Friday, October 24, 2025

चाय पियो कुल्हड़ खाओ



लेखराज मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों से नीचे देखने पर एक दुकान का बोर्ड दिखा। बोर्ड पर लिखा था -"चाय पियो कुल्हड़ खाओ।"
सीढ़ियों पर खड़े-खड़े दुकान की फोटो ली। सोचा कभी यहाँ चाय पीकर कुल्हड़ खाया जाएगा।
उसके बाद कई बार लेखराज मेट्रो स्टेशन से गुजरे। लेकिन वहां रुककर चाय पीने का समय नहीं मिला। सुबह सोचते-' शाम को आयेंगे।' शाम को सोचते -'देर हो गई, अब कल देखेंगे।'
इस बीच सोचते रहे कि यहाँ चाय के कुल्हड़ आइसक्रीम कोन के तरह होंगे जिनको आइसक्रीम के साथ-साथ खाते जाते हैं। लेकिन कौतूहल बना रहा।
कल शाम को घर लौटते हुए लेखराज मेट्रो स्टेशन आया तो उतर ही पड़े। सीढ़ियों से उतरकर चाय की दुकान की तरफ़ गए। बाहर बैठे हुए कुछ लोग चाय पी रहे थे। काउंटर पर कुछ चाय के कुल्हड़ (मिट्टी के) और कुछ कागज के कप रखे थे। चाय वाला चाय बना रहा था। ग्राहकों को दे रहा था।
हमने काउंटर पर खड़े लड़के से पूछा -"ये खाने वाला कुल्हड़ कैसा होता है भाई? पिलाओ हमको भी चाय। खिलाओ कुल्हड़।"
"अरे वो सब ऐसे ही बेवकूफ बनाने के लिए लिखा है" काउंटर पर खड़े लड़के ने ग्राहक को चाय देते हुए कहा।
हमने कहा -"लेकिन ये लिखा किस लिए है? खाने वाला कुल्हड़ कौन सा होता है?"
फिर उसने बताया कि आइसक्रीम वाला मोटा कोन ही होता है खाने वाला कुल्हड़। मोटा कुल्हड़ होता है। फैजाबाद से आता है। जल्दी ख़राब हो जाता है इसलिए मंगवाते नहीं। कम मात्रा में देते नहीं वो लोग। कम से कम 500 का आर्डर होता है एक बार में। उतने की खपत नहीं होती इसलिए मंगाते नहीं। कभी-कभी मंगाते हैं।
"लेकिन फिर लिखे काहे हो ये खाने वाले कुल्हड़ की बात?"- हमने पूछा।
उसने कहा -"अरे ऐसे ही लिख दिया। लिखा है तो चल रहा है।" वैसे कुछ लोग मिट्टी के कुल्हड़ को खाते हैं। आदत होती है उनको मिट्टी खाने की।
कहना तो हम यह भी चाहते थे इस तरह बेवक़ूफ़ बनाकर चाय बेचना अच्छी बात नहीं है। लेकिन कहे नहीं यह सोचकर कि कहीं बुरा मान गया तो गड़बड़ होगी। आजकल सच बात का लोग बुरा बहुत जल्दी मान जाते हैं।
हमने मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पी। दाम पंद्रह रुपये। काग़ज़ के कप में चाय के दाम दस रुपये हैं। कभी-कभी मिलने वाली खाने वाले कुल्हड़ की चाय के दाम बीस रुपये हैं।
जिस बेतकुल्लफ़ी और आत्मविश्वास से चाय वाले ने कहा -"अरे वो सब ऐसे ही बेवकूफ बनाने के लिए लिखा है" उससे मुझे रागदरबारी के मुन्नू बेईमान के भतीजे की याद आ गई। मास्टर मोतीराम के पूछने पर , तुम उस मुन्नू बेईमान के भतीजे तो नहीं हो ?, लापरवाही से कहा था -"और नहीं तो क्या?। (संबंधित अंश टिप्पणी में)
रागदरबारी से जमाना पचपन साल आगे बढ़ गया है। उस समय अपने बेईमान होने वाली बात पूछने पर बताने का चलन था। आज के समय में बताकर बेवकूफ बनाने का चलन है। तमाम योजनाएँ घोषित होती हैं, उनका हल्ला मचता है। बाद में उनके बारे में पूछने पर बताया जाता है -"वो तो जुमला था। ऐसे ही बेवकूफ बनाने के लिए बोला था।"
लोग बेवकूफ बन रहे हैं। बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य अद्भुत होता है।

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