Monday, October 27, 2025

लक्षद्वीप के निर्जन द्वीप कल्पती की सैर




 लक्षद्वीप का मतलब एक लाख द्वीप वाला समूह होता है। लेकिन वास्तव में यहाँ केवल 36 द्वीप हैं। इनमें भी केवल दस में लोग रहते हैं। बाकी 26 द्वीप निर्जन हैं। यहाँ कोई नहीं रहता।

जिन द्वीपों में लोग रहते हैं उनमें सबसे कम आबादी (2011 के अनुसार) बित्रा (Bitra) द्वीप में (271) और सबसे अधिक कावरत्ती (11221) की है। कावरत्ती लक्षद्वीप की राजधानी है। 2011 के सेंसेक्स के अनुसार लक्षद्वीप की कुल आबादी 65473 है। अब एक लाख हो गई होगी। इतनी आबादी तो दिल्ली, नोयडा के एक मोहल्ले/सेक्टर की होगी।
'बनाना बोट राइड' के बाद शाम को हम लोग पास का निर्जन द्वीप कल्पती (Kalpati) देखने गए। छुटका सा द्वीप है कल्पती। कुल क्षेत्रफल 0.085 वर्ग किलोमीटर। मतलब वर्गाकार हिसाब से देखें तो क़रीब 300 मीटर लम्बा, 300 मीटर चौड़ा द्वीप। कोई रहता नहीं वहाँ पर। इतनी ज़मीन नोयडा में पहुँच जाये तो अरबों के कीमत के सैकड़ों फ्लैट बन जायें।
शाम की चाय पीने के बाद हम कल्पती के लिए निकले। यह यात्रा 'ग्लास बोट राइड' के नाम से दर्ज थी टूर में। पता नहीं था कि क्या होती है 'ग्लास बोट राइड।' जब चले नाव में बैठकर कल्पती के लिए तब भी यही पता था कि निर्जन द्वीप जा रहे हैं। लेकिन जब चले नाव में बैठे तो उसकी तली में लगे शीशे से नीचे समुद्र दिखा। तब पता चला कि यही ग्लास बोट है। ग्लास बोट माने वह नाव जिसके नीचे काँच लगा हो ताकि हम उससे नीचे समुद्र के पानी का नजारा देख सकें।
समुद्र का पानी बहुत साफ़ था। काँच के नीचे कहीं-कहीं सतह की बालू तक दिख रही थी। बीच-बीच में समुद्र के अंदर मछलियाँ, शैवाल और चट्टाने भी दिख रहीं थीं। कोई रंगबिरंगी मछली दिखती तो हम लपककर उसको देखने से अधिक उसकी फ़ोटो लेने की कोशिश करते रहे। इंसानी फ़ितरत है यह। कोई चीज खूबसूरत दिखे तो उसको देखने की बजाय फौरन उसको अपने कैमरे के कब्जे में कर लो।
पानी में कई जगह कछुए भी दिखे। बड़े-बड़े कछुए। कभी नाव के बगल से निकलते दिखते। कभी नाव के नीचे के कांच से दिखते। कई बार फ़ोटो लिए वीडियो बनाए हमने।आधे-अधूरे। आधे-अधूरे लिखते हुए मोहन राकेश जी का लिखा हुआ नाटक 'आधे-अधूरे' याद आ गया।
कछुओं की उमर दस - बीस साल से लेकर 150 साल तक हो सकती है। हमको दिखने वाले कछुए की उम्र पता नहीं कितनी हो? क्या पता वह भी वरिष्ठ कछुआ हो। क्या पता उनके यहाँ भी सरकारी नौकरी का चलन हो। बात होती तो पता करते उनसे कि उनके यहाँ भी चुनाव-उनाव होते हैं क्या? उनके यहाँ भी पेंशन बंद हो गई है क्या? उनके यहाँ के नेता भी झूठ बोलने में उस्ताद हैं? उनके यहाँ भी कोई नॉन बायलॉजिकल कछुआ है क्या?
आगाती से कल्पती करीब पाँच किलोमीटर दूर है। करीब आधे घंटे में हम कल्पती पहुँच गए। सफेद बालू में कुछ पक्षी घूमते दिखे। वे शायद वहीं रहते होंगे। आपस में कहतें भी होंगे -'जब तक आदमी यहाँ रहने नहीं आते तब तक आराम से रह लो। उनके आने के बाद यहाँ रहना हराम हो जाएगा।'
हमसे पहले भी कई लोग नाव से वहां आये थे। घूम रहे थे। हम नाव से उतरकर द्वीप के अंदर घूमने लगे। अंदर जंगल के बीच पगडंडियाँ थीं। कुछ देर बाद फिर समुद्र। चारो तरफ़ समुद्र से घिरा है द्वीप। किसी तरफ़ से भी चलो, थोड़ी देर बाद समुद्र दर्शन होता है। हर तरफ़ लहरें इठलाते हुए कहतीं मिलतीं -
" अजी हमसे बचकर कहाँ जाइयेगा)
जहाँ जाइयेगा हमें पाइयेगा।"
जंगल में घुसते ही एक जगह कुछ लोग मछली भूनते दिखे। आपस की बातचीत से लग रहा था कि बंगाली हैं। तीन-चार मछलियाँ, जो शायद उन्होंने वहीं पकड़ीं थीं, भूनते हुए वे मजे से बतिया रहे थे। हमने उनका फ़ोटो लिए, वीडिया बनाया। वे तसल्ली से आपस में बतियाते हुए मछली भूनते रहे।
हमारे वहाँ घूमते हुए शाम हो गई थी। सूरज डूबने वाला था। विदा होते हुए सूरज भाई ख़ूबसूरत लग रहे थे। ट्रिक फ़ोटो के ज़रिए कुछ लोग सूरज को हाथ में लेते हुए फ़ोटो खिंचा रहे थे। हमारे साथ के लोगों ने भी कई जगह, अलग-अलग अंदाज में फोटो खिंचाये।
कुछ स्थानीय लोगों के साथ भी हमने फ़ोटो खिंचाए। उनमें से एक को फ़ोटो भेजे भी। फोटो भेजने के बाद उनसे बात भी हुई। स्थानीय जीवन के बारे में जानकारी भी मिली। उनमें से एक बालिका से अगले दिन लैगून बीच पर मुलाक़ात भी हुई। हमें तो याद नहीं था लेकिन उसने मिली-जुली भाषा में बताया -' हम मिले थे। कल्पती आई लैंड। आप फोटो सेंड।'
फोटो खिंचाते हुए, अपने-अपने हिसाब से , कल्पती को जितना देख सके देखा। बाकी दूसरों के देखने के लिए छोड़कर हम वापस आगती के लिए लौट लिए।
लौटते समय अंधेरा हो गया था। नीचे पानी नहीं दिख रहा था।न कोई मछली, न चट्टान, न कछुआ। उनके यहाँ भी शाम हो गई हो गई होगी। सब अपने-अपने घर लौट गए होंगे।
नाव के ग्लास को लकड़ी के पटरे से ढँक दिया गया था। जाते समय ग्लास के नीचे का पानी देखते हुए हम सोच रहे कि अगर कहीं यह काँच उखड़ जाये और समुद्र का पानी नाव में आ जाये तो नाव बचेगी कि डूबेगी। उस समय तो नहीं लेकिन अभी इसे लिखते समय मुझे रामनाथ अवस्थी जी कविता याद रही है :
वह जो नाव डूबनी है, मैं उसी को खे रहा हूं,
तुम्हें डूबने से पहले, एक भेद दे रहा हूं।
मेरे पास कुछ नहीं है, जो तुमसे मैं छिपाता।
मेरे पंख कट गये हैं,वरना मैं गगन को गाता।
यह लिखते हुये याद आया कि रमानाथजी एक बार हमारे घर रहे दो दिन तो उन्होंने बताया कि इसे सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी ने उनसे पूछा भी पूछा भी क्या ये पंक्तियां खासतौर से उनके लिये लिखीं गई हैं। बाद में उनकी सरकार गिर गई थी।
पूरा गीत आप टिप्पणी में दिए लिंक में पढ़ और सुन सकते हैं।
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