Monday, October 13, 2025

रेत पर कंचे खेलती बच्ची



 दोपहर को चाय की तलाश में निकले। सड़क पर इक्का-दुक्का लोग आते-जाते दिखाई दिए। कभी कोई गाड़ी सामने से आती दिखती। पीछे से आने वाली गाड़ी के हार्न की आवाज सुनाई देती। इसके बाद गाड़ी आहिस्ता से बगल से निकल जाती।

फैमिली रेस्टोरेंट बंद था। शाम तीन बजे खुलता है। चाय के लिए दूसरा ठिकाना तलाशने के लिए आगे बढ़े।
सड़क पर एक लड़की सर ढके स्कूटी चलाते सामने से आई। स्कूटी किनारे खड़ी करके सड़क पार खड़े लड़के से कुछ बात करती रही। सड़क चुपचाप उनकी बात सुनती रही। लड़की के हाथ में स्मार्ट वाच और चेहरे पर आत्मविश्वास दिख रहा था। बात करके स्कूटी स्टार्ट करके वह आगे चली गई।
एक आदमी अपना घर बनाता दिखा। लकड़ी की बाउंड्री बना रहा था। उससे चाय की दुकान के बारे में पूछा तो उसने बताया -आगे है दुकान।’
आगे सड़क किनारे एक लड़की बालू में बैठी अकेले कंचे खेल रही थी। उसके पास खड़े होकर मैंने उसका फ़ोटो लिया तो वह मुस्कराते हुए कंचे खेलती रही। कुछ देर बाद उसने खेलना बंद करके बालू पर कुछ लिखा। बाद में सब कुछ मिटाकर खत्म कर दिया।
हमने बच्ची को उसका वीडियो दिखाया। वह मुस्कराई। मैंने उसका नाम पूछा तो उसने बताया -रेहला।
रेहला नाम का मतलब खोजने पर पता चला कि प्रख्यात घुमक्कड़ इब्न बबूता के यात्रा वृत्तांत का नाम रिहला है। क्या पता लक्षद्वीप में रेत पर कंचे खेलती रेहला भी आगे चलकर कोई प्रख्यात इंसान बने और कुछ ऐसा काम करे जो उसके नाम से जाना जाये।
अकसर लोग बताते है कि उनके बचपन में खेले जाने वाले खेल कंचे, गुट्टे, गिल्ली -डंडा जैसे खेल अब नहीं खेले जाते। रेहला को गुट्टे वाले अंदाज़ में कंचे खेलते देखकर लगा कि बचपन में खेले जाने वाले खेल कभी ख़त्म नहीं होते। वे कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में खेले जाते रहते हैं। कोई न कोई उन खेलों को खेलता हुआ अपने बचपन की यादें बना रहा होता है।
आगे थोड़ी दूर पर बड़ी बिल्डिंग दिखी। लक्षद्वीप में आने वाले सरकारी विभाग के लोग यहाँ रुकते हैं। बाहर अगाती द्वीप का नक्शा है। एयरपोर्ट से पतले से हिस्से से शुरू करते हुए आगे द्वीप चौड़ा होता गया है। शुरुआत की चौड़ाई का पाँच छह गुना हो गया है द्वीप का दूर का हिस्सा। बेसबॉल के चौड़े बैट की तरह है अगाती द्वीप का नक्शा।
सामने ही चाय की दुकान थी। रेट लिस्ट में चाय के दाम 15 रुपये और B Tea के दाम दस रुपये लिखे थे। हमने उसको बेड टी समझा। बाद में याद आया कि ब्लेक टी के दाम हैं दस रुपये। दूध की चाय काली चाय के मुक़ाबले पाँच रुपए मंहगी थी।
दुकान के काउंटर पर पत्ते में लिपटी कोई चीज रखी थी। पता चला कि स्थानीय मिठाई है। जिसका नाम है -पोकुट । पत्ते के अंदर मुलायम खोल में नारियल का चूरा था। हल्की मीठी थी। हमने पूछा -‘ पत्ता भी खाया जाता है क्या ? ‘ दुकानदार ने हँसते हुए बताया -‘ नहीं।’ केवल मिठाई को मुलायम बनाये रखने के लिए पत्ते में लपेट कर रखी जाती है।
मिठाई को देखकर लगा कि गुझिया के आकार का मीठा मोमो है। मिठाई का दाम पंद्रह रुपये था। मिठाई खाकर , चाय पीकर भुगतान करके हम वापस लौट आए।
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