Wednesday, October 22, 2025

लक्षद्वीप में कायकिंग मतलब डोंगीबाज़ी



 लक्षद्वीप प्रवास के दूसरे दिन स्कूबा डाइविंग सभी के लिए अद्भुत अनुभव रहा। जिन लोगों ने पहली बार किया उनके तो कहने ही क्या? लौटने के बाद देर तक हम लोग उन्हीं अनुभवों में डूबे रहे। उनके ही बारे में बातें करते रहे।

दोपहर का खाना खाने के बाद तय हुआ कि शाम को कायकिंग की जायेगी।
कायकिंग मतलब डोंगीबाजी। कायक एक छोटी नाव होती है। जिसमें बैठकर दोनों तरफ़ ब्लेड वाले चप्पू से इसे चलाया जाता है। एक बार दायीं तरफ़ पानी ठेलना होता है , दूसरी बार बायीं तरफ़ से। डोंगी आगे बढ़ती जाती है। आमतौर पर कायकिंग शांत पानी में, झील में या कम पानी वाली जगहों पर की जाती है। तरह-तरह के आकार की डोंगियाँ होती हैं। उसी के अनुसार इनके नाम होते हैं।
लक्षद्वीप में मौजूद कायक दो प्रकार के थे। एक वो जिनमें दो लोग बैठ सकते थे। दूसरे वो जो अकेले के लिए थे। लोग अपने-अपने साथ के लोगों के साथ कायकिंग करते हुए आनंदित होते रहे। फोटो खिंचाते रहे।
बैठने का तरीका इस तरह होता है कि शरीर का गुरुत्वकेंद्र इस तरह रहे कि संतुलन बना रहे। टांगे फैलाकर बैठना होता है। टांगे फैलाकर बैठना भी कठिन काम है। इस कोशिश में अपन कई बार लम्बलेट होते रहे। लगा बैठने से बेहतर है लेटकर डोंगी चलाना।
कायक संख्या में कम थीं। इस चक्कर में हमारे हिस्से वो डोंगी आयी जिसमें सिर्फ़ एक व्यक्ति के बैठने का जुगाड़ था। हम बैठ गए संभलते हुए। धीरे-धीरे हाथ में लिए दुतरफ़ा चप्पू से नाव खेते रहे। थोड़ी देर में अभ्यास हो गया। अंदाज़ हो गया कि पानी को किधर धकेलने से नाव किधर जायेगी। तट के पास ही कई गोल चक्कर लगाते रहे। हालांकि सेफ्टी जैकेट पहने थे और लोग भी पास ही थे लेकिन मन में यह एहसास था कि तैरना नहीं आता है। इस एहसास ने दूर तक जाने से रोका।
पानी में नाव चलाते हुए हमने कभी सुनी हुई प्रार्थना की याद की :
"बजरंग बली मेरी नाव चली
जरा बल्ली कृपा की लगा देना।"
हमारे कई साथी दूर-दूर तक गए कायकिंग करते हुए। लेकिन वो भी उतनी ही दूर कि सबकी निगाह में रहें।
पंद्रह-बीस मिनट चप्पू चलाते हुए, डोंगीबाज़ी करने के बाद, अपन किनारे आ गए। सीधे बैठे-बैठे पैर अकड़ से गए थे। लगा कि घंटों कायकिंग करने वाले कैसे बैठे रहते होंगे।
नाव से उतरने के बाद समुद्र के भीतर ही रखे चौकोर आकार के सीमेंट के बने खोखले ढाँचों पर बैठ गए। बैठ क्या गए धँस गए। समुद्र में रखी चौकोर छेद वाली कुर्सी की तरह रखी थीं ये समुद्र के पानी के अंदर ये सीमेंट की बनी बिना पावों वाली कुर्सियाँ। शायद आसपास की इमारतों के बनते समय रखी गयीं हों । यह भी हो सकता है कि सुरक्षा के लिहाज से बनाकर डाली गयीं हों पानी में।
उन सीमेंट के बिना पाये वाले ढांचों को कुर्सियाँ कहना ठीक नहीं होगा। ये समझिए कि वे सीमेंट के पाटे थे जिनमें नीचे चौकोर छेद बने थे।
उन सीमेंट के पाटों पर बैठे हुए लगा कि पानी में बने किसी सिंहासन पर बैठे हैं। सिंहासन पर बैठने का मतलब सत्ता प्रमुख होना। उस ढाँचे पर बैठने में शरीर के नीचे का भार तो स्थिर था लेकिन शरीर के ऊपर के हिस्से को पानी की लहरें लगातार हिला-दुला रहीं थीं। शरीर नारियल के पेड़ की तरह हो गया। एक लहर दायीं तरफ़ धकियाती, दूसरी बायीं तरफ़। हर लहर उलाहना सा भी देती लगती -' यहाँ बैठे कुर्सी तोड़ रहे हो। निठल्ले बैठने में शर्म नहीं आती।'
किसी लोकतंत्र में उठी कोई भी आवाज सत्ता को हिला देने वाली लगती है। हमारी तरफ़ आती हर लहर हमको ऐसी लगती मानो वो हमको हमारी जगह से उखाड़ फेंकना चाहती थी। थोड़ी देर तक तो हम थोड़ा सकपकाये लेकिन फिर लहरों के थपेड़ों और उलाहनों का अभ्यास हो गया। हम उनके आदी हो गए।'लहर शर्म' ख़त्म होते ही हम आनंदित होते हुए उनका मजा लेते रहे।
सीमेंट के उन ढाँचों में काई और सेवार लगी थी। हल्का खींचते ही उखड़ कर हाथ में आ जाती। हम लहरों के आने-जाने के खेल को खेलने के साथ-साथ सीमेंट के खाँचों में जमी काई और सेवार को उखाड़कर पानी में डालते रहे। बैठे से बेगार भली वाले इस काम में समुद्र की काई समुद्र को ही समर्पित करते रहे।
हमारे साथ हमारे साथी बलबंत गुप्त जी भी सीमेंट की कुसियों पर जमे हुए समुद्र के पानी, लहरों और डूबते हुए सूरज की सुंदरता को देखते रहे। आनंदित होते रहे। काफ़ी देर 'जल बैठकी' के बाद हम लोग किनारे आए। कमरों में जाकर कपड़े बदले। दिन में दो बार समुद्र के पानी में रहने का एहसास देर तक बना रहा।
अभी भी मन वहीं के पाने में डूबा हुआ है। स्कूबा डाइविंग के और कायकिंग की यादें ताजा हो रही हैं। आप भी देखिए फोटो। वीडियो।
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