Friday, October 31, 2025

"मज़े मज़े में धारदार व्यंग्य"-अरविंद तिवारी




 [ वरिष्ठ व्यंग्यकार और गीतकार Arvind Tiwari अरविंद तिवारी जी मेरे लेखन पर हमेशा प्रोत्साहित करने वाली टिप्पणियां करते रहते हैं। मेरे लेखन के 'नैसर्गिक व्यंग्य दृष्टि' होने की बात कहते रहे हैं। अरविंद तिवारी जी ने मेरे कविता संकलन "अंधेरे का बड़प्पन" को पढ़कर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी भेजी है। यह मेरे लिए उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणी है। आप भी पढ़िए इसे। कविता संग्रह डाउनलोड करने का लिंक टिप्पणी में दिया गया है। विदेश में रहने वाले मित्र इसे किंडल पर पढ़ सकते हैं। किताब का प्रिव्यू मुफ्त में पढ़ सकते हैं। ]

अनूप शुक्ल ब्लॉग की दुनिया में जाना पहचाना नाम है।उनके पास व्यंग्य दृष्टि है इसलिए उनका लिखा रोचक होता है।वह मूलतः व्यंग्यकार हैं।उनके वृतांत व्यंग्य शैली में होते हैं।उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से वह पुरस्कृत भी हैं।उन्होंने "कट्टा कानपुरी" नाम से व्यंग्य क्षणिकाएं लिखीं हैं।उनके अनुसार यह लेखन मज़े मज़े में किया है। यहां मज़े से आशय व्यंग्य करने से है।इन क्षणिकाओं का संकलन आया है "अंधेरे का बड़प्पन"।यह शीर्षक चर्चित व्यंग्यकार आलोक पुराणिक Alok Puranik ने दिया है।यह संकलन अनूप जी ने सेल्फ पब्लिशिंग द्वारा ('ई बुक') से प्रकाशित किया है।कीमत पचास रुपए मात्र है।
व्यंग्य क्षणिकाएं हालांकि बहुत पहले से लिखी जाती रहीं हैं पर अज्ञेय के ज़माने से इनका लेखन बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। हम उनकी, 'सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं...' कविता को व्यंग्य क्षणिका ही मानेंगे।धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान और कादम्बिनी जैसी अनेक पत्रिकाओं ने इन क्षणिकाओं को खाद पानी देने का काम किया था।सरोजनी प्रीतम,मिश्रीलाल जायसवाल और दिनकर सोनवलकर जैसे अनेक कवियों ने इस विधा को ऊंचाइयों तक पहुंचाया।आज भी क्षणिकाएं बहुत लोकप्रिय हैं।
अनूप शुक्ल अपनी इन क्षणिकाओं के लिए खाद पानी अपने परिवेश से लेते हैं।उनका व्यंग्य कई बार महीन दिखाई देता है।__
"तुम अभी बदले नहीं
इसलिए बहुमत में हो"
कई बार उनकी सामान्य सी लगने वाली क्षणिका भी बेहद रोचक बन जाती है।___
"चांद की आवारगी बढ़ रही प्रतिदिन
किसी दिन पकड़ा गया तो क्या होगा।
हर गोरी के मुखड़े पर तंबू तान देता है
कोई मजनू थपड़िया देगा तो क्या होगा।"
या
"चांद ने सूरज को समझा दिया आहिस्ते से
भटक जाओगे अंधेरे में गर रात को न निकला मैं"
तुर्की के प्रसिद्ध लेखक ओरहान पामुक कहते हैं :
"लिखना वस्तुतः उस समय का अध्ययन करना है जिस समय से हम गुजर रहे हैं।"
अनूप शुक्ल इन क्षणिकाओं के माध्यम से अपने समय को ही व्यक्त करते हैं।एक व्यंग्य क्षणिका देखें:
"भला हो इश्क का जो उनको निकम्मा कर दिया
वरना वे भी किसी कौम के रहनुमा हो गए होते।"
यह हमारी सियासत पर करारा व्यंग्य है।
आजकल स्थित ऐसी है कि व्यक्ति हंसे तो कैसे हंसे।इस देश में बिंदास होना मना है:
"हंस मत यार बेफालतू फंस जाएगा,
मस्त बिंदास का इल्ज़ाम लग जाएगा।"
इस क्रूशियल समय में विरोधाभास चरम पर है।सहज गतिविधि शंका के दायरे में है।तब अनूप शुक्ल कहते हैं:
"सुबह से मेरी तारीफों के पुल उसने बांध रखे हैं
इतना उतर गए हैं हम उसकी निगाह से।"
अनूप शुक्ल की इन रचनाओं में कई जगह बिंब लाजवाब हैं।ये बिंब सायास नहीं आए हैं।सहज ही आ गए हैं:
"दिन घुसा दफ़्तर में
अकड़कर घंटी बजाई,
उजाला आया ठिठुरते
साहब! केहिका बुला लाई।"
आजकल बिना किसी गुट में रहे जीना संभव नहीं है।इसलिए कवि कहता है:
"भाई इधर रहो या उधर
किसी न किसी दल में रहो।
अकेले रहे तो निपट जाओगे
दल में भी रहो तो चुप रहो।"
बेशक कथ्य,शिल्प और भाषा का ध्यान रखकर ये क्षणिकाएं नहीं लिखी गईं पर इन सबका अभाव कहीं भी दिखाई नहीं देता।
वैचारिक व्यभिचार के इस दौर में जब कुछ भी लिखकर पोस्ट कर दिया जाता हो और उसे कविता मानने और मनवाने की होड़ चल रही हो तो ऐसे समय में अनूप शुक्ल की ये क्षणिकाएं बेहद सुकून देती हैं, क्योंकि ये हमारे जीवन अनुभव के बेहद करीब हैं।ये हमारे छद्म नकाब को हटाने का काम भी करती हैं।हमें यथार्थ के धरातल पर ले जाती हैं।हमे यह भी याद रखना है कि कविता मनुष्यता की खोज का साधन है,ईश्वर की खोज का नहीं।इसलिए ये क्षणिकाएं कविता की कसौटी पर भले ही खरी न उतरती हों,मनुष्यता के प्रति इनकी प्रतिबद्धता असंदिग्ध है।ये क्षणिकाएं एहसास की हांडी को तजुर्बों की नर्म आंच पर रखने की कवायद करती हैं।भाषा सहज और लोकजीवन से संपृक्त है।
अनूप शुक्ल जी को शुभकामनाएं।
[ वरिष्ठ व्यंग्यकार और गीतकार Arvind Tiwari अरविंद तिवारी जी मेरे लेखन पर हमेशा प्रोत्साहित करने वाली टिप्पणियां करते रहते हैं। मेरे लेखन के 'नैसर्गिक व्यंग्य दृष्टि' होने की बात कहते रहे हैं। अरविंद तिवारी जी ने मेरे कविता संकलन "अंधेरे का बड़प्पन" को पढ़कर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी भेजी है। यह मेरे लिए उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणी है। आप भी पढ़िए इसे। कविता संग्रह डाउनलोड करने का लिंक टिप्पणी में दिया गया है। विदेश में रहने वाले मित्र इसे किंडल पर पढ़ सकते हैं। किताब का प्रिव्यू मुफ्त में पढ़ सकते हैं। ]
अनूप शुक्ल ब्लॉग की दुनिया में जाना पहचाना नाम है।उनके पास व्यंग्य दृष्टि है इसलिए उनका लिखा रोचक होता है।वह मूलतः व्यंग्यकार हैं।उनके वृतांत व्यंग्य शैली में होते हैं।उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से वह पुरस्कृत भी हैं।उन्होंने "कट्टा कानपुरी" नाम से व्यंग्य क्षणिकाएं लिखीं हैं।उनके अनुसार यह लेखन मज़े मज़े में किया है। यहां मज़े से आशय व्यंग्य करने से है।इन क्षणिकाओं का संकलन आया है "अंधेरे का बड़प्पन"।यह शीर्षक चर्चित व्यंग्यकार आलोक पुराणिक Alok Puranik ने दिया है।यह संकलन अनूप जी ने सेल्फ पब्लिशिंग द्वारा ('ई बुक') से प्रकाशित किया है।कीमत पचास रुपए मात्र है।
व्यंग्य क्षणिकाएं हालांकि बहुत पहले से लिखी जाती रहीं हैं पर अज्ञेय के ज़माने से इनका लेखन बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। हम उनकी, 'सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं...' कविता को व्यंग्य क्षणिका ही मानेंगे।धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान और कादम्बिनी जैसी अनेक पत्रिकाओं ने इन क्षणिकाओं को खाद पानी देने का काम किया था।सरोजनी प्रीतम,मिश्रीलाल जायसवाल और दिनकर सोनवलकर जैसे अनेक कवियों ने इस विधा को ऊंचाइयों तक पहुंचाया।आज भी क्षणिकाएं बहुत लोकप्रिय हैं।
अनूप शुक्ल अपनी इन क्षणिकाओं के लिए खाद पानी अपने परिवेश से लेते हैं।उनका व्यंग्य कई बार महीन दिखाई देता है।__
"तुम अभी बदले नहीं
इसलिए बहुमत में हो"
कई बार उनकी सामान्य सी लगने वाली क्षणिका भी बेहद रोचक बन जाती है।___
"चांद की आवारगी बढ़ रही प्रतिदिन
किसी दिन पकड़ा गया तो क्या होगा।
हर गोरी के मुखड़े पर तंबू तान देता है
कोई मजनू थपड़िया देगा तो क्या होगा।"
या
"चांद ने सूरज को समझा दिया आहिस्ते से
भटक जाओगे अंधेरे में गर रात को न निकला मैं"
तुर्की के प्रसिद्ध लेखक ओरहान पामुक कहते हैं :
"लिखना वस्तुतः उस समय का अध्ययन करना है जिस समय से हम गुजर रहे हैं।"
अनूप शुक्ल इन क्षणिकाओं के माध्यम से अपने समय को ही व्यक्त करते हैं।एक व्यंग्य क्षणिका देखें:
"भला हो इश्क का जो उनको निकम्मा कर दिया
वरना वे भी किसी कौम के रहनुमा हो गए होते।"
यह हमारी सियासत पर करारा व्यंग्य है।
आजकल स्थित ऐसी है कि व्यक्ति हंसे तो कैसे हंसे।इस देश में बिंदास होना मना है:
"हंस मत यार बेफालतू फंस जाएगा,
मस्त बिंदास का इल्ज़ाम लग जाएगा।"
इस क्रूशियल समय में विरोधाभास चरम पर है।सहज गतिविधि शंका के दायरे में है।तब अनूप शुक्ल कहते हैं:
"सुबह से मेरी तारीफों के पुल उसने बांध रखे हैं
इतना उतर गए हैं हम उसकी निगाह से।"
अनूप शुक्ल की इन रचनाओं में कई जगह बिंब लाजवाब हैं।ये बिंब सायास नहीं आए हैं।सहज ही आ गए हैं:
"दिन घुसा दफ़्तर में
अकड़कर घंटी बजाई,
उजाला आया ठिठुरते
साहब! केहिका बुला लाई।"
आजकल बिना किसी गुट में रहे जीना संभव नहीं है।इसलिए कवि कहता है:
"भाई इधर रहो या उधर
किसी न किसी दल में रहो।
अकेले रहे तो निपट जाओगे
दल में भी रहो तो चुप रहो।"
बेशक कथ्य,शिल्प और भाषा का ध्यान रखकर ये क्षणिकाएं नहीं लिखी गईं पर इन सबका अभाव कहीं भी दिखाई नहीं देता।
वैचारिक व्यभिचार के इस दौर में जब कुछ भी लिखकर पोस्ट कर दिया जाता हो और उसे कविता मानने और मनवाने की होड़ चल रही हो तो ऐसे समय में अनूप शुक्ल की ये क्षणिकाएं बेहद सुकून देती हैं, क्योंकि ये हमारे जीवन अनुभव के बेहद करीब हैं।ये हमारे छद्म नकाब को हटाने का काम भी करती हैं।हमें यथार्थ के धरातल पर ले जाती हैं।हमे यह भी याद रखना है कि कविता मनुष्यता की खोज का साधन है,ईश्वर की खोज का नहीं।इसलिए ये क्षणिकाएं कविता की कसौटी पर भले ही खरी न उतरती हों,मनुष्यता के प्रति इनकी प्रतिबद्धता असंदिग्ध है।ये क्षणिकाएं एहसास की हांडी को तजुर्बों की नर्म आंच पर रखने की कवायद करती हैं।भाषा सहज और लोकजीवन से संपृक्त है।
अनूप शुक्ल जी को शुभकामनाएं।
https://www.facebook.com/share/p/16b2GM5mta/

No comments:

Post a Comment