लक्षद्वीप ट्रिप के दूसरे दिन हम लोग स्कूबा डाइविंग करने गए।
स्कूबा डाइविंग के बारे यही सुना था कि पानी के नीचे तैरने से संबंधित है। इससे ज्यादा जानकारी नहीं थी। लक्षद्वीप में स्कूबा करना है की बात चली तो हमने कहा -'हमको तैरना तो आता नहीं है।'
'स्कूबा के लिए तैरना आना जरूरी नहीं है। साथ में इंस्ट्रक्टर रहेगा। वह सब बताता जाएगा, कराता जाएगा।' हमको बताया गया।
हमने सोचा कि पानी के नीचे जाने का यह कौन सा खेल है जिसमें तैरना जानना जरूरी नहीं है। कई बार कन्फ़र्म किया -'सही में बिना तैराकी जाने स्कूबा किया जा सकता है।'
स्कूबा के लिए तैयार होते लोगों से अनन्य पूछ रहा था -'कैसा लग रहा है। डर तो नहीं लग रहा है? '
हमसे भी पूछा तो हमने कहा -'बहुत अच्छा लग रहा है। डरने की कोई बात नहीं। वो वसीम बरेलवी का शेर है न :
मैं इस उम्मीद में डूबा कि वो बचा लेगा,
अब इसके बाद मेरा इम्तहान क्या लेगा?'
स्कूबा के लिए जाने के पहले जानकारी दी गई। बताया गया कि पानी में मुँह से साँस लेनी है। नीचे जाने के लिए अँगूठे को नीचे दिखाना है। कोई समस्या होने पर 'थम्प्स अप' का संकेत करना है। मुँह में नमकीन पानी आ जाने पर बाहर कैसे थूकना है या बटन दबाकर कैसे निकालना है। कान पर दबाब आने पर कैसे नाक दबाकर दबाब कम करना है। सबसे जरूरी बात कि पैनिक नहीं होना है। आराम से साँस लेनी है। घबराना नहीं है।
ज़मीन पर थम्प्स अप का संकेत किसी उपलब्धि के समय किया जाता है। पानी में थम्प्स अप का मतलब 'कोई समस्या' है। जगह बदलने पर चीजों के मायने कैसे बदल जाते हैं इसका फिर से एहसास हुआ।
अम्माती स्कूबा डाइविंग स्कूबा कराने के लिए अधिकृत संस्था है। अकेले स्कूबा करने के लिए पर्याप्त अनुभव प्रमाणपत्र चाहिए होता है। स्कूबा कराने के लिए भी ट्रेनिग, कोर्स जरूरी होता है।
स्कूबा के लिए जाने के पहले सबसे फ़ार्म भराये गए। दिल की बीमारी की जानकारी ली गई। बीपी वालों ने लिखा -'बीपी है लेकिन दवाई से कंट्रोल में है।'
स्कूबा भी कई तरह की होती है। कम गहराई वाली (पानी में 4 मीटर नीचे) स्कूबा, अधिक गहराई (पानी में 12 मीटर नीचे) वाली स्कूबा। दोनों के लिए जगहें अलग होती हैं। दोनों की फीस अलग-अलग। चार मीटर तक के रेट चार हज़ार प्रति व्यक्ति थे। 12 मीटर वाले के पाँच हज़ार। मोलभाव करके कुछ कम कराये गए गए रेट लेकिन इस शर्त पर कि किसी को बताना नहीं है। इसलिए हम बता नहीं रहे।
सबको स्कूबा की जानकारी देने के बाद स्टीमर में बैठाकर हम लोगों को स्कूबा वाली जगह पर ले जाया गया। स्कूबा गाइड केवल दो थे इसलिए एक बार में दो-दो करके लोग स्कूबा करने गए। महिला साथियों ने पहले लाइफ़ जैकेट और स्कूबा गैजेट पहने। सबसे पहले पानी में उतरने वाली साथी किरण शुक्ला थीं।
पानी में उतारने के बाद कुछ देर पानी में 'सहज कराने के बाद' नीचे ले जाते थे स्कूबा कराने वाले। नीचे से आने पर सबने यही कहा -'अद्भुत अनुभव रहा। मेरा तो मन ही नहीं कर रहा था ऊपर आने का।'
हमारी बारी आने पर हम भी गए पानी में। हम भूल गए कि हमको तैरना नहीं आता। एकाध मिनट ऊपर रखने के बाद हमको घसीट के पानी के नीचे ले गया स्कूबा गाइड। नीचे जाते हुए कानों में थोड़ा दबाब महसूस हुआ। लेकिन हमने नाक दबाकर दबाब को बाहर कर दिया।
नीचे पानी में रंगबिरंगी मछलियाँ दिखाने लगीं। इतनी रंगबिरंगी मढ़लियों इतने नज़दीक से देखने की कभी कल्पना भी नहीं की थी मैंने। मछलियाँ मेरे अगल-बगल से इठलाती हुए, तैरती हुई निकल रहीं थीं। आमने-सामने, अगल-बगल , दायें-बायें, ऊपर-नीचे सब तरफ़ मछलियाँ ही मछलियाँ। पानी के नीचे का सारा इलाका रैंप जैसा लग रहा था जिसपर 'जलपरियाँ' इठलाती हुई 'कैट वॉक' (फिस वॉक) कर रहीं थीं।
बीच -बीच में ऐसा लगा कि पाँवों में कोई चिकोटी काट कर गया है। पता चला कि कोई मछलियाँ हमको छेड़ रहीं थीं। हमने सोचा कि बड़ी शैतान हैं मछलियाँ भी। पानी में आए अनजान इंसान से छेड़खानी कर रहीं हैं। सोचा कि इनका कोई थाना हो पास में तो वहाँ उनके ख़िलाफ़ शिकायत करा दें। मेरी यह सोच शायद मछलियों ने पढ़ ली थी और वे सारी की सारी मुस्कराती हुई हमको देखती लगीं।
स्कूबा गाइड बार-बार 'सब ठीक है?' का निशान बनाते हुए पूछ रहा था कि कोई समस्या तो नहीं? हम 'आल इज वेल ' का निशान बनाते हुए और नीचे ले चलने का संकेत कर रहे थे। नीचे जाने के बाद एक जगह सतह पर सीपी दिखी। हमने नीचे झुककर उसे उठा लिए। पहले मुट्ठी में पकड़े रहे। फिर अंदर कपड़ों में सहेज लिया। एक मुट्ठी बालू भी जेब में भर ली।
सामने एक फ़ोटोग्राफ़र भी दिखा। वह हमसे इशारेबाजी करते हुए हमारे फ़ोटो ले रहा था, वीडियो बना रहा था। हमने सोचा कि शायद कोई दूसरा स्कूबा वाला है। बाद में पता चला कि यह स्कूबा टीम के लोग हैं। हमारे साथ आए दूसरे साथियों की फ़ोटोग्राफी भी वही कर रहा था।
एक जगह रंगीन मछलियाँ और उनके पास सेंवई बराबर मोटाई के रंगीन गुच्छे लहराते दिखे। हाथ से छूने पर लसलसे से लगे। छूते ही शरमाकर दूर हट गए। पानी में रंगीन , चिकनी, लसलसी, लहराती , झूमती झाड़ियों जैसी जगहें रंगबिरंगी मछलियों का घर था। हर रेशे से कोई मछली बाहर आती, दूसरे से अंदर घुस जाती। अद्भुत सुंदर दृश्य।
पानी में रहते हुए देखें गए दृश्यों को देखते याद करने की कोशिश करते रहे कि बाद में इनको लिखेंगे। लेकिन सारे दृश्य गड्ड-मड्ड होकर एक ख़ूबसूरत याद में बदल गए हैं। सिर्फ़ इतना याद है कि ऐसी ख़ूबसूरती जीवन में पहली बार देखी। पानी के नीचे की दुनिया इसके पहले फ़ोटो, वीडियो में देखते आए थे। लेकिन सच में कितनी खबसूरत है पानी के नीचे की दुनिया यह ख़ुद से पहली बार देखी।
वहीं पानी के नीचे तय किया कि सबसे पहले मौके पर तैरना सीखना है।
काफ़ी देर तक नीचे रहने के बाद जब भी गाइड पूछता हम इशारा करते और नीचे ले चलो। लेकिन बेचारा ज़मीन खोदकर और नीचे कहाँ ले जाता? करीब आधे घंटे बाद वह धीरे-धीरे करके हमको ऊपर ले आया। सब लोगों ने तालियाँ बजाकर हमारा स्वागत किया। हम स्टीमर पर आकर पानी के नीचे देखी खूबसूरती को याद करते हुए समन्दर को देखते रहे।
हमने साथ में लाइए सफेद सीप दिखाई तो उसे देखकर किरन शुक्ला जी ने कहा -'भाई साहब ये हमको दे दीजिए।' हमने सीप के मोह में पड़ने के पहले उसको अनन्य को दे दिया। अनन्य ने स्कूबा डाइविंग के दौरान मिली सीप ट्रिप लीडर के रूप में किरण जी को सौंप दी। इस हस्तांरण का फ़ॉट तो मैंने ले लिए लेकिन इसके बाद जो खुशी किरन जी ने जाहिर की उसका फोटो/वीडियो किसी ने नहीं लिया। उसको केवल वही लोग महसूस कर सकते हैं जो उस वक्त वहाँ पर थे।
स्कूबा डाइव के बाद सभी ने अपने-अपने अनुभव साझा किये। ज्यादातर लोगों के लिए यह पहला अनुभव था। जिन लोगों ने पहले भी कर रखा था उन्होंने भी इस अनुभव को अद्भुत, अविस्मरणीय बताया।
लक्षद्वीप में किया स्कूबा डाइविंग का अनुभव अद्भुत और अविस्मरणीय तो सबके लिए रहा लेकिन सबसे ज़्यादा यादगार शायद शैल सिंह के लिए रहा। शैल सिंह तैराकी अच्छी जानती हैं। स्कूबा के लिए बहुत उत्साहित थीं। लेकिन पानी में उतरने के कुछ देर बाद उनको लगा कि कोई समस्या होगी तो क्या होगा? यह सोचते ही उनको परेशानी महसूस हुई और वे बार-बार पानी से बाहर आने के लिए कहने लगीं। उनके गाइड ने भी और बाहर स्टीमर में बैठे लोगों ने उनसे हिम्मत करने ले लिए कहा लेकिन वे बार-बार ' हमसे नहीं हो पायेगा, हम नहीं करेंगे' कहते हुए बाहर आने को कहने लगीं। गाइड उनको बाहर ले आया।
शैल जी बाहर स्टीमर में बैठी लोगों की उत्साह दिलाने वाली बातें सुनते हुए चुप बैठीं रहीं। जो वे सोच रहीं होंगी यह तो वही बता सकतीं है लेकिन जब सब स्कूबा कर चुके तो उन्होंने दुबारा लाइफ़ जैकेट पहने, मुँह में सांस लेने का उपकरण लगाया, आँख और नाक ढकने कवर पहना और देखते-देखते पानी में गाइड के साथ उतर गयीं।
लौट के आईं शैल जी तो उनके चेहरे से स्कूबा डाइव के अद्भुत, अविस्मरणीय अनुभव के साथ -'हमने भी कर लिए, हम भी कर कर सकते हैं' की अतिरिक्त ख़ुशी चमक रही थी। एक के साथ एक फ्री वाली यह खुशी उनको ताजिंदगी याद रहेगी। हमको भी उनका यह उदाहरण याद रहेगा। वे शायद पानी में सबसे देर तक रहीं। सबसे ज्यादा खुश भी दिखती रहीं।
जिस दौरान लोग स्कूबा डाइव कर रहे थे उस समय तैरना जानने वाले लोग पानी में तैर रहे थे। अनन्य तैरने के साथ डाइव भी लगा रहे थे। मीनल रस्तोगी जी को पानी में तैरते देखकर तमाम मछलियाँ नीचे से आकर उनके साथ तैरने लगीं। मीनल जी और मछलियों को तैरते देखकर लग रहा था स्कूल के दिनों की सहेलियाँ बहुत दिन बाद मिलने के बाद 'जल डांस' कर रहीं हों।
सब लोगों के स्कूबा डाइव करने के बाद हम लोग स्टीमर में मस्ती करते हुए वापस लौटे। यह अपने में एक ऐसा अनुभव था जिसे हम भूलना भी चाहें तो नहीं भूल सकते। हमको बंगलौर से आगाती आते हुए मिली महिला सहयात्री की याद आई जो कह रही थी कि वह स्कूबा डाइव के लिए लक्षद्वीप जा रही थी। उस समय मुझे लगा था कि ऐसा क्या है स्कूबा में जो यह सिर्फ़ स्कूबा के लिए जा रही है।
लेकिन पानी के नीचे की खूबसूरती देखने के बाद पता चला कि स्कूबा डाइव का अनुभव क्या होता है। अद्भुत, अविस्मरणीय अनुभव।
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