने का मौका निकल गया। डायलॉग मायूस हो गया। हमने उसको समझाया कोई बात नहीं बेटा। फिर मौका आयेगा। अभी याद आ गया तो लिख दिया। डायलॉग मुस्करा रहा होगा।
आज सुबह लखनऊ से बंगलौर आए। लखनऊ से बंगलौर आते हुए जेन जी पीढ़ी की बालिकाओं से बात करते हुए आए। एहसास हुआ कि पीढ़ी के अंतर के हिसाब से अनुभव के कारण सोच में अंतर के बावजूद तमाम मानव मूल्य सभी पीढ़ियों के लिए एक जैसे होते हैं।
बंगलौर पहुंचकर लपकते हुए लाउंज में नाश्ता किया। दो रुपए में जितना नाश्ता किया उतने के दम एयरपोर्ट पर दो हजार से कम क्या होंगे।
अब बंगलौर से आगे लक्षद्वीप के लिए बोर्डिंग करते हुए यह पोस्ट लिख रहे हैं। आगे के किस्से लक्षद्वीप से। आप मजे करिए। जो होगा देखा जाएगा।
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